लोकनायक भाग-१

जयप्रकाश का पुनर्जन्म – जवाहर लाल कौल

फीनिक्स पक्षी के बारे में कहावत है कि वह जलकर अपनी ही राख से फ़िर जन्म लेता है। जेपी के बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में सोचते हुए मुझे अक्सर महसूस होता है कि सेवाग्राम के गांधी आश्रम में मैंने उन्हें अपनी ही भावनाओ से पुनर्जीवित होते देखा है। मैंने जे.पी. का एक वह रूप भी देख था जिसमें वे निराश टूटे हुए ओर हार मान चुके सिपाही से दिखाई दिए थे। मुगावली में भिंड के बागियों के समर्पण के अवसर पर वे रो रहे थे। शायद अपनी सहचरी प्रभावती की याद में। लेकिन वहां से लौटते हुए रेल के एक विशेष केबिन में मुझसे बात-बात पर कुपित होना और फ़िर रो पड़ना या सारा दोश दूसरों पर मढ़ना ओर नौजवानों को कोसाना, फ़िर हाथ पटक कह देना कि मुझसे अब कुछ नहीं होगा, मैं थ गया हूं बीमार हूं। यह किसी योद्धा या नायक के लक्षण नहीं थे। उनकी निराशा का सीध प्रभाव मेरे मन पर भी पड़ा था। मुझे लग रहा था कि जेपी हार मान चुके है। पूर्व में वे कितन ही साहसी और पहल करने वाले रहे हासें अब उन्हें लग रहा था कि उनके अपने साथी ही उनका साथ छोड़कर गए है। इंदिरा जी को वे बेटी कहा करते थे। उसी बेटी को अधिनायकवाद की ओर बढ़ते देख वे विहवल तो थे, लेकिन अपने आप को पूरी तरह बेबस महसूस कर रहे थे। मुझे लग रहा था कि इनसे किसी तरह के नेतृत्व आशा रखना व्यर्थ है। उनका शरीर ही जवाब नहीं दे चुका है उनका मन भी टूट चुका है, लेकिन परिस्थितियों ने ऐसी करवट बदली कि जेपी के मूर्छित व्यक्तित्व में हरकत होने लगी और सेवाग्राम में उन्होंने एक तूफान को जन्म दिया। यह सम्मेलन सर्वोदय समाज की आपात बैठक थी, जिसमें तय होना था कि सर्वोदय कार्यकर्ताओं को सरकरी तानाशाही और कुशासन के विरूद्ध आंदोलन में शामिल होना चाहिए कि नहीं। सर्वसेवा संघ के मुखिया यानी स्वयं विनोबा भावे इसके विरूद्ध थे। उनका मानना था कि सर्वोदय एक रचनात्मक अभियान है। इसका सामयिक राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। लेकिन जेपी सहित अधिक्तर सदस्यों का मत था कि जब सत्ता ही जनविरोधी हो जाए तो उसके प्रति उदासीन रहना उचित नहीं।
आपात स्थितियों में तो संन्यासी भी शस्त्रा उठाना अपना धर्म मानते है। इस विवाद को सुलझाने के लिए सर्वोदय कार्यकर्ताओं का यह सम्मेलन बुलाया गया था। इसमें सभी राज्य शाखाओं के पदाधिकारी शामिल हुए। एक बंद कक्ष में महत्वपूर्ण बैठक आयोजित होनी थी। इसमें प्रेस का प्रवेश वर्जित था। प्रभाष जोशी उन दिनों सक्रिय सर्वोदय कार्यकर्ता थे और मैं दिनमान के प्रतिनिधी के रूप में वहां पहुंच गया था। मैंने प्रभाष जी से अनुरोध् किया कि वे मुझे किसी तरह इस सभाकक्ष में पहुंचा दें। खादी का सिला सिलाया कुर्ता पायजामा खरीदा। अपने सिर के आकार की गांधी टोपी ली। एक प्रसिद्ध सर्वोदय कार्यकर्ता के रूप में मैं प्रभाष जोशी के साथ अंदर पहुंच कर दो सौ विशिष्ट कार्यकर्ताओं में खो गया। मेरी बस इतनी ही कोशिश थी कि उत्तर भारत का कोई कार्यकर्ता मुझे पहचान न ले। मेरा विचार है कि मंच पर बैठे एक सर्वोदय नेता ने मुझे पहचान भी लिया, लेकिन वे केवल मुस्कुरा दिए यानी मेरी इस अनुशासनहीनता से वे कुपित नहीं थे।
