आधी दुनिया का पूरा सच

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर दुनियाभर की महिलाओं के लिए इससे यादगार तोहफा शायद ही हो सकता था. आज ही, जब दुनियाभर में महिला दिवस मनाया जा रहा है, अमेरिका की महिला फिल्म निर्देशक कैथरीन बिगेलो ने फिल्मों के लिए दुनिया का सर्वोच्च ऑस्कर  पुरस्कार जीतकर एक बार फिर दुनिया के सामने यह साबित कर दिया है कि महिलाएं किसी भी मामलें में पुरूषों से कम नहीं है. 1929 में अस्तित्व में आने के बाद ऑस्कर  पुरस्कारों के इतिहास में यह पहला मौका है, जब किसी महिला निर्देशक ने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीता है. आस्ॅकर पुरस्कारों के अस्सी साल के इतिहास में इससे पहले मात्र दो महिलाएं सर्वश्रेष्ठ निर्देशिक की श्रेणी में नामांकित हुई थी, लेकिन पुरस्कार वे भी नहीं जीत पाई. लेकिन बिगेलों ने ईराक के युध की पृष्ठभूमि पर बनी अपनी फिल्म ‘द हर्ट लॉकर’ के लिए यह पुरस्कार जीतकर न सिर्फ पुरूषों के दशकों पुराने वर्चस्व को तोड़ा, बल्कि महिला दिवस के मौके पर इस बहस को एक बार फिर चर्चाओं में ला दिया कि ‘महिलाएं भी प्रत्येक क्षेत्र में पुरूषों के बराबर ही उपलब्धियां हासिल कर रही है. वैसे, यह दुर्भाग्य ही है कि इक्कीसवीं सदी में भी हम इस बहस में उलझे हुए हैं. देश के प्रख्यात शायर और गीतकार बशीर बद्र का एक बहुत उम्दा शेर हैः

हम तुम दोनों मिलकर पूरे होते हैं

आधी आधी एक कहानी हम दोनों

लेकिन अफसोस कि चांद तक पहुंच जाने के बावजूद हम अभी भी महिला-पुरूष के बीच के सामंजस्य की इस हकीकत को स्वीकार नहीं कर पाएं हैं. दुख होता है कि भारत में तो इस मामलें में स्थिति बेहद खराब है. यह भी एक दुखद संयोग ही है कि जब समूची दुनिया 8 मार्च को महिला दिवस मना रही है, तब हमारे देश के सदन में महिला आरक्षण बिल को लेकर हंगामा मचाया जा रहा था. यूपीए सरकार ने एक असाधारण पहल करते हुए बिल का प्रस्ताव रखा, लेकिन चूंकि भारतीय राजनीति में सभी फैसलें व्यक्तिगत और पार्टीगत हितों को ध्यान में रखते हुए लिए जाते हैं, इसलिए ज्यादातर पार्टियों ने इस बिल को लेकर विरोध का रवैया अपनाने में ही अपनी भलाई समझी. इसके पीछे जदयू, राजद जैसी पार्टियों का तर्क है कि पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं को भी अलग से आरक्षण देना चाहिए. और इसी मुद्दे को लेकर भारत की ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां लंबे समय से महिला आरक्षण बिल का आंख-मूंदकर विरोध करती आई है. दरअसल, इसके पीछे राजनीतिक पार्टियों की अपनी मजबूरियां है. सभी पार्टियों को अपने विशेष तबके के मतदाताओं के पास हर पांच साल में चुनाव के दौरान वोट मांगने के लिए जाना होता है. इसी की जुगाड़ में वे बिना सही-गलत का हिसाब लगाए इस बिल का विरोध मात्र अपने स्वार्थ के लिए करते रहे हैं. इसी स्वार्थ के चलते वे यह बात बड़ी आसानी से भूल जाते हैं कि ऐसा करके वे समग्र स्त्री विकास की राह में रोड़े अटका रहे हैं. अफसोस इसलिए भी होता है कि यह वहीं देश है, जहां इंदिरा गांधी जैसी लोह-महिला ने देश की सर्वोच्च सत्ता को कई सालों तक सफलतापूर्वक संभाला था. वर्तमान में भी भारतीय राजनीति में जहां सोनिया गांधी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की बागडोर संभाले हुए है, वहीं मायावती, ममता बनर्जी जैसी महिलाएं भी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य की महत्वपूर्ण शख्सियतों में गिनी जाती है. इससे भी बड़ा तथ्य यह है कि वर्तमान में प्रतिभा पाटिल के रूप में एक महिला ही देश के राष्ट्रपति के पद को सुशोभित कर रही है. इसके बावजूद भी अगर यूपीए सरकार द्वारा लाए गए महिला आरक्षण बिल के विरोध की स्थिति निर्मित होती है, तो यकीनन यह बेहद शर्मनाक बात है. वर्तमान में देश-दुनिया में प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं का योगदान भी पुरूषों के बराबर ही है. अमेरिका में बराक ओबामा राष्ट्रपति के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, तो उनका हाथ बंटाने के लिए हिलेरी क्लिंटन जैसी महिला भी हैं. दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों में भी किरण मजूमदार जैसी महिलाएं शीर्ष पदों पर आसीन हैं और अपनी उपलब्धियों से पुरूष समाज को भी पीछे छोड़ रही है. और अब बिगेलों ने भी ऑस्कर  पुरस्कारों में महिलाओं का वर्चस्व कायम करके नई राह दिखाई है. बावजूद इसके अगर संकीर्ण राजनीतिक मानसिकता के चलते भारतीय राजनीतिक पार्टियां महिलाओं के अधिकारों को लेकर विरोध का रवैया अपनाती है, तो फिर मानना चाहिए कि अंग्रेजों से गुलामी के छह दशक गुजर जाने के बावजूद भारतीय पुरूष समाज अभी भी दिमागी तौर पर बंधा हुआ है. अपनी जिंदगी में सबसे अहम भूमिका निभाने वाली महिला को वह आज भी अपने साथ खड़े करने के लिए तैयार नहीं है. यही आधी दुनिया का पूरा सच भी है.

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