Featured|2011/11/29 9:29 pm

नेताओं एवं नौकरशाहों के लिए चेतावनी हैं थप्पड़

शरद पवार पर हमले के बाद हरविंदर सिंह

एक गुस्साए युवक द्वारा केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को थप्पड़ मारने की घटना पर पूरे देश में अफसोस प्रकट किया गया है। आम प्रतिक्रिया यही है कि ऐसी हिंसा से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता, यह निंदनीय है…आदि आदि। पवार की पार्टी के नेताओं तथा एक वर्ग ने सिरफिरे की करतूत बताकर इसे महत्वहीन करार दिया है।

निस्संदेह, लोकतंत्र में हिंसा का कतई समर्थन नहीं किया जा सकता, किंतु इसे केवल सिरफिरे या किसी मानसिक रोगी की करतूत बताना देश के अंदर व्याप्त असंतोष के दावानल को नजरअंदाज करना होगा। पवार वर्तमान सरकारी गठबंधन के पांचवें नेता हैं जिन पर एक आम नागरिक ने हमला किया है। 16 दिसंबर 2008 को इराक में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश पर पत्रकार मुंतजीर अल जैदी द्वारा जूते फेंकने के बाद से ऐसी घटनाएं थोड़े समय के अंतराल पर घट रहीं हैं। यह सामान्य चिंता की बात नहीं है कि इनमे सबसे ज्यादा घटनाएं भारत में हो गईं। एक भारतीय पत्रकार जरनैल सिंह ने 7 अप्रैल 2009 को गृह मंत्री पी. चिदम्बरम पर जूता फेंककर दूसरे व्यक्ति होने का दर्जा प्राप्त किया। चिदम्बरम के बाद कुरुक्षेत्र में कांग्रेस के प्रत्याशी एवं सांसद नवीन जिंदल को निशाना बनाकर एक सेवानिवृत्त शिक्षक ने जूता फेंका। इसी वर्ष कांग्रेस प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी के पत्रकार सम्मेलन में एक पत्रकार ने फिर जूता फेंका और उसकी कांग्रेस के नेताओं एवं कुछ पत्रकारों ने बुरी तरह पिटाई कर उसे अधमरा कर दिया। प्रश्न है कि ऐसी प्रवृत्तियां बढ़ क्यों रहीं हैं? क्या इन घटनाओं को केवल सिरफिरों की विकृत हिंसा मानकर नजरअंदाज कर दिया जाना चाहिए?

ध्यान रखने की बात है कि हमलावरों में से किसी का आपराधिक रिकाॅर्ड नहीं, निजी खुन्नस भी नहीं। इन सभी ने अपने को संबंधित नेता, सरकार, पार्टी के गलत, अन्यायपूर्ण एवं जन विरोधी कार्यों के विरुद्ध विद्रोही घोषित किया। पवार को थप्पड़ मारने वाला हरविन्दर कह रहा है कि क्या करुं जब भी सुनो घोटाले, घोटाले, घोटाले…. क्या करुं भगत सिंह के देश में ऐसा हो रहा है। हमारे पास कृपाण नहीं था…वरना……। गुरु गोवन्दि सिंह ने कहा कि सवा लाख मैं एक लड़ाऊं…। सब चोर हैं, केवल भाषण…। तो इसने भ्रष्टाचार एवं महंगाई को अपने क्षोभ का कारण बताया है। इसके पहले इसने भ्रष्टाचार के मामले में सजा पाए सुखराम पर भी न्यायालय परिसर में थप्पड़ चलाया था। जरनैल सिंह ने चिदम्बरम से सीबीआई द्वारा 1984 के सिख नरसंहार में जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट दिए जाने पर प्रश्न किया था। चिदम्बरम का जवाब सरकार के एक मंत्री एवं कांग्रेस के नेता के तौर पर वही था जैसा दूसरे नेताओं द्वारा पहले ही कहा जा चुका था। पत्रकार ने बीच में तर्क देने की कोशिश किया तो चिदम्बरम ने कहा प्लीज नो आर्गुमेंट। उसके बाद जरनैल ने जूता चला दिया। इसे केवल क्षणिक उत्तेजना की परिणति नहीं कहा जा सकता। हरविंदर या जरनैल पहले से ही कुछ करने का निर्णय करके आए थे। आप इन्हं सिरफिरा कहते हैं तो भी इनके सिर फिर जाने के कारणों पर गहराई से विचार करना ही होगा।

