अंधेर नगरी|2010/07/18 3:18 pm

कुछ करो पवार साहब !

हिंदुस्तान को किसी ज़माने में सोने की चिड़िया कहा जाता था ऐसा अक्सर हम बचपन से सुनते आए है और किताबों में भी पढ़ते आए है पर आज के हिंदुस्तान का असली चेहरा पूरे विश्व के सामने है दो जून की रोटी के लिए रोज़ संघर्ष करने वालो की संख्या विश्व के किसी देश के मुकाबले हिंदुस्तान में सबसे अधिक है इसके आठ राज्यों में सबसे ज्यादा 42 करोड़ गरीब लोग बसते है, जहां किसी ज़माने में अपने लोगो को दो जून की रोटी दिलाने के लिए ख़ैरात के तौर पर अमेरिका से घटिया लाल गेहूं लिया जाता था वही आज अपने खून पसीने अपने ही देश में पैदा हुआ उम्दा गेहूं कुडे में पड़ा सड़ने रहा है और दूसरी ओर इसी की तलाश में गरीब लोग अपना घर द्वार छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर फुटपाथ पर नरकीय जीवन बिताने को मजबूर है पर हैरानी की बात ये है कि इसके बावजूद कृषि प्रधान देश के कृषि मंत्री जो आजकल क्रिकेट मंत्री के तौर पर ज्यादा जाने-पहचाने जाते है माननीय शरद पवार साहब को ये समस्या अभी भी क्रिकेट की समस्याओं के मुकाबले कमतर ही लगती है

इससे बडी विडम्बना और क्या होगी कि कृषि प्रधान देश में हर साल 20 हजार टन गेहूं गोदामों मे रखा रखा ही सड़ जाता हो, ऐसा सरकारी तौर पर माना जाता है पर गैर सरकारी तौर पर माने तो ये आँकड़ा 1 लाख टन गेहूं से भी अधिक है ये आँकड़े उस समय हमें ज्यादा चिढ़ाते हुए नज़र आते है जब हमारे देश के 8 राज्यों के गरीब आफ्रिका के 26 देशो की ग़रीबों की तुलना में कही ज्यादा है,बिहार. झारखंड, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल में 42 करोड़ से ज्यादा लोग बसते है जबकि आफ्रिका के 26 सबसे गरीब देशो की तादाद महज 41 करोड़ ही है हमारे इन्हीं 8 राज्यों में भारत के आधे से ज्यादा और पुरी दुनिया के एक तिहाई से ज्यादा गरीब लोग रहते है ऐसे में देश की 37 फीसदी आबादी याने की तकरीबन 9 करोड़ परिवार ग़रीबी रेखा के नीचे याने बीपीएल योजना के तहत आते है इनमें से तकरीबन 2 करोड़ 50 लाख परिवार अत्यंत गरीब है जिन्हें जीवन यापन के लिए अन्त्तोदय योज़ना के तहत 2 रुपये किलो गेहूं और 3 रुपये किलों मे चावल सरकार मुहैया कराती है, इस सब के लिए सरकार द्वारा प्रतिवर्ष तकरीबन 1 करोड़ 70 लाख टन अनाज जारी किया जाता है ये उन खुदकिस्मत गरीबो के लिए है जिनका नाम सरकारी आंकड़ो में दर्ज है पर वे करोड़ो गरीब न तो जिनके पास कोई कार्ड है और न ही किसी फाइलों या योजनाओं में उनका नाम है वे आज भी इस बेतरतीब मंहगाई में अनाज खरीदकर खाने के लिए मज़बूर है पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि वे इसे खरीदे तो खरीदे कैसे इसके लिए उनके पास पैसे ही नही है ।

दूसरी ओर देश के अनाज का भंडारण करने वाली सरकारी एजेंसियों और एफ सी आई के गोदामों में लाखों करोड़ो टन अनाज पड़ा सड़ रहा है एफ सी आई के अधिकारी इन्हें भंडारण की समस्या मानकर अपना पल्लू झाड़ने में लगे रहते है कृषि मंत्री पवार साहब की माने तो अभी स्थिति काबू में है देश में सिर्फ 0.3 प्रतिशत अनाज ही सड़ने की स्थिति में है पर ये आंकड़े अफसरों के द्वारा घालमेल कर फाईलों में बनाएं जाते है वस्तुस्थिती इसके काफी विपरीत है अफ़सर इस आंकड़े की कभी भी 0.5 से ज्यादा फाईलो में बढ़ने नही देते जिनके चलते उनपर किसी प्रकार की कार्यवाही हो सके,रही बात सड़े गले आनाजों की तो उन्हें फिर से बोरों में भरकर उन करोड़ो गरीब लोगो के लिए भेज दिया जाता है जो सरकारी रहमों करम पर अपने पेट की आग बुझाने के लिए मजबूर रहते है

