वैदिकी जाति जाति न भवतिः……….

जनगणना से जात हटाओ के नारे के साथ कुछ तथाकथित बिना जात के लोगों ने उपवास और धरना दिया है। चलिये, इस जनत्रंत में सबको कुछ भी कहने-करने की आजादी और अपनी सोच को लादने का पूरा हक हैं। मैं भी, इसका फायदा उठाता हूँ और उपवास करने वालों से कुछ पूछता हूँ । सवाल है ? किसका विरोध जात का ? या सोच का ? या फिर व्यवस्था का ? अगर जात का विरोध कर रहे हैं तो समाज के अंदर इसकी जड़ें गहरी है जो मात्र उपवास से उखाड़ फेंका नहीं जा सकता है। मामला सोच का लगता है ? एक ओर जातिगत जनगणना का विरोध हो रहा हैं। उपवास किया जा रहा है। वहीं जातिनुमा अजगर में फंसे समाज के खिलाफ उपवास नहीं किया जा रहा है ? ऐसा नहीं कि जनगणना से जाति हटाने के खिलाफ उपवास करने वालों को मालूम नहीं। चलिये, जातिगत राजनीति के एक चेहरे को देखते हैं। देखते क्या हैं, आप सब को भी पता है। खबर, 18 जुलाई 2010 के लखनउ से प्रकाशित एक समाचार पत्र से है , जिसमें एटा जिले के अहरई गांव के एक स्कूल में मिड डे मिल खाने से बच्चों का इंकार। ….इंकार का कारण मिड डे मिल बनाने वाला रसोईये का दलित होना। मामला इतना गंभीर हो गया कि ग्रामीणों ने भी रसोईये का दलित होने के खिलाफ झंडा उठा लिया। मामला सरकार तक पहुंच। वह भी एक दलित मुख्यमंत्री के शासनकाल में। आला अधिकारी स्कूल पहुंचंे और खुद दलित रसोईये के हाथ का बना खाना खाया ताकि मामला शांत हो जाये। लेकिन, समाज के अंदर जाति के अजगर की पकड़ भला इतनी कमजोर कैसे होती? चर्चा है कि मामले को देखते हुए बीच का रास्ता निकालते हुए दलित रसोईये को किसी अन्य काम में लगाने की बात हो रही है। वहीं उन्नाव के एक स्कूल में तो हद ही हो गयी। एक खबरिया चैनल ने पिछले दिनों दिखाया कि मिड डे मिल बनाने वाले दलित रसोईये के खिलाफ स्कूल के प्राचार्य ने ही 90 दिनों का व्रत रख लिया। साथ ही स्कूल के तमाम शिक्षकों को भी व्रत के लिए पे्ररित किया। पूरा गांव समर्थन में खड़ा हो गया और दलित रसोईये के हटाने की कवायत तेज हो गयी। बच्चों ने भी खाना खाने से इंकार कर दिया। ऐसा नहीं कि, मिड डे मिल बनाने वाले दलित रसोईये के खिलाफ केवल उत्तर प्रदेश से ख़बरें आती है बल्कि अन्य राज्यों में भी यह घटित हो रही है। कहा जाता है कि बच्चें भगवान के रूप होते हैं। उन्हें क्या पता जाति किस चिड़िया का नाम है। बच्चों के दिमाग में दलित रसोईये की बात किसने डाली ? समाज के ठेकेदारों ने ? समाज के ठेकेदार कौन ? माफ कीजियेगा वही द्विज समाज ? तो सवाल हैं जनगणना से जात हटाओ के नारे के साथ कुछ तथाकथित बिना जात के लोगों ने जो उपवास और धरना दिया वह इनके खिलाफ होने चाहिये थे ? एक दलित जिसे सरकार ने काम दिया उसे ही विरोध जता कर बेकार/ बेरोजगार करने की कहीं साजिश तो नहीं ? सवाल बहुत हैं, जवाब चाहिये। वेद में कहा गया है ‘‘ वैदिकी हिंसा हिंसा न भवतिः’’……….लेकिन हो रहा है ‘‘ वैदिकी जाति जाति न भवतिः……….।’’