जेपी के अनेक भाषण मैंने सुने है। उन्होंने तीन बातें साफ-साफ कहीं। एक जिम्मेदार नागरिक के नाते वे उस सब के प्रति आंखे मूंद नहीं रह सकते जो देश में हो रहा है। जिन मूल्यों और लक्ष्यों के लिए उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ी थी, वही जानबूझकर तिरोहित हो उसके खिलाफ आवाज उठाना मेरा पहला कर्तव्य है। उनकों दूसरी बात थी कि लड़ाई का एक ही तरीका हम जानते है, वह है अहिंसक सत्याग्रह। यही हमें गांधी से मिला है। इसी का हम उपयोग करेंगे। जेपी ने इसे एक और कोण से उचित ठहराया। उनके अनुसार सभाओं में एक समाजवादी के नाते हमेशा हिस्सा लेता रहा। जेपी पर जब बातें होती है तो मुझे भारत के चार लोगों की याद आ जाती है। इसमें महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभभाई पटेल और जयप्रकाश नारायण की विचारधारा की चर्चा प्रासंगिक है। गांधी के भारतीयता का पूर्ण भाव था वहीं नेहरू यूरोपीय विचारधरा के प्रति समर्पित थे। लोहिया में भारतीयता थी पर जेपी ने इन सभी से अलग यूरोपीय विचारधारा को मानते हुए भी भारतीयता में अपना पूर्ण भाव दिखाया और यही उनके विजय का कारण बना। वे यूरोपीय उदारवादी विचारधरा से पूर्णरूप से प्रभावित थे। जितने निर्मल और सदाचारी जेपी थे उतना चारों में कोई नहीं दिखता यही बात उनके राजनीति छोड़ने के बाद एक प्रमुख कारण मानी जाने लगी। हालांकि असली भारतीयता भी वही है जो गांधी ने कहा और जिसे जेपी ने आत्मसात किया। मन में, चित्त में, सत्ता जिसे कभी आकर्षित नहीं करे जो लक्ष्य के प्रति, ध्येय के प्रति समर्पित हो, जो एक अर्थ में ब्रह्मचर्य का व्रत ले ले वहीं जेपी का नाम आता है। संविधन निर्माण के बाद जो पहला चुनाव हुआ तो कांग्रेस और सोशलिस्ट दोनों उसमें हार गए। उस समय भी जेपी बहुत बड़े लोकप्रिय नेता के रूप में सबसे आकर्षक थे। जब सत्ता किसी के लिए आकर्षण होती है तो वह साधन कभी नहीं बन सकता। भारतीय समाज के उत्कर्ष में यह चुनाव एक ऐसा मोड़ के रूप में आया, जिसमें जेपी को भूदान में शरीक कर दिया। भूदान आंदोलन का आकलन भी ठीक से नहीं हुआ। उसे सिर्फ विश्व में भूदान जैसा आंदोलन कहीं नहीं हुआ। विनोबा और बाद में जेपी को इसका जितना श्रेय मिलना चाहिए वह नहीं लिया। कुछ लोगों ने जेपी के बारे में यह भी कहा कि वे राजनीति में चले गए। जिसे यह पता नहीं है कि भूदान भरतीयता की, उसके मूल विचारधरा की प्रतीक है जबकि पूरा देश यूरोपीय