केवल हिंसा की निंदा से कुछ नहीं होने वाला। मानवीय विकास के इतिहास में हिंसा के भी अध्याय हैं। ज्यादातर लोगों की सहन क्षमता अपार होती है किंतु  जहां सहन क्षमता पार की सीमा में आती है वहीं ऐसा हो जाता है। किसी मनोवैज्ञानिक से पूछेंगे तो वह कई प्रकार की मनोविृत्ति बताकर उसके मानसिक रोग के इलाज का सुझाव देगा। आजकल हर ऐसे व्यवहार के लिए मनोविश्लेषकों ने बीमारी का नाम दे दिया। आॅब्सेशन, डिसाॅर्डर …। मानसिक बीमारी या हिंसा की भावना भी समाज के व्यवहार से ही पैदा होती है। आजादी के बाद भारतीय नेताओं का आभामंडल आम जनता की नजर में इतना ज्यादा था कि अगर उनसे कुछ गलती भी हो तो लोग सहसा प्रश्न नहीं उठाते थे।

आज स्थिति बिल्कुल बदल चुकी है। पूरे शासन जिसमें राजनीति, प्रशासन दोनों शामिल हैं, की छवि  देश के हित में, आम नागरिक के हित के लिए काम करने वाले नायक की नहीं, आम आदमी के हितों को अपने स्वार्थों की वेदी पर बली चढ़ाने वाले, देश हित के नाम पर अपने और अपने रिश्तेदारों के हितों के लिए सारे कुकर्म करने वाले दुष्ट घृणित खलनायक की हो गई है। हालांकि सभी राजनेता और नौकरशाह भ्रष्ट, बेईमान, कामचोर या जन विरोधी नहीं, लेकिन दुर्भाग्य से समग्र छवि ऐसी ही कायम हो चुकी है। किसी मुद्दे पर आप एक पार्टी के नेताओं का बयान सुनिए , ऐसा लगेगा जैसे वे एक दूसरे के प्रतिरुप हों। सबका आचरण, सबका बयान एक जैसा! इससे एक साथ जुगुप्सा एवं खीझ दोनों भाव उत्पन्न होता है।

आखिर लोकतांत्रिक सरकार एवं शासन प्रणाली के होते हुए भ्रष्टाचार, अपराध का घटित होना और इनको संरक्षण मिलना….सामान्य बात नहीं हैं, लेकिन ऐसा है। समाज में इस स्थिति को लेकर तीन वर्ग बन चुका है। एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे सुन्न होने की अवस्था में पहुंच रहा है। जैसे किसी पर लगातार विपत्ति आने लगे तो वह सहने का अभ्यस्त हो जाता है वैसे ही हमारे समाज का यह वर्ग शासन की आंखों के नीेचे, शासन के द्वारा या उसके संरक्षण से होने वाले अन्याय, अत्याचार कुकर्म… सबको सहने का अभ्यस्त हो चुका है। उसे लगता है कि यही स्वाभाकि स्थिति है। दूसरे वर्ग ने इसके साथ स्वयं को एडज्स्ट कर लिया है। किंतु, एक छोटा तबका है जो इसके विरुद्ध आवाज उठाता है। इसमें कुछ अति भावुक लोग हैं, जिनके आक्रोश की अभिव्यक्ति के लिए कोई सांगठनिक ढांचा नहीं और उनको विरोध करने के तरीके का प्रशिक्षण भी उपलब्ध नहीं, इसलिए वे ऐसी विकृत हिंसा के द्वारा अपनी खीझ उतार रहे हैं। अगर नेता एवं नौकरशाह पुनः इसे एक सामान्य घटना मानकर टाले रहे हैं तो इसका अर्थ इतना ही है कि वे अपने विरुद्ध देश भर में कायम सामूहिक गुस्से को समझ नहीं रहे या यह मानते हैं कि इसे दूर करना उनके वश मेें नहीं। दोनों स्थितियां खतरनाक हैं।

