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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज</title>
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	<description>राज-समाज और जन की आवाज</description>
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		<title>फिर भी मेरा देश तरक्की कर रहा है</title>
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		<pubDate>Sat, 31 Jul 2010 12:18:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शंकर दत्त फुलारा</dc:creator>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>

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		<description><![CDATA[(फिर भी मेरा देश तरक्की कर रहा है ; न जाने क्यों ? नेताओं – नौकरों को लाखों मिलते हैं और गरीब भूखों मरता है ; न जाने क्यों ?)... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/31/%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%b0/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: center;"><span style="color: #0000ff;">(फिर भी मेरा देश तरक्की कर रहा है ; न जाने क्यों ? नेताओं – नौकरों को लाखों मिलते हैं और गरीब भूखों मरता है ; न जाने क्यों ?)</span></p>
</blockquote>
<p style="text-align: center;"><img class="alignright size-full wp-image-5519" title="sheth_beaumonde_bldgmsky" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/sheth_beaumonde_bldgmsky.jpg" alt="" width="502" height="498" />कुछ लोगों में भारत-भारतीयता, के प्रति हीन ग्रंथि है ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">कुछ लोग सकारात्मक या सीधा, सोच ही नहीं पाते ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">कुछ को हमारे इतिहास और सभ्यता-संस्कृति में केवल बुरा ही बुरा दीखता है ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">कुछ लोगों को निर्दोषों के हत्यारों के प्रति भी सहानुभूति होती है ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">कुछ लोगों को अपराधियों से मुठभेड़ों पर शक होता ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल करने की जरुरत पड़ती है, जैसे गुलाम हों ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">धन्य हैं वो लोग जो चुप बैठे हैं पिछले साठ वर्षों से ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">धर्म के नाम पर अन्धविश्वास बढ़ता रहा ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">गुरु घंटालों को भगवान बना कर पूजने लगे ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">स्वतंत्रता के नाम पर धोखा हुआ कोई न जगा ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">लोकतंत्र के नाम पर लुटते रही जनता ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">देश भक्ति के चोले में गद्दारी होती रही ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">शिक्षित होने के भ्रम में मूर्ख बनते रहे ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">महलों में सरकार सोती है गोदामों में अनाज सड़ता है ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">सांसदों नेताओं को कैंटीन में दस रुपये में भोजन मिलता है ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">नेताओं – नौकरों को लाखों मिलते हैं और गरीब भूखों मरता है ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">फिर भी मेरा देश तरक्की कर रहा है ; न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">न जाने क्यों ?</p>
<p style="text-align: center;">न जाने क्यों ?</p>
]]></content:encoded>
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		<title>31जुलाई,बलिदान दिवस वीर उधम सिंह</title>
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		<pubDate>Sat, 31 Jul 2010 11:47:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अरविन्द विद्रोही</dc:creator>
				<category><![CDATA[इतिहास]]></category>
		<category><![CDATA[भारतनामा]]></category>
		<category><![CDATA[31जुलाई]]></category>
		<category><![CDATA[बलिदान दिवस، वीर उधम सिंह]]></category>

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		<description><![CDATA[तारीखें गवाह हैं कि हिन्दुस्तान की सरजमीं वीरों से खाली नहीं है। आतताईयों का दमन चक्र यदि अपने चरम पर रहा है तो माँ भारती के लाडलों ने भी अत्याचारों... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/31/31%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%ac%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b8-%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%89%e0%a4%a7%e0%a4%ae/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-5516" title="Shaheed Udham Singh" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/Shaheed-Udham-Singh.gif" alt="" width="300" height="300" />तारीखें गवाह हैं कि हिन्दुस्तान की सरजमीं वीरों से खाली नहीं है। आतताईयों का दमन चक्र यदि अपने चरम पर रहा है तो माँ भारती के लाडलों ने भी अत्याचारों का बदला लेने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। भारतीय इतिहास में ब्रितानिया हुकूमत की काली खामोश गवाह तारीख 13 अप्रैल 1919 है। इसी दिन रौलेट एक्ट के विरोध में वैशाखी के पर्व पर जालियांवाला बाग में विशाल जन समुदाय एकत्रित हुआ था। अपने प्रिय नेताओं के विचारों को सुनने के लिए लोग परिवार सहित तीन तरफ से बंद, संकरे, रास्ते वाले इस बाग में जमा हुए थे।</p>
<p style="text-align: justify;">इस समय पंजाब प्रांत का गर्वनर माइकल ओ डायर था। इसी रक्त पिपासु गर्वनर माइकल ओ डायर के आदेश, पर क्रूर एव बहशी अंग्रेज जनरल डायर ने संकरी गली पर फौज के साथ कब्जाकर के गोलीबारी करवायी थी। जालियांवाला बाग की मूक दीवारें इन दरिंदों की आज भी गवाह हैं। दीवारों पर गोलियों के निशान भारतीयो के अमानुषिक कत्लेआम तथा ब्रितानिया हुकूमत के अत्याचार की साक्षी हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय युवकों-किशोरों में इस घटना के पश्चात बदले की भावना बलवती हो गई। जालियांवाला बाग की माटी माथे पर लगाकर सौगंध खाई गई। सरदार भगत सिंह यहां की माटी साथ ले कर गये थे। मात्र 12 वर्ष की उम्र का किशोर उधम सिंह यहां घटी घटना को अपनी आँखों से जीवन्त रूप से देखने वालों में से एक था। बदले की भावना नसों में समा चुकी थी। ह्दय में भाव समेटे किशोर उधम सिंह इंजीयिरिंग की शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड गया।</p>
<p style="text-align: justify;">कालान्तर में इधर पंजाब का गवर्नर माइकल ओ डायर सेवानिवृत्त हो गया। वो इग्लैण्ड पहुँचा, ब्रिटिश नागरिकों ने इस हत्यारे का नायक के रूप में अभिनन्दन किया और बीस हजार पौंड का नगद पुरस्कार भी दिया गया। क्रोधित और दृढ़ निश्चयी उधम सिंह मौके की तलाश करने लगा।</p>
<p style="text-align: justify;">‘रोयल सेंट्रल एशियन सोसाइटी’ और ‘ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन’ द्वारा ‘‘अफगानिस्तान’’ विषय पर सम्मेलन का आयोजन 13 मार्च 1940 को किया गया। सभापति लार्ड जेटलैण्ड थे तथा प्रमुख व्यक्तियों में माइकल ओडायर बैठा था। कार्यक्रम की समाप्ति पर उधम सिंह सामने की पंक्ति में जा पहुँचे और एक साथ पांच गोलियां ओडायर की छाती पर उतारकर इस रक्त पिपासु को मौत के घाट उतार दिया। सभा भवन में भगदड मच गई। इसी दौरान बाहर निकलते समय गिर जाने के कारण उधम सिंह पकड़ लिये गये।</p>
<p style="text-align: justify;">लंदन के ‘ओल्डवेली क्रिमिनल कोर्ट’ में इस वीर योद्धा का मुकदमा चला। जज ने प्रश्न किया- तुमको कुछ कहना है?</p>
<p style="text-align: justify;">उत्तर -	‘‘हाँ, मुझे राम मोहम्मद सिंह डिसूजा के नाम से पुकारा जाये।’’</p>
<p style="text-align: justify;">प्रश्न -		‘‘तुम सिक्ख हो या मुसलमान?’</p>
<p style="text-align: justify;">उत्तर -	‘‘मैं हिन्दुस्तानी हूँ।’’</p>
