विचार -विमर्श|Shortlink: 2010/08/15 10:18 am

छात्रसंघों का दायित्व

डूसू चुनाव आ गया है और देखना है इस बार विश्वविद्यालय प्रशासन के क्या इरादे हैं ? वैसे छात्र राजनीति को करीब से जानने वाले विश्लेषक कहते हैं कि यदि डूसू भी प्रतिबंधित हो जाए तो दिल्ली की राजनीतिक फिजा में एक नई सरगर्मी पैदा होगी , एक घुटन महसुसू होगी छात्रों को , एक संघर्ष का वातावरण तैयार होगा और तब जामिया , जे एन यू और डी यू के छात्र नेतृत्व का सही परीक्षण होगा और परीक्षण कामयाब रहा तो सन 74 जैसा कुछ सामने आ सकता है | वर्तमान परिस्थिति में छात्र संघ के दायित्वों पर प्रकाश डाल रहे हैं डा. मनोज चतुर्वेदी:-

छात्रसंघों का यह दायित्व बनता है कि वे इतिहास, राजनीति, खेलकूद, नृत्य, ज्ञान-विज्ञान, कृषि तथा समसामयिक भारतीय एवं विश्व की समस्याओं पर अध्ययन करें तथा अपने सहपाठियों को भी ऐसा करने के लिए कहें। एक सच्चा विधार्थी ही विधार्थियों का नेता हो सकता है।

भारतीय चिन्तकों ने चार आश्रमों का प्रतिपादन किया है। ये चार आश्रम हैं- ब्रह्मचर्यश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम। इन चारों आश्रमों में ब्रह्मचर्याश्रम पहला है। जिसमें पच्चीस वर्ष तक की अवस्था तक एक युवक विद्योपार्जन करता है। साथ ही साथ इस कालखंड में विद्यार्थियों को अनेकानेक समस्याओं से रूबरू होना पड़ता है।

अध्यापक अब, अध्यापक नहीं रहे। उनके वेतन में अपार वृध्दि कर दी गई है। इस संदर्भ में जाने-माने स्तंभकार देवेन्द्र स्वरूप कहते हैं, ‘यद्यपि भारतीय समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो कम समय और श्रम में अधिकाधिक धनोपार्जन कर रहे हैं लेकिन उसमें विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को प्रथम स्थान दिया जा सकता है फिर भी वे अपने वेतन के अनुरूप कार्य नहीं करते हैं।’ कथाकार और माक्र्सवादी चिन्तक राजेन्द्र यादव ने अपने एक संपादकीय में लिखा, ‘हिन्दी के अध्यापकों में पढ़ने-पढ़ाने की चाह नहीं है तो फिर वे कैसे युवा पीढ़ी को ज्ञान से परिपूर्ण कराएंगे।’ ये बातें छात्रसंघों की प्रासंगिकता को दर्शाती है। यहां से यह बात भी निकलकर सामने आ रही है कि अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए छात्र संघ संघर्ष करें जिससे अध्ययन-अध्यापन का माहौल कायम हो सके।

विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था में अन्य पदों पर रहते हुए अध्ययन-अध्यापन संभव नहीं है। क्योंकि अध्ययन-अध्यापन और प्रशासनिक कार्यों में तालमेल बैठा पाना बेहद मुश्किल है। जब विद्यार्थी अध्ययन के लिए शिक्षक के पास आता है तो पता चलता है कि गुरूजी प्रशासनिक कार्य से अन्यत्र गए हुए हैं। विद्यार्थी के सामने कोई चारा नहीं बचता है। छात्र-संघ पदाधिकारियों को इस बात के लिए दबाव डालना होगा कि अध्यापकों को ऐसे कार्यों से दूर रखा जाए।

वैचारिक मतभिन्नता भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता रही है। भारतीय संस्कृति ने कभी भी असहिष्णुता या हिंसक प्रवृति को स्थान नहीं दिया है। इसी को आधार बनाकर भारतीय राजनीति या लोकतंत्र की स्थापना हुई है। अत: यह स्वभाविक है कि विद्यार्थियों में भी दलबंदी-गुटबंदी होगी। छात्र नेताओं का यह दायित्व बनता है कि वे दलगत राजनीति या गुटबंदी से ऊपर उठकर गुटनिरपेक्ष राजनीति पर चिन्तन-मनन करें तथा युवाओं में इसके प्रति जागरूकता लाने का प्रयास करें।

