Archive for category: जीवन

दुनिया का महानाटक

दुनिया का महानाटक

1 जनोक्ति डेस्क / 2010/07/01 9:10 am

जैसे कोई ड्रामा है, वैसे ही यह भी ड्रामा है, लेकिन वे हद के ड्रामा होते हैं और यह तुम्हारा ५००० वर्षों का बेहद का ड्रामा है|” [शिवबाबा] सन १९३६-३७,

असंठित श्रमिकों की वर्तमान स्थिति

असंठित श्रमिकों की वर्तमान स्थिति

0 जनोक्ति डेस्क / 2010/06/16 6:10 pm

साभार : आईएलओ प्रकाशित पुस्तक “मुक्ति की रह” अनौपचारिक अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर इस प्रकार परिभाषित की जा सकती है- ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें अनिगमित उद्यम, अनियत या दिहाड़ी मजदूर है। भारत सहित

हर घर बागबान

हर घर बागबान

2 अजय केशरी / 2010/06/14 9:12 pm

मेरा उनसे कोई खून का रिश्ता नहीं था फिर भी मै उनसे बराबर मिलता था घंटो मै उनसे बातें करता था उनको भी अच्छा लगता था मझसे बातें करना। मेरा

कितने मारे गए इस स्वाद और धुंए से…

कितने मारे गए इस स्वाद और धुंए से…

0 पूजा सिंह आदर्श / 2010/06/03 10:19 am

१ जून को विश्व तम्बाकू विरोधी दिवस था, इस उपलक्ष्य में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए, कहीं शिविर लगाए गए तो कहीं इसके विरोध में रैली निकाली गई लेकिन गौर

आत्महंता मत बनिए

आत्महंता मत बनिए

0 फ़िरदौस ख़ान / 2010/05/23 2:22 pm

यह एक विडंबना ही है कि ‘जीवेम शरदः शतम्’ यानी हम सौ साल जिएं, इसकी कामना करने वाले समाज में मृत्यु को अंगीकार करने की आत्महंता प्रवृत्ति बढ़ रही है।

दाम्पत्य जीवन में बिखराव

दाम्पत्य जीवन में बिखराव

0 डा ० पुरुषोत्तम मीणा / 2010/05/14 3:11 pm

क्यों विवाह संस्था प्रेम और त्याग की जगह लड़ाई का अखाड़ा बनता जा रहा है ? क्यों पति -पत्नी के रिश्तों की गाँठ कमजोर पड़ती जा रही है ? क्यों

नक्सलवाद की असली तस्वीर

नक्सलवाद की असली तस्वीर

0 डा ० पुरुषोत्तम मीणा / 2010/03/20 9:10 am

राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमन्त्री तक नक्सलवाद को देश की सबसे बडी या आतंकवाद के समकक्ष समस्या बता चुके हैं। अनेक लेखक भी वातानुकूलित कक्षों में बैठकर नक्सलवाद के ऊपर खूब

चिराग दिल  का जलाओ बहुत अंधेरा है

चिराग दिल का जलाओ बहुत अंधेरा है

1 अनिकेत प्रियदर्शी / 2010/03/19 5:40 pm

जगदीश की माँ का देहांत दो महीने पहले हुआ | माँ के रहते हुए जगदीश को कभी भी किसी तरह से कोई परेशानी नहीं हुई | कारण, माँ को मिलने

आत्ममुग्धता की बढ़ती भावना खतरनाक है

आत्ममुग्धता की बढ़ती भावना खतरनाक है

0 दीपाली पाण्डेय / 2009/10/28 10:40 pm

  मानव स्वयं के होने के बोध यानि अहम् के साथ नहीं जन्म लेता हैं। अहं का भाव समय के की धारा के संग-संग दिलोदिमाग पर छा जाता है। यह

सपनों का भरपूर लुत्फ़ उठाइए

1 जनोक्ति डेस्क / 2009/07/04 12:58 pm

काली स्याह अंधेरे में रात को मन के चित्रपटल पर चलने वाली विडियो यूँ हीं अनायास नहीं चलती । उसके गहरे अर्थ होते हैं । हर सपना अपने भीतर कुछ