क्या प्रजातंत्र मूर्खो का शासन है ?
शेक्सपियर ने कहा था प्रजातंत्र मूर्खो का शासन है। कुछ ऐसा ही दिखता है हाल में हुए कुछ राज्यों के चुनावी परिणामो पर।
एक तरफ देखता हूँ प्रतिदिन न्यूज पेपर में बढती हुई मंहगाई पर चर्चा हो रही होती है, चर्चा हो रही होती है बढ़ते हुए अपराधो पर । चिंता व्यक्त की जा रही होती है कि इस कदर बढती हुई मंहगाई की । मंहगाई सुरसा के मुंह की तरह बढती जा रही है। दूसरी तरफ केंद्र की सरकार के नित्य नए घोटाले →आगे पढ़ें ..





सालों पुराना एक किस्सा याद आया है। बात 1987 की है, उस वक्त हम देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के उप संपादक हुआ करते थे। उस वक्त मालिक महोदय के एक मित्र आए और अपने मकान या दुकान बेचने का एक विज्ञापन प्रकाशित करने को दिया। मालिक ने उस विज्ञापन के नीचे निशुल्क लिखकर विज्ञापन विभाग को दे दिया। विज्ञापन विभाग ने उसे कंपोजिंग के लिए भिजवा दिया। कंपोजिंग के बाद
यह भाजपा है जो अपने एक सूबाई कार्यकर्ता को अपना देश का अध्यक्ष बना देती है। एक प्रदेश के निजाम को तीसरी फतह हासिल करने पर देश का प्रधानमंत्री बनाने की बात कह देती है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में वंशवाद और सामंतीराज का यह आलम है कि दिल्ली की निजाम श्रीमति शीला दीक्षित जो तीन बार दिल्ली पर फतह हासिल कर चुकी हैं, को प्रधानमंत्री तो दूर देश का गृह मंत्री बनाने की बात भी नहीं करती! नरेंद्र मोदी
मित्रों,पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई बराबर एक कालोत्तीर्ण उक्ति कहा करते थे कि अगर गंगा को साफ करना है तो पहले हमें गंगोत्री को साफ करना होगा। वाजपेई खुद भी कुछ समय के लिए भारतीय राजनीति के शीर्ष पर पहुँचे लेकिन वे भी गंगोत्री को साफ नहीं कर सके और उनके हटने के बाद तो गंगोत्री पूरी तरह से गंदी ही हो गई। यहाँ गंगोत्री से मेरा आशय केंद्र सरकार से है और वाजपेई जी का भी यही मतलब
महाराष्ट्र में नए राजनीतिक समीकरणों की आहट सुनाई देने लगी है। खासकर राज्य में सशक्त क्षेत्रीय पार्टी के रूप में स्थापित शिव सेना को लेकर राजनीतिक कयासबाजियों का बाजार गर्माता जा रहा है। यह सभी को ज्ञात है कि शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे की हालत इन दिनों ठीक नहीं है। उनका स्वास्थय उनका साथ नहीं दे रहा। वहीँ पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और बाल ठाकरे के पुत्र उद्धव ठाकरे की भी हाल ही में
Follow Janokti