छात्रसंघों का यह दायित्व बनता है कि वे इतिहास, राजनीति, खेलकूद, नृत्य, ज्ञान-विज्ञान, कृषि तथा समसामयिक भारतीय एवं विश्व की समस्याओं पर अध्ययन करें तथा अपने सहपाठियों को भी ऐसा करने के लिए कहें। एक सच्चा विद्यार्थी ही विद्यार्थियों का नेता हो सकता है। इसलिए छात्र राजनीति के प्रति उत्सुक व्यक्तियों का यह उत्तरदायित्व बनता है कि वे व्यर्थ के कार्यों में समय न बर्बाद करके सच्चे अर्थों में छात्र राजनीति करें। वे समय के महत्व को समझें क्योंकि आज का बीता हुआ समय कल आनेवाला नहीं है। इसीलिए डा. राममनोहर लोहिया विद्यार्थियों को अत्याधिक अध्ययन-चिन्तन पर जोर देने को कहते थे।

महात्मा गांधी ने तो अपने शैक्षणिक चिंतन में युवाओं से अध्ययन के साथ ही साथ कठोर परिश्रम पर अत्यधिक बल दिया है।

छात्रवास एक ऐसा स्थान है जहां विद्यार्थी रहकर अध्ययन करते हैं। छात्रसंघों का यह दायित्व बनता है कि वे श्रमदान द्वारा छात्रवासों के कार्यों को संपादित करें तथा अध्ययन- अध्यापन का स्वस्थ माहौल बनाएं। ऐसा देखने में मिलता है कि छात्रनेता, शराब और नृत्य पर अत्यधिक जोर देते हैं। इसे किसी भी रूप में ठीक नहीं कहा जा सकता है। छात्रवासों में अतिथियों के लिए अलग-अलग कमरों की व्यवस्था भी होनी चाहिए। जिसके कारण किसी भी विद्यार्थी को यह आभास नहीं हो कि अतिथियों के चलते उनका समय बर्बाद हुआ है। छात्रें के प्रतिनिधियों को वाद-विवाद प्रतियोगिता, निबंध प्रतियोगिता, सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर जोर डालना चाहिए। इसमें स्वस्थ स्पर्धा होना चाहिए न कि कटुता एवं दोषपूर्ण आचरण। विद्यार्थी नेताओं का यह भी दायित्व होना चाहिए कि वे आहार-विहार, विचार एवं चिंतन में सादगी को महत्व दें। क्योंकि भारतीय संस्कृति में विद्यार्थी जीवन एक संन्यासी का जीवन है। कठिन विद्याश्रम के पश्चात हमें गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना होता है। यदि यह जीवन अव्यवस्थित होगा तो आगे के आश्रमों के जीवन काल में हमें तमाम दिक्कतें आएंगी।

छात्रसंघ छात्रें का एक ऐसा संगठन है जिसका एकमात्र लक्ष्य व्यक्तिगत हित न होकर सामूहिक हित होता है। व्यक्तित्व के विकास के लिए अध्ययन-चिन्तन जरूरी है। साथ ही देश के विविध भागों का भ्रमण भी जरूरी है। जो कुछ भी हम पढ़ते हैं, वे सारी चीजें समाज से ही प्राप्त करते हैं। भारतीय मनीषियों का एकमात्र लक्ष्य मानव जाति का कल्याण रहा है। विद्यार्थियों को पौराणिक स्थलों के ही साथ उन देशभक्तों की जन्मभूमि और कर्मभूमि पर जाकर यह प्रण करना चाहिए कि हम भी आपके वंशज हैं इसलिए राष्ट्र की एकता, अखंडता और संपन्नता के लिए हमारे तन का एक-एक कतरा समर्पित रहेगा।

राष्ट्र की सारी समस्याओं को ध्यान में रखकर छात्रनेताओं तथा छात्रसंघों को काम करना चाहिए। यह भी याद रखना होगा कि आज का नौजवान छात्र ही कल भारतीय समाज एवं विश्व समाज में जाकर कार्य करेगा। वह सफल कार्यकर्ता तभी हो सकता है जब उसने गहन अध्ययन एवं चिन्तन किया हो। हमें यह विश्वास के साथ कहना होगा कि छात्र संघों की भूमिका पथ-प्रदर्शक की भांति होगी। स्वामी विवेकानन्द का स्वप्न तभी साकार होगा जब उनके अनुसार केवल पांच विद्यार्थी मिल जाएंगे तो वे भारत ही नहीं विश्व को भी बदल देंगे। हम सभी छात्र नौजवानों को आगे बढ़ना होगा।

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