और कितनी रुचिका ?

 


” यदि कोई अपराध करे तो सजा और पीड़ित को इन्साफ ” ये बातें हिंदी उपन्यास और फिल्मों में रह गयी हैं . आज कहाँ और कितना इन्साफ मिलता है ? इन्साफ के नाम पर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में खिलवाड़ जारी है . यह कहानी है १४ वर्षीय लड़की की, जिसकी आँखों में सपना था टेनिस की सनसनी बनने का . आज अगर वो जिन्दा होती तो शायद सानिया मिर्जा से भी बड़ा नाम होती . एक ऐसी टेनिस की दुनिया का उभरता नाम जो यौन उत्पीड़न का शिकार होती है और प्रतिकार करती है तो उसे ख़ुदकुशी का रास्ता अख्तियार करना पड़ता है .यहाँ तक कि उसके भाई को झूठे केस में फंसाया जाता है ,जानवरों की तरह बर्ताव किया जाता है ,उसके पिता को मजबूरन अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है ,अपना मकान बेचना पड़ता है और १९ साल तक तिल-तिल कर मरते हुए जीवन गुजरना पड़ता है . 

रुचिका गिरहोत्रा ! १९ साल पहले शुरू हुई उसकी लड़ाई अब भी ख़त्म नहीं हुई है .चंडीगढ़ में १४ साल की इस लड़की के साथ हरियाणा के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक एस पी एस राठोड़ ने छेड़छाड़ की थी और आत्महत्या के लिए उकसाया था . इस नाबालिक लड़की के साथ हुई छेड़छाड़ व आत्महत्या के लिए उकसाने की शर्मसार कर देने वाली घटना की प्राथमिकी दर्ज होने में नौ साल लगा दिए गये .पिता और भाई की लाख कोशिशों के बावजूद ऐसा संभव नहीं हो सका जब तक सर्वोच्च न्यायालय की दखल नहीं हुई .कदम-कदम पर पुलिस -प्रशासन द्वारा पैदा की गयी बाधाओं के बावजूद रुचिका के परिजनों ने मामले को अदालत में जारी रखा अगले दस साल तक .मामले में शुरू से हीं अभियुक्त का पलड़ा भरी रहा .हालाँकि ,तत्कालीन पुलिस महानिदेशक आर आर सिंह ने जांच में राठोड़ को दोषी माना था लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री हुकुम सिंह ने इसकी उपेक्षा की .१९९४ में मुख्यमंत्री भजन लाल ने राठोड़ की पदोन्नति कर उसे डीजीपी बनाया . यह रुचिका की आत्महत्या के कुछ हीं महीनों बाद की घटना है ! पांच साल बाद ओमप्रकाश चौटाला सरकार ने भी मामले पर कोई ध्यान नहीं दिया और राठोड़ दिसंबर २००० में सेवानिवृत होने तक अपने पड़ पर शान से बने रहे . 


रुचिका गिरहोत्रा के मामले ने हमारी न्याय व्यवस्था और प्रशासन की संवेदनहीनता को एक बार फ़िर जगजाहिर कर दिया है . इस घटना पर लोकतंत्र के रखवालों की टाल मटोल ने बता दिया कि हमारे देश में ना तो नैतिक  मूल्यों  की जगह बची है और ना ही मानवाधिकारों की कोई फ़िक्र . नंबर वन हरियाणा का दंभ भरने वाले राज्य में १९ साल तक मुख्यमंत्री इंसान की खाल में छुपे एक भेड़िये को बचाने में जुटा रहता है .जिसने अपनी वर्दी के साथ समूची मानवता को कलंकित किया है .राठोड़ की पहुँच का नदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने प्राथमिक दर्ज कराने के सरे प्रयास विफल कर दिए ,इसके बावजूद उसे एक दिन के लिए भी निलंबित नहीं किया गया बल्कि उसके निर्देश पर रुचिका के घर वालों को सताया जाता रहा . तब उसके १६ साल के भाई आशु के खिलाफ ११ आपराधिक मामले दर्ज किये गये .उसके पिता सुभाषचंद्र गिरहोत्रा को ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स के प्रबंधक का पद छोड़ना पड़ गया क्योंकि राठोड़ के पुलिसिया गुंडे उन्हें बैंक में जाकर बार -बार धमकाते थे . पिता के नौकरी छोड़ने के कुछ दिन बाद ही रुचिका ने आत्महत्या कर ली . डीजीपी से लेकर गृहमंत्री सभी मूकदर्शक बनकर इस घटना को फिल्मों की भांति देखते रहे . सी बी आई की विशेष अदालतों में ४०० बार स्थगन तथा उच्च न्यायालय में ४० बार सुनवाई टलने के बाद राठोड़ को केवल छेड़छाड़ का दोषी मानते हुए बस छः माह की कैद और एक हजार रुपया जुरमाना की सजा दी गयी .और उसी समय अदालत से उसको बेल भी मिल गयी . इससे बढ़कर न्याय का उदाहरण क्या हो सकता है !

रुचिका मामले में न्याय प्रक्रिया की उड़ी धज्जियों ने पूरे देश में एक बहस खड़ी कर दी है . ऑरकुट  ,फेसबुक ,ट्विटर,ब्लॉग हर जगह लोग रुचिका के पक्ष में अड़े हुए हैं .मीडिया की सहभागिता और जनता की जागरूकता ने केस को पहली बार राठोड़ के खिलाफ कर दियां है . सजा सुनाये जाने के बाद बेल लेकर हँसते हुए बाहर आने वाले राठोड़ के चेहरे की हंसी उडती नज़र आ रही है . बढ़ते दबाव ने राठोड़ के ऊपर भारतीय दंड विधान की धारा ३०६ के तहत मामला दर्ज किया गया है . और साथ हीं आशु द्वारा दर्ज की गयी प्राथमिकी पर भी संज्ञान लिया जा रहा है .पर इतने से सब कुछ ठीक नहीं हो जाता है मामला दर्ज हो जाने से कुछ नहीं हो जाता . यह तो भारतवर्ष है जहाँ फाँसी की सजाप्राप्त अपराधी को बरी कर दिया जाता है  . न्यायव्यवस्था की खामियां इससे ख़त्म नहीं हो जाती हैं . खाकी और खादी की मिलीभगत से ऐसी ना जानी कितनी रुचिकाएं इन्साफ की बाट जोह रही है . .

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3 Comments

  • yahi  sawal rah rah k mere man me bhi gote kha raha hai….magr sah maniye aise asankhy mamle to darz bhi nai hote aur yadi darz ho jaaye to zara sochiye hmaari kanoon vayastha ki shakal kaisi hogi………

  •  SPS RATHOD KO TOUGH PUNISHMENT DENA CHAHIYE…….

  • दीपाली जी ने सही बात कही है, पर इसमें और गहराई से जाने की जरुरत है. दिल्ली में बैठकर आप दुसरे जगहों के मामलों का सही आकलन नहीं कर सकती है, इसलिए बेहतर होगा की किसी मामले को उठाने से पहले सिर्फ मीडिया में आई बातों को संगृहीत करके अपनी बात को लिखना थोडा हल्का लगता है, उम्मीद है दीपाली जी इस पर गौर करेंगी और मैं उम्मीद करता हूँ की उनका अगला आलेख गंभीर होगा.
    उदय शंकर खवाड़े
    समाचार संपादक
    अभी अभी, रोहतक (हरियाणा)

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