‘‘जनगणना 2011‘‘ में जातिगत जनगणना की चर्चा से ही भूचाल सा आ गया है। मीडिया में एक तरह का अघोषित युद्ध लेखकों ने छेड़ रखा है। कोई विरोध में खड़ा है तो कोई समर्थन में। हाल आरक्षण वाला है। तर्क पर तर्क दिये जा रहे हंै। सच्चाई को दरकिनार कर हर कोई अपनी बात मनवाने में लगा है कि वह जो कह रहा है वहीं सच है बाकि सब गलत ? लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जातिगत जनगणना का विरोध आखिर क्यों ? तर्क दिया जा रहा है कि इससे मानव-मानव में दूरी बढ़ेगी ? जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा ? एक प्रख्यात लेखक ने अपने लेख में यहंा तक लिख मारा कि इससे देश का एक और बटवारा हो जायेगा। बड़ी अच्छी सोच है ? इसके लिए साहब को कोई राष्ट्र्ीय सम्मान मिलना ही चाहिये ?

सच यह है कि आज के भारतीय वर्ण व्यवस्था वाले समाज में हर कोई इसके घेरे में हैं। आजादी के इतने साल बाद भी द्विज सामाजिक व्यवस्था में किसी ने दलितो को अपनाने व बराबरी का दर्जा तक नहीं किया ? आज भी उनके मंदिर में घुसने पर अघोषित रोक है, हक की बात करने पर दलित की जीभ काट ली जाती है, सरेआम मारा-पिटा जाता है, उनके लिए अलग से कंुआ, दलितों का छुआ खाना खाने से परहेज हैं…..और न जाने क्या-क्या ? दलितों के साथ होते अन्याय की चर्चा आये दिन मीडिया में होती रहती है। कहने के लिए उन्हें आरक्षण मिला है, जिस पर समाज का एक तबका नाक-भौं सिकोड़ता रहता है। वर्षो से समाज के अंदर जो बराबरी-गैरबराबरी का मामला है-बरकरार है। सवाल उठता है कि क्या सवर्ण समाज ने दलितों को बराबरी का दर्जा दिया है ? आश्चर्य है कि आज हम जाति का विरोध कर रहे है। विराध करने वालों ने कभी जाति आधारित समाज के खात्मे की बात की है ? किया भी तो हलके ढंग से। जातिगत सूचक सरनेम को हटा नहीं पाये। सरकारी और गैरसरकारी तौर पर दस्तावेजों में जाति के काॅलम में, जाति भरने का कोई विरोध नहीं करता ? और जाति पूछ ही लिया जायेगा तो कौन सा पहाड़ टूट जायेगा ? आस-पास में शर्मा जी रहते या वर्मा जी या फिर तिवारी जी या यादव जी सभी जानते हैं। जाति की बात केवल दलितों के लिए नहीं है यही बात ओबीसी के साथ भी है। खतरा द्विज समाज को दिखने लगा है। समाज की बागडोर अपने पास रखने वाले द्विज समाज की जब जातिगत व्यवस्था को तोड़ने में कोई भूमिका नहीं रही तो आखिर जातिगत जनगणना से उनके पेट में गुदगुदी क्यों ? चलिये 1914 में एक हीरा डोम की लिखी कविता पर नजर डालते हैं जो आज भी देश के कई क्षेत्रों में इसकी प्रासंगिकता नजर आती है।

‘‘अछूत की शिकायत’

