फूलवा को यकीन नहीं हो रहा था, जब उसे पंचायत के गांव में सरकारी योजना मिड-डे-मील के लिए बच्चों का खाना बनाने वाले रसोईये के तौर पर सरकारी मुलाजिम बनाया गया। फूलवा के कई पुश्त गांव व शहरों में सफाई का काम करते आ रहे हैं । लेकिन फूलवा खुश थी कि वह पुश्तों के काम को छोड़ समाज के अन्य जातियों की तरह बढ़िया काम करेगी। लेकिन फूलवा की यह खुशी काफूर हो गयी। ठीक उसी तरह जिस तरह से एक छोटे बच्चें के हाथ में आयी बर्फ की आइस्क्रीम जब छूट कर जमीन पर गिर जाती है। जब स्कूल के प्रधानाचार्य ने साफ-साफ कह दिया कि देखों फूलवा, सरकार ने भले ही तुम्हें बच्चों का खाना बनाने के लिए रखा हो ! ……खाना तुम नहीं बनाओगी….क्योंकि बच्चें तुम्हारे हाथ का खाना बना हुआ नहीं खायेंगे….तुम, स्कूल आओ, झाड़ू पोछा करो, और जाओ……खाना हम पकवा लेंगे। हां, पैसे तुम्हें रसोईये के ही मिलेंगें।….और हां, अगर मुंह खोला तो तेरा गांव में हुक्का-पानी बंद करवा दिया जायेगा।
फूलवा के सपने टूट गये थे !…….कुछ दिन पहले गांव के चौपाल पर शहर से आये पढ़े-लिखे लोगों के भाषण, उसके कानों पर तमाचा मार रहे थे…….हमारी जाति है हिन्दुस्तानी, जात न पूछो साधु की, जाति के नाम पर राजनीति नहीं, आदमी-आदमी में कोई फर्क नही….चाहे वह ब्राहमण हो या दलित…….की गूंज फूलवा को परेशान कर रही थी। विद्रोह को लेकर मन में द्वंद चल रहा था। लेकिन समाज को कर्म के पैमानों में बांटने वाले ठेकेदारों के भय से वह खामोश हो गयी। और समाज के ठेकेदारों द्वारा वर्षों से तय जाति के हिसाब कर्म पर ही आ कर ठहर गयी। यह फूलवा की कहानी कोई सदियों पुरानी नहीं है, बल्कि हाल ही में देश के कई क्षेत्रों में दलितों के साथ घटित होते देखी जा सकती है।
उत्तर प्रदेश के रमावाई नगर के विवाइन गांव पंचायत में दलित रेखा को रसोईये के पद पर नियुक्ति मिलते ही गांव से धमकियां मिलने लगीं। विरोध का तेवर देखिये प्रधानाचार्य ने दलित रसोईये के खिलाफ नब्बे दिन का व्रत का एलान कर दिया। बच्चों ने स्कूल आना बंद कर दिया। यही नहीं रेखा बाल्मिकी को गांव निकाला और हुक्का पानी बंद कर देने की भी धमकी भी दी गयी। दबाव इतना था कि रेखा बाल्मिकी ने खाना बनाने से हाथ खींच लिया। स्कूलों में बच्चों के नहीं आने पर कहती है कि अगर मेरे खाना बनाने से बच्चें नहीं पढ़ेगें तो मैं खाना नहीं बनाना चाहती। काश रेखा बाल्मिकी की इस सोच को समाज के ठेकेदार अपनाते और सदियों से शोषित-उपेक्षित-और हासिये पर रहने वाले दलितों को समाज के मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करते ? यह घटना मात्र एक या दो जगहों की नहीं है। बल्कि उत्तर प्रदेश समेत देश के अन्य हिस्सों में घटित हो रही है। इस तरह की घटनाएं जाति आधारित जनगणना का विरोध करने वालो के आंदोलन का कम करने पर आमदा हैं ? सवाल उठना स्वभाविक है क्या सामज में जो बदलाव आये हैं वह उपरी तौर पर है ? समाज ने घोषित रूप से मान्यता दे तो दी है लेकिन हकीकत में कहानी कुछ और ही है ? अघोषित रूप से जाति के नाम पर घृणा-कटुता बरकरार है ? कर्म के हिसाब से समाज में बंटी व्यवस्था अघोषित रूप से शासन में है ? वहीं रेखा की सोच के आगे समाज के ठेकेदार बौने लगते हैं। बच्चें स्कूल में पढ़ने आये इसके लिए वह अच्छे काम को छोड़ने से तनिक भी परहेज नहीं की है ?
