अंधेर नगरी|Shortlink: 2010/03/14 6:53 pm

आतंरिक सुरक्षा का प्रश्न

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  • वैश्विक आतंकवाद से जूझ रही दुनिया के सामने जिस तरह की लाचारगी आज दिख रही है वैसी कभी देखी नहीं गयी। जाति, धर्म के नाम होते आए उपद्रवों और मारकाट को इससे जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं है क्योंकि आतंकवादी ताकतें मानवता के सामने इतने संगठित रूप में कभी नहीं देखी गयीं। अगर आज इनका एक बड़ा संजाल दुनिया के भीतर खड़ा हुआ है तो यह साधारण नहीं है। ऐसे में भारत जैसे आतंकवाद के एक बड़े शिकार देश में, मीडिया की चुनौती बड़ी कठिन हो जाती है।

  • राजनीतिक क्षेत्र में घटती संवेदनहीनता और हर सवाल से राजनीतिक लाभ उठाने का मामला हमें चौतरफा दिखता है। इससे हुआ यह है कि मूल सवाल हमारी राजनीति के लिए कभी मुद्दा बनते ही नहीं। भारत इतने लंबे समय से आतंरिक सुरक्षा के संकट से जूझ रहा है किंतु आतंरिक सुरक्षा के विषय पर हमारे तंत्र में कोई गंभीरता नहीं दिखती। नक्सलवाद, आतंकवाद,जातीय आंदोलनों से लेकर अनेक विषयों पर हमारे समाज जीवन में तत्काल तनाव पैदा हो जाता है। हिंसा की घटनाएं भी हो जाती हैं।

  • देश की आतंरिक सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी की भावना लगभग मर गयी . नेताओं को अपनी जेब भरने से फुर्सत नहीं है इधर माथा-पच्ची कौन करे ?

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