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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; प्रकृति</title>
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	<description>राज-समाज और जन की आवाज</description>
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		<title>जनविरोधी विनाशोन्मुखी अनियंत्रित विकास के परिणाम</title>
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		<pubDate>Sun, 25 Jul 2010 06:28:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अरविन्द विद्रोही</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5179" title="destructive constrution" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/destructive-constrution-300x268.jpg" alt="" width="300" height="268" />विकास की अंधाधुंध दौड़ में मानव जाति अपने विनाश की आधारशिला पर एक के बाद एक पत्थर रखती जा रही है। पर्यावरणीय दृष्टिकोण से ग्राम्यांचलों की स्थिति अभी भी बेहतर है। कस्बे और शहर विकसित होने के साथ साथ जल, शुद्ध हवा और स्वास्थ्य जैसी समस्याओं से जूझ रहें हैं। ग्राम्य अंचलों में जल के भूमिगत् श्रोतों में कमी एक बड़ी समस्या है। नदी-पोखरों का संरक्षण अत्यन्त आवश्यक है। व्यक्तिगत स्वार्थ के चलते जल के पारम्परिक श्रोतों को पाटने के चलन ने बड़ी विकट स्थिति पैदा कर दी है। ग्रामीण क्षेत्र आज भी शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार जैसी आवश्यक जन सुविधाओं से वंचित हैं। ग्राम्य विकास का धन भ्रष्टाचारियों के काकस के चलते व्यक्तिगत् तिजोरियों मे। भरा जा रहा है। गावों में आपसी रंजिश की बड़ी वजह पानी निकासी की समुचित व्यवस्था न होना, सम्पर्क मार्गो का व्यवस्थित न होना तथा भूमि सम्बन्धी मामलों में त्वरित निर्णय न होना है। भ्रष्टाचार का दानव विकास का धन किस प्रकार लीलता जा रहा है, यह सर्वविदित है। सरकारी योजनायें लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के कारण अपना जन कल्याणकारी स्वरूप पूर्ण नहीं कर पाती हैं। और लोकतंत्र में सरकारें बगैर जन सहयोग एवं जन दबाव के योजनायें बनाने के अलावा कर भी क्या सकती है।? सिर्फ शासन-प्रशासन को दोषी ठहराने से हमारे मुल्क को हम तरक्की के शीर्ष स्तर पर नहीं ले जा सकते।</p>
<p style="text-align: justify;">जरा आइये, शहरी क्षेत्रों के विकास की योजनाओं की वस्तु-स्थिति की बात करें। शहरी आवासीय व्यवस्था के तहत सड़क-पार्क-सार्वजनिक उपभोग की भूमि-सभागार आदि सुविधाओं की व्यवस्था होती है या जगह छूटी होती है। सुगम आवागमन के लिए प्रत्येक आवास को सड़क से जोडा जाता है। पार्कों की अवस्थापना बच्चों, बुजुर्गों, स्थानीय जनता के टहलने, विश्राम करने और शुद्ध वायु के उत्सर्जन के उद्देश्यों हेतु किया जाता है। नगरीय क्षेत्रों में सामाजिक, वैवाहिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन हेतु सार्वजनिक उपभोग की भूमि या सभागार होते हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि-शासन द्वारा चिन्हित एवं स्वीकृत हमारे लिए स्वीकृत एवं निर्धारित इन जन-सुविधाओं पर डाका कौन और कैसे डालता है? यह जन-उपयोगी