सुलगते मुद्दे / अवधेश कुमार
अन्ना हजारे स्वयं अपने साथियों के अनशन में शामिल हो चुके हैं। मीडिया के माध्यम से यह देश की चर्चा का केन्द्रबिन्दु पहले से बना हुआ है। यह मानने में तो किसी को गुरेज है ही नहीं कि सरकार एवं संसद में प्रतिनिधित्व रखने वाले सभी राजनीतिक दलों को लोकपाल विधेयक अपने शीर्ष एजेंडे में लाने के लिए विवश करने में अन्ना हजारे एवं उनके साथियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि इसमें अन्ना के अनशन से ज्यादा भ्रष्टाचार के विरुद्ध बने माहौल एवं उनके साथियों की आयोजन प्रबंधन की भूमिका रही है, फिर भी इसका श्रेय तो उन्हें जाता ही है। किंतु, धीरे-धीरे उनकी भाषा और भाव-भंगिमा से कुछ संकेत और भी मिल रहे हैं जिन्हें समझना आवश्यक है।
हर मुद्दे और सत्याग्रह के साथ संख्याबल का होना आवश्यक नहीं है। कम या ज्यादा संख्या हर बार किसी मुद्दे के सही या गलत होने का आधार नहीं होता। हालांकि अन्ना-समूह ने स्वयं अपने समर्थन और लोकप्रियता की कसौटी भीड़ को बताया था और इस बार आरंभ से जन-बेरुखी के कारण उनके समर्थन पर प्रश्न उठा। हम मानते हैं कि जब तक लोकपाल विधान नहीं बन जाता अन्ना-समूह को दबाव बनाने की कोशिश करते रहना चाहिए। अन्ना-समूह अपने अनशन एवं बयानों से लगातार देश का केन्द्र-बिन्दु बनता रहा है एवं कई कारणों से उसका एक समर्थक वर्ग देशभर में खड़ा हुआ है इसलिए यह समझने की आवश्यकता है कि अपने समर्थक वर्ग को आप आगे किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? यह तथ्य है कि महात्मा गांधी के सत्याग्रह के रास्ते संघर्ष करते दिखते हुए भी उनके व्यवहार में यह मुखर रूप में कभी दिखाई नहीं पड़ा। सत्याग्रह करने वाले की भाषा और भंगिमाओं में विरोधियों के प्रति भी विनम्रता और सम्मान का भाव होना अपरिहार्य है।
यह बात साफ है कि जन लोकपाल को पूरे राजनीतिक प्रतिष्ठान में समर्थन नहीं है। राजनीति से बाहर सोचने-समझने वाले वर्ग के बहुमत ने भी जनलोकपाल के प्रारूप को एक सुपर सरकार की संरचना मानकर उसे निषेध एवं संतुलन के वर्तमान लोकतंत्र के मान्य आधार के लिए अनुचित करार दिया है। यानी जन लोकपाल को वर्तमान सरकार ही नहीं इस राजनीतिक प्रतिष्ठान से जो भी शासन में आएगा कानूनी जामा नहीं पहना सकता। अन्ना-समूह को यह सामान्य सा यथार्थ समझ में नहीं आया हो ऐसा नहीं हो सकता। बावजूद इसके वे यदि अड़े हैं तो साफ है कि उनका लक्ष्य धीरे-धीरे विस्तारित हो गया है। संभव है अप्रैल 2011 में उनका इरादा एक सशक्त लोकपाल को साकार किए जाने तक सीमित रहा हो, किंतु अगस्त 2011 में अन्ना की गिरफ्तारी और जेल से रिहाई, अनशन के दौरान जितना जनसमूह उभरा, संसद में जैसी प्रतिक्रिया हुई और मीडिया ने जितनी अभूतपूर्व कवरेज दी उसका असर होना स्वाभाविक था। हालांकि मुंबई का अनशन इनको आघात पहुंचाने वाला था। उसके बाद इन्होंने मुद्दों का दायरा बढ़ाना आरंभ किया। चुनाव सुधार से लेकर, प्रतिनिधि वापसी आदि का बयान तो अन्ना ने ही दिया। हां, इसका अवश्य ध्यान रखा गया कि ये सारे मुद्दे जन लोकपाल की अपरिहार्यता साबित करें। गत् 25 मार्च के अन्ना के पांचवें दौर के अनशन में ईमानदार अधिकारियों के शहीद होने के पहलू को प्रभावी तरीके से उठाया गया। उसके बाद 26 मई को संवाददाता सम्मेलन करके 34 में से 15 कैबिनेट मंत्रियों पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप होने के दस्तावेज दिए गए एवं इनकी त्वरित जांच की मांग की गई।
