श्रद्धेय प्रधानमंत्री जी ,
यथायोग्य सम्मान !
बीते दिनों ' लिब्रहान आयोग ' के रिपोर्ट से सम्बद्ध समाचारों से पटे अख़बारों को लगातार पढ़-पढ़कर एक प्रकार की बोरियत और उबाउपन ने आपको पत्र लिखने पर विवश किया.'
लिब्रहानआयोग ' की रिपोर्ट आने और उससे प्राप्त जानकारी पर एक हिन्दुस्तानी तबसरा अनायास हीं जेहन में आता है – " खोदा पहाड़ निकली चुहिया " . इस आयोग के गठन से लेकर रिपोर्ट आने तक में देश ने एक युग तो देखा ही साथ ही यहाँ के समाजार्थिक परिस्थितियों में कई युगांतकारी परिवर्तन भी हुए .तब के पैदा हुए बच्चे आज जवान हो चुके हैं ,ये सुन-सुन कर कि सन बानबे के दिसंबर की 6ठी तारीख को भारत के इतिहास में एक 'काला दिन ' है ,जिस दिन तक़रीबन खंडहर में तब्दील हो चुके बाबरी मस्जिद कहे जाने वाले एक विवादास्पद ढांचे को उन्मादियों की भीड़ ने तोड़ कर गिरा दिया वगैरह-वगैरह . साथ ही इसमें आरोपित नामज़दों की लम्बी फेहरिस्त से भी भली-भांति वाकिफ हैं . हाँ ,रिपोर्ट में आया एक नाम निश्चित रूप से नया और चौंकाने वाला है – पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का . यह एक ऐसा नाम है ,जिन्होंने तक़रीबन पांच दशक 'राजनीति की रपटीली राहों 'पर निर्भान्त और निर्लिप्त होकर चलने में गुजार दी -बेदाग़ . जिनके व्यक्तित्व की चमक उम्र ढलने के साथ फीकी न पड़कर और भी बढ़ी ,उर्जस्वित हुई .कहना ना होगा कि वाजपेयी, पंडित नेहरु के बाद एक मात्र ऐसे प्रधानमंत्री रहे जिन्हें वास्तविक अर्थों में 'जन-नेता 'माना जा सकता है . स्वतंत्र भारत के एकमात्र ऐसे व्यक्ति ,जो सक्रीय राजनीति से बाहर होकर भी सबसे लोकप्रिय राजनीतिक शख्सियत बने हुए हैं . और शायद नोबेल पुरूस्कार हेतु औपचारिक रूप से नामित होने वाले अकेले भारतीय प्रधानमंत्री भी वही हैं . कहने का अर्थ है कि ये उपलब्धियां किसी सांप्रदायिक रूप से संकीर्ण मानसिकता वाले या किसी विशेष धार्मिक समुदाय का समर्थन करने और पाने वाले किसी नेता की नहीं हो सकती . बल्कि उसके व्यक्तित्व में किसी के भी प्रति मन में कटुता न लाने की और किसी के मन की कटुता को मधुरता में बदलने की नैसर्गिक क्षमता होनी चाहिए .साथ ही जिसका कृतित्व 'मनसा -वाचा -कर्मना ' के तदाकार का साक्षात् प्रमाण हो . इसमें शायद आपको भी संदेह न होगा कि ऐसा व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों अटल जी के पास है और तभी तो आपने भी एकाध वर्ष पूर्व उन्हें भारतीय राजनीति का पितामह बताया था . ऐसे में जबकि सियासत के मैदान से एक लम्बी ,यादगार और अद्वितीय पारी खेल कर वे संन्यास ले चुके हैं तब उनपर लिब्रहान की रिपोर्ट और आशुतोष जैसे टुच्चे पत्रकारों द्वारा आरोप लगाना निश्चय हीं दुर्भाग्यपूर्ण और दुखदायी है . इससे दाग उनके दामन में नहीं लगेगा बल्कि भारत की राजनीतिक संस्कृति और उससे बढ़कर सच्ची मानवीयता की आत्मा पर कालिख पुत जाएगी .
" कहने को तो और भी बहुत कुछ है पर अगले पत्र में कहूँगा "
पत्र पर सुध लेने की उम्मीद करते हुए -
एक भारतीय नागरिक


दाग उनके दामन में नहीं लगेगा बल्कि भारत की राजनीतिक संस्कृति और उससे बढ़कर सच्ची मानवीयता की आत्मा पर कालिख पुत जाएगी . … – सहमत हूँ आपसे |
वैसे भी कांग्रेस के लिए तो बस नेहरु परिवार ही श्रद्धेय है … बाकी सब ऐरा-गिरा है ….
ji bilkul saty vachan is report me chuhiya hi nikli hai aur agar report me vajpeyi ji ka naam na aaya hota aur P.V.Narsimha rav ko na chhipaaya gya hota to shayad wo jise ham chuhiyaa kah rahe hai wo bhi na nikalti…….magar mahabharat k liye aaj itihaas dhratraashtr ko hi jimmedar thahraata hai…..ab ye kechad uchhalna hua ya nahi ye mujhe nahi malum……anoop aakash verma…..wwwanoopverma@gmail.com……………..
में सिर्फ इतना कहना चाहुगा के अपने स्वार्थ के लिए किसी महा पुरुष पर कीचड़ उछालना ये अच्छी बात नहीं हे
किसी भी हादसे के बाद तत्कालीन सरकार द्वारा विरोधी दल पर तोहमत मढने के उद्देश्य से आयोग बैठाने का बहुत पुराना चलन चला आ रहा है। इस आयोग पर देश के लाखों करोडों खर्च होने के बावजूद लिब्रहान ने जो रिपोर्ट बनाई है वो बिल्कुल एक तरफ़ा है और रद्दी की टोकरी के हवाले करने काबिल है। नरसिन्हराव को क्लिन चिट देना और अटलजी को कसूरवार करार देना सिर्फ़ इन दो बातों से लिब्राहन देश के प्रबुद्ध जनों में नफ़रत के पात्र हो गये हैं क्योंकि इन दोनों बातों का सच्चाई से दूर का वास्ता भी नहीं है।