हीरा डोम

हमनी के राति दिन दुःखवा भोगत बानी

हमनी के सहेब से मिली सुनाइबि।

हमनी के दुःख भगवानओ ने देख ताजे,

हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।

पादरी सहेब के कचहरी में जाइबजां,

बेधरम होके रंगरज बनी जाइबि।

हाय राम ! धरम न छोड़ते बनत बाते

बेधरम होके कैसे मुहंवा देखाइबि।

खंभवा के फारि पहलाद के बचवले जां,

ग्राह के मुंह से गजराज के बचवले।

धोती जुरजोधना कै भइया छोरत रहै,

परगट होके तहां कपड़ा बढ़बले।

मरले रवनवां के पलले भभिखना के,

कानी अंगुरी पै धैके पथरा उठवले।

कहवां सुतल बाटे सुनत न बाटे अब,

डोम जानि हमनी के छुए से डेरइले ।

हमनी के राति दिन मेहनत करीलेजां,

दुइगो रुपयवा दरमहा में पाइबि।

ठाकुर के सुखसेत घर में सुतल बानीं,

हमनी के जोति-जोति खेतिया कमाइबि।

हाकिमे कै लसकरि उतरल बानीं,

जेत उहओं बेगरिया में पकरल जाइबि।

मुंह बान्हि ऐसन नोकरिया करत बानीं,

ई कुलि खबरि सरकार के सुनाइबि।

बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजां,

ठाकुरे के लेखे नहि लउरी चलाइबि।

सहुआ के लेखे नहि डांडी हम मारबजां,

अहिरा के लेखे नहि गइया चोराइबि।

भंटउ के लेखेन कवित्त हम जोरबजां,

पगड़ी न बान्हि के कचहरी में जाइबि।

अपने पसिनवां के पइसा कमाइबजां,

घर भर मिली जुली बांटि चोंटि खाइबि।

हड़वा मसुइया कै देहियां है हमनी कै,

ओकरै के देहियां बभनओं कै बानी।

ओकरा के घरै-घरै पुजवा होखत बाजे,

सगरै इलकवा भइलैं जजमानी।

हमनी के इनरा के निगिचे न जाइलेजां,

पांके में से भरि भरि पियतानी पानी।

( ‘सरस्वती’ के सितम्बर,1914 में प्रकाशित)

हीरा डोम ने उस समय के दलित संवेदना को जिस ढंग से कविता में रखा उसका स्वरूप आज भी बरकरार है। दलित के दुःख दर्द और उसके पीड़ा के प्रति समाज ही नहीं भगवान द्वारा आंख मूंद लेने पर उन्हें कोसते हुए, उस पीड़ा से निकलने के लिए धर्मान्तरण की तरफ मुखतिब होता है लेकिन अंतिम क्षण में उसे खारिज कर देता है। और इसके पीछे दलित का आत्म सम्मान (कैसे मुहंवा देखाइबि) सामने आ जाता है। हीरा डोम कहते हैं-

हमनी के दुःख भगवानओ ने देख ताजे,

हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।

पादरी सहेब के कचहरी में जाइबजां,

बेधरम होके रंगरज बनी जाइबि।

हाय राम ! धरम न छोड़ते बनत बाते

बेधरम होके कैसे मुहंवा देखाइबि।

ऐसा नहीं कि हीरा डोम भगवान से डर कर धर्मान्तरण को खारिज करते हैं बल्कि अगले ही क्षण उनकी कविता डोम को छूने से डरे भगवान के सामने खड़ा हो जाता है।