<p style="text-align: justify;">जज ने कहा-	अपने बचाव के लिए तुम्हे कुछ कहना है?</p>
<p style="text-align: justify;">उधम सि।ह-	‘‘मुझे यह कहना है कि माइकल ओडायर को मैने ही मारा है। ओडायर मृत्युदण्ड का ही पात्र था। 21 वर्ष बाद मैं अपने राष्ट्र के अपमान का बदला लेकर संतुष्ट हूँ। फाँसी का फन्दा गले लगाने के लिए उत्सुक हूँ’’।</p>
<p style="text-align: justify;">इस निर्भीक स्वीकारोकित के पश्चात न्यायलय ने फांसी की सजा दे दी।</p>
<p style="text-align: justify;">31जुलाई,1940 के दिन इग्लैण्ड में ही राष्ट्रीय अपमान का बदला लेने के अपराधी माँ भारती के इस सेनानी को फाँसी पर लटका दिया गया। वीर उधम सिंह ने यह साबित कर दिया कि अंग्रेजो को हम अपनी सरजमीं पर ही नहीं, उनकी सरजमीं पर भी मौत दे सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इस अमर सेनानी को उसके बलिदान दिवस पर शत्-शत् श्रद्धाजलि।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
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		<title>विदा हो गया महानतम गेंदबाज</title>
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		<pubDate>Sat, 31 Jul 2010 11:34:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>

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		<description><![CDATA[लेखक: सुनील बघेल हाल ही में क्रिकेट इतिहास के सबसे महानतम गेंदबाज श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन ने शिखर पर रहते हुए टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया,ऐसे मौके पर फिरकी... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/31/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%a4%e0%a4%ae-%e0%a4%97%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%ac%e0%a4%be/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><strong><span style="color: #0000ff;"><img class="alignright size-medium wp-image-5509" title="murlidharan" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/murlidharan1-300x199.jpg" alt="" width="300" height="199" />लेखक: सुनील बघेल</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;">हाल ही में क्रिकेट इतिहास के सबसे महानतम गेंदबाज श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन ने शिखर पर रहते हुए टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया,ऐसे मौके पर फिरकी के इस जादूगर के करियर से जुड़े उस घटनाक्रम को याद करना जरूरी है, जब मुरली को हजारों दर्शकों के सामने बीच मैदान में थ्रो गेंदबाज घोषित कर दिया गया था. आॅस्टेªलिया के खिलाफ ही 28 अगस्त 1992 को अपने टेस्ट करियर का आगाज करने वाले मुरली शायद ही इस मुकाम तक पहुंच पाते, अगर इन विवादों ने उनकी अग्निपरीक्षा न ली होती. 26 दिसंबर 1995 के बाॅक्ंिसग डे टेस्ट से पहले मुरली एक साधारण आॅफ स्पिन गेंदबाज थे. उनकी गेंदों में टर्न तो मौजूद था, लेकिन रहस्यमयी गेंदे, बल्लेबाजों के दिमाग को पढ़ लेने की योग्यता नहीं थी. इससे भी बढ़कर, इन विवादों से पहले मुरली में खुद को विश्व क्रिकेट के महानतम गेंदबाज के तौर पर स्थापित करने का जज्बा भी नहीं आ पाया था. आॅस्टेªलिया के खिलाफ इस मैच से पहले मुरली अपने करियर के 22 टेस्ट मैचों में 32 से ज्यादा की औसत से मात्र 80 विकेट ले पाए थे.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन 26 दिसंबर 1995 में मेलबोर्न टेस्ट में जो कुछ घटित हुआ, उसने मुरली की सोच पर गहरा प्रभाव छोड़ा. आॅस्टेªलिया क्रिकेट में हर साल 26 दिसंबर यानी बाॅक्ंिसग डे के मौके पर टेस्ट मैच खेले जाने की परंपरा उस टेस्ट श्रंृखला के दौरान भी निभाई जा रही थी, जब 26 दिसंबर 1995 को मेजबान टीम श्रीलंका के साथ टेस्ट मैच खेलने उतरी थी. मेलबोर्न में खेले गए इसी टेस्ट के दूसरे दिन यानी 27 दिसंबर को श्रीलंका के फिरकी गेंदबाज मुथैया मुरलीधरन की गेंदों को आॅस्टेेªलिया मूल के अंपायर डेरेल हेयर ने तीन ओवरों के भीतर ही सात बार ‘नोे बाॅल’ घोषित किया था. आमतौर पर गेंदबाज जब गेंदबाजी रेखा से बाहर जाकर गेंद डालता है, तब अंपायर उसे ‘नो बाॅल’ घोषित करता है, लेकिन इस मामले में खास बात यह थी कि डेरेल हेयर ने गेंदों को इसलिए ‘नो बाॅल’ करार दिया था, क्योंकि उनकी नजर में मुरलीधरन गलत एक्शन के साथ गेंदबाजी कर रहे थे. इसके 10 दिन बाद जब 5 जनवरी 1996 को श्रीलंका टीम आॅस्टेªलिया और वेस्टइंडीज के साथ खेली गई त्रिकोणीय श्रंृखला के सातवें मैच में वेस्टइंडीज के खिलाफ ब्रिस्बेन के मैदान पर उतरी, तो फिर से यही कहानी दोहराई गई. इस बार हेयर के बजाए अंपायर राॅस इमरसन ने मुरली के पहले ही ओवर की तीन गेंदों को ‘नो बाॅल’ घोषित कर दिया. हेयर की तरह ही अंपायर इमरसन ने भी अवैध एक्शन के साथ गेंदबाजी के लिए मुरली की गेंदों को ‘नो बाॅल’ करार दिया था.</p>
<p style="text-align: justify;">मात्रा 23 साल की उम्र में अवैध गेंदबाज घोषित कर दिए जाने के बाद मुरली के करियर का अंत निश्चित था. मुरली ने भी हार मान ली थी. आने वाले सालों में जो गेंदबाज क्रिकेट की दुनिया का हर बड़ा कीर्तिमान अपने नाम दर्ज कराने वाला था, उसने स्पिन को छोड़कर मध्यम तेज और लेग स्पिन गेंदबाजी का भी फैसला कर लिया था. लेकिन तभी, कप्तान अर्जुन राणातुंगा की अगुवाई में समूचा श्रीलंका मुरली के पक्ष में आ गया. आईसीसी से लंबी लड़ाई लड़ी गई, तकनीक के सहारे यह साबित किया गया कि मुरली के गेंदबाजी एक्शन में कोई खोट नहीं है.</p>
<p style="text-align: justify;">टीम, प्रशंसकों और श्रीलंका बोर्ड के इसी समर्थन को मुरली के करियर का निर्णायक मोड़ कहा जा सकता है. तब तक विश्व क्रिकेट में आॅफ स्पिन गेंदबाजी के मामले में पाकिस्तान के अब्दुल कादिर और भारत के बिशनसिंह बेदी ने ही नाम कमाया हुआ था. लेकिन फिर भी स्पिन गेंदबाजी की यह कला तब तक क्रिकेट में अपना ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाई थी. लेकिन आॅस्टेªलियाई अंपायरों के गतिरोध के बाद मुरली ने इस कला को नया जीवनदान देने का संकल्प ले लिया.</p>
<p style="text-align: justify;">नतीजा यह रहा कि बाद के सालों में मुरली ने गेंदबाजी के हर कीर्तिमान को अपने नाम दर्ज कराया. भारत के खिलाफ वर्तमान में खेलीे जा रहीे तीन टेस्ट मैचों की श्रंृखला के पहले मैच के बाद जब मुरली ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया, तो गेंदबाजी का हर कीर्तिमान उनके साथ जुड़ा हुआ था. 800 विकेटों के साथ वे टेस्ट क्रिकेट के सबसे कामयाब गेंदबाज हैं, उन्होंने सबसे ज्यादा 67 बार एक पारी में 5 विकेट झटके हैं, मैच में सबसे ज्यादा 22 बार दस विकेट लेने का कारनामा भी उनके नाम दर्ज है. टेस्ट की तरह ही एक दिवसीय क्रिकेट का हर कीर्तिमान भी उनके नाम ही दर्ज है. 337 एक दिवसीय मैचों में 512 विकेटों के साथ वे क्रिकेट के इस संस्करण के भी सबसे कामयाब गेंदबाज हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन मुरली की महानता सिर्फ विकेटों की संख्या तक ही सीमित नहीं है. किसी भी खेल में खिलाड़ी की महानता को इस पैमाने पर आंका जाता है कि उसने अपने देश, अपनी टीम को शिखर तक पहुंचाने में कितना योगदान दिया? इस मायने में यह बात बगैर किसी शक-शुबहे के कहीं जा सकती है कि विश्व क्रिकेट में मुरली से बड़ा मैच विजेता खिलाड़ी नहीं हुआ है. टेस्ट क्रिकेट में मुरली ने 67 बार एक पारी में 5 विकेट झटके हैं, जिनमें से 40 टेस्ट मैचों में श्रीलंका को जीत हासिल हुई है. 1983 में टेस्ट क्रिकेट खेलने की शुरुआत करने वाली श्रीलंका टीम मुरली के पहले भी गेंदबाजी के मामले में साधारण थी और शायद मुरली के बाद भी साधारण रहेगी. लेकिन जब तक मुरली श्रीलंका के लिए खेलने उतरते रहे, उन्होंने हर विपक्षी टीम के खिलाफ अपने देश का झंडा लहराया. 1996 के विश्वकप में अगर श्रीलंका विश्वविजेता बनकर उभरी और उसके बाद टेस्ट क्रिकेट की भी सबसे कामयाब टीमों में शुमार हुई, तो इसका श्रेय बहुत हद तक मुरली को ही जाता है. टेस्ट क्रिकेट में तब तक ‘नवजात टीम’ कही जाने वाली श्रीलंका को मुरली ने न सिर्फ अपने घरेलू मैदान पर मैच जिताए, बल्कि विदेशी सरजमीं पर भी ऐतिहासिक कामयाबियां हासिल कीं. इसी के बूते वे पिछले सत्रह सालोें से श्रीलंका ही नहीं, विश्व क्रिकेट के भी शीर्ष गेंदबाज बने हुए थे.</p>