रेखा को समझौते के तहत झाड़ू पोछे में लगा दिया गया और खाना बनाने का काम किसी और को सौंप दिया गया। भले ही स्कूल ने उसे मिड डे मील वाला मानदेय देने वाली बात कह दी, लेकिन सामाजिक तौर पर सरकारी प्रयास के बावजूद वह अपने कर्म को नहीं छोड़ पायी। नाहरपुर गांव में नियुक्त शंखवार जाति की रसोईया प्रेमा देवी के साथ भी यही सब हुआ। उसे साफ-साफ कह दिया गया कि स्कूल आओ, झाड़ू लाओ, पोछा लगाओ लेकिन खाना नहीं बनाने दिया जायेगा। जुवान खोलने पर हुक्का-पानी बंद कर देने की धमकी दी गयी। रेखा, प्रेमा की तरह कई दलितों को जिन्हें सरकार ने बेहतर जीवनधारा देते हुए, वर्ण/कर्म व्यवस्था को समाज से हटा कर, सम्मान की जींदगी देते हुए मिड डे मील से जोड़ा, रसोईया बनाया। लेकिन समाज के ठेकेदार उससे बेहतर काम को छीनते हुए, सरकारी आदेश को ढेंगा दिखाते हुए उनके सामाजिक कर्म के हिसाब से झाड़ू-पोछा और सफाई के काम में लगा दिया। इस पूरे प्रकरण में साफ है कि वर्ण व्यवस्था को समाज के ठेकेदार बरकरार रखना चाहते हैं। समाज के जिस तबके के हाथ का बना खाना खाने से इंकार किया गया, अगर वही रेखा या प्रेमा आई.एस. अधिकारी होती तो ?
हालांकि सरकारी तौर पर अखबारों में आयी रिपोर्ट में कहा गया है कि सब कुछ सामान्य है। कहीं से कोई लिखित शिकायत नहीं है। उत्तर प्रदेश में हुई यह शर्मनाक सामाजिक घटना की पूरी रिपोर्ट को लखनउ के एक दैनिक पत्र ने 21 जुलाई 2010 को बैनर हेडलाइन बना कर छापी।
ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था की नींव इतनी गहरी है कि इसका अंदाजा रेखा, प्रेमा आदि के साथ हुई घटना से लगायी जा सकती है कि वर्षों से जात के नाम पर राजनीति व शासन चलाने वाले लोग आज भी अपनी जमीन घिसकने नहीं देना चाहते ? कभी आरक्षण, तो कभी जाति जनगणना के सवाल पर देश-समाज के समक्ष बुद्विजीवि सोच की गलथोथरी करते है मिल जाते हैं ? और अंदर से अपनी जड़ता को मिटाने के लिए तैयार नहीं हैं । वो जो चाहेंगे वही होगा का ? उनकी दबंगता बरकरार है। केन्द्र सरकार ने समाज के दबे-कुचले लोगों को हक दे हुए समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का बेहतर काम किया है। लेकिन समाज का दूसरा चेहरा सामने सरकार की नीतियों को कमजोर करने में लगी हुई है। सरकार ने आरक्षण दिया तो हो-हल्ला हुआ। नौकरी दी तो हो-हल्ला हुआ। दबंगता तो देखिये, दबंग समाज ने अघोषित रूप से कह दिया, चलो सरकार ने दिया तो क्या हम माने तब तो ?
सामाजिक पैमाना तय करने वाले समाज के ये ठेकेदार हजारों साल से चली आ रही कर्म/वर्ण व्यवस्था को तोड़ना नहीं चाहते, लोगों को जोड़ना नहीं चाहते ? समाज को एक सूत्र में देखना नहीं चाहते ? तभी तो, उत्तर प्रदेश के कई गांवों में देखने को मिला। सवाल वहीं दलित का है। सरकार की बहुचर्चित मिड डे मील योजना के तहत रसोईये के तौर पर नौकरी पाये दलितों के हाथ का बना खाना खाने से समाज के ठेकेदार विरोध में खड़े हो गये। सरकारी व्यवस्था के तहत दलित समुदाय को, सामाजिक वर्ण/कर्म व्यवस्था को तोड़ते हुए, सरकार ने रसोईये की नौकरी दे दी। लेकिन सामाजिक व्यवस्था ने सरकारी व्यवस्था को ठेंगे पर रख दिया। सरकार की इस व्यवस्था से अघोषित रूप से दलितों के साथ जो कुछ हुआ उससे जातिविहीन समाज की कल्पना करने वालों के आंदोलन को भी समाज के ये ठेकेदारों ने चुनौती दे दी है।

विषय अच्छा है ,सशक्त है.पर कुछ छोटे गावों तक ही सिमित रह गया है.शुक्र है शहरों में ये सब अब न के बराबर दिखाई देता है.शिक्षा और मिडिया दो इसी ताकते है जो जल्दी ही इस समस्या को जड़ से समाप्त कर देंगी.
सफल और सुनहरे भारत के स्वर्णिम भविष्य के लिए आपकी लेखनी का प्रयास भी प्रशंसनीय है
डॉ.शालिनिअगम