खंभवा के फारि पहलाद के बचवले जां,

ग्राह के मुंह से गजराज के बचवले।

धोती जुरजोधना कै भइया छोरत रहै,

परगट होके तहां कपड़ा बढ़बले।

मरले रवनवां के पलले विभीषण के,

कानी अंगुरी पै धैके पथरा उठवले।

कहवां सुतल बाटे सुनत न बाटे अब,

डोम जानि हमनी के छुए से डेरइले ।

खंभा फांड कर प्रहृाद को, ग्राह के मुंह से गजराज को, द्रोपदी को बचाने के लिए कपड़ा देने, रावण को मारने व विभीषण को पालने, कानी उंगली पर पहाड़ उठाने वाले भगवान से हीरा डोम साफ शब्दों में कहते हैं कहां सोये हैं, सुनते नहीं या डोम को छूने से डरे हैं ? डोम से डरे भगवान अपने आप कई सवाल छोड़ जाता है। भगवान और समाज डोम के स्पर्श से भले ही कतराते हो। लेकिन कहा जाता है कि इसी सामाजिक व्यवस्था में डोम के बिना मरने वालों को मोक्ष नहीं मिलता है। श्मसान घाट पर डोम राजा के हाथों दी गयी अग्नि से चिता को आग के हवाले किया जाता है। कैसी विडंबना है कि जीते जी डोम के स्पर्श से कतराने वालों को जीवन के अंतिम क्षण में डोम की याद आती है। दूसरी ओर हीरा डोम की भगवान से शिकायत आज भी प्रासंगिक है। आये दिन खबर आती है कि समाज के ठेकेदारों ने गाहे-बगाहे मंदिर में ताला जड़ कर दलितों को पूजा पाठ व भगवान के दर्शन से रोका। तभी तो हीरा डोम कहते है कि भगवान प्रहृाद को, ग्राह को, द्रौपदी आदि को बचाने आते लेकिन डोम को छूने से डरते हैं ?

कविता में हीरा डोम ने श्रम को भी मुद्दा बनाया है। दलितों के काम को गंदा व घिनौना माना जाता रहा है। इसके जवाब में हीरा डोम अन्य जातियों के श्रम पर सवाल उठाते हैं। और कहते हैं-

बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजां,

ठाकुरे के लेखे नहि लउरी चलाइबि।

सहुआ के लेखे नहि डांडी हम मारबजां,

अहिरा के लेखे नहि गइया चोराइबि।

भंटउ के लेखेन कवित्त हम जोरबजां,

पगड़ी न बान्हि के कचहरी में जाइबि।

अपने पसिनवां के पइसा कमाइबजां,

घर भर मिली जुली बांटि चोंटि खाइबि।

मतलब, ब्राह्मणों की तरह हम भीख नहीं मांगेगे, ठाकुरों की तरह लाठी नहीं चलायेगे, बनियों की तरह डंडी नहीं मारेंगे, अहीरों की तरह गाय नहीं चरायेगे……….। हाँ , हम अपने पसीने से पैसा कमायेगे और मिल बांट कर खायेगे। यह बात आज के तथाकथित स्वर्ण समाज के गाल पर तमाचा भी है। जब-जब आरक्षण का सवाल उठा तब-तब सवर्णों ने आंदोलन चला कर विरोध किया। आंदोलन के दौरान झाडू लगाने, जूता में पाॅलिस लगाने आदि श्रम को अपनाते हुए विरोध करते है । मानो यह काम बहुत ही घिनौना है और जैसे कि यह सिर्फ दलितो का ही काम हो ! ऐसा करके तथाकथित स्वर्ण समाज आज भी सदियों पुरानी दृष्टिकोण रखता है। ऐसे में हीरा डोम की शिकायत उनके वैचारिक सोच पर भारी पड़ जाता है।

अंत में हीरा डोम एक बड़ा ही मानवीय सवाल उठाते हैं जो आज भी यथावत है। देखिये इसकी बानगी-

हड़वा मसुइया कै देहियां है हमनी कै,

ओकरै के देहियां बभनओं कै बानी।

ओकरा के घरै घरै पुजवा होखत बाजे,

सगरै इलकवा भइलैं जजमानी।

हमनी के इनरा के निगिचे न जाइलेजां,

पांके में से भरि भरि पियतानी पानी।

कवि इसमें आदमी-आदमी के बीच के विभेद को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं एक ही हाड़ मांस को देह हमारा भी है और ब्राह्मण का भी, फिर भी ब्राह्मण पूजा जाता है। पूरे इलाके में ब्राह्मण की जजमानी है और हम दलितों को कुअंा के पास भी नहीं जाने दिया जाता है, किंचड़ से पानी निकाल कर पानी पीते हैं। सच भी है आज भी दलितों को उन कुआंें से पानी नहीं भरने दिया जाता है जहां स्वर्ण जाति के लोग पानी भरते हैं। गलती से कोई दलित कुआं के पास चला भी गया तो उसका हाथ-पैर तोड़ दिया जाता है।