<p style="text-align: justify;">फिर, किसी खिलाड़ी की महानता का एक पैमाना यह भी होता है कि विपक्षी टीम के खिलाड़ियों पर उसके प्रभाव का आकलन किया जाए. इस मामले में भी मुरली अपने प्रतिद्वंद्वियों- शेन वार्न और अनिल कुंबले से श्रेष्ठ नजर आते हैं. आध्ुानिक क्रिकेट के दो महानतम बल्लेबाजों- सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ मानते हैं कि मुरली की गेंदों को खेलना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती रही. वहीं, आध्ुानिक क्रिकेट के सबसे विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग ने भी मुरली को आखिरी विदाई देते हुए खुलेतौर पर स्वीकार किया है कि वे मुरली की रहस्यमयी गेंदों को कभी भी समझ नहीं पाए. बाद के सालों में मुरली ने अपनी गेंदबाजी में कई नए आयाम जोड़े. क्रिकेट को ‘दूसरा’ गेंद देेने का श्रेय भले ही पाकिस्तान के सकलेन मुश्ताक को जाता है, लेकिन मुरली ने इस गेंद को दुनियाभर के बल्लेबाजों के लिए परेशानी का सबब बना दिया. इन्हीं घूमती हुई गेंदों के बूते मुरली ने अपने सत्रह साल के करियर में हर बल्लेबाजा को अपनी ध्ुान पर नचाया. इससे भी बढ़कर, अपनी रहस्यमयी गेंदों के बूते उन्होंने विश्व क्रिकेट में आॅफ स्पिन गेंदबाजी को भी सम्मानजनक स्थान दिलाया, जो उनसे पहले खत्म होती जा रही कला मान ली गई थी.</p>
<p style="text-align: justify;">तो, अब इस कला के सबसे बड़े जादूगर ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया है. हालांकि उनके प्रशंसकों के लिए यही बात राहतभरी है कि वे एकदिवसीय और ट्वेंटी-20 क्रिकेट में खेलते रहेंगे. फिलहाल तो महान उपलब्धियों के लिए मुरली को सलाम करने का वक्त है.</p>
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		<title>दस टकिये पत्रकारों का दर्द</title>
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		<pubDate>Sat, 31 Jul 2010 08:17:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय कुमार</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5504" title="AA040013" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/freelance-journalist-of-india-i-246x300.jpg" alt="" width="246" height="300" />दूसरों के दुखःदर्द व जुल्म सितम के लिए रोजाना लड़ाई लड़ने वाले कलम के सिपाहियों के हक के लिए कोई खड़ा नहीं दिखता है। समाज में व्याप्त बराबरी-गैरबराबरी से पत्रकारों को भी दो-चार होना पड़ता है। खास तौर से उनकी माली स्थिति पर नजर डाले तो एक ऐसा बराबरी-गैरबराबरी सामने आता है जो चैंकाता तो है ही साथ ही सोचने के लिए मजबूर भी करता है। सवाल है मीडिया में काम करने वाले कस्बा से लेकर महानगर तक के पत्रकारों की माली स्थिति का ? और उनके साथ जो शोषण हो रहा है उसके पक्ष में खड़ा होने का ? जहां एक पत्रकार दस से बारह घण्टे काम करता है और एवज में एक सरकारी आदेशपाल से भी कम तनख्वाह पाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">मीडिया हाउसों में कार्यरत मीडियाकर्मी जहां एक ओर मीडिया के चकाचैंध ग्लैमर से प्रभावित हैं। वहीं एक ऐसा वर्ग भी है जो अखबार में काम करते हुए जीने के लिए संघर्ष कर रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि जहां एक ओर मीडियाकर्मियों को दस हजार से एक लाख तनख्वाह मिलती है तो वहीं ऐसे भी मीडियाकर्मी है जिन्हें 15 सौ रुपये महीने पर सुबह से देर शाम तक खबरों के पीछे भागना पड़ता है। जाहिर सी बात है कि जैसा काम वैसा दाम की परिपाटी मीडिया हाउसों में कुलाचे मार रहा है। अनुभव और नाम के सहारे हजारों की तनख्वाह पाने वाला बड़ा पत्रकार भी उतना ही श्रम करता है जितना एक आम पत्रकार। बल्कि मुफ्सिल का पत्रकार तो और ही ज्यादा काम करता है। मुफ्सिल में घटने वाली सुबह की खबर पर वह लगातर बना रहता है। उसे डाक संस्करण से लेकर देर रात के संस्करण के लिए खबर को डेवलप कर लगातार भेजना पड़ता है।</p>
<p style="text-align: justify;">पत्रकारों के बीच एक सामान वेतन नहीं हो सकता लेकिन जिंदगी जीने के लिए जितना चाहिये वह तो मिलनी ही चाहिये? श्रमजीवी पत्रकारों के वेतन को लेकर सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर प्रयास चले, लेकिन मीडिया हाउस के मालिकों ने नौकरी की परिभाषा ही बदल दी। संपादक हो या पत्रकार अमूमन सभी की बहाली अब अनुबंध के आधार पर हो रही है। जब इच्छा हुई रख लिया और निकाल दिया। वहीं बड़े नाम इसका फायदा भी उठा रहे हैं। जहां दूसरे मीडिया हाउस ने ज्यादा पैसे दिये, तुंरत पहले को छोड़, दूसरे को पकड़ लिया। वहीं सबसे बुरा हाल निचले स्तर के पत्रकारों का है वे हमेषा हासिये पर रहते हैं। मजेदार बात यह है कि अब मीडिया हाउस जब किसी को अपने  यहाँ रखता है तो उससे एक बौंड भरवाता है जिसमें उसका पेशा  पत्रकारिता नहीं बल्कि खेती बाड़ी, व्यवसाय आदि भरवाया जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरों के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाले स्वयं पत्रकार अपनी आवाज उठाने से वंचित रह जाते हैं ? देखा जाये तो पत्रकारों की जिंदगी रोज संघर्षों से भरी है। अमूमन हर मीडिया हाउसों द्वारा पत्रकारों का आर्थिक और शारीरिक शोषण जारी है। लेकिन विरोध की गुंज सुनाई नहीं पड़ती है। सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक  शोषण का है। चैंकने वाला तथ्य यह है कि छोटे और बड़े मीडिया हाउसों में 15 सौ रूपये के मासिक पर पत्रकारों से 10 से 12 घंटे काम कराया जाता है। यहीं नहीं उन पत्रकारों के पास मीडिया हाउस द्वारा कोई अनुबंध पत्र / नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाता है। प्रबंधन की मर्जी जब नौकरी पर रखे या जब चाहे नौकरी से निकाल दे। भुगतान दिहाड़ी मजदूरों की तरह मास्टर रौल जैसा है। महीने के आखिर में एक मास्टर रौल पर हस्ताक्षर करवाया जाता है और भुगतान के बाद उसे फाड़कर फेंक दिया जाता है। वेतन के मामले में पीड़ित कलम के सिपाहियों का हाल सरकारी आदेशपालों से भी बुरा है।</p>
<p style="text-align: justify;">देश  के राज्यों में अधिकांश  युवा पत्रकार अपने कैरियर की शुरुआत मामूली सी तनख्वाह 1500 रुपये पर करते हैं। अगर देखा जाए तो दिहाड़ी मजदूरों को जितनी मजदूरी एक महीने में दी जाती है, उससे कम पत्रकारों को दी जाती है। बिहार से प्रकाशित कई अखबारों में कमोवेश स्थिति ऐसी ही है। वहीं कस्बाई पत्रकारों को अखबार मीडिया हाउस की ओर से अधिकतम 3000 रुपये प्रति माह दिये जाते हैं। जबकि बड़े पैमाने पर हजार 12 सौ रूपये मासिक पर रखा जाता है। उन्हें समाचार संकलन के अलावा अखबार के लिए विज्ञापन भी जुटाना होता है। पहले सेंटीमीटर या कालम के हिसाब से भुगतान दिया जाता था लेकिन अब प्रति खबर या मासिक भुगतान किया जाता है। बिहार के कस्बा और छोटे जगहों पर कार्यरत पत्रकारों ने बताया कि अखबार को आंदोलन, बदलाव आदि का नारा देने वाले बड़े समाचार पत्र समूह द्वारा एक स्ट्रींगर को प्रति समाचार 10 या 12 रु. दिये जाते हैं, चाहे खबर एक कालम की हो या चार कालम की। भुगतान तय रहता हैं वही 10 या 12 रूपये प्रति खबर। वहीं सुपर स्ट्रींगर को प्रति माह दो से तीन हजार दिया जाता है। जहां तक छोटे समाचार पत्र का सवाल है तो वे कस्बा और छोटे जगहों पर कार्यरत पत्रकारों को एक पैसा भुगतान नहीं करते हैं हां उनके समाचार जरूर छपते हैं। साथ ही उन्हें विज्ञापन लाने को कहा जाता है जिस पर कमीशन दिया जाता है। जबकि अखबार के मुख्य कार्यालयो में कार्यरत स्ट्रींगर और सुपर स्ट्रींगर को तीन हजार से 14 हजार रूपये प्रतिमाह दिये जाते हैं। संपादक/प्रबंधक तनख्वाह तय करते हैं। वहीं चैंकाने वाला तथ्य यह है कि अमूमन हर अखबार कस्बा या छोटे शहरों में किसी को भी अपना प्रतिनिधि रख लेते हैं उसे खबर के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता है। बल्कि वह जो विज्ञापन लाता है उस पर उसे कमीषन दिया जाता है। अखबार का संपादक/प्रबंधक जानते हैं कि वह बेगार पत्रकार अखबार के नाम पर अपनी दुकान चलायेगा ? जो उसकी मजबूरी बन जाती है आखिर  दिन भर अखबार के लिये बेगार करेगा तो खायेगा क्या ?  बिहार के सासाराम में एक छोटे समाचार पत्र के लिए रिपोर्टिंग करने वाला एक पत्रकार अपना नाम छुपाते हुए कहता हैं कि हालात यह है कि पैसा मिले या न मिले किसी मीडिया हाउस से जुड़ने के लिए पत्रकारों की लम्बी कतार है। बिना पैसे और विज्ञापन के कमीशन पर काम करने वाले पत्रकार मौजूद है तो भला क्यों कोई मासिक वेतन पर किसी को रखे ? यही हाल देश के अन्य क्षेत्रों का है।</p>