सुविधायें नागरिकों के लिए ही उपलब्ध कराई जाती हैं या निर्धारित होती हैं। फिर ऐसा क्यों होता है कि तंग सड़के, फुटपाथों पर अतिक्रमित दुकानें, सड़कों पर अवैध निर्माण व कब्जे, पार्कों की भूमि पर अवैध कब्जे, पार्कों के सौन्दर्यीकरण एवं रख-रखाव के प्रति अरूचि, गन्दी नालिया दिखती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">शहरी नागरिक भी अपनी मूलभूत सुविधाओं को स्वयं क्षरित भी करता है तथा किंकर्तव्य-विमूढ़ होकर इन्ही सुविधाओं को लुटता हुआ देखता भी, और मौका पाते ही लूटता भी है। उसके देखते ही देखते उसके लिए बनाई गई सुविधायें लुटती रहती है और वो खामोशी अख्तियार किये रहता है।भ्रष्टाचारियों, अपराधियों, माफियाओं, मानवता के दुश्मनों एवं पूंजी के पुजारियों के आगे बेबस जन साधारण घुटता रहता है। यदि कोई हिम्मत करके इन समाज विरोधियों के क्रिया-कलापों की शिकायत प्रशासन से करता है तो अधिकतर मामलों में शिकायत कर्ता को धमकी-प्रलोभन के दौर से गुजरना पड़ता है। शिकायत तो साधारणतया दूर नहीं होती, हां शिकायत कर्ता को परेशानिया और जाँचकर्ता को बैठे-बिठाये मलाई जरूर मिल जाती है। रोटी-रोजी के चक्कर में फंसा नागरिक जनसुविधाओं के लिए संघर्ष की सोच भी नहीं पाता। असुविधाओं का ठीकरा सरकार के मत्थे फोड़ कर अपने दायित्व से मुंह चुराने का अभ्यस्त हो चुका आम नागरिक सिर्फ अपने-अपने परिवार के बारे में सोच रहा है। राजनैतिक दलों के द्वारा जनहित के कार्यों को अपनी प्राथमिकता में न रखने का कारण सिर्फ यही है कि जनता भी वोट देते समय किये गये कार्यों के स्थान पर जातिगत आधार पर एवं पूंजी के अंधाधुंध वितरण, प्रयोगकर्ता, बाहुबली को चयनित करती आ रही है। जातिगत आधार पर, बाहुबल के इस्तेमाल व प्रभाव से, धन के इस्तेमाल से चयनित जनप्रतिधि अपने मूल आधार को बढ़ाते हैं। यदि जनसमस्याओं के लिए लड़ने वाले लोग जनप्रतिनिधि निर्वाचित होने लगें तो वे स्वाभाविक रूप से जनहित के कार्यों को करते हुए अपना आधार व जनविश्वास बढ़ायेंगे । मॅंहगाई के खिलाफ जिस तरह से जनता ने अपना आक्रोश भारत बन्द को सफल बना कर प्रदर्शित किया है, उससे जनहित को नजरअंदाज करना सरकारों के लिए चेतावनी है। अब यह आक्रोश व्यवस्था परिर्वतन तक बना रहे यह अत्यन्त आवश्यक है। सरकार के रवैये ने जनाक्रोश की ज्वाला में घी डाल दिया है। अपने सत्ता के अहंकार में मदमस्त मंत्री का बढ़ी कीमतों की वापसी के विषय में इंकार जन भावनाओं को कुचलने सरीखा है। मॅंहगाई रोकने में नाकाम सरकार विकास के नाम पर मनमानी कर के जनता को ठेंगा दिखाती है। सरकारों का पूरा ध्यान नोट व वोट बटोरने की रणनीति बनाना व विपक्षी दलों को, जनता को धकियाने में लगा रहता है।</p>
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		<title>बन्दरों को भोजन न दें !</title>
