ममता तूं तो गयी बंगाली जनता के मन से
0मित्रों, ममता बहुत ही महान शब्द है, महान भाव है और महान अनुभूति तो है ही. परन्तु इस आलेख में हम जिस ममता का नीर-क्षीर-विश्लेषण करने बैठे हैं वह ममता
भारत के लिए नए राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव करने की गहमागहमी का सियासी हल्कों में आग़ाज हो चुका है। भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अबुल कलाम
भारत का संविधान अपने आप में अनोखा है, लेकिन निहितार्थ की राजनीति के चलते सभी राजनीतिक दल संविधान पर लगातार प्रहार कर अपने मनमाफिक इसमें संशोधन करने में जुटे हुए है। आज
राजनीति जब तक राज करने की नीति है तब तक तो ठीक है पर मनमानी करने की नीति हो जाए तो क्या करें ? एक तरफ केंद्र की सरकार है
मित्रों, ममता बहुत ही महान शब्द है, महान भाव है और महान अनुभूति तो है ही. परन्तु इस आलेख में हम जिस ममता का नीर-क्षीर-विश्लेषण करने बैठे हैं वह ममता
कांग्रेस से टूटकर अलग हुंईं ममता बनर्जी इस समय पूरी दादा गिरी पर आमदा हैं। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार और अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा ममता बनर्जी की नैतिक और अनैतिक
जातिगत राजनीति वर्तमान में भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस देश में जाति के नाम पर राजनैतिक पार्टियां टिकट वितरण करती है, जाति के नाम
कहते हैं कि 12 साल में घूरे के भी दिन फिर जाते हैं लेकिन उत्तरप्रदेश में तो दूने वर्ष बीतने पर भी कांग्रेस पार्टी की ढ़ाक के तीन पात की
कांग्रेस अब इस देश के न्यायपालिका पर भी बिलकुल विश्वास नही करती | कांग्रेस के लिए असली तीर्थ स्थान या असली सुप्रीम कोर्ट १० जनपथ है | आज के पहले
कल तक राहुल गांधी के अघोषित द्रोणाचार्य की भूमिका निभाने वाले कांग्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह का शनि भारी होता दिख रहा है। राहुल के दरबार में अब दिग्गी
पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का एक कथन है कि “राजनीतिज्ञों को नेशन फर्स्ट, पार्टी नेक्स्ट, सेल्फ लास्ट” के उदात्त आदर्श को ध्यान में रखकर राष्ट्र सेवा की राजनीति करनी चाहिये, परन्तु
जुलाई का महीना दिल्ली के लिए काफी गर्म होता है. पर यह धूप तब और कष्टकर हो जाता है जब आप बायो-डाटा लेकर नौकरी की तलाश में दिल्ली की सड़कों
कल आधी रात के बाद मेरे मोबाईल पर एक मैसेज आया- “अन्ना के आंदोलन का एक साल पूरा हो गया। क्या बदल गया देश?” मेरा जवाब था “बड़े परिवर्तन में
शरद जोशी ने वर्षों पहले अपने एक व्यंग में लिखा था ” जब तक पक्षपात ,निर्णयहीनता,ढीलापन ,दोमुंहापन ,पूर्वाग्रह ,ढोंग ,दिखावा ,सस्ती आकांक्षा और लालच कायम हैं | तब तक कांग्रेस