शिक्षा, समाज|2011/09/06 2:31 am

हाई प्रोफाइल होती शिक्षा में गुम होते शिक्षक

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जिस तेजी से परिवर्तन की बयार चल रही है….उसमे सब कुछ उतनी ही तेजी से बदल भी रहा है…हमारी जीवन शैली,हमारा आचरण,हमारे आदर्श,हमारे विचार,कर्त्तव्य, …सभी कुछ.हमारे उद्दयेश बदल गए हैं.पहले हम जिन उद्द्येश्यों की पूर्ती के लिए शिक्षा ग्रहण करते थे जब वो ही नहीं रहे तो ….शिक्षा भी बेमानी सी हो गई है…जिस तेजी से शिक्षा का बाजारीकरण हुआ है उसने बहुत कुछ बदल दिया है.जब शिक्षा पैसा कमाने का सिर्फ धंधा बन कर रह जाये…तो शिक्षा देने वालो की सोच कैसे स्थिर रह सकती है.अगर हम और आप ध्यान दे….तो देखेंगे कि प्राइमरी स्कूल तो १० कि.मी तक भी नही दिखाई देंगे लेकिन मैनेजमेंट कालेज हर कदम पर खुले हुए हैं.जो शिक्षा के नाम पर डिग्री देने का धंधा करते हैं और मजे की बात ये है कि ये धंधा हम सब की आँखों के सामने और रसूख वाले लोगों की नाक के नीचे बड़ी अच्छी तरीके से फल-फूल रहा है.हर साल लाखों इंजीनिअर ये तैयार कर रहे हैं और लाखों को एम.बी.ए की डिग्री थमा रहें हैं.जरा सोचिये क्या होगा इन् बच्चों का भविष्य ?????
एक समय वो था कि जब इक्का-दुक्का लोग ही बड़ी मेहनत से इंजीनिअर बनते थे और उन्हें बड़ी अच्छी और शान वाली नौकरी मिलती थी.लेकिन अब तो आलम ये है कि हर साल पूरी खेप तैयार हो रही है दर-दर की ठोकरें खाने के लिए.स्कूल-कालेज शिक्षा का मंदिर होता है और शिक्षक उसका भगवान पढने वाले बच्चे भक्त होते हैं…अब भक्त और भगवान का रिश्ता कैसा होता है ये बताने की जरुरत नहीं है…भक्त भगवान की भक्ति करता है और आँख मीच कर उस पर विश्वास…फिर क्या भगवान को अपने भक्त के साथ विश्वासघात करना  चाहिए ????भगवान बनने का दावा तो कोई भी कर सकता है लेकिन भगवान बनना क्या इतना आसान है.???उसके लिए कठिन तपस्या  करनी पड़ती है,,एक आदर्श स्थापित करना पड़ता है,,खुद को साबित करना पड़ता है तब कही जाकर आप एक अच्छे इन्सान बनते हो भगवान बनना तो दूर की बात है.पहले ज़माने में गुरु-और शिष्य का रिश्ता इतना मजबूत होता था कि जो गुरु ने कह दिया शिष्य के लिए वही पत्थर की लकीर है…और पूरी जिन्दगी वो बात याद रहती थी.ऐसा क्यों था ???क्योंकि शिक्षक ने अपने को इसी ढंग से प्रस्तुत किया था,इसी लिए उसका प्रभाव शिष्य पर आजीवन रहता था.अब क्या है कि जब बच्चा स्कूल जाना शुरू करता है तभी से उसे ,बनावटी जीवन का सामना करना पड़ता है. स्कूल में  बच्चा अंग्रेजी बोलना तो सीखता है लेकिन उसे अपने बड़ो से या छोटो से कैसे बोलना है ये कोई नहीं सिखाता.नैतिक मूल्यों की जीवन में क्या जगह है ये उन्हें ही नहीं पता जो स्कूल-कालेज में पढ़ा रहें हैं तो पढने वाले को कहाँ से पता होगा????ये एक बहुत बड़ा सवाल है..आप सब से गुजारिश है कि एक बार इस बारे में गंभीरता से सोच के जरूर देखिएगा..क्योंकि ये सच है..हो सकता है कि बहुत सरे लोग मेरी इस बात से सहमत न हो लेकिन ये ९९% सच है क्योकि ये मैंने स्वयं अनुभव किया है.शिक्षक ही वो व्यक्ति है जिसके ऊपर देश और समाज का निर्माण निर्भर करता है इसलिए सबसे ज्यादा मजबूत कंधे शिक्षक के ही होने चाहिए.मजबूत नीव पर ही बुलंद इमारत खड़ी हो सकती है… लेकिन आज शिक्षक का कर्त्तव्य किसको याद है????शिक्षा की बनावटी दुनिया में शिक्षक भी कही खो से गए हैं….
स्कूल -कालेज में नौकरी मिल गई है बस इतना ही काफी है स्कूल आओ,कोर्स की किताबें पढ़ाओ और अपने घर को जाओ…जिम्मेदारी कोई नहीं उठाना चाहता.अतिरिक्त ज्ञान कोई नहीं देना चाहता.
चलिए ….एक बात बताइए अगर हम बच्चों को कुछ अच्छी बातें सिखाएं या बताएं तो क्या कोई हमें रोक देगा या मना करेगा ????स्कूल का प्रिंसिपल ये कहेगा कि आप ऐसा मत करिए…ये करने की इजाज़त नहीं है आपको ….अगर कोई ऐसा कहता भी है तो उसकी नौकरी पर लात मारिये लेकिन अपने फ़र्ज़ से पीछे मत हटिये.हम खुद ही कुछ नहीं करना चाहते हैं और इलज़ाम हमेशा दूसरो पर डालते हैं.अपनी जिम्मेदारी प्रत्येक व्यक्ति को खुद ही उठानी होगी.. चाहे कितने भी कानून बना लीजिये लेकिन सबसे बड़ा कानून तो अपनी अंतरात्मा का है जो सही और गलत का फैसला करता  है.हम सब जानते हैं कि हम क्या गलत कर रहे हैं और क्या सही???? शिक्षक दिवस मनाना किस लिए???क्या ऐसा काम कर रहें हैं हम एक  शिक्षक या शिष्य के रूप में जो हमें इसे मानना चाहिए.गुरुओं का सम्मान सही मायनों में तब होता होता है जब पढ़-लिख कर,एक अच्छा नागरिक बनकर छात्र  देश की सेवा करके अपने गुरु का नाम रोशन करता है और एक गुरु को भी तभी सम्मान पाने का हक है जब वो देश के लिए बेहतर नागरिक तैयार करे ,,अपने शिष्य को एक अच्छा और नेक बनाये…बनाने से मेरा मतलब है कि उनको सही रास्ता दिखाए,उनका मार्गदर्शन करे….जब हम सब मिलकर अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे तभी हमारे देश का कुछ भला होगा.आने वाली पीढ़ी का भविष्य सवंरेगा…उनके लिए एक साफ़ सुथरे  और उज्जवल भविष्य की परिपाटी तैयार करना हम सब की नैतिक जिम्मेदारी है अन्यथा आगे आने वाली पीढ़ी हमें कोसेगी कि हमने उनके लिए विरासत में क्या छोड़ा है….भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,गरीबी?????
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