देश भर में जाति आधारित जनगणना पर जोरदार बहस चल रही है | समर्थन और विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं | एक ओर ” मेरी जात हिन्दुस्तानी ” बताने वाले लोग हैं तो दूसरी ओर इस अभियान को दलित और पिछड़ों के विरोधी बताने वाले भी कम नहीं है | ” विचार-विमर्श ” स्तम्भ के तहत अब तक पांच से अधिक आलेख इस विषय पर आ चुके हैं और जिनमें दो लेखकों ने जाति आधारित जनगणना को दलितों और पिछड़ों के हित में बताने की पूरी कोशिश की है | विरोध करने वाले बिना जात के लोगों को संबोधित करते हुए पटना के पत्रकार और लेखक ‘संजय कुमार’ पूछते हैं :-
किसका विरोध जात का ? या सोच का ? या फिर व्यवस्था का ? अगर जात का विरोध कर रहे हैं तो समाज के अंदर इसकी जड़ें गहरी है जो मात्र उपवास से उखाड़ फेंका नहीं जा सकता है। मामला सोच का लगता है ? एक ओर जातिगत जनगणना का विरोध हो रहा हैं। उपवास किया जा रहा है। वहीं जातिनुमा अजगर में फंसे समाज के खिलाफ उपवास नहीं किया जा रहा है ? ऐसा नहीं कि जनगणना से जाति हटाने के खिलाफ उपवास करने वालों को मालूम नहीं। समाज के ठेकेदारों ने ? समाज के ठेकेदार कौन ? माफ कीजियेगा वही द्विज समाज ? तो सवाल हैं जनगणना से जात हटाओ के नारे के साथ कुछ तथाकथित बिना जात के लोगों ने जो उपवास और धरना दिया वह इनके खिलाफ होने चाहिये थे ? एक दलित जिसे सरकार ने काम दिया उसे ही विरोध जता कर बेकार/ बेरोजगार करने की कहीं साजिश तो नहीं ?
संजय भाई के जातिवाद को लेकर विचार और आलेख में दिए गये उदाहरण निश्चित तौर पर विचारणीय हैं किन्तु जनगणना में जाति को शामिल कर इसका हल नहीं ढूंढा जा सकता है अपितु इसके विपरीत परिणाम ही सामने आयेंगे | जाति आधारित जनगणना का मुखालफत करने वालों का उद्देश्य केवल इतना सा है कि जाति आधारित राजनीति को आंकड़ों का आधार ना मिले | यदि जाति आधारित जनगणना होती है तो दुष्परिणाम यह होगा कि किसी भी संसदीय या विधानसभा अथवा पंचायती चुनाव के दौरान क्षेत्र की उसी जाति का ध्यान रखा जाएगा जो संख्या में जीत-हार का फैसला करने वाले हैं बाकी अल्पसंख्यक (चाहे वो किसी भी जाति से संबंध रखते हों ) समुदाय को हासिये पर छोड़ दिया जायेगा | इस जनगणना का जो तथाकथित पिछड़ेपन को दूर करने का लक्ष्य बताया जा रहा है वह राजनीतिक दुर्भावना और वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित है | किसी के भी पिछड़ेपन को जानने के लिए उसकी जाति जानना जरुरी नहीं है | जहाँ तक सवाल पिछड़ों -दलितों के उत्थान का सवाल है तो यह केवल राजनीतिक भागीदारी से संभव नहीं है यदि ऐसा होता तो १५ वर्षों के “मुस्लिम-यादव समीकरण ” वाले लालू राज में सभी यादवों और मुसलमानों की स्थिति में आशानुकूल सुधार आया होता ! दलितों की मसीहा मायावती के शासन में दलितों के उत्थान की जगह उनका शोषण चरम पर नहीं होता ! दलितों के घर खाना खाने वाले राहुल बाबा की परोक्ष सत्ता में राजेन्द्र सच्चर समिति की रपट पर सुनवाई जरुर की गयी होती ! स्पष्ट है कि ये सब राजनीतिक हथकंडे केवल दलितों -पिछड़ों के हितैषी होने का भ्रम फैला कर अपना-अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए हैं | जाति आधारित जनगणना के विरोध का मतलब किसी भी तरह के ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने या आरक्षण का विरोध करना नहीं है | दलितों -पिछड़ों-मुसलमानों की स्थिति का पता लगाने के लिए अब तक सैकड़ों आयोग और समितियां गठित की जा चुकी हैं लेकिन उनकी रपट पर कितना कारगर और जमीनी प्रयास किया गया है यह जगजाहिर है | पिछले दो दशकों से भारतीय लोकतंत्र के दो बड़े राज्य बिहार और उत्तर प्रदेश में कोई भी सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं है फ़िर भी पिछड़ों के हालात क्यों नहीं सुधार रहे हैं ?