<p style="text-align: justify;">मजेदार बात यह है कि इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो पत्रकारों के हित के लिए लम्बी-चैड़ी बातें करते हैं। तर्क दिया जाता है कि पत्रकारिता के पेशे  में ऐसे लोग आ गये है जो तिकड़मी, अनस्कील्ड और कहीं नौकरी नहीं लगी तो पत्रकार बन गये आदि आदि। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर उन्हें रखता कौन है ? अखबार ही न ? और आज अखबार संपादक कम प्रबंधक अधिक चला रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रख्यात पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी ने भारतीय मीडिया द्वारा चुनाव के दौरान पैसे लेकर खबर छापने की परिपाटी के खिलाफ जो मुहिम छेड़ी थी, उसकी गुंज संसद और चुनाव आयोग में सुनाई दी है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान देशभर में ये गुंज सुनाई दी थी। अब संसद में भी इसकी गुंज सुनाई पड़ी है। राज्यसभा में सांसदों ने पैसे लेकर मीडिया द्वारा खबर छापने की खतरनाक बढ़ती प्रवृति के खिलाफ गंभीर चर्चा की। पैसे लेकर खबर छापने की मीडिया के सोच के खिलाफ केवल सांसद ही नहीं बल्कि पिछले ही दिनों  पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला ने भी चिंता व्यक्त की और इसे गलत करार भी दिया। पैसे लेकर खबर छापने की प्रथा कोई नई नहीं है और इसपर हो-हल्ला तब मचा जब स्व. प्रभाष जोशी ने पूरे देश भर में मीडिया के इस सोच के प्रति जन आंदोलन चला दिया था। गत लोकसभा चुनाव और कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान यह खुलकर सामने आ गया था। मीडिया ने पैसे लेकर खुलेआम खबर छापने का सिलसिला जारी रखा। यह हो-हल्ला लोकतंत्र के निर्माण में, लोकतंत्र के ही एक खंभे द्वारा किया गया। इस मसले पर पत्रकार भी दो खेमें में नजर आये।</p>
<p style="text-align: justify;">मीडिया ने अपने को बाजारवाद के चंगुल में डालकर संभवतः मीडिया को व्यवसायिक नजरिये से परोस दिया। हो-हल्ला तो चुनाव के दरम्यिन नेताओं द्वारा अपने फेवर में पैसे देकर खबर को प्रकाशन प्रसारण से हुआ। लेकिन गुपचुप तरीके से नये-नये हथकंडों के जरिए खबर छापने/प्रसारित करने का सिलसिला जारी है। इसमें दस टकिया पत्रकारों को मोहरा बनाया जा रहा है। यह चैंकाने वाला तथ्य है या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता लेकिन बिहार के कई जिलों में तैनात पत्रकारों से खबर छापने के बदले अखबारों की प्रतियां बिकवाई जाती है। इसमें बड़े मीडिया गु्रप शामिल हैं। बिहार के कई जिलों के अखबारों से जुड़े पत्रकारों ने बताया कि किसी भी कार्यक्रम या खबर को छापने के लिए संबंधित संस्था या व्यक्ति से पैसे न लेकर उससे खबर छापने के एवज में अखबार की प्रतियां खरीदने पर दवाब बनाया जाता है। अखबार द्वारा अपने संवाददाताओं पर विज्ञापन के लिए दबाव बनाने की बात पुरानी हो चुकी है लेकिन प्रतियां बिकवाने का नया फंडा निकाल लिया गया हैं। यानी खबर छपने के बदले अखबार की प्रतियां खरीदों ? बदले में अखबार मालिक अपनी तिजोरी भर रहे हैं और दस टकिया पत्रकार जहां था वहीं खड़ा हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">मीडिया में इस तरह की परिपाटी का जन्म लेना मीडिया के लिए भयावह है और जिस तरह की सोच मीडिया के अंदर बढ़ती जा रही है वह काफी खतरनाक है। पत्रकार को पत्रकार न रख, उसे सेल्स एजेंट के तौर पर मीडिया हाउस इस्तेमाल कर रहा है।</p>
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		<title>एकछत्र शासन का घोषणापत्र- 37</title>
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		<pubDate>Sat, 31 Jul 2010 05:22:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जयदीप शेखर</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><img class="alignright size-medium wp-image-5401" title="guncrime" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/guncrime-294x300.jpg" alt="" width="294" height="300" />37. सजा का निर्धारण</strong></p>
<p style="text-align: justify;">37.1          किसी भी अपराध को निम्नलिखित पाँच में से किसी एक या &#8216;एकाधिक&#8217; श्रेणी/श्रेणियों के अर्न्तगत लाकर सजा का निर्धारण किया जाएगा-</p>
<p style="text-align: justify;">क) कायदे-कानूनों का उल्लंघन, जिससे किसी को नुक्सान नही पहुंचता हो- सजा: चेतावनी या जुर्माने से लेकर एक वर्ष से कम की कैद;</p>
<p style="text-align: justify;">ख) व्यक्ति, परिवार या संस्था को नुकसान पहुंचाने वाले अपराध- सजा: एक से तीन वर्ष तक की कैद;</p>
<p style="text-align: justify;">ग) समाज, संस्कृति या सभ्यता को नुक्सान पहुँचाने वाले अपराध- सजा: चार से छह वर्ष तक की कैद;</p>
<p style="text-align: justify;">घ) राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय एकता या राष्ट्रीय सम्पत्ति (सरकारी खजाना सहित) को नुकसान पहुँचाने वाले अपराध- सजा: सात से नौ वर्ष तक की कैद, और</p>
<p style="text-align: justify;">ङ) मानवता, पर्यावरण या जैव-विविधता को नुकसान पहुंचाने वाले अपराध- सजा: दस से बारह वर्ष तक की कैद।</p>
<p style="text-align: justify;">37.2          एक ही अपराध जब एक से अधिक श्रेणियों के अर्न्तगत आए, तो सजा भी जोड़कर दी जायेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">37.3          अदालत में अपना दोष स्वयं स्वीकार करनेवाले दोषियों को सजा में रियायत देने का &#8216;विवेकाधिकार&#8217; न्यायाधीशों को प्राप्त होगा। (इस विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते समय न्यायाधीशों को &#8216;जनभावना का ध्यान रखना चाहिए।)</p>
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		<title>बुद्धिमान, सुन्दर, स्वस्थ ऐसे बनो</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Jul 2010 18:00:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ राजेश कपूर</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-5501" title="swasthy -health" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/swasthy-health.jpg" alt="" width="260" height="298" />प्यारे बच्चो! मैं आपको कुछ उपयोगी बातें बतलाऊंगा जिनको अपनाकर आप अपनी स्मरण शक्ती बढा सकेंगे, कद लम्बा कर सकेंगे! इसके इलावा दांन्त-आखें सुन्दर, शरीर मजबूत बना सकेंगे! लड्कियों के बाल खूब लम्बे होसकेंगे! मन बडा प्रसन्न रख सकोगे! तो करना है न ये सब? करने में बडा आसान है!</p>
<p style="text-align: justify;">*१. रोज रात को सोते समय अपनें पैरों के तलुओं की मालिश देसी घी, शुद्ध सरसों के तेल, जैतून के तेल या नारियल के तेल से करें(इन में से जो भी मिले)! नाक के अन्दर भी लगाएं और अपनी नाभी में भी लगायें! सर दर्द, नक्सीर(नाक से खून आना), दिमाग का भारीपन आदि सब ठीक हो जायेंगे!<br />
*२. दो-तीन चम्मच मेथी-दाना लेकर रात भर पचास ग्राम पानी में भिगो दें! प्रातः पचास ग्राम कोई अच्छा तेल लें और मेथी, मेथी का पानी व तेल को किसी पीतल या लोहे के बर्तन में पकायें! जब मेथी के दाने काले होजायें तो तेल तैयार हो गया! अब इसको ठण्डा करके छानें और किसी कांच की शीशी में रखें! रात को सोते समय इसकी चार-पांच बूंदें कान में डालने से कुछ ही दिन में दिमाग तेज होगा, कैइ और रोग भी ठीक होंगे!<br />
नाक-कान में तेल डालने से थोडा-थोडा जुकाम होकर दिमाग हलका और मन प्रसन्न होजायेगा! दांतों की दर्द गायब होने लगेगी!स्मरण शक्ती बढने लगेगी! इतना ही नहीं, आंखें भी सुन्दर बन जायेंगी!<br />
