” सत्य दबाये ना दबे , जाने सकल जहान ” ! फर्जी मुठभेड़ के नाम पर अल्पसंख्यक मतों की राजनीति करने वालों ने पिछले तीन-चार वर्षों में गुजरात से लेकर बाटला हाउस तक सच को झूठ और झूठ को सच में बदलने का षड्यंत्र रचाया लेकिन आखिरकार उनकी पोल खुल ही गयी . 15 जून २००४ को गुजरात में मारे गये चार आतंकियों में से एक इशरत जहाँ को पाक साफ़ और पुलिस मुठभेड़ को फर्जी साबित करने की कोशिश तो खूब हुई पर कुख्यात आतंकी संगठन “लश्कर-ए -तैयबा” के मास्टरमाइंड हेडली के बयान से सच सबके सामने आ गया . हेडली से पूछताछ करने शिकागो गयी भारतीय जांच दल के हवाले से भारत के आधिकारिक समाचार एजेंसी भाषा की माने तो मुंबई की इशरत जहाँ लश्कर द्वारा प्रशिक्षित एक ‘मानव बम’ थी जिसे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या के उद्देश्य से भेजा गया था .और हैरत की बात तो यह है कि इतने दिनों से गुजरात सरकार को कटघरे में खड़ा करने वाली केंद्र की सरकार इस बात को भूल चुकी थी कि केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने भी इशरत जहाँ और जावेद सहित अन्य दो लोगों को “लश्कर-ए -तैयबा” का आतंकवादी माना था !
इशरत जहाँ को इत्र कारोबार का एक सेल्सगर्ल बताने वाले उसके परिजन,मोदी को आड़े हाथों लेने वाले सेक्युलर नेता,मानवाधिकार संगठन, मीडियाकर्मी आदि -आदि आज कहाँ हैं ? फर्जी मुठभेड़ पर घंटों विशेष कार्यक्रम प्रसारित करने वाले चैनलों को हेडली के सच से परहेज क्यों है ? क्या अहमदाबाद मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट एसपी तमांग बतायेंगे कि किस आधार पर उन्होंने इस मुठभेड़ को नरेन्द्र मोदी को खुश करने के लिए किया गया फर्जी मुठभेड़ बताया ?
ऐसे ही ना जाने कितने तर्कसंगत सवाल हेडली के बयान से उठ खड़े हुए हैं जिनका उत्तर दे पाना देश की स्वार्थी और सत्तालोलुप शर्मनिरपेक्ष जमात के लिए कठिन है ! आम तौर पर फर्जी मुठभेड़ की कहानी गढ़ने वाले पटकथाकार लिखते हैं कि पुलिस द्वारा फलां जगह से फलां -फलां व्यक्ति को अल्पसंख्यक समुदाय से होने के कारण अपहरण कर , या घर में घुस कर गोली मार डी गयी और बाद में घातक हथियार , फर्जी पासपोर्ट , आतंकी साहित्य आदि सबूत के तौर पर रख दिए गये .
यदि इस मामले में अपनी यादाश्त को थोड़ा पीछे ले जाएँ तो 15 जून 2004 को यही मीडिया मामले के उस पहलु को दिखा रहा था जिसे बाद में झूठा और ग़लत बताया जा रहा था। उस समय मीडिया के हवाले से यह मुठभेड़ लश्कर आतंकवादियों के सफाए की दिशा में गुजरात पुलिस का एक बहादुरी भरा कदम था। परन्तु , अचानक एक मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट जिसके कुछ निहित स्वार्थ थे ,पर मीडिया इतनी संवेदनशील हो उठी कि उस समय की गयी अपनी ही रिपोर्टिंग को फर्जी साबित करने में जुट गयी !