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		<pubDate>Sat, 24 Jul 2010 11:46:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ राजेश कपूर</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5108" title="monkey in india" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/monkey-in-india-300x203.jpg" alt="" width="300" height="203" />सरकार के आह्वान पर ध्यान देना चाहिए। खेती को खत्म करने की अनेक योजनाओं में से एक हैं बन्दरों का सदुपयोग। हजारों साल से किसान और बन्दर दोनों अपने-अपने अस्तित्व को बनाए हुए थे। अनायास बन्दर खेती के लिए मुसिबत बन गए। समस्या इतनी विकराल हो गई कि हजारों किसानों को खेती छोड़नी पड़ गई हैं। उनकी आर्थिक स्थिति पहले ही अच्छी नहीं थी, अब और बिगड़ गई। हिमाचल के हजारों एकड़ खेत खाली पड़े हैं जो किसानों की दुर्दशा की कहानी कह रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">नासमझी भरे वृक्षारोपण ने स्थिति को बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई है। वन विभाग द्वारा वनों में फलदार जंगली पौधे लगाए जाते तो हालत इतनी न बिगड़ती। बन्दरों को वनों में खाने को कुछ न कुछ मिलता रहता तो सन्तुलन बना रहता।</p>
<p style="text-align: justify;">ध्वनि प्रदूषण और इलैक्ट्रो मैग्नैटिक तरंगों की अत्यधिक सघनता के कारण बन्दरों में भी मनुष्यों की तरह तनाव और काम वासना की वृ(ि विचारणीय है।</p>
<p style="text-align: justify;">विदेशी षड्यन्त्र:- बन्दरों की संख्या अविश्वसनीय रूप में बढ़ी है। हजारों साल के इतिहास में ऐसा पहले कभी होने की जानकारी नहीं मिलती। खेती को कब्जाने, किसानों को खेती दूर भगाने की क्या कोई कुटिल चाल हो सकती है? हमें भूलना नहीं चाहिए कि बाजार में ऐसे फैरोन्ज, हारमोन्ज उपलब्ध है  जिन के लगाने, छिड़कने के प्रभाव से स्त्री-पुरुष एक दूसरे की ओर जबरदस्त आकर्षण अनुभव करते हैं। होमोसैक्सुअल बना देने वाला सिंड्रोम सैनिकों में फैलाने की खबरें आ चुकी है ।  क्या बन्दरों में काम भावना और प्रजनन अभूतपूर्व गति से बढ़ाने के लिये किन्हीं विशेष हार्मोन, सिण्ड्रोम या तरंगों का प्रयोग किया गया होगा? बन्दरों के जीवन चक्र का गहराई से अध्ययन करके इस तरह के शरारती प्रयास करना असम्भव नहीं। इन कामों में अमेरिका का काफी नाम है।</p>
<p style="text-align: justify;">बन्दरों को भोजन क्यों न दें?</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय जनमानस में बन्दरों के प्रति श्रद्धा के कारण उन्हें आहार देने की परम्परा बहुत पुरानी है। पिछले कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति बन्दरों की संख्या के साथ-साथ बढ़ी है। भोजन के आकर्षण में सड़कों के आसपास सिमट आए हजारों बन्दरों को यात्रियों द्वारा फैका आहार मिलते रहने से वे खेतों से दूर रहेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">बन्दरों को यात्रियों द्वारा फैंका आहार मिलता रहे तो कृषि और कृषकों के लिए बन्दरों का आतंक काफी कम हो जाता हैं। पर लगता है कि सरकार ;सभी दलों कीद्ध को किसानों की मुसीबतों से कोई वास्ता नहीं। उन्हें सड़कों पर बन्दरों का होना पसन्द नहीं या फिर किसानों की मुसीबतें बढ़ाने की गुप्त योजना में अनजाने में वह भागीदार बन रही है? अतः यदि आप भी सरकार के इस प्रयास के समर्थक हैं, खेती को उजाड़ना चाहते हैं तो बन्दरों को आहार न दें, विदेशी शक्तियों के उद्देश्यों की पूर्ति में हाथ बटाएं और सरकारी प्रयास में सहयोग करें। ताकि सड़कों पर सिमट आए बन्दर  गांवों में जाकर खेती