*३. एक छोटीसी सच्ची कहानी सुनो! स्वामी जगदीश्वरानन्द जी किसी भक्त की बेटी की शादी में दिल्ली गये तो देखा कि शादी की सारी तैयारी और धूम-धाम तो जैसी होती है वैसी ही है पर दुल्हन तथा उसके माता-पिता कहीं नजर नहीं आरहे! पूछने पर पता चला कि ऊपर के कमरे में हैं, पर क्यों? किसी को पता नहीं था! स्वामी जी ऊपर के कमरे में गये तो देखा तीनो सर झुकाकर उदास बैठे हैं! लडकी दुलहन के कपडे पहने घुंघट में थी! प्रणाम आदी के बाद पूछा कि क्या बात है? पता चला कि लडकी को आई-फ़्लू हुआ है जिसका इलाज होनें में कई दिन लगेंगे! कोई बडे से बडा आधुनिक चिकित्सक तुरत-फ़ुरत आईफ़्लू का इलाज नहीं कर सकता! शादी में कैसे तो लडकी को मण्डप में बिठायें और कैसे मुंह दिखाई करें?<br />
स्वामी जी ने कहा कि चिंता न करो, बेटी अभी ठीक होजायेगी! और स्वामी जग्दीश्वरानन्द जी ने ये चमत्कार करदिया, लड्की पांच-छः घण्टों में ठीक होगई! प्रातः फ़ेरों के समय उसे देखकर पता ही नहिं चलता था कि उसे कभी आईफ़्लू हुआ भी था! स्वामी जी का यह जादू आप भी सीख सकते हैं, सीखोगे?<br />
स्वामीजी ने असली मेंहदी पानी में आटे की तरह गूंधकर उसका एक लड्डु जैसा बनाकर लडकी के गुदा-स्थान (मल-स्थान, ऐनस) पर रखवा दिया! एक-एक घण्टे बाद उसे बदलते रहे और लडकी का आईफ़्लू गायब होगया. कितना आसान है न? पर ध्यान रखना कि मेंहदी बहुत ठण्डी होती है, अतः सर्दियों के मौसम में या ज्वर आदि में इसका प्रयोग न करें! उच्च-रक्तचाप, आखों की लाली भी इससे ठीक हो सकती है! इतना तो आप समझ ही गये होंगे कि प्रातः मल त्याग के बाद ठण्डे पानी से गुदा-स्थान को धोने से आंखें और दिमाग स्वस्थ रह्ते हैं! जो टायलेट-पेपर का प्रयोग करते हैं और फ़ोम की कुर्सी, गद्दियों पर अधिक बैठते हैं; उन्हें आंख,कान,दिमाग के रोग भी अधिक होते होंगे, है न?<br />
*४. अमेरीका के प्रो. जे. मोर्गन (एम.डी) ने अपने साढे चार हजर मरीजों का इलाज बिना दवाओं के केवल ओम बुलवाकर कर दिया! हमने भी स्वयं अपने पर और कई बच्चों व रोगियों पर ओम का असर आजमाया है! वाकई बडी जल्दी व बडा अछा असर होता है! आप भी ओम का कमाल आजमाकर देखो! रोज प्रातः और सोते समय ओम का जाप पांच-दस मिनेट तक कुछदेर बोलकर और फ़िर कुछ देर बिना बोले (मानसिक) जाप करें! आप देखेंगे कि आपके सारे के सारे शारीरिक के और मानसिक रोग ठीक होते जा रहे हैं! बुद्धी व स्मरण-शक्ती, ताकत तथा उत्साह, प्रसन्नता बढती ही जायेगी! दस-बारह दिन में ही बडा अछा असर नजर आने लगता है!<br />
*५. जर्मन, फ़्रांस, रूस, इटली आदि अनेक देशों के वैग्यानिकों ने खोज की है कि भारतीय गऊ के गोबर को जलाने से हैजा, प्लेग, टाईफ़ाईड, डायरिया, टी.बी. तक के रोगाणु मर जाते हैं! अगर गोबर के उपले के साथ थोडी सी दाख, मुनक्का, किशमिश या गुड जला दिया जाये तो असर और भी अधिक होता है! केवल आधे घण्टे में नब्बे प्रतिशत से अधिक रोगाणू-कीटाणू मर जाते हैं! यानी अगर हम अपने घर में गोबर का एक टुकडा (अपनी उंगली जितना लम्बा और मोटा), थोडा सा देसी घी लगाकर धूप की तरह रोज सुबह-शाम जलायें और उसके साथ दो- चार दाने मुनक्का, दाख, किशमिश या गुड जलायेंगे तो हमारे घर में कभी भी कोई कीटाणुजन्य रोग होगा ही नहीं! कोई रोग होगा भी तो कुछ दिन में ठीक होजाजायेगा! गोबर की बत्तियां बनाते समय अगर उसमें थोडा तगर,जीरा, जटामासी,बचा,ब्रह्मी आदि डालसकें तो और भी कई लाभ होंगे!<br />
सबसे पहले आकलैंड के वैग्यानिकों ने यह खोज की थी कि संसार में दो तरह की गऊएं हैं! (१) जिनके दूध में बीटा कैसीन ’ए-१’ नामक प्रोटीन है वे सब कैंसर आदि रोग पैदा करती हैं! फ़्रेजियन, हलिस्टीन, रेड-डैनिश तथा अधिकांश जर्सी गऊएं ’ए-१’ प्रोटीन वाली हैं जिनके दूध से मधुमेह(डायबिटीज), कैंसर, आटिज्म, ह्रिदय रोग आदि असाध्य बीमारियां लगती हैं! इनका गोबर, गोमूत्र, दूध, स्पर्श आदी सबकुछ विशाक्त होता है! यही कारण है कि ब्राजील ने चालीस लाख से अधिक भारतीय गोवंश अपने देश में तैयार किया है! अमेरिका भी अब यही कर रहा है! (२) दूसरी वे गऊएं हैं जिनके दूध में ’ए-२’ नामक प्रोटीन होती है! ये दूध बल-बुद्धी वर्धक है और यह कैंसर रोधक है! हमारी सारी भारतीय गऊएं ’ए-२’ प्रोटीन वाली होती हैं! पर विदेशी लोग हमें यह बात बताते नहीं, हमसे छुपाते हैं! अतः हमें अपने इस स्वदेशी गोवंश की सुरक्षा करनी होगी और इसी के घी- दूध, गोबर, गोमूत्र का प्रयोग करना होगा!<br />
*६. कुछ सावधानियां रखने, अपनाने की भी जरूरत है, फ़िर आपका स्वास्थ्य कमाल का होजायेगा! समझने और याद रखने की ये बात है कि बोतल और पैकिट में बन्द सभी खाने-पीने के आहार पदार्थों में कुछ ऐसे रसायन डाले जा रहे हैं जिससे हमारा शरीर और दिमाग कमजोर होजाते हैं! इनमें  एक रसायन का नाम है  ’मोनोसोडियम ग्लुटामेट’. इसके असर से स्नायुकोश मरने लगते हैं; लीवर, गुर्दे, ह्रिदय, आंतें आदि भी धीमी गति से बेकार होने लगते हैं! इस ग्लुटामेट से अफ़ीम की तरह इसकी आदत पड जाती है और इसके बिना रहना मुश्किल हो जाता है! इसके प्रभाव से कम स्वाद चीजें अधिक स्वाद लगती हैं और स्नायुतंत्र इस तरह से खराब होजाता है कि पेट भर जाने की सूचना दिमाग तक पहुंचनी बन्द हो जाती है! लीवर खराब होजाने के कारण भूख नहीं लगती पर कुरकुरे, चिप्स, चाकलेट, पिज्जा, बरगर, खूब खाए जाते हैं क्योंकि ग्लुट्मेट हमें इसके लिये मजबूर करता है!<br />
इनके इलावा भी कई हानिकारक रसायनिक पदार्थ इन पैकिटों और बोतलों में होते हैं! अतः इनसे बचना चाहिये!<br />
*८. अश्वगंधा, विधारा, शतावरी ५०-५० ग्राम लेकर पीस लें, अब इसमें १५० ग्राम मिश्री मिलाकर रोज प्रातः एक छ्म्मच चूर्ण पानी या गो के दूध से खाते रहें! खटाई कुछ्दिन नहीं खाएं और कब्ज न हो तो शरीर शक्तीशाली बन जायेगा.<br />
*९. रोज सवेरे एक बताशे में ५-७ बूंदें बड के दूध की डालकर खाने से लडके, लडकियों, बडे, बूढों के मूत्र रोग टीक होजाते हैं और शरीर सुन्दर व शक्तीशाली बनता है!<br />
*१०. सर में शैम्पू लगाने से बाल, आखें, स्मरणशक्ती व चेहरा ख्राब होने लगते हैं क्योंकि इनमें कई हानिकारक रसायनों का प्रयोग हुआ होता है! साधू-सन्तों और अयुर्वेद के नाम पर बने जितने भी शैम्पू हमें बाजार में मिले, सभी हानिकारक थे! इसलिये शैम्पू की जगह कुछ और प्रयोग करना होगा! रीठा, निम्बू, दही, मेंहदी व नरोल साबुन का प्रयोग करके देखें!<br />
*११. आपने देखा होगा कि आजकल के बच्चों के दांत सफ़ेद-सुन्दर नहीं होते. जानते हैं क्यों ? टुथपेस्ट में डले हुए फ़्लोराईड से दान्त और हमारे शरीर की हड्डियां गलने, खराब होने लगती हैं. इसपर अनेक शोध होचुके हैं. अतः पेस्ट के स्थान पर किसी मन्जन का प्रयोग करना चाहिये. क्भी-कभी दातुन भी करते रहें. मल-मूत्र त्याग के समय दान्त दबाकर बैठें और बाद में कुल्ला कर लें. इससे भी दान्त मजबूत बनते हैं.  असल में मल-मूत्र त्याग के समय हमारे दन्तों की जडों में कुछ तेजाबी पदार्थ एकत्रित होकर उनकी जडों को कमजोर बना देते हैं. कुल्ला करने से ये तेजाबी तत्व निकल जाते हैं. हमारे पूर्वज तभी तो मल-मूत्र त्याग के बाद सदा कुल्ला किया करते थे.<br />
*१२. अन्त में एक बात और कि सोने से पहले रात को वही सोचकर और पढकर सोना जो आप बनना चाह्ते हैं! सवेरे उठकर भी कुछ्देर तक वही सोचना और ईश्वर से क्रिपा मंगना! केवल एक साल में आपको नजर आने लगेगा कि आपने जो मांगा था आप वही बनते जा रहे हो, हालात उसी के अनुसार बन रहे हैं!<br />
अगर कोई समस्या हो, कोई प्रश्न हो तो ई-मेल पर भेजना; समाधान पत्र या ई-मेल से भेजेंगे! ई-मेल के लिये जरुरत हो तो अपने अध्यापक, माता या पिता की मदद लेना! अगर ई मेल नहीं भेज सकते तो पत्र लिखना, पता है-<br />
&#8220;सुधाम, सपरून, सोलन-१७३२११ (हि.प्र.)<br />
ई-मेल :dr.rk.solan@gmail.com</p>
