मुस्लिम विचारकों की आपत्ति वन्दे -मातरम के अर्थ को लेकर है – ख़ास कर वन्दे . ताज्जुब है कि भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग होते हुए भी ,वे इस सोच ,मानसिकता से अभी तक नहीं उबरे कि उनकी पहचान समग्र रूप से विशुद्ध भारतीय होने से है इतर कुछ नहीं ! शब्द वन्दे हो या बन्दे क्या फर्क पड़ता है ?? अपनी मत्री भूमि के लिए वंदन , पूजा ,सम्मान के लिए इस्लामी इबारतों के आधार या स्पष्टीकरण की आवश्यकता भला क्यूँ अनुभव की जाए ?
आम धारणाओं से अर्थ के अनेकार्थ निकले जा सकते हैं , शब्दों से खिलवाड़ कर जनभावनाओं को आहत करने की कला भी विकसित की जा सकती है पर यदि हम अपनी मातृभूमि का दिल से यशोगान करना चाहते हैं हैं तो भारत भूमि हो या वतन , वन्दे हो या बन्दे अंतर नहीं पड़ सकता .
गौरतलब होना चाहिए – 
“ मानस जलधि रहे चिर चुम्बित
मेरे क्षितिज उदार बनो ” – प्रसाद


wah wah!!
मधु लोमेश ने शायद वन्देमातरम पर की जाने वाली आपतियों की तह नहीं देखि है ये बहस बन्दे और वन्दे की नहीं बात सिम्ब्लिस्म की है …..आपने इस पोस्ट जो तस्वीर लगायी है वो आपके लिए भारत हो सकता है हमारे और कम से कम मेरे लिए कतई नहीं……याद दिलाता चलूँ की ये सिम्बल सहारा श्री सुब्रत जी ने अपनी कंपनी के प्रचार के लिए तैयार किया है (वो भले ही भारत पर्व की बात में मिलकर…..और भारत पर्व भी उनकी कंपनी का प्रचार ही tha) दूसरी बात की वन्दे मातरम जिस लेखक ने अपनी जिस रचना में लिखा है उसको पड़े बिना मुसलमानों को ताकीद करना मुनासिब नहीं…. विरोध केवल शब्द या गान का नहीं बल्कि उसकी रचना के उद्देश्यों और लागू करने के पीछे के उद्देश्यों का है…………और मै बड़ी इमानदारी से कहता हूँ की हाँ मैं वन्दे मातरम का विरोधी हूँ और इसके लिए मुझे फाँसी भी मंज़ूर है………क्योकि इसकी रचना ही मुस्लिम विरोध में की गयी है