Featured|2012/02/06 1:17 pm

कश्मीर बचाने की मुहिम !

लेखक : Mann singh
कश्मीर बचाने की मुहिम !कश्मीर की मीरा कहलाने वाली संत कवयित्री ललद्यद का आज कुछ कहना भी खतरे से खाली नहीं होगा। 14वीं सदी की वह महान हस्ती आज उन जमातों में नहीं गिनी जातीं, जो सेकुलर कही जाती हैं। ललद्यद भी कम्युनल हो गई। 19 जनवरी को असंख्य कश्मीरी हिंदुओं को घाटी से निकले 22 वर्ष हो गए। इन निर्वासित हिंदुओं ने कहीं बम नहीं फोड़े, किसी गांव में जाकर आग नहीं लगाई और किसी के घर रात के दो बजे दस्तक देकर गोलियों से सारे परिवार को मारकर गाजी जैसा कोई खिताब नहीं ओढ़ा। क्या इसीलिए उनकी व्यथा पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया?
ईश्वर में मगन रहने वाली कश्मीर की भक्त कवयित्री ललद्यद (जिन्हें लल्लेश्वरी नाम से भी जाना जाता है) ने कहा था, ईश्वर ने सब बंदों को एक जैसा पैदा किया है। वह यह नहीं मानती थीं कि जो मस्जिद में जाए वह आबाद हो और जो शिव भक्त हो, उसके धर्मस्थल तोड़ दिए जाएं। अल्लाह और राम में फर्क ललद्यद के चरित्र में था ही नहीं। वे जो ढूंढ़ते हैं कि जो भी मंदिर वाला मिले, माथे पर तिलक लगाए मिले या जो भी तिरंगे की शान के लिए जान देने वाला मिले, फिर चाहे वह मुसलमान ही क्यों न हो,उसको मार दिया जाए। वे लल द्यद को नहीं समझ सकते। छोटे-छोटे दूध पीते बच्चों को भी मां से जुदा कर मार देने में उनको कोई गुरेज नहीं होता, क्योंकि वे एक कथित “महान मिशन” पर काम कर रहे होते हैं। उन लोगों को किस तरह समझाया जाए कि वाजवान और समोवार का सही मतलब क्या होता है? घर-बार, दरख्त, बगीचे और कश्मीर की सर्दी, बरफ और कांगड़ी छोड़ने का दर्द क्या होता है?
रोज की तहर 19 जनवरी के दिन भी दिल्ली व्यस्त है सरकार बनाने, दलित घरों में एक रात बिताने, रैन बसेरे पर बुलडोजर चलाने, पैसे के लेन-देन और पेज-थ्री पार्टियों के वृत्त लिखने में। “पेड न्यूज” का जमाना है। कश्मीरी हिंदुओं के बारे में लिखने से क्या फायदा? कौन “वोट बैंक” है भाई इन सब लोगन का? इतिहास गवाह है, 19 जनवरी 1990 को कश्मीर घाटी में लाउड स्पीकरों पर कैसी खतरनाक और भड़काऊ घोषणाएं हो रही थीं। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट और हिजबुल मुजाहिदीन के गाजी घूम-घूमकर हिन्दू घरों पर लिख रहे थे, “हिन्दुओं, तुम भाग जाओ,…” किसने गुहार सुनी पीड़ितों की? किसने कहा कि जब तक ये हिंदुस्तानी वापस अपने घरों को नहीं लौटते, तब तक मैं सिर्फ एक वक्त खाना खाऊंगा?
घर के उजड़ने का दर्द क्या होता है, यह किसने समझा? दुनिया के इतिहास में ऐसा उदाहरण और कहां मिलेगा कि अपने ही देश में अपने ही नागरिक, देशभक्ति और धर्मनिष्ठा के लिए मारे जाते रहे, उजाड़े जाते रहे और फिर भी देश में चुनाव और संसद के कामकाज बदस्तूर चलते रहें? कश्मीर में कश्मीरी हिन्दुओं को पूरी तरह से संदर्भहीन कर दिया गया है। सब इस पाप के भागीदारी हैं। वहां अभी तक दो झंडे हैं। दो तरह की संवैधानिक व्यवस्थाएं हैं, दो तरह के निजाम हैं। वहां की समस्या के समाधान के लिए किसी भी वार्ता से कश्मीरी पंडितों को पूरी तरह निकाल दिया जाता है। वहां वे कब वापस लौटेंगे, यह विषय किसी भी राजनीतिक पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र का हिस्सा नहीं बनता है।
सरकार को प्रवासियों के घर वापसी की तो चिंता है, लेकिन जो लोग देश में ही निर्वासित हैं, उनके बारे में वह कुछ नहीं सोच रही है। घर से उजाड़कर बाबुओं के रहम पर, छोटे-छोटे फ्लैटों और शिविरों में रहकर कितने ही कश्मीरी पागल हो गए, एक पूरी कौम ही तितर-बितर हो गई। इसका हिसाब कौन रखेगा? भारत की संस्कृति और सभ्यता की एक अद्भुत कथा रचने वाला समाज ही जड़ों से उखाड़ दिया गया और भारत के भक्त निवासियों ने इसे कितनी गंभीरता से लिया? श्री संस्कृति की परंपरा, शारदा लिपि, शारदा मठ,ऋषि कश्यप द्वारा कश्मीर बसाए जाने का इतिहास, ललितादित्य का महान शासन, राजतरंगिनी के पृष्ठ,सब कैसे वितस्ता में बहा दिए जाएंगे?
अब उन्होंने कश्मीर में शहरों के नाम भी बदलने शुरू कर दिए हैं। अनंतनाग को इस्लामाबाद लिखा जाता है। शंकराचार्य पहाड़ी को सुलेमान पहाड़ी कहा जाता है। कश्मीर में से कश्मीरियत को उखाड़ देने की साजिश को नाम दिया गया है, “कश्मीर बचाने की मुहिम!” जिहादियों ने अपने उदार धर्मावलंबियों पर भी कोई रहम नहीं किया है। उन पर भी ज्यादतियां होती रही हैं। हम किस तिरंगे की शान में 26 जनवरी मनाते हैं, जरा सोचा जाए। 19 जनवरी, 26 जनवरी से पहले आती है।

2 Comments

  • भारत की संस्कृति और सभ्यता की एक अद्भुत कथा रचने वाला समाज ही जड़ों से उखाड़ दिया गया और भारत के भक्त निवासियों ने इसे कितनी गंभीरता से लिया?

  • हिन्दू उनसे भी अधिक दोषी हैं, जो अपने ही भाइयों को लुटता पिटता देखते रहें.

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