यदि मुठभेड़ फर्जी था भी तो क्या पुलिसवालों की गलती इशरत और उसके आतंकी साथियों को निर्दोष बना देती है ? एक मिनट के लिए मान लिया कि पुलिस द्वारा इन दोषियों को सज़ा देने का तरीका ग़लत था परन्तु क्या उनकी गलती मारे गये आतंकियों के पाक साफ़ होने का प्रमाण है ? यद्यपि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ पत्रकारों ने जावेद के संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त पाया और यह बताया गया कि इशरत उस युवक के साथ पार्टनर की तरह विभिन्न शहरों की यात्राएं करती थी . प्रश्न उठता है कि ऐसी क्या वजह थी कि एक रुदिवादी मुस्लिम परिवार की लड़की अपने परिवार को बताये बिना इधर उधर जाती थी ? दूसरी ओर , क्या कारण थे कि बाकी के दो युवकों की लाश लेने भी कोई नहीं आया ? जो लोग यह कहते फिरते थे कि इशरत जहाँ तो मुंबई के एक कॉलेज में पढ़ती थी , वो बताने का कष्ट करेंगे कि ऐसा कहाँ लिखा है कि आतंकी किसी कॉलेज के पढने वाले नहीं हो सकते ?
तमांग की रपट को आधार बना कर यह निष्कर्ष ” मुसलमानों को आतंकवादी कहकर मारने पर मोदी खुश होते थे और अपने पुलिसवालों को पदोन्नति देते थे. शायद इसीलिए गुजरात में मुसलमानों को आतंकवादी बनाकर मारा जाता रहा और मुख्यमंत्री अपनी सख्त इमेज बनाते रहे ” देने वाले अनेकों कलमबेचू पत्रकारों ने यही टिप्पणी शीला दीक्षित या मनमोहन सरकार पर क्यों नहीं की जब दिल्ली के बटला हाउस में आतंकी छात्र मारे गये ? तब केवल दिल्ली पुलिस और शहीद मोहन चन्द्र शर्मा के ऊपर कीचड़ क्यों उछाले गये ? इनके कहे अनुसार यदि केवल मुसलमान होने की वजह से इशरत को मारा गया तो और भी किसी का अपहरण कर मारा जा सकता था लेकिन उसी को क्यों मारा गया जो दो पाकिस्तानी युवकों के साथ थी ? अगर फर्जी मुठभेड़ के नाम पर देश की पुलिस का काम मुसलमानों की हत्या ही रह गयी है तो हर दिन दो-चार भारतीय मुसलमान मारे जाते और अब तक मुसलमानों की आबादी में फर्क दिखने लगता ? बहरहाल इन सवालों के जबाव हेडली ने दे दिए हैं . यह साफ़ हो गया है कि किस तरह मुसलमानों को फर्जी मुठभेड़ का भय दिखा कर उनका मत हासिल करने की राजनीति देश में चल रही है और इस साजिश में केंद्र सरकार की बिस्तर पर सोने वाले पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने भी उनका जमकर साथ दिया है !


है इन प्रश्नों का जबाव मीडिया के पास ?
यह सच है कि आतंकवादियों को शह हमारे मुल्क के ही कुछ तथाकथित लोग देते हैं. उससे भी घोर विडंबना यह कि कुछ तथाकथित नेता भी इन्हें शरण देते हैं और इन्हें लगातार बचाने की कवायद में लगे रहेते हैं.1
देश मे सब को पूरी आज़ादी है कोई भी कुछ भी कर सकता !
ओह्ह …..और उन बेकसूरों (?) के एनकाउन्टर के चक्कर में वे बेचारे (?) आतकवादी बेवजह मारे गये ! लाहौल विला कुवत
लश्कर ऐ तैयबा” एक सांस्कृतिक संगठन है फिर पुलिस उसके मानवतावादी कार्यकर्ताओं को आतंकी कैसे कह सकती है हेडली से कोई गलती हो गयी होगी ! कई बार जबान फिसल जाने से ऐसी बातें हो जाया करती है !
मोदी को खुश करने के लिए पोलिसे एन्कोउन्टर कर सकती है तो क्या सोनिया को खुश करने के लिए तमांग जूठी रिपोर्ट नहीं बना सकता ? .
मोदी को खुश करने के लिए पोलिसे एन्कोउन्टर कर सकती है तो क्या सोनिया को खुश करने के लिए तमांग जूठी रिपोर्ट नहीं बना सकता ? .
मीडिया तो एक वेश्या है … जिसके पास पैसे, जिसके पास सत्ता सिर्फ उसको गर्मी देती है