विश्वपटल पर सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनने के ख्वावों में डूबें देश का वर्तमान हालात क्या इसे कभी हकीक़त के धरातल पर ला पाएंगी । हिंदुस्तान एक कृषि प्रधान देश है यहा कि अर्थव्यवस्था पुरी तरह कृषि पर ही निर्भर रहती है ऐसे में सरकारी अव्यवस्थाओं के चलते देश के अन्नदाता के खून पसीने से उपजे अनाजों की इस हालात का रोना कौन रोऐंगा, निश्चित तौर पर परोक्ष रुप से इसका असर अन्नदाताओं पर अवश्य पड़ेगा। ग़रीबों का क्या वे तो सरकार के रहमों करम पर ही अपना जीवन यापन करने को मजबूर है और लगभग आगे भी रहेंगें । इसे विडम्बना नही तो और क्या कहेंगें की एक तरफ तो गोदामों में अनाजों के ढेर सड़ने को मज़बूर है और दूसरी ओर इन्हीं अनाजों के लिए टकटकी बांधे गरीब तिल-तिल भूखों मरने को विवश है

हालात काबू में है और,प्लीज मीडिया इसे ज्यादा तूल न दे … ये बयान है खेत खलिहानो से दूर क्रिकेट के मैदान पर चियर्सगल्रर्स के ठुमकों का आंनद उठाने में ज्यादा मसगूल रहने वाले हमारें देश के कृषि मंत्री श्री शरद पवार साहब का । देश की कृषि नीति से ज्यादा क्रिकेट नीति की ओर इनका ज्यादा रुझान रहता है इनकी माने तो देश में हालात अभी काबू में है और स्थितीयां पहले से बेहतर हो रही है पर असली चेहरा तो देश की इन आठ राज्यों के किसी भी गांवो कस्बों मे जाकर आसानी से देखा जा सकता है जिन्हें आज भी आई पी एल से ज्यादा बी पी एल की सुविधाओं की ज़रुरत है ।

1 Comment

  • अब आप पवार साहब को नहीं जानते तो ऐसी अपेक्षा रखेंगे ही उनसे.
    ठीक से जान लीजिये उन्हें . वे मंत्री किस विभाग के हैं ये भी शायद नहीं जानते वे . जानते हैं तो सिर्फ गुगली ,योर्कर ,चौका, छक्का वगैरह या कुल्हे मटका कमर के नीचे तूफ़ान मचा देने वाली चीयरलीडर्स .
    वे अपनी पार्टी के बालर ,बैट्समैन ,फील्डर ,अम्पायर सभी कुछ हैं .हमेशा टास जीतने की कला जानते हैं .क्योंकि सिक्का उन्हीं का होता है ‘ शोले ‘ के अमिताभ बच्चन वाला .जिसके भी साथ खेलें चित भी मेरी पट भी मेरी .और जिसको प्यार से अब तक गले लगाते रहे उसी से उसी की कब्र खुदवा उसी को दफ़न भी करते रहे .अब तो वो भी काम नहीं करना चाहते सिर्फ कैबिनेट और लालबत्ती चाहते हैं .
    खैर अगर आप उनकी पार्टी का नाम भर जान लेते तो उनसे शिकायत और अपेक्षा की बजाय ‘ कागज़ कारे ‘ करने में समय न गवांते .

    उनकी पार्टी का नाम है RCP यानी राजनैतिक CRICKET पार्टी .
    तो भगवान से प्रार्थना करूंगा कि आप को सदबुद्धि दे और उनसे याचना करने की बजाय रण कर उनको और उनके प्रगतिशील गठबंधन को उखाड़ने का प्रयत्न करें .वर्ना वे और उनके प्रगतिशील (?) गठबंधन की गैंग तो यही समझती रहेगी कि आप सहित देश और उसका बिकाऊ सिस्टम उनका अब क्या उखाड़ लेगा जो साठ साल तक नहीं उखाड़ पाया .
    वे और उनकी गैंग आश्वस्त हैं कि अब तो कोई गांधी ,लोहिया ,जयप्रकाश या आंबेडकर भी नहीं है ,भगत सिंह ,सुखदेव ,राजगुरु ,आज़ाद ,बिस्मिल ,असफाक ,रोशन ,लाहिड़ी या सुभाष भी नहीं हैं जो वतन पर मर मिटने का ज़ज्बा और कुर्बान हो , कुर्बान हो जाने की तमन्ना रखने वाले गर्म खून पैदा कर सकें .

    अब तो भारत माता भी शर्म निरपेक्ष नेता और कर्म निरपेक्ष जनता ही पैदा कर रही है सपूत कहाँ ?
    वन्दे मातरम या जय हिंद बोलना भी भांडों ने हथिया लिया है .
    फिर भी …….
    वन्दे मातरम !
    जय हिंद !

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