उसी दिन 25 जुलाई के अनशन की घोषणा हुई। इसमें प्रधानमंत्री पर कोयला आवंटन में भ्रष्टाचार का आरोप लगा। इसके पूर्व संसद में गंभीर आरोप वाले सांसदों का मुद्दा भी इन्होंने तीखी प्रतिक्रियाओं और बहस के कन्द्र में ला ही दिया था। वस्तुत: 25 जुलाई से आरंभ अनशन के ये मुद्दे निर्धारित थे और इसी को लेकर ये तैयारी कर रहे थे। केवल इस बार दो बातें जुड़ीं हैं। एक, राजनीतिक दलों के अध्यक्षों पर लगे आरोपों को लाया गया है तथा ‘संसद शुद्धीकरण’ शब्द का प्रयोग केजरीवाल ने किया है। उन्हें पता है कि उनके अनशन से न तो मंत्रिमंडल के सदस्यों पर लगे आरोपों के लिए विशेष जांच दल यानी सिट का गठन होगा, न पार्टी प्रमुखों के लिए और न लोकसभा व राज्यसभा के सांसदों के लिए फास्ट ट्रैक न्यायालय बनेगा और यदि बन गया तो श्रेय इनको ही जाएगा और ये इसे अपनी उपलब्धियों में शामिल करेंगे।
अगर आप सतही तौर पर भी इसका विश्लेषण करेंगे तो 2011 के अप्रैल से अब तक के प्रयाण में अन्ना अभियान सीधे राजनीति के मैदान की ओर बढ़ता दिखाई देगा। भले अभी बयान हैं कि वे राजनीतिक विकल्प नहीं देंगे, लेकिन यह पूरा सच नहीं दिखता है। सारे राजनीतिक दल इनकी निंदा के दायरे में आ गए हैं। मई में अन्ना ने कहा था कि 3 जून की दिल्ली बैठक में राजनीतिक परिवर्तन पर चर्चा होगी। अब अन्ना ने कहा है कि वे 2014 में जन उम्मीदवार देंगे जिनका चयन जनता करेगी और वे उन उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार भी करेंगे।
पूरा माहौल ऐसा बनाया जा रहा है जिससे संदेश जाए कि इस समय की सरकार ही नहीं अन्य दलों के नेता भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध कारगर उपाय के पक्ष में नहीं, क्योंकि भ्रष्टाचार के हमाम में सभी नंगे हैं, इसलिए संसद यानी राजनीति के शुद्धीकरण के लिए हमें ही आगे आना होगा। अरविन्द केजरीवाल का भी बयान है कि देश में गुस्सा है और 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस तथा भाजपा से अलग एक राजनीतिक विकल्प जनता के बीच से खड़ा होगा जिसे हम समर्थन देंगे। केजरीवाल, मनीष सिसोदिया एवं गोपाल राय का अनशन अन्ना के बाद की तैयारी है। उनकी आक्रामक भाषा ही नहीं, वाहनों के काफिलों का जुलूस आदि राजनीतिक दलों के व्यवहार अनुसार ही हैं। कुछ मतभेद भी होंगे, पर यह अभियान प्रत्यक्ष राजनीति की ओर ही बढ़ रहा है।
संसदीय लोकतंत्र में राजनीति परिवर्तन का मुख्य अस्त्र है। अन्ना-समूह को इसका पूरा अधिकार है। हम अन्ना समूह विरोधियों की लांछनाभिव्यक्तियों से सहमत नहीं हो सकते। यह गलत या अनैतिक नहीं है। पर यदि राजनीति के शुद्धीकरण के नाम पर वे मैदान में प्रत्यक्ष-परोक्ष कूदते हैं तो राजनीतिक दल उनसे यह पूछ सकते हैं कि आपने पहले जो कहा वह झूठ था क्या? वैसे भी आंदोलन को इवेंट मैनेजमेंट यानी आयोजन प्रबंधन से इतना भड़कीला और खर्चीला बनाकर अन्ना-समूह ने सच्चे आंदोलनकारियों के लिए कठिनाइयां पैदा कर दी हैं। यह परिवर्तन के लिए सक्रिय और अनेक आंदोलनों में लगे लोगों के लिए बड़ा धक्का होगा।
(यह लेख ट्रिब्यून में पूर्व प्रकाशित है )





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