जहां तक छात्रसंघ की बात है, सर्वप्रथम यह विचार करना होगा कि आज छात्र संघों की उपयोगिता कितनी है; क्या इनसे विद्यालय के मूल उद्देश्य की पूर्ति हो रही है ? यदि नहीं, तो फिर क्यों न छात्र संघ की बजाय छात्र परिषदों को बढ़ावा दिया जाये ।
छात्र परिषद का अर्थ है, जिन छात्रों ने अपनी कक्षाओं में सर्वाधिक अंक पाये हैं, ऐसे छात्रों की परिषद। विद्यालय का मूल उद्देश्य शिक्षा देना है। वहां का वातावरण इसके अनुकूल बना रहे, इसकी चिंता केवल वही छात्र कर सकते हैं, जो स्वयं पढ़ने में तेज हों। इस परिषद में कुछ छात्र ऐसे भी हो सकते हैं, जिन्होंने खेल या कला जैसी कक्षा से इतर गतिविधियों में अच्छा प्रदर्शन किया है।
देश में आई राजनीतिक गिरावट का सीधा असर छात्र राजनीति पर पड़ा है, क्योंकि प्रायः सभी राजनीतिक दल युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए छात्र संघों का दुरुपयोग करते हैं। इंदिरा गांधी के काल से राजनीति में धन और बाहुबल का उपयोग बढ़ा है। जातीय और घरेलू दलों के आने के बाद तो विद्यालयों की राजनीति में खुली हिंसा होने लगी है। कम्युनिस्ट तो जन्मजात हिंसावादी हैं। ऐसे में विद्यालयों का वातावरण खराब होना स्वाभाविक ही है।
एक बात और; जब से विद्यालयों का आकार बहुत बड़ा होने लगा है, तब से हर दल अपनी युवा संस्था के द्वारा वहां कब्जा करना चाहता है। इससे उसे चुनाव में युवा शक्ति का पूरा सहयोग मिल जाता है। बड़े विद्यालयों के छात्र संघों के पास भरपूर कोष होता है। इसकी बंदरबांट का अधिकार भी सीधे-सीधे छात्र नेताओं को होता है। वे इससे छात्र हित के नाम पर स्वयं मौज मस्ती करते हैं।
छात्र संघ चुनाव के बाद बड़े नगरों में प्रायः शराब की दुकानें लूटी जाती हैं। इसलिए शराब व्यवसायी इस दिन दुकान बंद करना ही उचित समझते हैं। फिर भी उन्हें भारी चंदा तो देना ही पड़ता है। विद्यालय के आसपास के दुकानदार चुनावों के समय त्रस्त रहते हैं। उन्हें हर नेता के समर्थकों की गुंडागर्दी सहनी पड़ती है और जबरन चंदा भी देना पड़ता है। सिटी बसें प्रत्याशियों के साइनबोर्ड नजर आती हैं। होर्डिंग नेताओं के नामों से पुत जाते हैं। कुल मिलाकर ऐसा अराजक माहौल होता है कि चुनाव के अंतिम कुछ दिनों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं कालिज आना ही बंद कर देते हैं।
इस चुनाव में पड़े वोटों का यदि हिसाब लगायें, तो ध्यान में आता है कि विजयी प्रत्याशी को दस प्रतिशत वोट भी नहीं मिलते। एक उदाहरण देखें। वर्ष 2006 में डी.ए.वी. कालिज, देहरादून में अध्यक्ष बने संग्राम सिंह पुंडीर को 2,890 तथा उपविजेता जितेन्द्र रावत को 1,931 मत मिले थे। इस पद के लिए केवल 6,860 मत पड़े। महासचिव बने राकेश नेगी को 3,001 तथा उपविजेता सुमित पुंडीर को 2,705 मत मिले। पूरे चुनाव में 7,112 मत पड़े, जबकि यहां 30,000 छात्र हैं। 20 लाख रु0 छात्रों ने खर्च किये। राजनीतिक दलों , विद्यालय और पुलिस-प्रशासन का भी काफी धन खर्च हुआ। कोई बताए कि ऐसे अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों का क्या महत्व है, जिन्हें 90 प्रतिशत छात्रों का समर्थन नहीं है ?
इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि महाविद्यालयों में छात्रों की संख्या 5,000 से अधिक न हो। बड़े-बड़े विद्यालयों में विज्ञान, कला, वाणिज्य, कानून, शिक्षा, भाषा के अलग-अलग संकाय होते हैं। अच्छा तो यह है कि इन सबके अलग विद्यालय हों, वे एक दूसरे से पर्याप्त दूरी पर तथा शहर से हट कर हों। जिससे जो सचमुच पढ़ने के इच्छुक छात्र हैं, वे ही वहां जायें।
इसी प्रकार कुलपति, प्राचार्य, शिक्षक आदि की नियुक्ति भी राजनीतिक दबावों से मुक्त होनी चाहिए। शिक्षा पर नियन्त्रण के लिए पूर्व प्राचार्य, कुलपति तथा प्रसिद्ध शिक्षाविदों की अलग से ‘शिक्षा संसद’ हो। देशोत्थान के लिए विद्यालयों का वातावरण ठीक होना बहुत आवश्यक है।


मैं आपके विचारों से सहमत हूँ . दलगत राजनीति से उबर कर ही ,शिक्षा का स्तरीयता बचाई जा सकती है .
@ प्रतिभा सक्सेना.
छात्र राजनीति के वर्तमान काले चेहरे को देखकर कल के उजाले का प्रयास नहीं छोड़ना चाहिए | ” राजनीति ” शब्द से घृणा ही ऐसी सोच को जन्म दे रही है लेकिन यदि राजनीति ही इतनी गन्दी है और सबकी जड़ है तो फ़िर संसदीय चुनाव भी क्यों ना बंद कर दिया जाए ? और इस सब को बंद करने के बाद की क्या योजना है ?
सहमत हूँ आपसे | क्षत्र संघों के गिरते स्तर को रोकने के लिए बदलाव जरुरी है |
मैं भी यही समझती हूँ क़ी ज्यादातर छात्र राजनीती क पार्टी उदासीन होते है. लेकिन जिनका रुझान इस तरफ होता है वो बाद चढ़ कर इसमें भाग लेट है छात्रों को इसमें रूचि दिखनी चैये ताकि अच्छे नेताओ के कारन छात्रों में राजनीती के पार्टी विस्वाश जाग्रत हो .