विचारधरा से चल रहा है। इस बात को जेपी के लिए भी एक निर्णायक फैसले के तहत कहा जा सकता है। भारत जैसे विभिन्न मत वाले देश में भूदान ने जो किया उसका आकलन अभी तक नहीं हो पाया। जेपी इसी भारतीयता के उत्कर्ष को दूसरे तरीके से राजनीति के मार्फत लोगों के सामने रखा सम्पूर्ण क्रांति की जब चर्चा होती है तो मुझे लगता है कि उन्होंने जिस ध्येय के लिए यह किया व ह पूर्ण रूप् से सफल हुआ। वैसे तो हर आंदोलन का उत्कर्ष और अपकर्ष होता है। भूदान में भी खिन्नता आई। जेपी और लोहिया के संबंध् में स्नेह और प्रतिद्वंद्विता हुई पर सफलता और असफलता के पैमाने पर यदि किसी आंदोलन और व्यक्ति की चर्चा होती तो उस लिहाज से संपूर्ण क्रांति भी सफल हुई और जेपी को उसका श्रेय मिला। लोहिया ने भी एक बार कहा कि यदि इस देश का कोई सफल नेतृत्व कर सकता है या इस देश को कभी किसी भी रूप में हिला सकता है तो वह जयप्रकाश है। जेपी जिस समय राजनीति मे आए उसे बड़ा संक्रमण का काल कहा जा सकता है बांगलादेश की लड़ाई के दौरान इंदिरा गांधी बहादुर सिपाही की उपाधि अपने उपर ले ली थी। इसका फायदा इंदिरा गांधी द्वारा यह लिया गया कि सभी संस्थाएं टूटीं, पार्टियों का अस्तित्व सत्तसा के पास विशाल पुलिस और सैन्य बल है जिसके विरूद्ध हम सशस्त्रा क्रांति नहीं कर सकते। इसलिए हमें कुछ अतिवादी गुटों या धुर साम्यवादियों का यह तर्क स्वीकार नही कि सत्ता परिवर्तन या सामाजिक क्रांति केवल हथियार से ही हो सकती है। तीसरी बात थी कि अगर सर्वोदय समाज या इसकी शीर्ष कार्यसमिति सर्वसेवा संघ यह फैसला करती है कि एक सर्वोदय कार्यकर्ता की हैसियत से सरकार विरोधी आंदोलन में शामिल नहीं हो सकते। अगर यह माना जाता है कि भ्रष्टाचार मिटाने का प्रयास सर्वोदय कार्यकर्ताओं का सरोकार नहीं हो तो मै। अपने पद से त्यागपत्रा देने को तैयार हूं। जे.पी. की इस घोषणा से खलबली मच गई।
अधिक्तर कार्यकर्ताओं ने इसका जोरदार तालियों से स्वागत किया, लेकिन कुछ नेता चिंतित हो उठे। उन दिनों गुजरात के राज्यपाल के माध्यम से इंदिरा गांधी को हर तरह की सूचना मिलती रहती थी। सर्वसेवा संघ में तो सदस्य, निर्मला देशपांडे और दयानंद पटनायक बाकायदा इंदिरा जी के खिलाफ होने वाले किसी भी फैसले का डटकर विरोध् कर रहे थे। इससे सर्वसेवा संघ में गंभीर समस्या पैदा होई। संघ का फैसला बहुमत से नहीं होता सर्वसम्मत होता है। तेरह सदस्यों में अगर एक भी सदस्य असहमत हो तो फैसला नहीं हो सकता। यहां तो दो सदस्य विरोध् करने पर तुल गए थे। गतिरोध् ऐसा था कि अंत में मामला विनोबा के पास पहुंचा। सबने फैसला उन पर छोड़ा।