जाति आधारित जनगणना के समर्थकों का कहना है कि इससे से जातिगत संख्या का आंकड़ा सामने आएगा और सरकारी योजना बनाने में सुविधा होगी | इस तर्क में कोई दम नहीं है क्योंकि कोई भी जाति ऐसी नहीं है जिसका हर आदमी आर्थिक और सामाजिक रूप से विपन्न हो या हर आदमी आमिर या गरीब हो , फ़िर जाति को गरीबी हटाने का आधार कैसे बनाया जा सकता है ?
जरा गौर फरमाइए, इस जनगणना के आधार पर निकाले गये आंकड़ों में अलग-अलग क्षत्रों में किसी जाति की संख्या 40 % तो किसी 50 % और किसी की 60 % भी हो सकती है !फ़िर क्या होगा ? सरकारी योजनायें बने ना बने तब हर जाति “गुर्जर” और “मीणा” होगी , जिनके बीच आरक्षण पाने के लिए होड़ लगेगी चाहे वो जातियां सामाजिक और आर्थिक रूप से सबल ही क्यों ना हो , संख्या पक्ष प्रबल होगा ! हर तरफ़ मंडल कमीशनों का दौर चलेगा। हर पार्टी अपना “वोट बैंक” सुनिश्चित करने में लगी रहेगी। कुल मिलाकर एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जायेगी जो इस देश की प्रगति की दिशा दुर्गति की ओर ले जा सकती है।
बहरहाल , ये बहस जारी है | कुछ अन्य पठनीय आलेखों के लिंक नीचे प्रेषित कर रहा हूँ | पढ़िये और आप भी अपने विचार हमें लिख भेजिए | janokti@gmail.com पर मेल करें और जनोक्ति के पंजीकृत लेखक खुद अपने खाते से पोस्ट करें !

जयराम जी,
नमस्कार ।
बधाई … बिलकुल सही और सटीक बात । जाति को आधार बनाकर भी भला कभी कोई कार्य सम्पूर्णॅ हुआ है । आजतक अखण्ड भारत कभी एक नजर नही आया…ये भी तो सत्य है । हम किससे लडे जाति के नाम पर ? अपने से या अपने अपनो से ? मैने पहले ही कहा है जो भी पिछ्डे है चाहे वे सवर्ण हो या दलित उन्हे आधार बना कर अगर जनगणना करवाई जाये तो ज्यादा एक दूसरे से जुडा जा सकता है । और देश का आपस मे जुडा रहना ज्यादा जरूरी है . !
जयराम भाई आप की पीड़ा सही है लेकिन क्या जाति जनगणना हो ने से देश टूट तक जायेगा ? मैं ने अपने लेख वैदिकी जाति जाति न भवतिः…….मे बात की है . जब की एक ओर जाति जनगणना का विरोध हो रहा है तो दूसरी और जुल्म करने वालों के खिलाफ क्यों नहीं आंदोलन किया जाता है एक तरफ जाति का विरोध कर रहे हैं वहीं दूसरी और द्विज समाज के लोग दलितों के खिलाफ मोरचा लिये हुए है यह कैसा कैसी सोच है ?