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		<title>मुलायम-कल्याण मैत्री अध्याय का लाभ कांग्रेस को</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Jul 2010 12:49:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमेश भट्ट</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5491" title="congress (1)" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/congress-1-226x300.jpg" alt="" width="226" height="300" />बीते लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में कांग्रेस ने लोकसभा की 22 सीटें जीतकर सबकों चौंका दिया। शायद खुद कांग्रेस के लोगों के लिए यह जीत किसी अचम्भे से कम नही थी। मगर जीत तो जीत है चाहे उसके लिए कोई भी कारण गिनाए जाए। कांग्रेसियों के इसके पीछे राहुल फैक्टर काम करता दिखाई दिया। पिछले कुछ सालों में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उत्तरप्रदेश को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बनाया है। देश को सबसे ज्यादा प्रधानमन्त्री देने वाले इस राज्य में कांग्रेस का ग्राफ 1989 के बाद लगातार गिरता चला गया। एक समय जो मुस्लिम समुदाय कांग्रेस का प्रबल समर्थक था, बाबरी विध्वंस के बाद वह उससे दूर होता चला गया। मगर 2009 के लोकसभा चुनाव में वह वापस कांग्रेस की तरफ आता दिखाई दिया। यही कारण है कि कांग्रेस को न सिर्फ वोट फीसदी बल्कि सीट का भी फायदा मिला। उपर से मुलायम कल्याण मैत्री अध्याय का लाभांश सीधे-सीधे कांग्रेस के खाते में गया। बहरहाल कारण जो भी हो कांग्रेसी 2012 में यूपी के दुर्ग में झण्डा गाड़ने का सपना अकेले दम पर देखने लगे है। अब सवाल यह कि क्या यह ख्याली पुलाव है या वाकई इस बात पर दम है। दरअसल पिछले कुछ महिनों में यूपी में हुए 16 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के छोली में 2 सीटें ही गई। जबकि सबसे अहम मुददा यह रहा कि फिरोजाबाद सीट पर 1800 वोट लाने वाली कांग्रेस मात्र 6 महिने में 350000 वोट के साथ सपा के गड़ में सेंध लगा गई। इस चुनाव ने मुलायम को एक सबक भी दिया की जनता ज्यादा दिन तक परिवारवाद और मनमाने फैसले के बोझ तले नही दबी रह सकती। कांग्रेस पार्टी ने इस समय युद्ध स्तर पर सदस्यता अभियान चला रखा है। हाल के आंकड़ों से यह पता लगता है कि यह अभियान के तहत कांग्रेस से जुड़ने वाले लोगों की संख्या 20 लाख से बड़कर 60 लाख के आसपास पहुंच गई है। इस साल यूपी में पंचायत चुनाव तय है। 2011 में शहरी निकाय के चुनाव और 2012 में विधानसभा चुनाव है। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव। बहरहाल सबसे पहले राहुल गांधी यूपी में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में नए जोश का संचार कर रहे है। दलितों के घर भोजन कर रहे है ताकि माया की दलित जमीन को दरका सके। इधर मायावती की सामाजिक संरचना को तोड़ना किसी भी पाट्री के लिए नामुमकिन दिख रहा है। मुलायम सिंह मुसलमानों से कल्याण को गले लगाने के लिए माफी मांग चुके है। देखना दिलचस्प यह होगा कि यह माफीनामा वापस मुस्लिमों को उनकी ओर खींच पायेगा या नही। इधर अजीत सिंह की पार्टी का कांग्रेसीकरण होना मुश्किल लग रहा है। इस काम में सबसे बडी चुनौति उनके खुद के बेटे है जो मथुरा लोकसभा सीट से सांसद हैं। बहरहाल देश को सबसे बड़े राज्य जहां से 404 विधायक चुने जाते है। 80 सांसदों दिल्ली चुन कर आते है। वह राजनीतिक लिहाज से कितना महत्वपूर्ण है आप और हम समझ सकते है।</p>
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		<title>अगर सरकारें अप्रासंगिक हो गयीं हैं&#8230;तो</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Jul 2010 12:23:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[लेखक : भूतनाथ &#8221; विकिलिक्स &#8221; द्वारा अमेरिकी कार्यवाइयों के भंडाफ़ोड किये जाने और अमेरिकी सरकार द्वारा इसे संघीय व्यवस्था का उल्लंघन बताये जाने पर एक प्रश्न अपने-आप ही उठ खडा... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/30/%e0%a4%85%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b9/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h2 style="text-align: right;"><strong><span style="color: #0000ff;">लेखक : भूतनाथ</span></strong></h2>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5486" title="Indian Gov &amp; Politics" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/Indian-Gov-Politics-259x300.jpg" alt="" width="259" height="300" />&#8221; विकिलिक्स &#8221; द्वारा अमेरिकी कार्यवाइयों  के भंडाफ़ोड किये जाने और अमेरिकी सरकार द्वारा इसे संघीय व्यवस्था का उल्लंघन बताये जाने पर एक प्रश्न अपने-आप ही उठ खडा होता है कि क्या सिर्फ़ सरकारें ही व्यवस्था को बनाये रखती हैं,बाकि सब तंत्र उसका उल्लघंन ही करते हैं??</p>
<p style="text-align: justify;">जबसे हमने लिखित इतिहास को पढा और उसके माध्यम से सब कालों में &#8220;सरकारों&#8221;का जो आचरण जाना और समझा है उससे तो ठीक उल्टा ही प्रमाणित होता है,अब तक के लिखित इतिहास के अनुसार हमने यही देखा है कि तरह-तरह की सरकारों ने किस-किस प्रकार के &#8220;सुनियोजित-कुकर्म&#8221; किये हैं और जब विभिन्न व्यक्तियों या किन्ही सामाजिक संगठनों ने उनके विरुद्द किसी भी प्रकार की आवाज़ उठायी या आंदोलन भी किया तो किस प्रकार से इस &#8220;तथाकथित &#8221; सरकारों ने उनका गला घोंटा है या कि अपनी सेना और अपने अधीन तंत्र के द्वारा किस प्रकार की हिंसा के द्वारा कुचला है और मज़ा तो यह भी है कि यह सब आज इस तथाकथित लोकतांत्रिक कहे जाने वाले &#8220;सभ्य&#8221; युग में भी हो रहा है,अंतर सिर्फ़ इतना है कि ऐसा आचरण करने वाली लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारों का ढंग और कम्युनिस्ट सरकारों का ढंग एक-दूसरे थोडा अलग है.</p>
<p style="text-align: justify;">इससे कभी-कभी ऐसा भी प्रतीत होता है कि लोकतांत्रिक देशों में लोक-तंत्र का अर्थ महज इतना ही होता है कि नागरिक अपनी मनमानी करें और अगर सरकार को यह नागवार गुजरे तो वह अपनी मनमानी करे&#8230;फर्क सिर्फ़ इतना है कि सरकार की मनमानियां एक भयानक अत्याचार से भी भीषण हो सकती हैं,बाद में भले वह हटा दी जाये और बाद वाली सरकार उससे भी जाहिल साबित हो&#8230;..</p>
<p style="text-align: justify;">अब तक यही समझा जाता रहा है कि लोगों द्वारा चुनी गयी सरकारों में लोगों के हित ज्यादा सुरक्षित होते हैं,हालांकि ज्यादातर इतिहास इस बात की न सिर्फ़ तस्दीक नहीं करता बल्कि इसे नकारता भी है.सरकार के लोग,उपर से नीचे तक चाहे वो कोई भी हों,खुद के कर्म को उचित और आम नागरिक के कर्मों को ज्यादातर गलत बताते हैं&#8230;.यह गलत होना गैर-कानूनी होने से लेकर देशद्रोह होना तक भी हो सकता है,यहां तक कि इसी तर्ज़ पर आज तक तमाम लोकतांत्रिक देशों के कानून उनके खुद के ही संविधान की धज्जियां उडाते दिखायी देते हैं&#8230;..और मज़ा यह है कि जिन कानूनों के बिना पर आम लोगों को कडी-से-कडी सज़ा तक दे दी जाती है&#8230;.उन्हीं कानूनों की चिथडे उनके रखवाले हर वक्त करते हुए दिखायी देते हैं, मगर चुंकि हर आदमी अपनी ही समस्याओं से भरा उन्हें निपटाने में पगलाया रहता है&#8230;..उसे गरज़ ही नहीं होती इस सबको देखने की [जब तक कि वो खुद नहीं इस सब झमेले में फ़ंस जाये ]&#8230;.और सिर्फ़ और सिर्फ़ इसीलिए यह सब चलता रहता है&#8230;..लोग आंख मूंद कर अपना-अपना जीवन व्यतीत करते रहते हैं&#8230;.और सरकारी दुनिया में बिल्ली के भाग से छींका टूटता रहता है&#8230;..उस टूटे हुए छींके से ये सरकारी लोग [बिल्लियां]मलायी मार-मार कर खाते रहते हैं&#8230;.यहां तक कि कोई आम नागरिक भी अगर इस मलायी को चाटना चाहे तो उसे निस्संदेह किसी ना किसी सरकारी हाथ की मदद का ही सहारा लेना होता है&#8230;.मज़ा यह कि कल को अगर यह सब उजागर भी होता है तो इसका ठीकरा हर हालत में उस गैर-सरकारी व्यक्ति या समूह के माथे पर ही फ़ूटना होता है&#8230;.अगर सरकारी हाथ कुछ ज्यादा ही काला हो गया हो तो तो सरकार खुद आगे बढ्कर उसे बचाया करती है&#8230;क्युंकि सरकार में भी तो ना जाने कितने ही पक्ष होते हैं,जिन्होने इस मलायी को चाटने में अपना भी मूंह मारा होता है&#8230;&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">इसका सीधा मतलब आप यह भी लगा सकते हो कि सरकार का दामन हमेशा साफ़ ही होता है&#8230;हम जैसे बेईमान और भ्रष्ट लोग ही सरकार का मूंह काला किये जाते हैं[सरकार के साथ मूंह काला नहीं करते....!!!]और इसीलिये सरकार का विरोध करने वाले&#8230;..सरकार अलग सोचने वाले&#8230;सरकार से बिल्कुल ही भिन्न नीति रखने वाले&#8230;.