विनोबा ने जेपी को समझाने की कोशिश की लेकिन शीघ्र ही वे जान गए कि जेपी को आंदोलन से अलग रखना संभव नहीं था। इसलिए उन्हें मजबूरी में छूट देनी पड़ी कि सर्वोदय कार्यकर्ताओं अपनी निजी हैसियत में चाहे तो आंदोलन में शामिल हो सकते है। विनोबा की मजबूरी और जे.पी के निश्चय की बात दिनमान में बाबा बोले हां बाबा रपट में छपा। जेपी के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि वे बार-बार अपनी विचारधारा बदलते रहे है। कभी वे मार्क्सवादी थे और गांधीवाद की आलोचना करते थे। फ़िर गांधीवादी समाजवादी हुए और अंत में गांधीवादी। गांधीवादी रहते हुए भी कभी वे जनसंघ जैसे राजनैतिक दलों के घोर आलोचक थे। लेकिन जेपी आंदोलन के दौरान उन्होंने इसी दल का सक्रिय सहयोग लिया। इस बात को अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। जेपी एक विकासमान व्यक्तित्व थे। किसी उएक विचारधारा के कैदी बनकर रहना उन्हें स्वीकार नहीं था। मार्क्सवादी वे तब थे जब उन्हें साम्राज्यवादी शोषण के खिलाफ वही एक मात्रा शक्तिशाली आंदोलन लगता था। समाजवादी वे तब हुए जब उन्होंने साम्यवादी हिंसा के संदर्भ में भारतीय परिस्थितियों से साक्षात्कार किया। गांधी में उन्हें भारतीयता का मर्म मिला। विभिन्न विचारधारा से नहीं तानाशाही प्रवृत्ति ओर राष्ट्र के सत्व को खाने वाले भ्रष्टाचार के साथ था।
इसके विरूद्ध हर उस नागरिक को एकजुट करने की आवश्यकता थी जो इन प्रवृत्तियों को राष्ट्र के लिए खतरनाक मानता था। इसलिए जेपी के विचारों में बदलाव दरअसल उन विचारयात्रा के पड़ाव थे, जिन्हें वे एक-एक करके पार कर रहे थे। इसी संदर्भ में उनकी समग्र क्रांति की भी आलोचना होती है। आलोचना का मुख्य आधार यह है कि उसमें वर्तमान हालात और समस्याओं की तर्कसंगत और व्यवहारिक हल नहीं है। लेकिन क्या गांधीजी के स्वराज और लोहिया के चैखम्बा राजा में सभी सवालों के उत्तर हैं। अगर होते तो लोहियावादी राजनैतिक दलों और गांधीवादी संगठनों के पास ठोस वैकल्पिक राजव्यवस्था अर्थशास्त्रा का खाका होता।
गांधी और जेपी की गति इस मायने में समान थी कि दोनों का अधिकांश जीवन संघर्षों और आंदोलनों के बीच गुजरा। और इस बीच जो चिंतन उन्होंने किया उसका सैद्धान्तिक रूप तो वे सामने रख पाए लेकिन सिद्धान्तो को व्यावहारिक योजनाओं के रूप में विकसित करने का उन्हें मौका नहीं मिला।

4 Comments

  • जे पी की जरुरत आज भी है . आगे का इन्त्ज़ार है 

  • जयराम "विप्लव"

    धीरू सिंह जी , आपका इन्तेजार ज्यादा दिनों का नहीं है हर सप्ताह इस कड़ी को बढाया जायेगा अलग-अलग लेखकों की राय से . लोकनायक की जरुरत आज सबसे ज्यादा है क्योंकि आज राजनीति से भी लोक बिलकुल ही गायब हो गया है और आज़ाद भारत में जे पी अकेले हैं जिनको जनता ने अपना नायक माना है .

  • आपको देखकर खुशी हुई .. सफलता के लिए बहुत शुभकामनाएं !

  • loknayak ke bare me yah bahut acchi jankari hai iska jyada se jyada prachr prasar jaruri hai,lekin desh ko aaj fir J.P.ki jarurat hai……………

Leave a Reply