करीब एक सौ साल पूर्व लिखी हीरा डोम की यह कविता आज भी जीवंत व प्रासंगिक है। हीरा डोम ने कविता के माध्यम से अपनी जाति की संवेदनशीलता को सामने लाया साथ ही अपने आत्म-सम्मान को स्थापित भी किया, जो अपने आप में बड़ी बात है। महादलित विमर्श की जब-जब चर्चा होती है तब-तब बिहार के हीरा डोम की वह शिकायत सामने आती है। जो उन्होंने 1914 में की थी। डोम जाति की पीड़ा को हीरा डोम ने शब्दों में वर्षो पूर्व पिरोया था। देश आजाद हुआ, हालात बदले, लेकिन हीरा डोम के लिखे एक-एक शब्द आज भी प्रासंगिक है। भगवान, समाज, व्यवस्था व सरकार से की गई भोजपुरी में उनकी शिकायत को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘अछूत की शिकायत’ नाम से कविता के रूप में ‘‘सरस्वती’’ के सितम्बर,1914 के अंक में प्रकाशित किया था। दलित विमर्श में हस्तक्षेप करती हीरा डोम की कविता ‘सरस्वती’ में प्रकाशित होने वाली संभवतः पहली और एकमात्र भोजपुरी कविता थी। और वह भी एक दलित की। भोजपुरी में लिखी गयी कविता ने वर्षो से भारतीय समाज में उपेक्षित और अछूत रहे डोम जाति के उस दर्द को सामने लाया है जिसे देख हर कोई अपनी आंखें मूंद लेता है। जिसमें इंसान तो शामिल हैं ही भगवान भी पीछे नहीं हैं।

4 Comments

  • हीरा डोम की कविता आज भी जीवंत है .आप ने ठीक लिखा है. सालो से समाज ने दलित भइयो से को बराबरी का दर्जा नहीं दिया . येही हल अन्य छोटी जाति के साथ भी देखा जाता है

  • भारतीय समाज के ठेकेदार प्रत्येक व्यक्ति की पहचान कर्म से करते हैं और कर्म जाति से जुडा हुआ है। अतः भारतीय जनगण्जनगणना में जाति का उल्लेख युक्ति संगत है।

  • जाति विहीन समाज की जरुरत है .हीरा डोम की कविता काफी मार्मिक है जो दिल को छू गयी