और सरकार के गलत कार्यों का विरोध करने वाले ना सिर्फ़ उसकी [गोपनीय]संघीय व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले समझे जाते हैं,अपितु देशद्रोही तक भी साबित किये जा सकते हैं&#8230;&#8230;प्रत्येक सरकारी व्यक्ति,चाहे वह कितना ही अदना-सा&#8230;.किसी भी सामान्य समझदारी का गैर-जानकार&#8230;या कि बिल्कुल ही टुच्ची सी समझ रखने वाला भी क्यों ना हो&#8230;..उसके अधिकार.. उसकी ताकत&#8230;.उसका अहंकार&#8230;.उसका रुतबा&#8230;उसकी कडकता&#8230;.उसका रूआब&#8230;.और सबसे बढ्कर ना जाने किन अनजान जगहों से आने वाला अथाह धन उसे हमसे इतर साबित करते हैं&#8230;.मगर वह देश-द्रोही कभी नहीं कहला सकता&#8230;.अगर कभी कहला भी गया तो यह माना जाता है कि जरूर ही उसके खिलाफ़ कोई गहरी राजनीतिक साजिश रची गयी है&#8230;और इसके पीछे अवश्य ही विपक्षी राजनीतिक दल है&#8230;.और इस प्रकार उस गद्दार व्यक्ति या समूह इस तरह के तमाम देश-द्रोही कार्यों के प्रति आंख मूंद ली जाती है&#8230;.और ऐसा क्यों ना हो&#8230;..आखिर उस हमाम में सभी शरीक जो हैं&#8230;..</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार के अनुदान से चलने वाला बहुतेरा मीडिया भी इस हमाम का ही वासी ही होता है&#8230;.इस मलायी का चटोरा&#8230;..सो एक तरफ़ मीडिया का एक हिस्सा उस गलत व्यक्ति/समूह या सरकार के इन कारनामों को उजागर कर रहा होता है&#8230;.वहीं&#8230;.यह मीडिया-विशेष अपनी पूरी ताकत और जद्दोजहद के संग उन गलत कार्यों में बराबर का भागीदार बन कर सरकार का वकील बनकर उन तमाम गलत पक्षों के पक्ष में तमाम निराधार और घटिया दलीलें पेश करता है&#8230;.जिन्हें हम बेसिर-पैर के  कुतर्क साबित कर सकते हैं&#8230;.और समय-समय पर ऐसा करते भी हैं&#8230;&#8230;मगर ऐसा कब तक चले&#8230;..और क्योंकर चले&#8230;..??सरकारों का कार्य क्या सिर्फ़ मनमानी करना है&#8230;.??सरकारें क्या किसी और लोक से उतरी हैं और किसी के भी प्रति उत्तरदायी  नहीं हैं&#8230;..??और आम आदमी का कोई और काम नहीं है क्या,जो वह सरकारों और उससे जुडे तमाम लोगों पर नज़र रखे&#8230;.और अपना महत्वपूर्ण काम-धाम छोड देने की कीमत चुका कर &#8220;ऐसे लोगों” की पोल खोजता चले&#8230;..??सरकारें एयरकंडीशंड रूमों में बैठ कर तमाम उल्टे-सीधे निर्णय ले ले&#8230;.फिर आम आदमी या संगठन  सडक पर आंदोलन करता चले&#8230;..??जब सब राय आम आदमी को देनी है&#8230;.और सरकार को उसके हर किये हुए कर्म का अच्छा-बूरा बतलाना है&#8230;..तो फिर ऐसे निकम्मे लोगों को सरकार बनाने का न्योता ही क्यों देना है&#8230;??</p>
<p style="text-align: justify;">क्या सरकार होने का मतलब यही होता है&#8230;..कि आप मनमानी करते रहो&#8230;..मनमाने निर्णय लेकर अपने ही नागरिकों की जान सांसत में डालते रहो&#8230;.उनका जीवन जीना हराम करते रहो&#8230;..??अपनी ऊंची अट्टालिकायें खडी करते रहो&#8230;..सब तरह का नाजायज काम उन्हीं नियमों के छेदों की आड में करते रहो&#8230;जिसकी बिना पर तुम किसी दूसरे को जेल में झोंक देते हो&#8230;.???और मीडिया-कोर्ट और सभी तरह के संगठन सरकार के पीछे भोंपू और लाठी लेकर दौडते फ़िरें&#8230;.???समझ नहीं आता कि आखिर सरकार है तो आखिर है क्या&#8230;.??सरकारें हम बनाते हैं हममे से कुछ लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर हमारे बीच सब किस्म की व्यवस्था कायम करने के लिये&#8230;.वो भी अपने खर्च से हुए चुनाव से और अपने ही खर्च पर दिये जाने वाले उन हज़ारों नेताओं और तमाम सरकारी लोगों को वेतन देकर&#8230;..और सब सरकार बनाते ही सिर्फ़ &#8220;अपनी व्यवस्था &#8221; कायम करने लग जायें&#8230;.तो उन्हें वापस कैसे बुलाया जाये&#8230;..और उनके लिये किस तरह की सज़ा तय हो&#8230;अब सिर्फ़ इसी एक बात पर विचार करना है हमारे समाज रूपी तंत्र को&#8230;.अगर सरकारें अप्रासंगिक हो गयीं हैं&#8230;तो उसी की वजह से न सिर्फ़ यह कु-व्यवस्था फ़ैलती है&#8230;.बल्कि नस्लवाद-आतंकवाद नाम नासूर भी यहीं से पनपता है&#8230;.पल्लवित होता है&#8230;..जिस तरह अपराधियों का इलाज लाठी-डंडे-कोडे तथा अन्य तरह की सज़ायें तय हैं&#8230;..उसी तरह यही सजायें क्या इन लोगों के लिये नहीं तय की जा सकती&#8230;.अगर माननीय न्यायालय कानूनों में छेद की वजह से उचित फ़ैसला कर पाने में अक्षम है&#8230;.तो फिर जनता को ही क्यों नहीं इसका ईलाज करना चाहिये&#8230;.!! मुझे उम्मीद है कि यह अनपढ-गरीब और सतायी हुई जनता एकदम ठीक फैसला लेगी&#8230;..हो सकता है कि सभ्य लोगों को उसका फैसला &#8220;जंगल का कानून सरीखा लगे&#8230;&#8221;मगर अगर सब तरफ़ जंगली लोग ही हों&#8230;और आम जनता के अधिकारों का बर्बरतापूर्वक हनन कर रहे हों तो आप किस तरह उनका इलाज सो कोल्ड सभ्य कानूनों द्वारा कर सकते हैं&#8230;.!!</p>
<p style="text-align: justify;">पानी सर से अत्यधिक उपर जा चुका है&#8230;.जनता को अब फैसला लेना ही होगा&#8230;.कि उसे क्या चाहिये&#8230;..एक अमानवीय और किसी भी प्रकार की उचित सोच से रहित सरकार&#8230;&#8230;और उसकी नाक तले ऊंघ रहा निकम्मा प्रशासन&#8230;&#8230;कि इन सबसे मुक्ति&#8230;..अगर दूसरे रास्ते की मन में है&#8230;.तब तो आगे बिल्कुल रद्दोबदल कर डालिये&#8230;&#8230;अपने बीच से एकदम नये लोग निकालिये&#8230;.और उन्हें चेतावनी देकर ही संसद और विधान सभाओं में भेजिये&#8230;..और अभी&#8230;&#8230;अभी के लिये यही कहुंगा कि इस वर्तमान को अभी-की-अभी उखाड फेंकिये&#8230;..और यह आप सब&#8230;.हम सब&#8230;.यानि कि आम जनता ही कर सकती है&#8230;..क्योंकि भ्रष्टाचारियों को सज़ा देने में हमारा कानून&#8230;..और हमारा संविधान भी पस्त हो चुका है&#8230;..!!!</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211;</p>
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		<title>हिन्दी लिखना सीख रही हूँ ….</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Jul 2010 17:00:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपाली पाण्डेय</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जनोक्ति पाठकों को दीपाली पाण्डेय का नमस्कार ! और &#8221; ब्लॉग हलचल &#8221; में हर बार की  तरह आपके समक्ष कुछ अंतरजाल पर नये आये चिट्ठों का लेखा &#8211; जोखा लेकर प्रस्तुत हूँ... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/29/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%96-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5468" title="blog halchal" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/blog-halchal4-300x200.jpg" alt="" width="300" height="200" />जनोक्ति पाठकों को दीपाली पाण्डेय का नमस्कार ! और &#8221; ब्लॉग हलचल &#8221; में हर बार की  तरह आपके समक्ष कुछ अंतरजाल पर नये आये चिट्ठों का लेखा &#8211; जोखा लेकर प्रस्तुत हूँ |</p>
<p style="text-align: justify;">आज की पहली पोस्ट हरीश कुमार तेवतिया की है - कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर भारत  की राजधानी दिल्ली में (अक्टूबर २०१० )को बड़े ही जोर शोर से बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रशंशिय खेलो का आयोजन होने वाला हैं | तेवतिया जी ने अपने ब्लॉग के माध्यम से भारत  की छवि को हमे किस तरह बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत करना हैं और साथ ही भारतवाशियों को सन्देश देने का प्रयास किया है</p>
<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://jagatras.blogspot.com/2010/07/2010-1_27.html">दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 </a></h3>
<p style="text-align: justify;">अगली पोस्ट रिसब चंदेल जी की हैं  .. भारत में क्रिकेट को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है  परन्तु आज आई पि एल जैसे क्रिकेट लीग के शुरू होने से और देश में भ्रष्टाचार को बढावा मिल रहा हैं  .खेल चाहे जो भी हो लेकिन ऐसे खेल का मतलब ही क्या रह जाता हैं जिससे हमारे &#8230;.. भारत के स्वाभिमान और गौरव का क्षति पहुचें</p>
