प्रिय ,पाठक बंधुओं अपने सम्पादकीय स्तम्भ 'संपादक उवाच ' के अर्न्तगत हमने एक नया कॉलम 'पाठक उवाच' का श्रीगणेश किया है जिसमें विभिन्न मुद्दों पर आपकी राय ,आपके विचारों को शामिल किया जायेगा .'पाठक उवाच ' की पहली कड़ी में पेश है ,शिक्षा के व्यापारीकरण के मुद्दे पर "जनोक्ति " के नियमित पाठक चन्द्र सिंह 'राकेश' : 
एक वो भी जमाना हुआ करता था ,जब गरीब छात्रों के लिए छात्रावास की सुविधा होती थी .समाज शिक्षा का संचालन करता था .लेकिन आज बदलते दौर में हरेक चीज का निजीकरण हो रहा है .आज शिक्षा का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रह गया है . व्यापारिक प्रवृत्ति के लोभी लोगों द्वारा विदेशी रूप में शिक्षा को अपनाए जाने पर काम किया जा रहा है . मैकाले के हाथों बर्बाद हुई भारतीय शिक्षा व्यवस्था का बचा-खुचा स्वरुप अब देश के हीं कुछ मतलबी लोगों द्वारा मिटटी में मिलाया जा रहा है और सरकार भी इस काम में शिक्षा के व्यापारियों का भरपूर साथ दे रही है .एक तरफ आधे से अधिक आबादी साक्षरता की लड़ाई लड़ रही है तो दूसरी तरफ माध्यमिक और उच्च शिक्षा का खर्च दिनोदिनआसमान को छूता जा रहा है .
वर्तमान हालत में इस बात को सोचना चाहिए कि कम खर्च में बेहतर शिक्षा कैसे उपलब्ध कराइ जाए . नवोदय विद्यालयों का मॉडल इस दिशा में एक बेजोड़ उदाहरण माना जा सकता है .एक समय था जब गरीब छात्रों को राष्ट्रीय स्तर पर छात्रवृत्ति मिलती थी आज क्या मिल रहा है या नहीं मिल रहा है आम अभिवावकों और छात्रों में इस बात को लेकर कोई जानकारी नहीं होती है . सरकार को इस दिशा में जागरूकता फैलाने का प्रयास करना चाहिए और अगर ऐसी व्यवस्था बंद की गयी है तो उसे वृहत पैमाने पर लागू किया जाना चाहिए .
हम सब कहते है भारत गाँव का देश है ,किसानों का देश है तो हमें नहीं भूलना चाहिए कि शिक्षा का वर्तमान व्यापारिक स्वरुप ग्रामीण भारत के किसी काम का नहीं है . आज रोजगारपरक शिक्षा की बात तो की जाती है लेकिन देश के सबसे बड़े आर्थिक क्षेत्र कृषि को नज़रअंदाज किया जाता है .आज कृषि और पशुपालन से जुडे हुए पाठ्यक्रमों को प्राथमिकता मिलनी हीं चाहिए .
विकास की योजना और शिक्षा को साथ लेकर चलना चाहिए .परन्तु आज केद्र अथवा राज्य की सरकारें क्या कर रही है ? ये सरकारें बड़े -बड़े भवन बना रही है , मुक्त हाथों से निजी शिक्षण संस्थानों को पंजीयन बाँट रही है , शिक्षा में सुधार के नाम पर आरक्षण दे रही है , तीन -चार हज़ार की तनखाह पर लोक-शिक्षक बहाल कर रही है , प्राथमिक विद्यालय के छात्रों को मध्यान्न भोजन भी करवा रही है आदि -आदि . फ़िर भी शिक्षा की दशा -दिशा पहले से भी बदतर होती जा रही है .पहले जिस जाती व्यवस्था को शिक्षा में असमानता का कारण बाते जाता रहा है आज उसकी जगह आर्थिक व्यवस्था ने ले ली है . आज जिसे पास जितना पैसा है वो उतना हीं पढ़ा लिखा है . अब सरस्वती लक्ष्मी के घर गिरवी है और पहले की तरह लक्ष्मी भी चंचला नहीं रही जो इधर उधर भटकती फिरे . आज लक्ष्मी भी स्थाई ग्राहकों की तलाश में रहती है . जिस पर एक बार मेहरबान हो जाए तो फ़िर कई पीढियों तक साथ निभाती है .
आज केवल शिक्षा स्थलों के ढांचे बनाने पर जोर न देकर शिक्षा का स्तर , पाठ्यक्रम ,और शिक्षकों की समस्याओं पर सरकार की नज़र होनी चाहिए .