को उजाड़े, वहां की औरतों बच्चों को आतंकित करें और उनका जीवन दूभर कर दें। आखिर किसान को उसकी जमीन से जुदा करने का काम कोई आसान बात नहीं है। काफी कुछ करना पड़ेगा। तो आप इस में भागीदार बन रहें हैं न? हमारे विदेशी आका तभी तो 10-15 रुपए का आटा 50 या 60 रुपए का बेच पाएंगे। बाकी अनाज की भी यही हालत होगी। अविश्वास करने की नासमझी न करें। मुफ्रत का पानी 10-12 रुपए लीटर लेकर पीने पर वे आपको बाध्य कर सकता है तो और भी बहुत कुछ सम्भव है। इसी दृष्टि से बढ़ते बन्दरों के आतंक और इस पर ढीली-ढाली सरकारी नीतियों को देखें।</p>
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		<title>मोनसेंटो के विनाशकारी मक्का बीज</title>
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		<pubDate>Mon, 19 Jul 2010 09:21:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ राजेश कपूर</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-4780" title="monsanto-skull-and-bones" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/monsanto-skull-and-bones.jpg" alt="" width="344" height="300" />विनाशकारी ‘‘बीटी कॉटन ’’ बीज की निर्माता कम्पनी मौनसेण्टों ने हिमाचल में भी अपने पांव तेजी से पसारने शुरू कर दिये हैं। ‘‘डिकाल्ब’’ नामक  मक्का बीज मण्डी, हमीरपुर के बाद अब प्रदेश के कई भागों में उगाने शुरू हो गए हैं। इन बीजों का मिट्टी, मनुष्यों और पर्यावरण पर कितना और कैसा बुरा प्रभाव होना है, यह तो आने वाला समय बतलाएगा। पर इस कम्पनी के पिछले कार्यों को देखकर ऐसी आंशका स्वाभाविक है कि ये बीज कई प्रकार से हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं। इस कम्पनी की कार्यशैली और प्रकृति की थोड़ी जानकारी भी इसके प्रति आशंकाओं और सन्देहों को पैदा करने के लिए काफी है।</p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिका के कहने पर विश्वभर में बदनाम इस कम्पनी ने वियतनामियों पर छिड़कने के लिए अजेण्ड औरेंज नामक हत्यारा रसायन बनाया था जिसे छिड़कर अमेरीका ने हजारों वियतनामियों की निर्गम हत्या की थी। जंगल के वृक्ष, पशु-पक्षी  तक इस छिड़काव से समाप्त हो गए थे।</p>
<p style="text-align: justify;">विषैले रसायन बनाने वाली अमेरिका की इस बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने विश्व के बीज बाजार और आहार पर कब्जा करने का अभियान छेड़ा हुआ हैं। बीटी कॉटन  जैसा हानिकारक कपास का बीज बनाने के पीछे ‘‘एजेण्ट आरेंज’ बनाने जैसा उद्देश्य होने की आशंकाओं को नकारा नहीं जा सकता। ये बीज और इसकी उपज इतनी जहरीली है कि अनेक कपास उगाने वाले प्रदेशों  में ‘‘बीटी कपास’’ के खेतों में चरने से हजारों भेड़ों की मृत्यु हो गई। पंजाब के दर्जनों किसान ऐसे मिले जो इस कपास की टहनियां उठाने से बीमार पड़ गए। उनके शरीर सूज गए और जलन तथा खारिश होने लगी। इस कपास के बने वस्त्र कितने मारक प्रभाव वाले होंगे, इसका कुछ अनुमान लगाया जा सकता हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">विचारणीय बात यह है कि केवल कीट नियंत्रण के लिए ऐसी जहरीली कपास का बीज बनाया गया या निशाने कहीं और भी हैं? वियतनामियों को सीधे-सीधे मारने की क्रूरता से मिली बदनामी के बाद अब चुपके-चुपके चालाकी से हमें मारने की कोई योजना चल रही क्या? एक तीर, दो शिकार। विश्व बाजार में कपास के व्यापार में कब्जा करने के लिये भारत जैसे शक्तिशाली प्रतियोगी को पछाड़ने का उपाय तो नहीं?  