यह आप बीती है ऐसे इंसान की जो अपना गाँव सब छोड़ कर देश की राजधानी दिल्ली आया था, अपना एवं अपने परिवार का भविष्य सुधारने को, परन्तु हर मोड़ पर उसका सामना या तो भ्रष्टाचार से हुआ या नियति की मार से/ इन सब से दुखी वह इंसान यह सोचने पर मजबूर हो गया कि भ्रष्टाचार इस समाज की नियति है या नियम ?
लगभग २७ वर्ष पूर्व उसने दिल्ली आकर ऑटो चलाना शरू किया और आज भी वह एक ऑटो चालक ही है/ कहने को इस दौरान देश एवं दुनिया दोनों में बहुत बदलाव आये, और बहुत तरक्की भी हुई, परन्तु इस इंसान की दुनिया आज भी दिन भर की लगभग ५०० रुपया की कमाई पर ही निर्भर है, जिसमे से २५० रुपया प्रतिदिन वह अपने ऑटो मालिक को भी देता है/ और बचे हुए पैसों से वह दिल्ली की गीता कालोनी इलाके में रह कर अपने दो बेटों, एक बेटी की पढ़ाई के खर्च के साथ साथ वह अपना, अपनी पत्नी एवं बच्चों का पेट भी पालता है/
इस शख्स की बातों से हमारे समाज में फैले भ्रष्टाचार की गहराई का भी पता चलता है की कब से यह दीमक की तरह हमारे समाज को खोखला कर रहा है और आज भी हम में से शायद ही कोई इससे अछूता रह गया हो/
अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में इस शख्स को रौशनी की एक किरण दिखाई तो देती है, परन्तु वह कहता है की इसमें भी जब तक पूरा देश एक जूट नहीं होगा, तब तक इस समस्या को कोई ठोस समाधान संभव नहीं/
इस शख्स का नाम महेश, शैक्षिक योग्यता आठवीं पास, पेशा ऑटो ड्राईवर, मूल निवासी सीतामढ़ी बिहार, यह परिचय है उस इंसान का जो आज से करीब ३२ वर्ष पूर्व बिहार से नौकरी की तलाश में देश की राजधानी दिल्ली आया/ बहुत भाग दौड़ के बावजूद जब कोई नौकरी नहीं मिली तो अपने परिवार का पालन पोषण की खातिर इसने ऑटो चलाने का निर्णय लिया/ डेढ़ साल तक ऑटो चलाते हुए एक दिन इसकी बहाली होमगार्ड के जवान के तौर पर हो गयी, तब इसे लगा की जो सपना लेकर वह बिहार से दिल्ली पहुंचा था उसे शायद अब पंख लग गए, परन्तु उसे क्या मालुम की यह तो एक सपना ही मात्र है/ करीब ७ वर्षों तक होमगार्ड में नौकरी करते हुए एक दिन सरकार के एक फैसले ने उसे एक दम से सड़क पर ला दिया/ सरकारी फरमान यह था की जिनकी भी शैक्षिक योग्यता दसवीं से कम है उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाए/ चूँकि महेश भी मात्र आठवीं पास था तो उसकी नौकरी भी उन १२००० होमगार्ड के जवानो के साथ चली गयी/
सरकार का यह फरमान महेश जैसे लोगों के लिए मुसीबत का पहाड़ साबित हुआ कुछ दिनों तक तो उसने अपने घर परिवार का खर्चा जैसे तैसे निकाल लिया परन्तु जब पैसे बिलकुल ख़तम होने लगे तो उसके सामने अपने परिवार के पालन पोषण की समस्या मुहं बाए खड़ी हो गयी/
कोई और चारा न देख उसने फिर से ऑटो चलाने का निर्णय किया/ परन्तु यहाँ भी उसकी किस्मत ने उसका साथ छोड़ दिया/ एक दिन उसका लाइसेंस कहीं गिर गया, बहूत धुंडने पर भी जब लाइसेंस नहीं मिला तो महेश ने अपना डुप्लीकेट लाइसेंस बनाने की खातिर आर टी ओ दफ्तर का रुख किया, जहाँ किसी अधिकारी से उसने अनुरोध किया की उसका डुप्लीकेट लाइसेंस उसको दे दिया जाए/ अधिकारी ने पहले तो फोटो कॉपी रख लिया और कहा की काम हो जाएगा, फिर थोड़ी देर बाद उस अधिकारी ने महेश से २०० रुपया के मांग रखी, परन्तु चूँकि लेकिन चूँकि महेश के पास उस समय मात्र सौ रुपया ही था तो अफसर ने फोटो कॉपी वापस देकर उसका काम करने से मन कर दिया /
