पिछले कुछ समय में नक्सलियों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंसक कार्रवाई करके केंद्र की यूपीए सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत की है. साथ ही इससे यह भी साफ हो गया है कि देश के ज्यादातर राज्यों को अपनी चपेट में ले चुका नक्सलवाद अब तेजी के साथ आतंकवाद में तब्दील होता जा रहा है. पिछले कुछ दिनों में बिहार और पश्चिम बंगाल में हुई नक्सली हिंसा ने इस बात को पूरी तरह से सही साबित भी कर दिया है. पश्चिम बंगाल के सिल्दा में नक्सलियों ने सेना के कैंप पर हमला करके चैबीस जवानों को मौत के घाट उतारा, वहीं बिहार के जुमई में एक गांव पर हमला करके बारह ग्रामीणों की जान ले लीं. कुछ ही दिनों के भीतर हुई ये नक्सली हिंसा भयावह है.
लेकिन भयावह सिर्फ हिंसा ही नहीं है, हिंसा का तरीका भी है. असल में यह तरीका भयावह ही नहीं, भारत सरकार की आंखों की नींद उड़ा देने वाला भी है. इसकी वजह, नक्सली हिंसा को अंजाम देने का नक्सलियों का वह तरीका, जो सबको हैरान कर रहा है. देश की सुरक्षा एजेंसियां कह रही है कि सिल्दा में जो नक्सली हमला हुआ, उसमें महिलाएं शामिल थी. इतना ही नहीं, इस पूरी कार्रवाई को अंजाम देनें की जिम्मेदारी भी एक महिला के हाथों में थी. इसी तरह, बिहार के जुमई में गांव पर जो नक्सली हमला हुआ, उसकी कमान बच्चों के हाथों में थी. चैदह साल की कम उम्र के इन बच्चों ने दर्जनभर से भी ज्यादा गांववालों को मौत के घाट उतार दिया. इसके साथ ही नक्सलियों ने भारत सरकार को यह साफ संकेत दे दिया कि वह अपनी रणनीति में बदलाव ला चुकी है.
हैरानी इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि कुछ अरसा पहले हमारी सुरक्षा एजेंसियों ने ही यह खुलासा किया था कि नक्सली देश के अलग-अलग हिस्सों में महिलाओं और बच्चों को प्रशिक्षण दे रहे हैं. इस खुलासे के बाद बवाल तो खूब मचा था, लेकिन ठोस कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ. बिहार और पश्चिम बंगाल में हुई नक्सली हिंसा से तो यही संकेत मिलता है कि भारत की सरकारें हीे पाकिस्तान पोषित आतंकवाद पर काबू पाने का दंभ भरती हों, लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि वह देश के भीतर ही नक्सलियों से नहीं निपट पा रही हैं. महज चुनावों की खानापूर्ति करके सरकार अपनी जिम्मेदारी से मूंह नहीं मोड़ सकती. न ही हिंसा के बदले हिंसा की राह अपनाकर इस घरेलू आतंकवाद से निपटा जा सकता है. इसके लिए साझा प्रयासों की जरूरत है. जरूरत है कि राज्य सरकारें केंद्र सरकार के साथ मिलकर इस समस्या का हल ढूंढे. जरूरत इस बात की है कि वोट बैंक को किनारे रखकर देश की आंतरिक सुरक्षा में आ गई इस बड़ी दरार को बूझने का काम किया जाए.
अफसोस कि यह होता नहीं दिखता. गृहमंत्री पी चिदंबरम के बयानों से तो कम से कम यही लगता है. जनाब कभी नक्सलियों से बातचीत की बात करते हैं, तो कभी उन्हें धमकाते हैं. इन्दौर में हुए भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा० रमनसिंह ने यह बड़े गर्व के साथ कह दिया कि हमारे राज्य में हम नक्सलवाद पर काबू पाने में कामयाब हो गए हैं. रमनसिंह यह बात चुनावी नतीजों के आधार पर कह रहे थे, लेकिन इस बीच वे यह आसानी से भूल गए कि छत्तीसगढ़ में वोट डालने वाले मतदाताओं का प्रतिशत चालीस भी पार नहीं कर पाया था. जाहिर तौर पर यह न सिर्फ राज्य सरकार की, बल्कि केंद्र सरकार के लिए भी एक बड़ी नाकामी है.
दूसरी ओर, केंद्र और राज्य सरकारों की इसी नाकामी ने नक्सलियों में उत्साह का संचार कर दिया है. वह भी इस कदर कि माओवादी नेताओं को दिल्ली की सत्ता भी अपनी पहुंच के भीतर नजर आने लगी है. इसी मानसिकता का परिचय देते हुए हाल ही में नक्सली नेता किशनजी ने केंद्र सरकार पर यह कहते हुए दबाव बनाया कि बातचीत न होने की दिशा में 2050 तक दिल्ली की सत्ता पर उनका कब्जा होगा. नक्सली नेता की यह चेतावनी उनके खिलाफ केद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे ‘ग्रीन हंट’ अभियान को बंद किए जाने के संदर्भ में थी. बावजूद इसके, इस चेतावनी से यह तो अंदाजा लगाया ही जा सकता है कि नक्सलियों के हौंसले किस कदर बुलंद हो गए हैं.
इसीलिए, चुनौती अब केंद्र की यूपीए सरकार के सामने हैं. महंगाई जैसे मुद्दें से जूझ रही यूपीए के लिए नक्सलवाद भी एक बड़ी चुनौती है. अब यह समस्या सिर्फ बंगाल या छत्तीसगढ़ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि समूचे देश में पैर पसार चुकी है. पाकिस्तान के ऊपर दबाव बनाकर खुश हो रही यूपीए सरकार को यह समझना होगा कि पाकिस्तान पोषित आतंकवाद से बड़ा खतरा घरेेलू नक्सलवाद को लेकर पनप रहा है. इसलिए किसी भी स्तर पर उदासीनता के गंभीर परिणाम समूचे देश को भुगतने होंगे.


वैश्विक आतंकवाद से जूझ रही दुनिया के सामने जिस तरह की लाचारगी आज दिख रही है वैसी कभी देखी नहीं गयी। जाति, धर्म के नाम होते आए उपद्रवों और मारकाट को इससे जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं है क्योंकि आतंकवादी ताकतें मानवता के सामने इतने संगठित रूप में कभी नहीं देखी गयीं। अगर आज इनका एक बड़ा संजाल दुनिया के भीतर खड़ा हुआ है तो यह साधारण नहीं है। ऐसे में भारत जैसे आतंकवाद के एक बड़े शिकार देश में, मीडिया की चुनौती बड़ी कठिन हो जाती है।
राजनीतिक क्षेत्र में घटती संवेदनहीनता और हर सवाल से राजनीतिक लाभ उठाने का मामला हमें चौतरफा दिखता है। इससे हुआ यह है कि मूल सवाल हमारी राजनीति के लिए कभी मुद्दा बनते ही नहीं। भारत इतने लंबे समय से आतंरिक सुरक्षा के संकट से जूझ रहा है किंतु आतंरिक सुरक्षा के विषय पर हमारे तंत्र में कोई गंभीरता नहीं दिखती। नक्सलवाद, आतंकवाद,जातीय आंदोलनों से लेकर अनेक विषयों पर हमारे समाज जीवन में तत्काल तनाव पैदा हो जाता है। हिंसा की घटनाएं भी हो जाती हैं।
देश की आतंरिक सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी की भावना लगभग मर गयी . नेताओं को अपनी जेब भरने से फुर्सत नहीं है इधर माथा-पच्ची कौन करे ?