" पाठक उवाच " की इस कड़ी में 'जनोक्ति के उद्देश्य' के ऊपर भोपाल से प्रमोद ताम्बट जी के द्वारा भेजे गये निजी मेल को शामिल किया जा रहा है .

भाई जयराम जी,
आपका मेल मिला मगर ''जनोक्ति'' के पक्ष में कही आपकी हर बात से सहमति प्रकट करना मुश्किल है। वर्ग विभाजित समाज में प्रत्येक मनुष्य के विचारों का पूरा ताना-बाना निश्चित रूप से शोषक या शासित वर्ग के स्वार्थ के इर्द गिर्द घूमता है। जाने अन्जाने हम में से हरेक आदमी इन्हीं विचारों का वाहक होता है। यदि आप शोषक वर्ग के विचारों के वाहक नहीं है तो निश्चित रूप से आप शासित वर्ग के विचारों को ढो रहे होते है। ऐसे में जब आप कहते है कि विचारधारा और वाद से मुक्त होकर मानव समाज के लिए कुछ किया जाए तो यह स्पष्ट तौर पर शोषक वर्ग की विचारधारा है क्योंकि शोषित वर्ग को तो अपनी मुक्ति के लिए एक ठोस विचारधारा चाहिए ही चाहिए, वह कौन सी है आप अच्छी तरह से जानते है। उससे पृथक कोई भी विचारधारा यहाँ तक कि तटस्थता का भाव तक शोषित वर्ग की लक्ष्य प्राप्ति की मुहीम में बाधा के अलावा कुछ नहीं है।
वाद के तमगे में जकड़ी मानसिकता अपना स्वतंत्र विकास नही कर सकती और न ही सर्वसमाज का हित सोच सकती है यह बात इतिहास ने कई बार झूठ साबित कर दी है। कुछ असफलताओं को यदि आप निराशा की दृष्टि से देखते हैं तो मैं कहना चाहूँगा कि समाज के विकास का तरीका ही यही होता है जिससे सीखकर आगे की राह निकालना मनुष्य की आदिम परम्पराओं में आता हैं।.
अब किसी भी पीड़ा का भान समाज को नही होने दिया जाता ताकि क्रांति न उपजे
यह बात आप किस आधार पर कह रहे है पता नहीं जबकि 95 फीसदी जनसाधारण पीड़ा और बदहाली की जिन्दगी जी रहा है। हाँ नाना तरह से उन्हें शोषित रूप में एकजुट ना होने देने के सैकड़ों प्रयोजन किये जा रहे हैं जिनमें छद्म क्रांतिकारिता एवं पूंजीवादी वामपथ भी एक अलग रूप लिए शामिल है।
बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नही हो सकता
इसमें कोई शक नहीं। क्योंकि ज्ञान हमेशा मानवजाति के Upward और Onward विकास की दिशा में अभिव्यक्त होता है और बाजार कभी भी शोषित पीड़ित आम जनता के कल्याण के लिए नहीं होता, खासकर इस देश में तो आज़ादी के बाद से कभी नहीं रहा।
यह आपका भ्रम है कि ब्लागिंग बाज़ार के चंगुल से मुक्त अभिव्यक्ति का मन्च है बल्कि यह तो एक स्विच आॅफ होने के बाद दुनिया भर को आदमी से काट देने में सक्षम माध्यम हैं, और अभिव्यक्ति के धरातल पर अभी काफी अपरिपक्वता परोस रहा माध्यम है। जिस दिन इससे शोषक शासक वर्ग को असुविधा होने लगेगी सारे ब्लाॅग हवा में उड़ जाऐंगे, सारी विचारधारा धरी की धरी रह जाएगी। फिर भी आपकी कोशिश अन्यों से अच्छी है और प्रशंसा योग्य भी है मगर जब हम क्रांति की बात करते हैं तो फिर सारी चीजों को गंभीरता से लेना बेहद जरूरी है। वर्ना जैसे ब्लाॅग पर दूसरे लोग समाज की गंदगी उलीच रहे हैं आपकी कोशिश भी इसमें बढ़ात्तरी के अलावा कुछ नहीं होगी। आशा है मेरी बात को अन्यथा नहीं लिया जावेगा। धन्यवाद।
प्रमोद ताम्बट
भोपाल
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