कल और आज
0कल और आज के बीच का यह पल मेरा है और यही वह समय है जिसमें मैं उस सचाई से परिचित हुई हूँ कि मैं वो नहीं जो कुछ करती
योग सूत्र के अनुसार अविद्या , अस्मिता , राग-द्वेष के कारण जीव को दुःख प्राप्त होता है | उपनिषदों के अनुसार के कण-कण में सत् चित् आनंदस्वरूप परमात्मा ही सर्वत्र हैं तो
स्वामी रामदास का यह नियम था कि वे स्नान एवं पूजा से निवृत्त हो भिक्षा मांगने के लिए केवल पांच ही घर जाते थे और कुछ न कुछ लेकर ही
‘‘श्रद्धा भाव है श्राद्ध’’| पितर हमारे किसी भी कार्य में अदृश्य रूप से सहायक की भूमिका अदा करते। क्योंकि अन्ततः हम उन्हीं के तो वंशज हैं। ज्योतिष विज्ञान की मान्यता
कल और आज के बीच का यह पल मेरा है और यही वह समय है जिसमें मैं उस सचाई से परिचित हुई हूँ कि मैं वो नहीं जो कुछ करती
योग सूत्र के अनुसार अविद्या , अस्मिता , राग-द्वेष के कारण जीव को दुःख प्राप्त होता है | उपनिषदों के अनुसार के कण-कण में सत् चित् आनंदस्वरूप परमात्मा ही सर्वत्र हैं तो
स्वामी रामदास का यह नियम था कि वे स्नान एवं पूजा से निवृत्त हो भिक्षा मांगने के लिए केवल पांच ही घर जाते थे और कुछ न कुछ लेकर ही
‘‘श्रद्धा भाव है श्राद्ध’’| पितर हमारे किसी भी कार्य में अदृश्य रूप से सहायक की भूमिका अदा करते। क्योंकि अन्ततः हम उन्हीं के तो वंशज हैं। ज्योतिष विज्ञान की मान्यता
देवर्षि नारद खीझ-से गये थे, क्योंकि तीनों लोकों में राधा की स्तुति हो रही थी। वे स्वयं भी श्रीकृष्ण से कितना प्रेम करते हैं। इसी मानसिक संताप को मन में
मूल्य-बोध धारण किए रहने वालों को इसकी कीमत चुकानी पड़ती रहती है, इसलिए उनका जीना और भी अधिक कठिन हो जाया करता है। हमारे पिता के जीवन में कठिनाइयों का अभाव
लडाई लड रही हूँ /मैं भी अपनी /शस्त्र उठाये बिन खुद को मारकर/जीवन चिता पर लेटे लेटे. गाँधी का उदाहरण सत्याग्रह, बहिष्कार/तज देना सब कुछ अपने तन, मन से॥ ऐसा ही
आदमी रास्ता चलने में थोड़ा ढीला होकर इधर-उधर कहीं हो जाये तो उसका पैर मोच जाता है। दूसरा आदमी दीवाल में अपना पैर मार दे तो दीवाल ढह जाती है।
एक बार डॉ. बशीर बद्र के मुखारविंद से दूरदर्शन पर उनकी ही पंक्तियाँ सुनीं.पंक्तियाँ कुछ इस तरह से थीं-जबसे मैं चला हूँ मंजिल पर मेरी नजर है,रस्ते में मील का
कभी किसी खुले मैदान में बैठिये,फुर्सत के पलों में,और देखिये अपने इर्द गिर्द तो अजीब प्रश्न आते है मन में ,इतना ऊँचा आकाश जिसकी कोई थाह नहीं उसपे कभी ध्यान