अंधेर नगरी|2010/06/19 6:03 pm

धनवान नियम पर शासन करते हैं और नियम निर्धनों पर

…छब्बीस साल से एक एंडरसन को हम नही पकड पाए, कसाब और अफ़जल गुरू को अभी तक फांसी नही हो सकी…… जंज़ीरें, जंज़ीरें ही हैं, चाहे वे लोहे की हों या सोने की, वे समान रूप से मनुष्य को गुलाम बनाती हैं। क्या एंडरसन ने भी कभी किसी ऐसी ही जंजीर का तो सहारा नही ले लिया था? हमें देश की न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है, मगर जरा उन लोगो के धैर्य का सोचे जो इन घिनौने कार्य करने वालो के शिकार बने है । क्या उनके लिए कोई समय सीमा नही है ?

26 साल पहले भोपाल के यूनियन कार्बाइड संय़ंत्र से 40 टन मिथाइल आइसोसाइनेट गैस रिसता है और इस गैस रूपी काल के गाल मे हजारों लोग समाहित हो जाते है । कई लाख लोग तो उस गैस के दुष्प्रभाव का सामना आज तक कर रहे । आज कोई जाकर उन लोगों से पूछे की उस काली रात का प्रभाव आज भी वो कैसे झेल रहे है । गैस त्रासदी का मार झेल रहे लोगों और उनके दुख मे दुखी समस्त भारत की जनता आज तक इस इंतजार मे थी कि कुछ तो न्याय जरूर होगा । मगर जब न्याय हुआ तो ऐसा न्याय जो आज तक के सबसे बडी औधोगिक त्रासदी का बडा निराशाजनक पटाक्षेप कहा जा रहा है।

भूत लौटने वाला नहीं, भविष्य का कोई निश्चय नहीं; सँभालने और बनाने योग्य तो वर्तमान है । मगर आज का वर्त्तमान जो इन पीडितों के लिए बना वो स्वागत योग्य तो कदापि नहीं कहा जाएगा । हजारों लोगों की जान लेने वाले हादसे के लिए सात लोगों को “लापरवाही से मृत्यु का कारण बनने के लिए‘दो साल की कैद हुई और मामूली सा जुर्माना लगाया गया…हां और एक दिलचस्प बात की लगे हाथों आरोपियों की जमानत भी हो गई और किस्सा हुआ खत्म । 26 साल अर्थात 9490 दिन, या फिर 227760 घंटे, या फिर 327974400 मिनट, या फिर 19678464000 सेकेंड का इंतजार और एक जमानत के साथ उस इंतजार का हुआ पटाक्षेप ।

यहां न्यायपालिका को हम क्या कह सकते है उनकी अपनी सीमाए रही होंगी , क्यूकिं जब 1996 मे सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले मे भारतीय अभियुक्तों पर‘गैर इरादतन हत्या का मामला बदलकर लापरवाही से मृत्यु का कारण बनने का आरोप तय किया था तभी इस बात का आभास हो गया था कि इस मामले मे अब शायद भारतीय कानून ज्यादा कुछ नही कर पाएगी । क्योंकि यहां पर पुलिस-नेता-प्रशासन का कुछ ऐसा ताना बाना था कि उसे छेद पाना कानून के लिए टेढी खीर हो चली थी ।

उस त्रासदी का प्रभाव अभी भी लोगों के स्वास्थ्य पर देखा जाता है । आज भी मिथाइल आइसोसाइनेट गैस और रसायनिक जहर चर्म रोग, दमा, कैंसर और न जाने कितनी बीमारियों के रूप मे लोगों के शरीर मे घुला हुआ है । असर तो ऐसा है की आज भी बच्चे अपंग पैदा होते रहते है, और मां के दूध में ज़हरीले रसायन पाये जाने की बात तक भी सामने आती रही है । मानव इतिहास मे ऐसी त्रासदी की मां का अमृत समान दूध भी विषाक्त हो गया और इसके जिम्मेवार लोगों को केवल लापरवाही से मृत्यु का कारण बनने के लिए‘दो साल की कैद हुई और मामूली सा जुर्माना लगाया गया और फिर लगे हाथों इन आरोपियों की जमानत भी हो गई ।

