युवा|2010/01/09 2:16 pm

आवारा के संस्कार

एक कस्बे से दिल्ली आया तो अपने माँ-बाप के सपनों के संग जो कुछ चीजे और मैं अपने साथ लाया था वो थे तहजीब और संस्कार । तहजीब को तो न जाने कॉलेज में किस भाव, किस-किस को कितना बेचा। अब तो यह भी याद नहीं हैं अगर याद हैं तो बस इतना की कभी मैं भी संस्कारी होता था। पर अब तो मैं आवारा हूँ, एक आदर्श आवारा। इस दिल्ली ने मुझे दिया भी बहुत कुछ हैं मेरे सपने, मेरी ख़्वाहिशे और ऐसी ढेरों चीजें जो मेरी फ़ाकामस्ती में मैंने जुटाई हैं, सिर्फ अपने लिए। वो मेरी हैं, सिर्फ और सिर्फ मेरी। मगर एक वाक़या जिसने मुझे ये एहसास दिलवाया की मैंने अपने संस्कारों को भी ताक में रख दिया है। अगर आप मेरी माने तो यह काम मैंने जानबुझकर नहीं किया हैं, न ही इस काम में मेरी गलती कोई गलती हैं। अपने इस काम की नैतिक जिम्मेदारी मैंने दिल्ली की बसों को दिया है। जिन्होंने मुझे अपने संस्कारों को ताक में रखने पर मजबूर कर दिया। घर से कॉलेज तक के इन दो सालों के सफर में मेरी किस्मत ने कभीकभी इस भीड़ से ख़चाखच भरी बसों में भी सीट दिलवा दी थी। मगर मेरी किस्मत और संस्कारों का कभी भी टकराव नहीं हो पाया था। मगर जब तीसरे साल में उस वाक़ये ने मुझे ऐसी याद दी है, जिसने मेरे आलसी व्यक्तित्व को भी लिखने पर मज़बूर कर दिया। सर्दियों के मौसम आने के बाद भी ए.सी बसों में चलना मुझे अच्छा लगता था। ख़ासकर तब जब डीटीसी ने अपना किराया तिगुना कर दिया था। मुझे अपने पूरे जीवन में सबसे डरावनी चीज़ों में से एक चीज ‘भीड़’ लगती थी। न तो मैंने कभी भीड़ के साथ सड़क पार की थी, न ही मैं उस भीड़ के साथ मैं अपने कॉलेज के दो घण्टों के सफर में व्यवधान चाहता था। मगर इस भीड़ ने भी कसम खा रही थी “चाहे जो हो जाये इस मुए को तो चैन से नहीं रहने देना है।’’ कॉलेज के कैंटिन से लेकर बस की सीट तक हर जगह इस ‘भीड़’ ने मेरे इस पतले से शरीर को खुब थकाया था। बहरहाल ऐसे ही एक दिन जब मैं बस में चढ़ा और बिना मशक्कत के सीट पर आराम से आसान लगाया और फिर बस के आगे वाले हिस्से में एक खूबसूरत चेहेरे की तलाश करने लगा जिसे देखकर मैं ये दो घंटे उस चेहरे की समीक्षा करते हुए निकाल दूँ। मैं एक बार फिर आपको ये बताना चाहुँगा कि मैं “आवारा’’ हूँ एक ” आदर्श आवारा’’। खाली दिमाग रहना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होता है। इसलिए मैं लोगों के चेहरे की समीक्षा करता रहता था। या फिर आप कह कहते हैं कि मैं भविष्य के एक फिल्म निर्देशक की हैसियत से अपने फिल्म के किरदारों को तलाशता रहता हूँ। क्योंकि इंसान की हकीकत तो हमें यहीं पर देखने को मिलती हैं। फिलहाल मैं ऐसे ही एक चेहरे की तलाश कर ही रहा था कि मैंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा जो खड़े थे, और भीड़ में अपनी जगह बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। मैं अपनी सीट से उठकर उन्हें बिठाना चाहता था। मैंने अपने मन को सीट से उठने के लिए पूरी तरह से तैयार कर लिया था। मेरे संस्कारों ने मेरे अस्तित्व पर अधिकार जमाने का प्रयास किया। लेकिन तभी अचानक मेंरे मस्तिष्क ने इसका विरोध किया और मैं बैठा रहा क्योंकि अभी बस ने मात्र 5 मीनट का सफर तय किया था। और मेरे गंतव्य तक पहुँचने में कम से कम 1.5 घण्टे लगने वाले थे। मैं बैचेन हो उठा था। मेरे संस्कारों ने मुझे धिक्कारना शुरू कर दिया था। मगर मैं हमेशा अपने दिमाग के आदेश का पालन करता हूँ। अब मैं खुद को उनकी निगाहों से बचाना चाहता था। क्योंकि अगर उनकी नज़र मेरी नज़र से टकरा जाती तो मैं अपनी सीट से खड़ा हो जाता जो मैं किसी भी कीमत पर करने को तैयार नहीं था। बहरहाल थोड़ी ही देर में मैंने देखा कि उन्हें ‘वरिष्ठ नागरिक’ वाली सीट मिल गई थी। मेरे मन का अपराध बोध कम तो हो गया मगर मेरे संस्कार रह -रह कर मुझे धिक्कार रहे थे .आख़िरकार परेशान होकर मैंने अपनी कलम से मेरे अपराध को स्वीकार किया . . . और उस वृद्ध व्यक्ति से क्षमा का अनुरोधी हुँ। हालांकि मेरे जैसे आवारा का ऐसा करना अपनी ही समझ से परे हो गया है ….

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