लद्दाख के सीमावर्ती गाँव चुशूल (समुद्र तल से चौदह हजार दो सौ तीस फीट की ऊंचाई ) के पास का रजान्गला दर्रे का युद्ध संसार के सर्वाधिक असाधारण और अप्रतिम युद्धों में शुमार है . 62 की लड़ाई में इस मोर्चे पर भारत जीता था . उस समय 17 हजार से 19 हजार फीट की उंचाई वाले रजान्गला दर्रे पर मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 13 कुमाऊं की सी कंपनी तैनात थी जिसमें ३ पलटनें जवानों के पास ३०३ रायफलें ,६०० राउंड प्रति जवान ,६ एल एम् जी और १ हजार ग्रेनेड तथा मोर्टार बम थे .१८ नवम्बर की सुबह शून्य से १२ डिग्री नीचे के हाड़ कंपा देने वाली सर्दी और भारी बर्फ़बारी वाले मौसम में चीनियों ने हमला किया ,जो भारतीय जवानों की संख्या और संसाधनों में कई गुना थे . दिनभर चले भयानक युद्ध में चीनियों की संख्या बढ़ती जा रही थी और भारतीय जवानों के गोला बारूद कम पड़ते जा रहे थे लेकिन सेना का एक भी जवान पीछे नहीं हटा . "आखिरी गोली आखिरी सैनिक " वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए उन्होंने अपने बुलंद हौसले से चीनियों को आगे बढ़ने से रोकने में सफलता पाई . भारत माँ की रक्षा में ११४ जवान शहीद हो गये . उन परमवीरों की पार्थिव देह तीन महीने बाद बर्फ पिघलने पर मिली और भारतीय सीमा ओर दबे ८०० से अधिक चीनी सैनिकों के शव भी बरामद किये गये .भारत मान के जांबाज सिपाहियों ने सैकड़ों चीनियों को मार गिराया लेकिन अपनी स्थिति से एक कदम भी पीछे नहीं हटे .
मेजर जनरल आयन कॉरडोजो ने अपनी किताब ' परमवीर -आवर हीरोज इन बेटल ' में लिखा है कि जब रजान्गला में भारतीय शहीदों के पार्थिव शारीर को ढूंढने सैनिकों की टुकड़ी पहुंची तो पाया कि जवानों की उँगलियों उनकी रायफलों पर थी और कुमाऊं रेजिमेंट का हर जवान दर्जनों गोलियां झेल कर भी अपनी स्थिति से एक इंच भी पीछे नहीं हटा था . दो इंच मोर्टार चलाने वाले एक जवान मृत शारीर जब मिला तो एक ग्रेनेड उस समय भी उसके हाथ में था .जिस चिकित्सा सहायक का शव मिला उसके हाथों में सिरिंज और पट्टियाँ मौजूद थी . कर्तव्य परायणता और अद्वितीय पराक्रम का इससे बढ़कर उदाहरण क्या हो सकता है . यह युद्ध भारतीय एकता का एक अद्भुत उदाहरण था . मेजर शैतान सिंह जोधपुर से थे तो अधिकाँश जवान हरियाणा के वीर अहीर थे . उनकी स्मृति में राजान्गला में एक वीर स्मारक और अहीर धाम बनाया गया है .
रजान्गला के शहीदों की याद बरबस ताजा हो उठी जब बीते दिनों अख़बारों में चीन द्वारा लद्दाख में सड़क निर्माण कार्य रोके जाने का समाचार पढ़ा . वही लद्दाख है जिसकी सीमा को चीनी कब्जे से बचाने के लिए सैकड़ों वीर कुर्बान हुए थे . आज वहीँ से फ़िर चीन के नापाक मनसूबे सामने आ रहे हैं . भारतीय क्षेत्र में चीन का हस्तक्षेप पराकाष्ठा पर है . चीनी मिलिटरी के जवान, पत्थरों पर लाल रंग से चीन लिख रहे है और यह यहाँ आसानी से देखा जा सकता है. स्थानीय लोगों से चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि जल्द ही यह हिस्सा हमारे कब्जे में होगा. अभी हाल ही में चीन की एक सामरिक पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी थी जिसमे लिखा था- भारत को खंड-खंड तोड़ देने का सबसे सही समय आ गया है . इस रिपोर्ट पर चीनी सरकार ने कोई सफाई नहीं दी वरन भारतीय विदेश मंत्रालय को ही एक बयान जारी करना पड़ा कि उक्त रिपोर्ट में कहे गए विचार, लेखक की निजी राय थी और चीन के किसी अधिकारिक बयान से इसकी पुष्टि नहीं होती है. चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुसकर सड़क निर्माण रोक कर चले जाते हैं ,क्या इस घटना से स्पष्ट नहीं हो जाता है कि चीन के मनसूबे ख्याली पुलाव नहीं है ? क्या अब भी भारत सरकार भारत को खंडित करने के उस बयान से आँख मूंद लेगी ? लगता तो ऐसा ही है . सरकार जब प्रधानमंत्री की अरुणाचल यात्रा पर चीनी आपत्तियों के आगे घुटने टेक सकती है, तो भला ऐसा क्यों नहीं हो सकता ? सच्चाई ये है कि विदेशपरस्ती में भारत के सत्ताधीशों की रीढ़ नहीं बची है .ऐसे में एक जवाब जो लाजवाब दिखाई देता है जिससे चीनियो के दिमाग ठिकाने आ सकते है. और वह है चीनी उत्पादों पर भारतीय बाजार में प्रतिबन्ध लगाया जाए . ऐसा कोई कदम मनमोहन सरकार उठाएगी इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए क्योंकि जब अमेरिका हीं चीन की ताकत को नमन करके झुक रहा हो तब अमेरिकापरस्त सरकार से क्या उम्मीद ?
इसीलिए , हे नपुंसक प्रतिनिधियों के जन्मदाता अर्थात मतदाता ! आप नेतापरस्ती त्याग कर अपने और अपने देश के हित में , चुशूल के शहीदों को याद कर , सन बासठ की लड़ाई को याद कर , चीन की गद्दारी को ध्यान में रख कर , लगातार चीनी हस्तक्षेप के परिणामों को सोच कर चीनी उत्पादों के बहिष्कार का दृढ निश्चय करें .


चीन की तरफ से हो रही जब तब की घुसपैठ और भारतीय क्षेत्र में बिला मतलब कि दखल को बर्दास्त करना हिज्दापन ही तो कहा जायगा
चीन को सबक सिखाने का जो सुझाव आपने दिया है उस पर सबको अमल करना चाहिए . चीनी उत्पादों का बहिष्कार ही एकमात्र विकल्प है जो चीन को झुका सकता है . जब हम गाँधी के कहने पर अंगेजी कपडे जला सकते हैं तो चीनी क्यों नहीं ? विदेशी वस्तुओं का खासकर चीन का बहिष्कार हो .
कापुरूष नेहरू का खून काबिज है , ना ! मख्खन की रोटी जिन्हें आजादी से ज्यादा प्यारी लगती है उनसे ऐसी कोई उम्मीद करना ही मूर्खता है।
is murda ho rahi kaom ko jinda karne ke liye modi jaise kisi mard ko gaddi sambhalni chahiye,kayar Nehru ka khoon china ko nahi lalkarega.