ये है हमारा देश महान भारत । यहां के सन्दर्भ मे शक्तिशाली को अपराधी बनाना और उसे कठोर दंड देना एक अत्यंत मुश्किल कार्य माना जाता है । कहने को तो राजनीति की एक नई पीढ़ी तैयार हो गई, सरकारें आई और चली गईं, लेकिन किसी को आज तक इन गैस पीड़ितों से कोई ज्यादा मतलब नही रहा। फाईलों मे और मीडिया मे तो कई रिकार्ड प्रस्तुत कर दिये जाते है पर धरातल मे अभी भी क्या एक व्यवस्था के तहत पीडितो की सभी जरूरतो को पूरा किया जाता रहा है । कमियां तो इस मामले मे पहले से हीं थी उसपर से जो फैसला इस भयानक त्रासदी के आरोपियों के सन्दर्भ मे आया वो इस बात को चरितार्थ कर गया कि सामर्थ्य्मूलं स्वातन्त्र्यं अर्थात शक्तिस्वतन्त्रता की जड है । जो शक्तिशाली थे वो भला कारागार मे कैसे रह सकते थे ।

किसी ने खूब कहा कि विपत्तियों को खोजने , उसे सर्वत्र प्राप्त करने , गलत निदानकरने और अनुपयुक्त चिकित्सा करने की कला ही राजनीति है । और इस राजनीति का प्रभाव ये है कि आज भी उस गैस जनित बीमारियों से करीब एक लाख लोग जूझ रहे हैं और प्रभावित लोगों की औसत उम्र महज 46-47 वर्ष रह गई है। स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था कि सर्वसाधारण जनता की उपेक्षा एकबड़ा राष्ट्रीय अपराध है । तब तो ये मान लिया जाना चाहिए कि 26 साल से यह बडा अपराध हमारे महान भारत देश मे बडी सहजता से होता चला आ रहा है । लोकतंत्र इस धारणा पर आधारित है कि साधारण लोगों में असाधारणसंभावनाएँ होती है, फिर इस असाधारण संभावना वाले साधारण लोगों के साथ ऐसी नाइंसाफी क्या लोकतंत्र के साथ एक खिलवाड नही है ?

गुजरे 26 सालों में लगभग एक लाख से अधिक गैस पीड़ितों के स्थाई रूप से अपंग होने और करीब 3 लाख से ज्यादा लोगों के जटिल बीमारियों से ग्रसित होने की बात प्रकाश मे आयी है , अर्थात विपत्तियों का दौर भोपाल गैस पीड़ितों के लिए अनवरत जारी है । और इन विपत्तियों के जिम्मेवार लोगों को केवल लापरवाही से मृत्यु का कारण बनने के लिए ‘दो साल की कैद हुई और मामूली सा जुर्माना लगाया गया और फिर लगे हाथों इन आरोपियों की जमानत भी हो गई । मै इस लाईन को बार बार दोहरा इसलिए रहा हूं ताकि हम उस अंतहीन दर्द के दर्दपूर्ण अंत का औचित्य समझ सके । पर ये बहुत मुश्किल है और फिर से ये बात सही नजर आती है कि यहां पर पुलिस-नेता-प्रशासन का कुछ ऐसा ताना बाना था कि उसे छेद पाना कानून के लिए टेढी खीर हो चली थी ।

तो कुल मिलाकर बात यही नजर आती है कि चाहे वो एंडरसन हो या अफजल गुरू या फिर कसाब ये इतने ज्यादा भारतीय हो जाते है कि इनपर हमारे देश के पुलिस-नेता-प्रशासन की तिकडी दिलों-जान से न्यौछावर हो जाने को तैयार रहती है । नतीजा सामने है पर एक बात तो तय है किकानून चाहे कितना ही आदरणीय क्यों न हो , वह गोलाई को चौकोर नहीं कह सकता । व्यवस्था मस्तिष्क की पवित्रता है , शरीर का स्वास्थ्य है , शहर की शान्ति है , देश कीसुरक्षा है । जो सम्बन्ध धरन ( बीम ) का घर से है , या हड्डी का शरीर से है , वही सम्बन्ध व्यवस्था का सब चीजों से है ।

अब जब व्यवस्था ही कानून के सामने खडा नजर आये तो स्थिति मे बदलाव की क्या उम्मीद करें। तो क्या लोकतंत्र के उपर कही गयी एक बात को मान लिया जाए कि लोकतंत्र ऐसी व्यवस्था है – जहाँ धनवान, नियम पर शासन करते हैं और नियम, निर्धनों पर ???? करे कल्पना उस समय की जब न राज्यं न च राजासीत् , न दण्डो न च दाण्डिकः । स्वयमेव प्रजाः सर्वा , रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥

( न राज्य था और ना राजा था, न दण्ड था और न दण्ड देने वाला। स्वयं सारी प्रजा ही एक-दूसरे की रक्षा करती थी ।)

1 Comment

  • डा ० पुरुषोत्तम मीणा

    बहुत खूब शानदार लिखा है, साधुवाद एवं शुभकामनायें!
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    जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

    काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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    उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

    आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

    हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

    इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

    अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

    अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

    शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

    सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

    जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
    भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
    7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
    फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
    E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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