अंधेर नगरी|2012/02/19 4:04 pm

नालंदा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का झोल

Nitish kumar_nalanda international university_Amartya senभारत में कई ऋषि मुनि, पीर ,गुरु व् ज्ञानी हुए है हमने उन्हें नहीं देखा , ना ही तक्ष-शिला , भोज- शिला ,विक्रम -शिला, नालंदा, वल्लभी या कांची जैसे विश्वविद्यालय, पर फिर भी अपने लोगो के मुंह से भारत को विश्व गुरु कहते सुना है भारतीय धर्मं और दर्शन के प्रति विश्व भर में अगाध श्रद्धा को देखा है. अमेरिकी इतिहासकार विल डूरंट ने ने भारत को अपनी सभ्यता की मातृभूमि बताया, साथ ही माना था की संस्कृत सभी यूरोपीय भाषाओँ की माँ है, भारतीय दर्शन, यूरोपीय दर्शन की जननी है. उनका मानना था की भगवन बुद्ध के सिद्धांतो को यूरोपीय ईसाइयत में ढाला गया है. चीन के अमरीका में पूर्व राजदूत हु शिह का मानना था की भारत ने बिना कोई सैनिक भेजे लगभग 20 शताब्दियों तक चीन को सांस्कृतिक रूप से जीत लिया था , तो ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ खड़ा होता है की वो कौन से ताकत थी की चीन जैसा ज्ञान- तकनिकी में समृद्ध राष्ट्र भी भारत से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. उत्तर है भारत का प्राचीन ज्ञान- दर्शन, जो नालंदा, तक्षशिला, शारदा पीठ कश्मीर, भोजशिला, तिरुचिरापल्ली, सोमपुरा पुष्पगिरी ओदान्तपुरी जैसे मनको में पिरोया था . भारत भूमि पर सदियों से आक्रान्ता आयें, बसे ढले पर पर कभी इन मनको को नष्ट नहीं किया गया. कई सदियों तक रहने के बाद, धर्म दर्शन के इन केन्द्रों को वो सहना पड़ा जो कभी मानव इतिहास में देखा न सुना गया था जिस विद्या को लूटा नहीं जा सकता था आक्रंताओ ने जला दिया. अरब राष्ट्रवाद के जागृत होने के उपरांत जिस प्रकार प्राचीन मिस्र की आत्मा अलेक्सांद्रिया, प्राचीन इरान की आत्मा को तिस्फुन में और प्राचीन भारत की आत्मा को नालंदा में समाप्त किया गया वो सम्पूर्ण मानव इतिहास के लिए त्रासदी थी.

इतिहास गवाह है हर मानव त्रासदी का अंत भी मानव ही करता रहा है , अगर नालंदा को एक मुस्लिम आक्रान्ता की हनक ने विलुप्त करवा दिया तो उसी नालंदा के पुनः प्राण प्रतिष्ठा की परिकल्पना एक मुस्लिम राष्ट्राध्यक्ष ने द्वारा होना भी इतिहास का न्याय है. नालंदा का इतिहास ही कुछ ऐसा है जो यहाँ आया वो प्रभावित हुए बिना न रह सका , तभी तो नालंदा में महज़ एक रेल कोच कारखाने के शिलान्यास के मौके पर आए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार से नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने का आह्वाहन किया। चिराग जला दिए गए थे फिर इसी बीच राजनैतिक उठापटक ने नितीश बाबू को बिहार का मुख्यमंत्री बनवा दिया, तो उनकी सरकार ने इसकी स्थापना की पहल की। सन 2010 में लोकसभा में एक बिल पेश हुआ और प्रस्ताव ध्वनिमत से ‘अंतर्राष्ट्रीय नालंदा विश्वविद्यालय’ की नींव पड़ी, तो सन 2011 में राज्य सरकार द्वारा 446 एक़ड भूमि विश्वविद्यालय प्रशासन को उपलब्ध करवा दी गयी. आजकल इस विश्वविद्यालय की के शुरूआत के लिए तैयारियां जोरों से चल रही हैं और मौजूदा योजना के मुताबिक वर्ष 2012 से इस विश्वविद्यालय में बौद्ध अध्ययन सहित सात विषयों की पढाई शुरू कराये जाने की संभावना है. विश्वविद्यालय की परिकल्पना एक अन्तराष्ट्रीय संस्था के तौर पर की गयी है जो बौध मत समेत सभी प्राचीन दर्शनों पर अध्यन व् शोध करेगा जिसकी मिलकियत भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व के लिए होगी इसके प्रबंधन का जिम्मा भी अन्तराष्ट्रीय होगा जिसमे भारत के प्रतिनिधि भी नुमायिन्दगी करेंगे , प्रबंधन संचालन समिति में बिहार सरकार के दो व केंद्र सरकार के तीन मनोनीत सदस्य होंगे। संचालन समिति में बिहार सरकार के संयुक्त सचिव एवं केंद्र सरकार के विदेश विभाग के संयुक्त सचिव सहयोग करेंगे। कुलपति संचालन समिति के सदस्य होंगे। विश्वविद्यालय के कुलपति को एवं सम-कुलपति को केंद्र सरकार के विदेश मंत्रालय के सचिव स्तर का दर्जा प्राप्त होगा। दिल्ल्ली विश्व विद्यालय से सम्बद्ध रीडर डॉo गोपा सभरवाल को इस नए विश्वविद्यालय की कमान सौंप दी गयी . PM मनमोहन अमर्त्य को NIU का परामर्शदाता बनाते है तो बदले में  मनमोहन की बिटिया NIU के advisory council में आती है

 

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