Author: पुष्पेन्द्र आल्बे
मैं हमेशा से ही लेखक बनना चाहता था, लेकिन जीवन के शुरूआती सालों में पता नहीं था कि लक्ष्य तक पहुंचा कैसे जाए ? सो, माता-पिता के दबाव में साइंस सब्जेक्ट लिया और एमएससी कर लिया. लेकिन सरकारी नौकरियों से अपना जी घबराता है, शुरू से ही. सो, घर से बगावत की और शहर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर आ गए, अखबार में नौकरी करने. शुरूआत खराब रही,, चपरासी के तौर पर भी एक अखबार में काम करना पड़ा, लेकिन अपन भी कहां हार मानने वाले थे. दो सालों के भीतर ही उस अखबार के न्यूज एडिटर बन बैठे. अखबार का नाम है ‘प्रभातकिरण-मप्र का सबसे प्रतिष्ठित सांध्यकालिन अखबार. अब पत्रकारिता जगत में आठ साल होने को आए हैं, उसी अखबार में न्यूज एडिटर हैं, तो एक राष्ट्रीय न्यूज पत्रिका में काॅपी एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रहा हूं. क्रिकेट और फिल्मों के अपन बचपन से शौकीन हैं, सो हाल ही में दो नए ब्लाॅग भी शुरू किए हैंः
WWW.bollywoodextraa.blogspot.com
www.cricextraa.blogspot.com
उम्मीद है, जल्द ही इन ब्लाॅग को वेबसाईट का रूप देने में कामयाब हो जाऊंगा. तब तक, सफर जारी है, जिंदगी का.... मेरा मंत्र बहुत स्पष्ट है: "you cannot reach out to people by saying things the same way you have been saying them. You have to say them differently.” . "और मुझे लगता है कि मैं उस के लिए अब तैयार हूँ ...
वैश्विक आतंकवाद से जूझ रही दुनिया के सामने जिस तरह की लाचारगी आज दिख रही है वैसी कभी देखी नहीं गयी। जाति, धर्म के नाम होते आए उपद्रवों और मारकाट को इससे जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं है क्योंकि आतंकवादी ताकतें मानवता के सामने इतने संगठित रूप में कभी नहीं देखी गयीं। अगर आज इनका एक बड़ा संजाल दुनिया के भीतर खड़ा हुआ है तो यह साधारण नहीं है। ऐसे में भारत जैसे आतंकवाद के एक बड़े शिकार देश में, मीडिया की चुनौती बड़ी कठिन हो जाती है।
राजनीतिक क्षेत्र में घटती संवेदनहीनता और हर सवाल से राजनीतिक लाभ उठाने का मामला हमें चौतरफा दिखता है। इससे हुआ यह है कि मूल सवाल हमारी राजनीति के लिए कभी मुद्दा बनते ही नहीं। भारत इतने लंबे समय से आतंरिक सुरक्षा के संकट से जूझ रहा है किंतु आतंरिक सुरक्षा के विषय पर हमारे तंत्र में कोई गंभीरता नहीं दिखती। नक्सलवाद, आतंकवाद,जातीय आंदोलनों से लेकर अनेक विषयों पर हमारे समाज जीवन में तत्काल तनाव पैदा हो जाता है। हिंसा की घटनाएं भी हो जाती हैं।
देश की आतंरिक सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी की भावना लगभग मर गयी . नेताओं को अपनी जेब भरने से फुर्सत नहीं है इधर माथा-पच्ची कौन करे ?