@ अनिकेत भाई ! आपके वक्तव्य से पुर्णतः सहमत |
@ संजय भाई , सवाल देश के टूटने का नहीं है , सवाल तो उस राजनितिक खेल का है जिसमें किसी भी जाती का अल्पसंख्यक समाज पिसेगा | कहते हैं जब जागे तबभी सवेरा तो भाई हम आज ही जागे हैं और अभी सामने जो मुद्दा है उसपर काम करें , जातिवाद के नाम पर चल रहे शोषण ,भेद-भाव एक बड़ा और दीर्घकालिक मसला है जिसे काफी सोच-विचार और रणनीति के तहत दूर किया जा सकता है | वैसे आपकी इस बात से पूरी असहमति है की समूचा द्विज समाज ही पिछड़ों -दलितों के खिलाफ खड़ा है ! ऐसा बिलकुल भी नहीं है ! जन्म से मैं भी द्विज हूँ लेकिन आजतक मैंने अपने आस-पड़ोस ऐसा कुछ भी नहीं देखा क्योंकि पिछले एक दशक में बहुत बदलाव आया है |
और जहाँ तक जाती-व्यवस्था को तोड़ने की बात है तो इसके लिए जाती से पहले उपजातियां तोडनी होगी | ब्राह्मणों में भी पचास तरह के ब्राह्मन हैं और सभी एक-दुसरे को श्रेष्ठ समझते हैं , दलितों में भी यही हाल है जो खुद शोसन के शिकार हैं और वो भी अपने से कमजोर जाति को सताते हैं | ऐसा वास्तविकता है !
” भारत में छोटी से छोटी जाति भी अपने से छोटी जात को खोज ही लेता है !”
तो पहले उपजाति तोड़ें आपस में बेटी-रोटी का सम्बन्ध कायम हो फिर जाकर जाति तोड़ने की बात करना उचित होगा !
जाति ना पूछो साधू की , पूछ लीजिये ज्ञान ,
मोल करो तलवार का पड़ी रहने दो म्यान !
आज तो सब काम जाति से ही होता है !
संजय भाई,
नमस्कार स्वीकार करें .
मैं ब्राह्मण जाति का हूँ किन्तु आजतक कभी ऐसे विचार नहीं रहे या कभी ये नहीं बताया गया की अन्य जातियों का सम्मान कम है अथवा कोई भी जाति किसी से कम या अधिक महत्वा रखती है. जिस प्रकार की बात आप कर रहे हैं उससे आप अपनी ही जाती का अपमान कर रहे हैं . आप इस बात को क्यों मान लेते हैं की कोई भी जाति विशेष दलित है . आप दुर्भावनावश इस प्रकार की बात कर रहे हैं .
भारत का इतिहास रहा है की हर जाति ने देश का नेतृत्व किया है .
आप अपनी जाति का सम्मान करें देश का सम्मान करें और इस प्रकार से किसी जाति के विषय मैं पूर्वाग्रह न रखें . मैं आपकी जाति का पूरा सम्मान करता हूँ किन्तु किसी भी जाति को इस प्रकार का अधिकार नहीं है की वो देश के विरुद्ध और धर्म के विरुद्ध बात करे .
आपसे विनम्र निवेदन है की डॉ अम्बेडकर को पढ़ें और कभी हो सके तो हिंदुत्व की मूल भावना को समझने का प्रयास करें . आप किसी जाति से पहले हिन्दू हैं इसका ध्यान रखें .
रही बात जातिगत जनगणना की तो ये मात्र वोट बैंक की राजनीति है.
यदि आप खुले हृदय से विचार करेंगे तो आप समझेंगे की इससे केवल समाज का विघटन होगा परिणाम स्वरुप देश का .
कोई भी ब्राह्मण किसी भी जाति के विरुद्ध नहीं है . जो लोग हैं वो न ही धर्म की मूल भावना जानते हैं न ही अपनी स्वयम की जाति को .
इस प्रकार के लोग एक तरह से देश द्रोह कर रहे हैं .
मुझे अपनी जाति पर पूरा गर्व है और अपेक्षा करता हूँ की आपको भी होगा.