इस कपास में आम पर पैदा होने वाले वे कीट आ जाते हैं जो हजारों साल के इतिहास में नहीं आए थे।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसी बदनाम कंम्पनी द्वारा बनाये मक्की के बीजें को बढावा देना खतरे से खाली नही। इस कंम्पनी की कारगुज़ारियों से अनजान हिमाचल सरकार पिछले कई साल से प्रदेश के किसानें को ‘डिकाल्ब डबल’ नामक मोनसेण्टो का बीज सब्सिडी पर बो रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘हैती’ जैसे निर्धन देश ने भी इस कंम्पनी का दान में मिला मक्की का बीज स्वीकार नहीं किया और जला दिया। फ्रांस में न्यायालय के आदेश से इस कम्पनी का खेतों में लगा मक्की का बीज नष्ट कर दिया गया। इस कंम्पनी के बनाए मकई को खाने से लीवर, गुर्दे, हृदय आदि अंग खराब होने के अनेकों शोध सामने आए हैं। स्वतंत्र शोधों यह बात भी सामने आई है कि इन तथाकथित समुन्नत बीजों से धीरे-धीरे या एकदम उपज घट जाती है। अतः उपज बढ़ने के दावे भी सही नहीं हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">सबसे बडा खतरा है हमारी पारम्परिक मक्के  के विनाश का। मोनसेण्टो की मक्की के पोलन से परम्परिक बीज नष्ट होना सुनिश्चित होता है, पिछले अनेक अनुभव इसका प्रमाण हैं। सारे संसार के आहार और बीज संम्पदा पर कब्जा करने के लिये कुख्यात इस कंम्पनी का असली निशाना हमारे बीज ही हैं, आज के वैश्विक परिदृष्य को समझने वाला कोई भी व्यक्ति इस बात को आसानी से समझ सकता है। अतः इसे बढावा देना एक बड़े विनाश की भूमिका सिद्ध हो सकता है।</p>
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		<title>गंगा रक्षा, भारत रक्षा, अभी वक्त है चेतो भारतवासियो</title>
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		<pubDate>Sun, 18 Jul 2010 06:22:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राजेश त्रिपाठी</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-4862" title="Ganga River Pollution" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/GangesRiverPollution009-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" />पुण्य सलिला सुरसरी, पतितपावनी, जगउद्धारिणी गंगा जिसका हर भारतवासी से जन्म से लेकर मरण तक का अटूट नाता है।  जिसे श्रद्धा से  गंगा मैया कह कर बुलाते हैं और जो जाने कितनी संस्कृतियों की साक्षी और इतिहास की गवाह है। जिसके तट पर संस्कृतियां जन्मी, जिसने सदियों से जमाने का हर दर्द सहा फिर भी लोगों में बांटती रही अमृत। वह गंगा जिसके बारे में कहा जाता है-गंगा ही हिंदुस्तान, हिंदुस्तान है गंगा, सच पूछो तो इस देश की पहचान है गंगा। आज उसी गंगा की पहचान खो रही है। सदियों से भारतवर्ष की जीवनरेखा रही सुरसरी की अपनी सांसें फूल रही हैं, घुट रहा है उसका दम। गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक उसमें घोला  रहा है जहर और वह अब प्रदूषण