आज के समय मे जाति की बात को हम भारतीयों से अलग कर के नही रखा जा सकता है । भारत में जाति आधारित जनगणना इस समय चर्चा में है। हमारे यहां तो पहले सरकार की हाँ और फिर उस मुद्दे पर टालमटोल ने इसे न सिर्फ व्यापक बहस का मुद्दा बना दिया है, वरन इस मुद्दे को एक गलत मोड देने का भी प्रयास कर दिया है । वैसे जाति आधारित जनगणना होनी चाहिए या नही इसके उपर कोई भी राय जल्दबाजी मे बनाने से अच्छा है कि हम इस मुद्दे को पूरी तरह से समझने का प्रयास करे । कैसे ये अच्छा है और कैसे ये खराब है इसका आकलन करना ज्यादा जरूरी हो जाता है ।
संस्कृत मे एक श्लोक है सर्वं परवशं दु:खं सर्वम् आत्मवशं सुखम्, एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुख दु:खयो: अर्थात जो चीजें अपने अधिकार में नही है वह सब दु:ख है तथा जो चीज अपने अधिकार में है वह सब सुख है | जाति आधारित जनगणना से अगर कोई चीज हाथ से निकलती हुई प्रतीत होती है तो निश्चित तौर पर ये जनगणना वहां दु:ख का कारण है और जहां इससे कहीं कुछ प्राप्त होने की सम्भावना है वहां इस जनगणना से सुख है । पर ,मेरा तो यह मानना है कि आज ऐसी जनगणना की जरूरत है जिसमे उन लोगों को चिन्हित किया जाये जो आर्थिक तौर पर सबसे ज्यादा पिछडे हुए है और जिन्हे अपने भरण-पोषण मे भारी समस्या का सामना करना पड रहा है ।
वो चाहे सवर्ण हो या शूद्र इसमे ना पड कर अगर हालात पर आधारित जनगणना करवायी जाये तो इसमे क्या नुक्सान है ? आज आरक्षण का बोलबाला हर तरफ नजर आता है , जिसका खामियाजा भी लोगों को भुगतना पडता है । हम भारतीय लोगों मे एक बात सदैव देखी जाती है कि हम बातें तो हमेशा ही बडी बडी कर देते है पर कही न कही उसमे एक अधूरेपन की झलक साफ दिखाई देती है । मौके का फायदा कभी देश का सवर्ण- वर्ग उठाता नजर आता है, तो कभी दलित-पिछडे़ वर्ग अपने अधिकारों का गलत उपयोग करते नजर आ जाते है ।
हमारे यहां दूसरों के काम मे मग्न हानेवाले थोडे है तथा दूसरों का दु:ख देखकर दु:खी होने वाले भी थोडे है | यहां तो हम कहते है बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, पर करते है स्वजन हिताय स्वजन सुखाय । इस जनगणना का विरोध करने वाले और इसका समर्थन करने वाले कही न कही अपने हितों को सर्वोपरि रखने मे ज्यादा लगे हुए है । जाति व्यवस्था हमारे समाज की हकीकत है, इससे मुँह नहीं फेरा जा सकता । पर इसके लिए इस तरह से हाय-तौबा मचाने की कोई आवश्यकता नही । सहनाववतु , सह नौ भुनक्तु , सहवीर्यं करवावहै अर्थात एक साथ आओ , एक साथ खाओ और साथ-साथ काम करो अगर हम इस बात पर चले तो क्या कोई नुकसान है ?
भारत एक लोकतांत्रिक राज्य है जहाँ बहुमत के आधार पर शासन-व्यवस्था चलती है। आज जाति के आधार पर शिक्षा, नौकरियों और विभिन्न योजनाओं में आरक्षण की व्यवस्था है, अगर देखा जाये तो ये भी कोई बहुत सराहनीय बात नही है । कई बार इसके दुष्परिणाम सामने आते है । अगर हर चीज के लिये जगह हो तो हर चीज जगह पर नजर आने लगेगी । हमारे देश मे कुछ व्यवस्था को तो अब खत्म कर देना ही सबसे बेहतर विकल्प रहेगा, और इसमें आरक्षण और जातिवाद सबसे प्रमुख है । जहां जो ज्यादा लायक हो अगर वो उस जगह को प्राप्त करे तो इसमे बुराई क्या है ? फिर इसमे आरक्षण और जातिवाद के लिए कही कोई जगह बचती ही नही ..।
आज जरूरत है आपसी समरसता पैदा करने की जो जाति की राजनीति मे कभी पनप नही सकती है । और अगर इस तरह से समय समय पर जातिवाद अलग-अलग रूप मे प्रभाव मे आने का प्रयास करेगा तब तो स्थिति और ज्यादा विकट हो जायेगी । अगर लोग आदेश के बजाय मिथक से , तर्क के बजाय नीति-कथा से , और कारण के बजाय संकेत से चलने लगे तो क्या किया जाये, फिर तो किसी भी सही व्यवस्था का विरोध होगा और अवश्य होगा । तर्क-वितर्क होगा , अपने अपने पक्ष रखे जायेंगे और आपसी टकराव के अलावा और कुछ देखने को नही मिलेगा ।
आज जाति आधारित जनगणना के मुद्दे पर इसका समर्थन करने वाले और इसका विरोध करने वाले दोनों ही आक्रमकता का सहारा ले कर अपनी –अपनी बात रखने का प्रयास करते है , परंतु आक्रामकता सिर्फ एक मुखौटा है जिसके पीछे मनुष्य अपनी कमजोरियों को, अपने से और संसार से छिपाकर चलता है। असली और स्थाई शक्ति सहनशीलता में है। त्वरित और कठोर प्रतिक्रिया सिर्फ कमजोर लोग करते हैं और इसमें वे अपनी मनुष्यता को खो देते हैं। क्या हम सब मिलकर जाति के इस जंजीर को तोडने का प्रयास नही कर सकते ? क्या सवर्ण और पिछडे हमेशा इसी तरह से बिना मुद्दे का मुद्दा बनाकर आरोप-प्रत्यारोप करते रहेंगे ? ऐसे मे इस देश का आखिर क्या होगा ? क्या भारतवर्ष आगे बढने के बजाए हमेशा इन्ही ढकोसलाओं मे उलझा रहेगा ? जाति आधारित जनगणना से ज्यादा महत्वपूर्ण क्या इन प्रश्नों की ओर भी ध्यान दिया जाये या नही ?


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