अंधेर नगरी|2011/02/01 10:49 pm

नासूर है मगर नामुमकिन नहीं है भ्रष्टाचार

महाराष्ट्र में एडिशनल कलेक्टर को जिंदा जलाने की प्रतिक्रिया ने , सरकार , व्यवस्था , राजनीति सबमें पनप और पैठ जमा चुके भ्रष्टाचार के प्रति पहले से ही आक्रोशित आम जनमानस में एक अजीब सी बेचैनी और उत्तेजना भर दी है । आज सार्वजनिक सेवा से लेकर व्यवस्था से जुडा हर वो आदमी जिसने अब भी किसी न किसी स्तर पर अपनी इमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा को बचाए रखा है वो सोचने पर मजबूर हो गया है कि क्या अब वो समय आ गया है जव या तो इस भ्रष्टाचार के दानव को पूरे देश को निगलने की इजाजत दे दी जाए या फ़िर कि अब ऐसी चोट की जाए कि भ्रष्टाचार की ताबूत में हर छोटी बडी चोट एक कील का काम करे । काश कि ये घटना और इस तरक की अन्य घटनाओं में से कोई भी वो काम कर जाता जो जालियांवाला बाग ने किया था । बेशक अभी ऐसा लग रहा हो कि आज जनयुद्ध और जनाक्रोश नाम के भ्रष्टाचार विरोधी जनांदोलन देश के सबसे निचले स्तर से लेकर सर्वोच्च स्तर तक जम चुके भ्रष्टाचार को मिटाने में कोई भी बडी भूमिका निभा सकेगा । किंतु सोनवणे की शहादत यदि ऐसे छोटे छोटा आंदोलनों के लिए उत्प्रेरक का काम कर रहे हैं तो समझ जाना चाहिए कि बावजूद इसके कि आज देश का बहुत बडा हिस्सा खुद इस भ्रष्टाचार मशीनरी का अंग बन चुकने के बावजूद भी अब इस स्थिति से उकता गया है ।

भ्रष्टाचार और उससे जुडे मुद्दों पर जब भी बात शुरू होती है तो बहस वहीं लगभग दम तोडती हुई महसूस होती है जब पलट के कोई पूछ देता है …ओह अच्छा तो आम ईमानदार हैं ..एकदम ईमानदार ..लेकिन आपकी ईमानदारी उनकी ईमानदारी जितनी नहीं है ..यानि ईमानदारी को भी लेयर में बांट रखा गया है ..और आखिरी वाली कैटेगरी होती है डैड ऑनेस्ट यानि मरी हुई ईमानदारी । यानि कि सबसे बडी समस्या ये है कि इस हमाम में से उन्हें तलाशना बहुत कठिन है जो हमाम में भी नंगे होने से बचे रह पाए हैं । लेकिन क्या सचमुच ही उन्हें तलाशना , उन्हें पहचानना कठिन है । मुझे तो उलटा ये लगता है कि किसी भी दफ़्तर में एक ईमानदार चपरासी से लेकर एक अनुशासन पसंद पाबंद अधिकारी को मेंटल खोपडी , सनकी , गांधी जी का अवतार , राजा हरीशचंद्र की औलाद जैसे विशेषणों के साथ आराम से पहचाना जा सकता है । और चाहे वो मुन्सिपल कमिश्नर जी आर खैरनार हों , या किरन बेदी , टीन एन शेषन हों और ऐसे ही उंगलियों पर गिने जाने वाले अधिकारी उनकी धमक न सिर्फ़ उनके महकमें में बल्कि पूरे मंडल में बखूबी देखा जा और महसूस किया जा सकता है ॥

इतना तो अब तय है कि आज देश का कोई भी पद , कोई भी महकमा , कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है कि जहां सबसे निचले स्तर से लेकर सबसे ऊपर तक घूसखोरों , दलालों और भ्रष्टाचारियों की पूरी फ़ौज शामिल हो । इसलिए आम तौर पर जब भी कोई एक गांठ खींच कर खोलने की हिम्मत करता है तो पूरा तंत्र ही चूंकि जुडा होता है तो सब कुछ उघड और उधडने का बाद पूरी तरह नग्न दिखने के डर से उसकी लीपापोती हो जाती है । फ़िर चाहे वो टू जी टाईट जी घोटाले की बात हो या किसी लाईसेंस बनाने के दफ़्तर में रंगे हाथों पकडा गए किसी दलाल की बात हो । अब से कुछ समय पहले तक और अभी भी बहुत हद तक न्यायपालिका की ओर लोग मुंह बाए देखते थे कि , अब लोकतंत्र का यही वो हथौडा बचा है जो इस भ्रष्टाचार का मुंह थकूच के फ़ोड सकता है । लेकिन पिछले कुछ समय में जिस तरह से न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की बात निकल कर सामने आई है उसने अब ये भ्रम भी तोड दिया है कि देर सवेर न्यायपालिका , कार्यपालिका की नाक में नकेल डाल कर उसे सही रास्ते पर डाल ही देगी । सोचिए कि भ्रष्टाचार की हालत ये तब है जबकि अभी ….भारतीय…न्यायपालिका और भारतीय सेना में व्याप्त असीमित भ्रष्टाचार की कई परतों में छुपे हुए भ्रष्टाचार का पहला छिलका भी नहीं उतारा जा सका है आज तक ….यदि उन अंधेरों में झाडू लगाई जाए तो …सडांध कई गुना बढ जाएगा ..। जी हां सिर्फ़ इन महकमों में कार्यरत लोग और उससे जुडे उनमें सेवारत कर्मचारी अधिकारी ही जानते हैं कि इन स्थानों पर भी समस्या कितनी गंभीर है । सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति ये जानते हुए कि उनके वरिष्ठ न्यायमूर्ति ने वो सूचना जानबूझ कर सार्वजनिक नहीं की है जो उन्हें दी ही इसलिए गई थी कि वे स्थिति को ठीक ठीक समझ सकें , और इस बात का खुलासा वे तब करते हैं जब उनके वरिष्ठ अवकाशप्राप्त कर चुके होते हैं । इतनी दबंगई …हद है जब इतना दबाव उस स्तर पर महसूस किया जा सकता है तो एक आम आदमी की बिसात ही क्या ??

लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि भ्रष्टाचार को ऐसे ही बढते हुए चुपचाप देखते रहने के अलावा कोई और रास्ता ही नहीं है । बिल्कुल है । न न न इसके लिए बहुत बडी योजनाओं और , बहुत सारी एजेसियों , आदि की जरूरत नहीं है …बिल्कुल नहीं ….आपको बस हर महकमे , दफ़्तर , गलियारे में ….एक आध बचे ईमानदार मेंटल तलाशने होंगे ..और कैमरे के आगे उन्हें गला फ़ाड कर सच बता देने को उकसना भर है …एक बार ये आग भर लगा देनी है उन तमाम जूनुनी दीवानों में कि अब देश को यदि कोई बचा सकता है तो उनकी वो हिम्मत/ हिमाकत ही बचा सकता है जिसे उन्होंने सिर्फ़ अपनी नौकरी खोने , जेल जाने , और शायद जान चले जाने के कारण कहीं दबा छुपा कर रखा है । अब तो वैसे भी उन्होंने सत्येंद्र दूबे , यशवंत सोनवणे , किरन बेदी , जी आर खैरनार ..सब कुछ बन कर देख लिया तो फ़िर ऐसे भी सही और वैसे भी सही । हां उस वक्त मीडीया से जुडे उन तेवरों के साथ की भी जरूरत होगी जिनकी स्टोरी को कहीं न कहीं इस वजह से कैंची से कतर दिया जाता है ताकि अखबार के मुनाफ़े और उसके सरपरस्त के चेहरे पर शिकन न आए । वे ही इस चिंगारी को आग का रूप दे सकते हैं । एक और दूसरा उपाय है इन सबको कैमरे की ज़द में ले आया जाए । सब कुछ , दफ़्तर , कार्यालयों , संसद , अदालत , अस्पताल सारी वो जगहें जहां भ्रष्टाचार के अंडे पनपने की ज़रा भी गुंजाईश है उन्हें कैमरे की नज़रों से पाट दिया जाए और सब कुछ दिखाया सुनाया आम चौराहे पर खडी जनता को । हो सकता है कि जो देख कर उत्तेजित हो रहा हो उसकी खुद की सूरत भी अगली स्क्रीन पर दिखाई दे जाए । मगर दोनों ही स्थितियों में आम लोगों को कम से कम ये तो पता चल ही जाएगा कि कौन कि्स स्तर पर कितना धंसा हुआ दलदल में । संसद सत्र से लेकर अदालती कार्यवाही तक , मोटर चालन परीक्षा से लेकर किरोसिन लेने वालों की कतार तक सब कुछ खोल कर रख दो आम जनता के लिए । लेकिन ये कदाचित उतना आसान नहीं है मगर शुरूआत तो की ही जा सकती है । सूचना के अधिकार ने कुछ ही दिनों में आम आदमी को इतना प्रभावशाली बना दिया है कि आज सरकार रोज किसी न किसी बहाने से इसमें तरह तरह की तब्दीली कराने के जुगत में लगी हुई है ।

भ्रष्टाचार तब तक खत्म नहीं हो सकता जब तक उसे सरे आम नग्न करके शर्मिंदा न किया जाए । यदि हालात इतने बुरे हैं कि एक दूसरे को शर्मसार करने और होने की नौबत आ जाती है तो भी , उस कीमत पर भी ये परंपरा चलनी ही चाहिए । इसके साथ ही उन मुट्ठी भर गिने चुने सिरफ़िरों , जो ईमानदारी की मिसाल बन चुके हैं , उन्हें इतना प्रबल समर्थन और हिम्मत देनी चाहिए कि फ़िर उनका एक मुष्ट प्रहार ही इस भ्रष्टाचार को नेस्तनाबूत कर सके । चाहे गलत रास्ते से ही मगर एक सही उद्देश्य का प्रतीक बना असांजे जब अमेरिका के गले की फ़ांस बन गया तो भी आम जनमानस के साथ ने हुई उसे उस आंच से साफ़ बचाए रखा है अब तक ॥ तो इंतज़ार किया जाए बस उस क्षण का जब अचानक ही ये चिंगारी सुलग उठे और एक दावानल का रूप धर ले ॥

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