के पंक में डूब कर अपनी पहचान ही खोती जा रही है। साल दर साल सिकुड़ता जा रहा है उसका आंचल। अपने किनारे उग आयी जाने कितनी औद्योगिक इकाइयों के गलीज, विषैले कचड़े को लीलने को विवश है हमारी मां गंगा। चाहे कानपुर में चमड़े का शोधन करने वाली टेनरियां हों या गंगा किनारे बसे कुल 2073 कस्बे और शहर सभी के गंदे नालों का पानी बिना शुद्ध किये सीधा गंगा में जाता है। शहरों-कस्बों की इस गंदगी ने गंगा के 75 प्रतिशत पानी को प्रदूषित कर दिया है। इसके अलावा उसमें पड़ने वाले औद्योगिक कचड़े स्थिति और शोचनीय कर दी है। इससे अमृत  जैसा गंगा का पानी विष में बदल गया है।  केद्र सरकार की एक रिपोर्ट ही यह दरशाती है कि ऋषिकेश से लेकर गंगासागर तक का गंगा का पानी मनुष्य के पीने लायक नहीं रहा। यहां तक कि मनुष्य इसमें स्नान तक नहीं कर सकता। वैज्ञानिक मानते हैं कि इसमें नहाने से कैंसर व अन्य बीमारियों के होने का खतरा है। वही गंगाजल जिसके बारे में यह प्रसिद्ध था कि इसे वर्षों रखे रहो पर इसमें कीड़े नहीं पड़ते आज विषैला हो गया है कि अब मानवों के प्रयोग लायक नहीं रहा जो वर्षों से इसे पूजा अर्चना स्नानादि में काम में लाते रहे हैं। औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ का खामियाजा, इसका अपने हिस्से का दुख भोगने को गंगा भी विवश है। हम इसे अकाल मौत की ओर बढ़ते देख रहे हैं, किंकर्तव्य विमूढ़ हैं क्योंकि जिनके हाथों में सत्ता है उन्हें अपने राजनीतिक दांवपेचों से फुरसत नहीं। गंगा की सोचने के लिए उनके पास वक्त कहां। गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की प्रधानमंत्री की मंशा सराहनीय और साधुवाद की परिचायक है  लेकिन गंगा को अकाल मौत से बचाने के लिए कोई सार्थक प्रयास सत्वर और नितांत आवश्यक है। इसके बिना गंगा नहीं बचेगी और अगर गंगा के अस्तित्व पर संकट आया तो यह संकट देश पर भी होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार ने गंगा के प्रदूषित पानी के बारे में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जरिये जो अध्ययन करवाया था उसके अनुसार ऋषिकेश से पश्चिम बंगाल तक कुल 23 जगहों से गंगा के पानी के नमूने लेकर उनका परीक्षण किया गया और पाया गया कि इन नूमनों में से कहीं का भी पानी मनुष्य के पीने योग्य यानी प्रथम श्रेणी का नहीं है। ऋषिकेश का पानी दूसरे दर्जे का यानी स्नान लायक पाया गया। हरिद्वार तक पहुंचते-पहुंचते वही पानी तीसरे दर्जे का हो गया जिसे शुद्धीकरण के बिना प्रयोग ही नहीं किया जा सकता। यह हाल है गंगा के उस पानी का जो कभी अमृत माना जाता था। आज वह स्नान लायक भी नहीं रहा। गंगा शुद्धीकरण के</p>
<p style="text-align: justify;">अब तक सभी प्रयास ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हुए हैं। यही वजह है कि इनका कोई फल सामने नहीं आया। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए 1985 में गंगा एक्शन प्लान के बैनर में एक योजना बनायी गयी थी जिसके तहत गंगा में गिरने वाले औद्योगिक कचड़े और शहरी सीवेज को रोकने के लिए वाटर ट्रीटमेंट प्लांट आदि लगाने की योजना बनायी गयी थी। इस प्लान में 2000 करोड़ रुपये स्वाहा हो गये लेकिन गंगा प्रदूषण मुक्त होने के बजाय और भी प्रदूषित हो गयी।</p>