<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://rushabhchandel.blogspot.com/2010/07/blog-post.html">मेरा भारत मेरा गौरव</a></h3>
<p style="text-align: justify;">आज महिलाऐं जागरूक हो गयी हैं  |अनेक किस्म की दिक्कतों के बीच रहकर भी वह अपने लिए राह खुद बना रही हैं . राजनीति हो ,मीडिया हो या कोई भी क्षेत्र हर क्षेत्र में चुनौतियों का सामना कर अपने क्षेत्र में निरंतर अग्रसर हो रही हैं |</p>
<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://reportermanoj.blogspot.com/2010/06/blog-post.html">मीडिया और महिलाये</a></h3>
<p style="text-align: justify;">वर्त्तमान समय में हिंदी को सब लगभग सब भूल ही चुके अगर हिंदी कुछ बची है तो केवल कुछ अख़बारों , मीडिया ,व् साहित्यकारों के बीच ही सिमट कर रह गयी है | इस बात को नकार नहीं जा सकता है की अंगेरजी के कारण ही आज देश में बहुत कुछ संभव हो पाया परन्तु नयी चीजों को अपनाकर अपनी चीजों को भूलना क्या ये बात सही है|</p>
<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://bachapan.blogspot.com/2010/07/blog-post.html">हिन्दी लिखना सीख रही हूँ</a></h3>
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		<title>राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर अय्यर-कालमाड़ी आमने-सामने</title>
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		<pubDate>Thu, 29 Jul 2010 16:42:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राजेश त्रिपाठी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पिछले कुछ अरसे से हमारे देश के कुछ मंत्री उत्साह में आकर या अपनी अलग सोच के चलते ऐसा कुछ कर या कह जाते हैं कि जिससे न सिर्फ उस... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/29/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b2-%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%95/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal; font-size: 13px;"><img class="alignright size-full wp-image-5472" title="comman wealt game" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/comman-wealt-game.jpg" alt="" width="270" height="210" />पिछले कुछ अरसे से हमारे देश के कुछ मंत्री उत्साह में आकर या अपनी अलग सोच के चलते ऐसा कुछ कर या कह जाते हैं कि जिससे न सि</span><span style="font-weight: normal; font-size: 13px;">र्फ उस सरकार की किरकिरी होती है जिसमें वे हैं अपितु वे खुद भी सवालों ले घिर जाते हैं। उनकी अपनी पार्टी के लोग उन्हें सवालों के कठघरे में ला खड़ा करते हैं। हाल फिलहाल यह स्थिति राज्यसभा सांसद मणि शंकर अय्यर की है जिन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों के विरोध में बयान क्या दिया, इन खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को अपना दुश्मन बना लिया। कलमाड़ी और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के लिए राष्ट्रमंडल खेल सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक बड़े आयोजन को सुचारु रूप से करा लेने का सुख या तमगा अपने सिर बांधने की होड़ का नाम है। गरीब और भूखे देश में 12 दिन के आयोजन के लिए हजारों करोड़ रुपये स्वाहा करने की इस ललक पर अय्यर ने सवाल उठा दिया है। ऐसा वे पहले भी कह चुके हैं कि भारत जैसे गरीब देश में इस तरह के आयोजनों का कोई औचित्य नहीं है।</span></h3>
<div style="text-align: justify;">
<p>वाकई अय्यर साहब के तर्क में दम है। हम जो बड़ा आयोजन करने जा रहे हैं उसमें फूंके तो करोड़ों जा रहे हैं लेकिन इससे देश को क्या हासिल होगा? सोने-चांदी के पदक तो विदेशी झटक ले जायेंगे, हमारे पल्ले क्या पड़ेगे कुछ रजत और कांस्य पदक। अब तक के देश-विदेश के कई बड़े खेल आयोजन गवाह हैं कि कहीं भी भारतीय खिलाड़ियों को वैसी कामयाबी नहीं मिली जैसी ओलंपिक वगैरह में हमसे छोटे देशों के खिलाड़ी पा जाते हैं। सिर्फ अभिनव बिंद्रा, राठौर, सुशील कुमार जैसे चंद गिने हुए कामयाब नामों का मतलब एक पूरा देश नहीं होता। इसमें दोष खिलाड़ियों का नहीं हमारे यहां उन्हें खेल के उचित साधन उपलब्ध न होने पाने का है जिसकी शिकायत कम से कम विदेशी खिलाड़ियों के मुंह से तो नहीं ही सुनने को मिलती। अभी ज्यादा अरसा नहीं बीता जब हमारे यहां के निशानेबाजों ने कहा था कि उनको अभ्यास के लिए गोलियां तक मुहैया नहीं करायी गयीं। ऐसे में आप अपने खिलाड़ियों से राष्ट्रमंडल खेलों में बड़ी कामयाबी हासिल करने का सपना पाले बैठे हैं? धन्य हैं भारत और उसके ये दिवास्वप्न देखने वाले नेता।</p>
<p>मणिशंकर अय्यर ने राष्ट्रमंडल खेलों में पैसे की बर्बादी और इसके निर्माण कार्य में होने वाली देरी पर नाखुशी जताते हुए कहा है कि इस खेल की रक्षा अब शैतान ही कर सकता है। कांग्रेस ने अय्यर के इस बयान को उनकी अपनी व्यक्तिगत राय बता कर पल्ला झाड़ लिया लेकिन सुरेश कलमाड़ी तो जैसे एकदम से उखड़ गये। उन्होंने तो अय्यर के बयान को राष्ट्रविरोधी तक कह डाला। वैसे अगर देखा जाये तो राष्ट्रमंडल खेलों के निर्माण की गति पहले से ही लचर और ढीली थी जिस पर खुद राष्ट्रमंडल खेलों के ब्रिटिश अधिकारी भी भारत आकर अपना असंतोष जता गये थे। उन दिनों भी कलमाड़ी को उनकी टिप्पणी अखर गयी थी और अधिकारियों और कलमाड़ी के बीच उभरे तनाव को खत्म करने के लिए बड़े नेताओं तक को बीच में आना पड़ा था। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में अब 64 दिन भी नहीं बचे। दिल्ली में 3 से 14 अक्तूबर तक ये खेल होने हैं। स्थिति यह है कि अभी तक बहुत सा निर्माण कार्य बाकी है। यहां तक स्थिति आ गयी है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को निर्माण कार्य में लगे ठेकेदारों को डराना पड़ रहा है कि अगर वे 31 अगस्त 2010 तक अपना काम पूरा नहीं करते तो उन पर जुरमाना तो लगेगा ही साथ ही उनका नाम काली सूची में लिख लिया जायेगा। इन खेलों में 70 देशों के खिलाड़ियों को ही हिस्सा लेना है और इसी में हम पस्त हुए जा रहे हैं और हमारे यहां कुछ लोग ओलंपिक जैसे आयोजनों का सपना भी देख रहे हैं। ऐसे बड़े आयोजनों को सफलता पूर्वक करा लेने वाले देश इसके लिए वर्षों पूर्व से तैयारियां करना शुरू आयोजक सरकार से 720 करोड़ रुपये और मांग रहे हैं। सरकार को उम्मीद है कि इन खेलों के दौरान दिल्ली में लगभग 1 लाख पर्यटक आयेंगे। अब इन लोगों को कमरे कम पड़ेंगे क्योंकि कुळ 35 होटल इस मकसद से तैयार होने थे जिनमें से सिर्फ 13 ही तैयार होने की स्थिति में हैं। इन 13 होटलों में सिर्फ 2500 कमरे ही उपलब्ध हो पायेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">जिन राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में हम इतना इतरा रहे हैं उसमें कई स्टार खिलाड़ियों ने भाग लेने से मना कर दिया है। कई देश सुरक्षा कारणों से दिल्ली के इन खेलों में हिस्सा लेने से कतरा रहे हैं और इन खेलों में हिस्सेदारी के प्रति अपनी अनिच्छा जता चुके हैं। वैसे भी इन खेलों पर लश्कर के हमले का खौफ मंडरा ही रहा है। ऐसे में आतंक के साये में हो रहा यह आयोजन कितना सफल होता है यह तो वक्त आने पर ही पता चलेगा। वैसे यह हमारे देश का एक बड़ा आयोजन है , एक देशवासी के रूप में हम इसकी कामयाबी की ही प्रार्थना करेंगे वैसे इस तरह के आयोजनों का लाभ आमजन तक न कभी पहुंचा है , न इस बार पहुंचेगा। चंद होटल वालों की चांदी कटेगी। कुछ ठेकेदारों और बिचौलियों की पौबारह होगी और देश के हिस्से दो-एक सोने चांदी के पदक और ढेर सारे कांस्य पदक आ जायेंगे। अगर लोहे का पदक होता तो संभव है उसे पाने में हमारा देश अव्वल रहता। जहां न खिलाड़ियों के लिए अच्छी सुविधाएं हों न उनके प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था वहां उनसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद करना भी उन पर ज्यादती ही है। आप अच्छी सुविधाएं दीजिए फिर देखिएगा सबके आगे होंगे हिंदुस्तानी। हम उस दिन का सपना बुन रहे हैं और राष्ट्रमंडल खेलों की रक्षा भगवान ही करें, शैतान ही नहीं यही कामना कर रहे हैं। आप भी यही कीजिए आखिर देश के भले की सोचना हर एक का कर्तव्य है।</p>
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