राहुल त्रिपाठी
भाई राहुल जी
नमस्कार
आप का विचार पढ़ा। अच्छा लगा। काश आप की तरह अन्य ब्राहमण जाति के लोग सोचते? और हां मेरा लेख किसी जाति विशेष के खिलाफ नहीं है। बल्कि समाज के अंदर ब्राहमणवाद करने वालांे से है। ब्राहमणवादी समाज को चलाने वालों से उसमें कोई भी जाति हो ? हालांकि आपने इतिहास पढ़ने की सलाह दी है तो आप ही बताये कि समाजिक व्यवस्था के नियामक कौन रहे हैं ? भाई…..बोया पेड़़ बबूल का आम कहां से खाये……..। हीरा डोम की पीड़ा आज इस ब्राहमणवादी समाज में कायम है। उसे हटाना है। जनोक्ति पर ही एक लेख है‘‘ तुम, झाड़ू पोछा लगाओ, खाना हम पकवा लेंगे !.. पढ़ियेगा। जवाब मिल जायेगा। लेख मैंने दुर्भावनावश नहीं लिखा है। आप को लगता है तो यह आपकी सोच होगी। बल्कि समाज के अंदर इस तरह की सोच से धिन आती है। दूसरी बात आज जो हो रहा है उसके लिए जिम्मेदार कौन है उसके लिए आंख कान आप खेल कर रखें ऐसा लगता है कि आपने मेरा लेख ठीक से पढ़ा नहीं या फिर बौखलाहट में आपने देश के विरुद और धर्म के विरुद की बात कह दी। आप किसी खास विचार धारा से जुड़े हैं इससे मुझे कोई लेना देना नहीं और हां देश व धर्म का ठेकेदार न बनें। इस देश में अभिव्यक्ति की आजादी है। सम्मान देने और हिन्दू होने का अहसास आप किस अधिकार से दे रहे है? मैं क्या हूॅं और आप क्या हैं इसके लिए आपसे सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं? आग्रह है सभी को गले लगाये जाति, हिन्दूत्व के गमछे में बांध कर बरगलाने की कोशिश न करें। मेरी बातों से तकलीफ हुई हो तो खेद है और हां मैं एक व्यक्ति हॅू…हिन्दुस्तानी हूॅं….और भारत देश धर्मनिरपेक्ष देश है इसे याद रखे।
मित्र मै इस मुद्दे पर आपसे १००% सहमत हूं,पर एक सामान्य व्यक्ति इस बाबत कर भी क्या सकता है, कोनसा बुद्धीजीवी यह नहीं जानता कि नक्सली समस्या का सृजन कैसे हुआ, कुछ मुट्ठी भर लोग जयादा से ज्यादा सुविधाए,जमीन,धन-दोलत समेट लेना चाहते है और हजारो आदिवासियों एवं ग्रामीणों को मूल-भूत सुविधाओं से भी महरूम रखा जाता है, इनको हर तरह की सुविधाओं से महरूम रख कर अगर तथाकथित सभ्य-समाज अगर यह सोचता है कि वह हमेशा सुखी रह लेगा तो यह उसका भ्रम है, यही बात अन्य आतंकवादियों पर भी खरी उतरती है इन अभावग्रस्त युवाओं का कुछ बेहद चालाक लोग बरगला कर फायदा उठाते है, जिससे आम आदमी को चहूँ ओर जान गवाते हुए देखा जा सकता है, अब यही जनता के नुमाइंदो ने जाति के नाम से जनगणना का शिगूफा छेड़ दिया हँ जिसमे अंततः फायदा स्थानीय स्तर के नेताओं को हमेशा फायदा होता रहे. अगर आप सोचते है कि आम आदमी कि इस विचार के विरुद्ध कोई भूमिका हो सकती है तो आप बताइये हमें क्या करना चाहिए फिलवक्त मै बाबा रामदेव के समाज के जनजागरण हेतू किये जा रहे कार्यों में रुची ले रहा हूं यदि उनके द्वारा समर्थित कोई व्यक्ति किसी भी चुनाव में खडा होता है मै उसे ही मतदान करूंगा