आर टी ओ दफ्तर से बाहर आकर महेश की मुलाक़ात एक दलाल से हुई उसने महेश का काम सौ रुपया में ही करने का भरोसा दिला कर उससे सौ रुपया और फोटो कॉपी लेकर उसको वहीँ प्रतीक्षा करने को बोल कर चला गया, लम्बे इंतज़ार के बाद भी जब वह दलाल वापस नहीं आया तो, महेश निराश और उदास मन से घर लौट आया/
चूँकि बिना लाइसेंस के महेश ऑटो भी नहीं चला सकता था, और उस वक़्त वो पाई-पाई का मोहताज हो चूका था, इसी मजबूरी के कारण, 2-3 दिनों बाद वह फिर से आर टी ओ दफ्तर पहुंचा/ दफ्तर के बाहर एक चाय दूकान वाले ने उसको एक सिपाही के बारे में बताया जो उसका कम करा सकता था/ महेश उस सिपाही से मिला तो उसने भी १००-१५० रुपया माँगा और उसको दुसरे दिन आने को बोला/ चूँकि महेश के पास कोई और रास्ता नहीं था तो उसने सिपाही पर विश्वास करते हुए उसको १०० रुपया और लाईसेंस की फोटो कॉपी दे दिया/ दुसरे दिन जब वह वापस उस सिपाही से मिलने पहुंचा तो पुरे दिन धुंडने के बावजूद उस सिपाही का भी कहीं कोई पता नहीं चला/ यह वो दिन था जब महेश को अपने घर वापस लौटने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी/ उसके मन में बार बार एक ही सवाल उठ रहा था की इस संसार में किस पर भरोसा किया जाये और कौन है जो भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं/
अंततः थक हार कर महेश उस दिन भी घर लौट आया/ उसने अपनी समस्या अपने एक पडोसी को सुनाया, जिसने इसे हिम्मत देते हुए कहा की उसकी पहचान के लोग आर टी ओ दफ्तर में हैं, मात्र सौ रुपया में वह काम करा देगा/ महेश ने उस पडोसी को सौ रुपया दिया, जिसने शाम में उसको डुप्लीकेट लाइसेंस लाकर दिया और पडोसी होने का हक निभाया /
इस तरह वह फिर से ऑटो चलाने लगा और आज तक दिल्ली की सड़कों पर ऑटो दौड़ा कर परिवार का खर्चा निकाल रहा/ जितना दुःख महेश को अपने होमगार्ड की नौकरी जाने से नहीं हुआ उससे कहीं ज्यादा उसे भ्रष्टाचार का सामना करके हुआ है/ वह बस एक ही सवाल करता है की भ्रष्टाचार हमारे इस समाज के लिए नियति है या नियम और कब तक हमें इससे दो चार होना होगा ???
महेश कहता है कि “साहब किस्मत की मार से तो आदमी फिर भी उबर जाता है, लेकिन भ्रष्टाचार की मार से तो आदमी पूरी तरह टूट जाता है/” महेश के मुताबिक उसने कभी कोई ग़लत काम नहीं किया, लेकिन फिर भी उसके साथ अक्सर ग़लत होता आया/ इतनी बड़ी दुनिया में उसे बहुत कम अच्छे लोग मिले, जिसे वो मिसाल के तौर पर याद कर सके/ उसे तो हर वक़्त सिर्फ अपनी बेबसी, लाचारी और बदकिस्मती की कहानी ही याद आती है और जिससे उसकी आँखें अक्सर नम हो जाती हैं/
महेश इस दुनिया या हमारे समाज में ऐसा अकेला शख्स नहीं जिसने भ्रष्टाचार की मार झेली है, हाँ यह ज़रूर है की वह इस समाज का वो आइना है जिसमे हम अपने समाज की ये तस्वीर देख कर शायद उससे कोई सबक हासिल कर सकें !