नेताओं के व्यवहार का एक उदाहरण देखिए। पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं राज्य सभा सांसद तारिक अनवर एक समाचार चैनल पर ऐसे ही तर्क दे रहे थे, जब मैंने हिंसा का विरोध करते हुए भी देशव्यापी माहौल की चर्चा की तो वे उबल पड़े और कहने लगे कि मैं इन्हें वरिष्ठ पत्रकार नहीं मानता, ऐसी भाषा कोई वरिष्ठ पत्रकार बोल नहीं सकता। मर्यादित भाषा में जब नेता सच तक सुनने की शालीनता न दिखाकर शब्दों से हिंसा करने लगेंगे तो उसका परिणाम क्या हो सकता है! फूलपुर में राहुल गांधी को काला झंडा दिखाने गए समाजवादी पार्टी के युवाओं के साथ कांग्रेस के सांसद, विधायकों ने किस तरह लातों,घूसों से पिटाई की उसे भी दुनिया ने देखा। इन सब आचरणों से आम युवाओं को क्या प्रेरणा मिल सकती है। आज का सच यह है कि आम व्यवहार से भी धीरे-धीरे सहनशीलता और विनम्रता गायब हो रही है तथा हिसंक प्रवृत्तियां बढ़ रही है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर व्यवस्था के प्रति असंतोष लगातार बढ़ रहा है। आखिर विरोध प्रकट करने में निजी अराजकता या हमला या अपमानित करने वाले तरीके अपनाने की प्रवृत्ति समाज के बदलते आचरण का ही तो प्रमाण है। ऐसा यूं ही तो नहीं हो रहा। हम मानते हैं कि हिंसा से किसी समस्या का समाधान नहीं, लेकिन असंतोष से उबलते, खीझे अधिकारविहीन लोग इसे अपना रहे हैं। नक्सली हिंसा की हम जितनी आलोचना करें, इसके समर्थक भी तो अपने समाज में मौजूद हैं। क्यों? इस क्यों को नजरअंदाज करने का अर्थ है भविष्य की हिंसक अराजकता को निमंत्रण देना। आखिर चिदम्बरम पर जूता फेंकने की उत्प्रेरणा कहंा से आई? इतने सिखों की जघन्य हत्या के 26-27 वर्ष बाद तक किसी को सजा न मिलना एक न्यायपूर्ण व्यवस्था का प्रमाण नहीं हो सकता। अगर कुछ को सजा मिली होती तो एक वरिष्ठ पत्रकार का अंतर्मन ऐसा उबाल मारता ही नहीं। उसी प्रकार यदि भ्रष्टाचार एवं महंगाई का राक्षस इतना व्यापक नहीं होता तो हरविंदर को ऐसा करने की उत्प्ररेणा ही नहीं मिलती।

जाहिर है, इनकी जड़ वर्तमान व्यवस्था में है जो अपने चरित्र से ही भ्रष्टाचार को बढ़ाने वाली, अपराध को संपोषित करने वाली, एक वर्ग विशेष को व्यापक समाज की कीमत पर आर्थिक लाभ देने वाली और कुल मिलकार एक भयावह अन्यायपूर्ण समाज के निर्माण का कारण है। जब तक यह व्यवस्था कायम है हिंसक अराजकता की भयावह संभावनाऐं हमेशा मौजूद हैं।

1 Comment

  • यह जनता में बढ़ रहे आक्रोष का नतीजा है कि ऐसी घटनाएँ हो रही है। देश के नेताओं ने अपने नैतिक स्तर को इतना नीचे गिरा दिया है कि अब वो खलनायक लगने लगे है और खलनायकों का क्या हस्र होता है हम और आप भली प्रकार जानते है। अब भी समय है सम्हल जाएँ तो बेहतर है।

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