Archive for category: जीवन

कल और आज

0 देवी नागरानी / 2012/01/22 3:25 pm

कल और आज के बीच का यह पल मेरा है और यही वह समय है जिसमें मैं उस सचाई से परिचित हुई हूँ कि मैं वो नहीं जो कुछ करती

संतुलित जीवन

0 जनोक्ति डेस्क / 2011/12/08 12:13 am

योग सूत्र के अनुसार अविद्या , अस्मिता , राग-द्वेष के कारण जीव को  दुःख प्राप्त होता है | उपनिषदों के अनुसार के कण-कण में सत् चित् आनंदस्वरूप परमात्मा ही सर्वत्र हैं तो

भिक्षा बनी रोशनी : स्वामी रामदास

0 बरुण कुमार सिंह / 2011/10/26 11:19 pm

स्वामी रामदास का यह नियम था कि वे स्नान एवं पूजा से निवृत्त हो भिक्षा मांगने के लिए केवल पांच ही घर जाते थे और कुछ न कुछ लेकर ही

‘‘श्रद्धा भाव है श्राद्ध’’

‘‘श्रद्धा भाव है श्राद्ध’’

1 सौरभ मालवीय / 2011/09/25 12:43 am

‘‘श्रद्धा भाव है श्राद्ध’’| पितर हमारे किसी भी कार्य में अदृश्य रूप से सहायक की भूमिका अदा करते। क्योंकि अन्ततः हम उन्हीं के तो वंशज हैं। ज्योतिष विज्ञान की मान्यता

प्रेम की स्तुति

0 बरुण कुमार सिंह / 2011/09/20 5:50 pm

देवर्षि नारद खीझ-से गये थे, क्योंकि तीनों लोकों में राधा की स्तुति हो रही थी। वे स्वयं भी श्रीकृष्ण से कितना प्रेम करते हैं। इसी मानसिक संताप को मन में

मरना कठिन है, पर जीवित रहना उससे अधिक कठिन होता है।

0 Dadu / 2011/09/04 8:00 pm

मूल्य-बोध धारण किए रहने वालों को इसकी कीमत चुकानी पड़ती रहती है, इसलिए उनका जीना और भी अधिक कठिन हो जाया करता है। हमारे पिता के जीवन में कठिनाइयों का अभाव

चक्रव्यूह

चक्रव्यूह

2 देवी नागरानी / 2011/08/24 8:52 pm

लडाई लड रही हूँ  /मैं भी अपनी /शस्त्र उठाये बिन खुद को मारकर/जीवन चिता पर लेटे लेटे. गाँधी का उदाहरण सत्याग्रह, बहिष्कार/तज देना सब कुछ अपने तन, मन से॥ ऐसा ही

आदमी

0 जयराम "विप्लव" / 2011/08/08 2:24 pm

आदमी रास्ता चलने में थोड़ा ढीला होकर इधर-उधर कहीं हो जाये तो उसका पैर मोच जाता है। दूसरा आदमी दीवाल में अपना पैर मार दे तो दीवाल ढह जाती है।

ना तो कारवां की तलाश है ना तो रहगुजर की तलाश है

1 ब्रज किशोर सिंह / 2011/06/19 3:29 pm

एक बार डॉ. बशीर बद्र के मुखारविंद से दूरदर्शन पर उनकी ही पंक्तियाँ सुनीं.पंक्तियाँ कुछ इस तरह से थीं-जबसे मैं चला हूँ मंजिल पर मेरी नजर है,रस्ते में मील का

क्या आकाश सच में ऊँचा है ?

0 मनीष राय / 2011/06/14 7:40 pm

कभी किसी खुले मैदान में बैठिये,फुर्सत के पलों में,और देखिये अपने इर्द गिर्द तो अजीब प्रश्न आते है मन में ,इतना ऊँचा आकाश जिसकी कोई थाह नहीं उसपे कभी ध्यान