<p style="text-align: justify;">अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस समस्या को गंभीरता से ले रहे हैं। उनकी अध्यक्षता में हुई गंगा बेसिन अथॉरिटी की बैठक में गंगा के शुद्धीकरण के बारे में विचार-विमर्श किया गया। इस अथॉरिटी में उन पांच राज्यों को शामिल किया गया है जिनके पास से गंगा बहती है। इस बैठक में प्रधानमंत्री ने यह कहा कि गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के इस कार्य में आने वाले खर्च का 70 प्रतिशत व्यय केंद्र सरकार देगी और 30 प्रतिशत संबंधित राज्यों को वहन करना होगा। इस योजना को किस तरह से लागू किया जायेगा यह रूपरेखा अभी योजना आयोग को बनानी है। इस योजना में गंगा के अलावा उसकी सहायक नदियों को भी प्रदूषण मुक्त करना शामिल है ताकि प्रदूषण के उत्स को ही नष्ट किया जा सके। बक्सर, पटना, मुंगेर, भागलपुर आदि का गंगा जल तीसरे दर्जे का है। यह ऐसा है कि इसका प्रयोग सिर्फ शुद्धीकरण के बाद ही किया जा सकता है। वाराणसी, कानपुर, इलाहाबाद का गंगा जल तो सिर्फ जानवरों के पीने लायक ही रह गया है। गंगा प्राणदायिनी है, देश की आधी आबादी की प्यास यही बुझाती है। खेतों और दियारा में हर साल नयी मिट्टी लाकर धरती पर सोना उपजाती है गंगा। इस तरह यह अन्नदायिनी भी है। यह सूखी तो सूख जायेंगे खेत, सूख जायेंगी न जाने कितनी जिंदगियां। गंगा को सर्वाधिक प्रदूषित करते हैं शहरों की गंदी नालियां। रही-सही कसर औद्योगिक इकाइयों से निकता कचड़ा पूरी कर देता है। हमारे देश में औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ के आगे आम जनता के हित-अनहित की बात नहीं सोची जाती। आज हम औद्योगिक इकाइयों से निकले प्रदूषित कचड़े को शुद्ध कर गंगा में डालने की बात कर रहे हैं लेकिन जब ये औद्योगिक इकाइयां स्थापित की गयीं तो उनको यह निर्देश क्यों नहीं दिये गये कि वे अपने औद्योगिक कचड़े के ट्रीटमेंट के लिए संयंत्र लगायें तभी उन्हें लाइसेंस दिया जायेगा? जिन अधिकारियों ने इनको लाइसेंस दिये उन्होंने पहले इस बात का जायजा क्यों नहीं लिया कि इससे परिवेश और पर्यावरण के लिए क्या-क्या संकट आ सकते हैं? उनकी इस उदासीनता का कारण क्या था? कौन सी ऐसी मजबूरी थी कि उन लोगों ने उस वक्त यह नहीं सोचा कि औद्योगिक कचड़ा एक दिन गंगाजल की प्राणवायु ही छीन लेगा? उनके सामने ऐसा क्या दबाव या प्रलोभन रहा होगा जिसके चलते उन्होंने देश की जीवनरेखा गंगा को ही दांव पर लगा दिया? ऐसे जाने कितने और भी सवाल हैं जो आज देश की जनता के जेहन में हैं। वह गंगा को तिल-तिल कर मरता देख रही है और सोच रही है कि आखिर वे कौन से खलनायक हैं जिन्होंने गंगा को इस हाल तक पहुंचने दिया है। हम आज गंगा के शुद्धीकरण की बात करते हैं वही गंगा जो और को तारती है आज खुद अशुद्ध है और आज उनकी ही मुंहताज है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसे दूषित करने के गुनहगार हैं। आज तक जितने सरकारें हुईं, किसी ने भी गंगा के बारे में गंभीरता से सोचा हो ऐसा नहीं लगता। लगता है कि सबने इसे सिर्फ एक नदीं के रूप में देखा और माना जिसके मरने या बचने से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन