जाति-धर्म से ऊपर बेदाग़ हो राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार
0भारत का संविधान अपने आप में अनोखा है, लेकिन निहितार्थ की राजनीति के चलते सभी राजनीतिक दल संविधान पर लगातार प्रहार कर अपने मनमाफिक इसमें संशोधन करने में जुटे हुए है। आज
मुकुल कानितकर संसद के 60 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर विशेष सत्र का आयोजन कर उत्सव मनाया गया । पर क्या केवल उत्सव मनाना पर्याप्त है ? सैद्धांतिक रूप
सुरेंद्र किशोर, 15 अप्रैल। जातीय वोट बैंक के आधार पर ताकतवर बने इस देश के अन्य नेताओं की तरह येदियुरप्पा भी अपने राज्य में अपनी मर्जी चलाना चाहते हैं। उधर,
भारत संस्कृति और परंपराओं का देश है। किसी भी कार्य के संपादन के लिये ऊर्जा एवं शक्ति की आवश्यकता होती है। मातृ शक्ति एवं भक्ति के बिना दुनिया का संचालन
भारत का संविधान अपने आप में अनोखा है, लेकिन निहितार्थ की राजनीति के चलते सभी राजनीतिक दल संविधान पर लगातार प्रहार कर अपने मनमाफिक इसमें संशोधन करने में जुटे हुए है। आज
राजनीति जब तक राज करने की नीति है तब तक तो ठीक है पर मनमानी करने की नीति हो जाए तो क्या करें ? एक तरफ केंद्र की सरकार है
पिछले कई महीनों से भारत में परिवर्तन की एक उत्कट लालसा दिखाई दे रही है | कल तक जो सज्जन अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, अन्याय, दूषित लोकतंत्र आदि को नियति मान नेपथ्य
आज़ादी की बीते 63 सालों में देश के लाखों बुनकरों की समस्याएं और उनकी ग़रीबी दूर होने की बजाय बढ़ती ही चली जा रही है | सरकार की ओर से
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल चार देशो की यात्रा पर गयी है .. चलो इसमें कोई बुराई नही .. लेकिन आप चौक जायेंगे की उन्होंने अपने तीन पोतों को बकायदा सरकारी डेलीगेट
कांग्रेस की हार की वजह पर बनी एंटनी समिति की रिपोर्ट मे राहुल गाँधी को क्लीन चिट् — बिल्ली के गले मे मरले चूहे कभी घंटी बाँधने की हिम्मत नही
जैश-ए-मोहम्मद का प्रमुख मौलाना मसूद अजहर कभी कांग्रेस सरकार का दायां हाथ हुआ करता था। पी.वी. नरसिंह राव के जमाने में वह कांग्रेस आकाओं के इशारे पर खतरनाक आतंकवादी गतिविधियों
सचिन रमेश तेन्दूलकर को राज्यसभा जाना चाहिए था या नहीं, इस विषय पर चैक-चैराहे से लेकर मीडिया और सोशल मीडिया तक बहस चल रही है। सचिन का निर्णय वाकई चैंकाने
एक महान क्रिकेटर तथा एक महान अभिनेत्री को राज्यसभा की सदस्यता प्रदान करने की कवायद चल रही है। बेशक, दोनों अपने-अपने क्षेत्र के अच्छे फनकार हैं, मगर सांसद बन कर
परिवर्तन की बात करना राजनेताओं और समाजसेवियों में प्रचलित एक फैशन है; पर यह परिवर्तन लोकतन्त्र की मर्यादा में होना चाहिए। यद्यपि वर्तमान चुनाव प्रणाली भी पूर्णतया लोकतान्त्रिक ही है;