  • डॉ राजेश कपूर

    ***भारत में छुआ- छूत नहीं थी***
    पता नहीं भारत में कब और कैसे ये छुआ-छूत का विषधर सांप घुस गया? पूर्वाग्रहों को छोड़ कर ज़रा तथ्यों व प्रमाणों की रोशनी में देखें तो पता चलता है कि भारत में जातियां तो थीं पर छुआ- छूत नहीं. स्वयं अंग्रेजों के द्वारा दिए आंकड़े इसके प्रमाण हैं.
    भारत को कमज़ोर बनाने की अनेक चालें चलने वाले अंग्रेजों ने आंकड़े जुटाने और हमारी कमजोरी व विशेषताओं को जानने के लिए सर्वे करवाए थे. उन सर्वेक्षणों के तथ्यों और आज के झूठे इतिहास के कथनों में ज़मीन आस्मान का अंतर है.
    सन १८२० में एडम स्मिथ नामक अँगरेज़ ने एक सर्वेक्षण किया. एक सर्वेक्षण
    टी. बी. मैकाले ने १८३५ करवाया था. इन सर्वेक्षणों से ज्ञात और अनेक तथ्यों के इलावा ये पता चलता है कि तबतक भारत में अस्पृश्यता नाम की बीमारी नहीं थी.
    यह सर्वे बतलाता है कि——
    # तब भारत के विद्यालयों में औसतन २६% ऊंची जातियों के विद्यार्थी पढ़ते थे तथा ६४% छोटी जातियों के छात्र थे.
    # १००० शिक्षकों में २०० द्विज / ब्राह्मण और शेष डोम जाती तक के शिक्षक थे. स्वर्ण कहलाने वाली जातियों के छात्र भी उनसे बिना किसी भेद-भाव के पढ़ते थे.
    # मद्रास प्रेजीडेन्सी में तब १५०० ( ये भी अविश्वसनीय है न ) मेडिकल कालेज थे जिनमें एम्.एस. डिग्री के बराबर शिक्षा दी जाती थी. ( आज सारे भारत में इतने मेडिकल कालेज नहीं होंगे.)
    # दक्षिण भारत में २२०० ( कमाल है! ) इंजीनियरिंग कालेज थे जिनमें एम्.ई. स्तर की शीशा दी जाती थी.
    # मेडिकल कालेजों के अधिकांश सर्जन नाई जाती के थे और इंजीनियरिंग कालेज के अधिकाँश आचार्य पेरियार जाती के थे. स्मरणीय है कि आज छोटी जाती के समझे जाने वाले इन पेरियार वास्तुकारों ने ही मदुरई आदि दक्षिण भारत के अद्भुत वास्तु वाले मंदिर बनाए हैं.
    # तब के मद्रास के जिला कलेक्टर ए.ओ.ह्युम ( जी हाँ, वही कांग्रेस संस्थापक)
    ने लिखित आदेश निकालकर पेरियार वास्तुकारों पर रोक लगा दी थी कि वे मंदिर निर्माण नहीं कर सकते. इस आदेश को कानून बना दिया था.
    # ये नाई सर्जन या वैद्य कितने योग्य थे इसका अनुमान एक घटना से हो जाता है. सन १७८१ में कर्नल कूट ने हैदर अली पर आक्रमण किया और उससे हार गया . हैदर अली ने कर्नल कूट को मारने के बजाय उसकी नाक काट कर उसे भगा दिया. भागते, भटकते कूट बेलगाँव नामक स्थान पर पहुंचा तो एक नाई सर्जन को उसपर दया आगई. उसने कूट की नई नाक कुछ ही दिनों में बनादी. हैरान हुआ कर्नल कूट ब्रिटिश पार्लियामेंट में गया और उसने सबको अपनी नाक दिखा कर बताया कि मेरी कटी नाक किस प्रकार एक भारतीय सर्जन ने बनाई है. नाक कटने का कोई निशान तक नहीं बचा था. उस समय तक दुनिया को प्लास्टिक सर्जरी की कोई जानकारी नहीं थी. तब इंग्लॅण्ड के चकित्सक उसी भारतीय सर्जन के पास आये और उससे शल्य चिकित्सा, प्लास्टिक सर्जरी सीखी. उसके बाद उन अंग्रेजों के द्वारा यूरोप में यह प्लास्टिक सर्जरी पहुंची.
    ### अब ज़रा सोचें कि भारत में आज से केवल १७५ साल पहले तक तो कोई जातिवाद याने छुआ-छूत नहीं थी. कार्य विभाजन, कला-कौशल की वृद्धी, समृद्धी के लिए जातियां तो ज़रूर थीं पर जातियों के नाम पर ये घृणा, विद्वेष, अमानवीय व्यवहार नहीं था. फिर ये कुरीति कब और किसके द्वारा और क्यों प्रचलित कीगई ? हज़ारों साल में जो नहीं था वह कैसे होगया ? अपने देश- समाज की रक्षा व सम्मान के लिए इस पर खोज, शोध करने की ज़रूरत है. यह अमानवीय व्यवहार बंद होना ही चाहिए और इसे प्रचलित करने वालों के चेहरों से नकाब हमें हटनी चाहिए. साथ ही बंद होना चाहिए ये भारत को चुन-चुन कर लांछित करने के, हीनता बोध जगाने के सुनियोजित प्रयास. हमें अपनी कमियों के साथ-साथ गुणों का भी तो स्मरण करते रहना चाहिए जिससे समाज हीन ग्रंथी का शिकार न बनजाये.

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