गंगा नदी नहीं एक पावन सरिता है, वह जीवनधारा है, जीवन शैली है। ऋषियों मुनियों ने इसमें अवगाहन कर मोक्ष पाया। सदियों से यह पतित पावनी और सुरसरि यानी देव सरिता कहलाती रही है। इसे वही सम्मान मिलना चाहिए। यह मां है और इसे बचाना हर देशवासी का कर्तव्य है। अब तक जो भूल हुई है उसका दुष्परिणाम हमारे सामने है। हम पुण्य सलिला गंगा को कीचड़ और गलीज से सनी नदी के रूप में बदलते देख रहे हैं और दुखी हो रहे हैं यह सोच कर कि एक संस्कृति, एक जीवनधारा एक समृद्ध, पुनीत इतिहास हमारे सामने धीरे-धीरे विलुप्त होने की दिशा में बढ़ रहा है। भगीरथ कठिन तप कर गंगा को धरा पर लाये थे ताकि उनके पूर्वज सगर पुत्र तर सकें। उनकी लायी सुरसरी उसके बाद से सदियों से जगत को तार रही है लेकिन हमने इसकी रक्षा नहीं की और यह सूखी तो फिर कोई भगीरथ नहीं आयेगा धरती पर गंगा को दोबारा लाने के लिए। तब अनर्थ के सिवा और कुछ नहीं होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">गंगा में जगह-जगह बांध बनाये गये हैं जिनसे विद्युत उत्पादन हो रहा है और खेतों की सिंचाई में भी उसके पानी का इस्तेमाल हो रहा है। यमुना नदी जिसका प्रदूषण दिल्ली में चरम स्तर पर है अपने प्रदूषित जल के साथ गंगा में इलाहाबाद के संगम में मिलती है। इसके अलावा दूसरी प्रदूषित नदियां भी गंगोत्री से गंगासागर तक के गंगा के मार्ग में विभिन्न स्थानों पर उससे मिलती हैं और उसके प्रदूषण का स्तर और बढ़ाती चलती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">पता नहीं देश जीवनदायिनी गंगा के प्रति उदासीन क्यों हो गया है। गंगा जो इस देश का आधार और इसकी संस्कृतियों की संवाहक है। वैसे इस अंधेरे में भी प्रकाश की किरणें नजर आ रही हैं जो सुखद संकेत है। देश के विभिन्न हिस्सों में गंगा के प्रदूषण के प्रति जनमानस में चिंता जगाने, उन्हें गंगा की रक्षा में प्रवृत्त करने की दृष्टि से कई प्रयास किये जा रहे हैं। इनमें ही एक गंगा आरती है जो हरिद्वार के परमार्थ आश्रम में वर्षों से होती आ रही है। बनारस में भी होती है पिछले कुछ दिनों से हावड़ा के रामकृष्णपुर घाट में भी अशोक पांडेय के नेतृत्व में कुछ उत्साही लोगों ने ऐसी ही आरती शुरू की है जिसका उद्देश्य गंगा के प्रदूषण के बारे में जन जागरण फैलाना है। माना कि ऐसे प्रयासों से गंगा प्रदूषण मुक्त नहीं होगी लेकिन इससे गंगा की दुर्दशा के बारे में देश में चिंता जगाने का काम तो किया ही जा सकता है जो संभव है कल एक ऐसे सद्प्रयास में बदल जाये जो गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के सत्कार्य में सहभागी बन जाये। गंगा को भगवान का ही रूप मानने वाले एक महान व्यक्ति हैं केंद्रीय विश्वविद्यालय इलाहाबाद के वनस्पति विज्ञान वित्भाग के वरिष्य़ आचार्य डाक्टर दीनानाथ शुक्ल ‘दीन’ जो गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने के संकल्प ले चुके हैं। उन्होंने कहा है कि गंगा को प्रदूषम मुक्त करा कर ही वे उसमें स्नान करेंगे। वे प्रदर्शनियां लगा कर और गोष्ठियां आदि आयोजित कर गंगा के प्रदूषण और उसके खतरों के बारे में जनजागरण फैलाते हैं और इस अभियान से करोड़ो लोग जुड़ चुके हैं। वे तथा उनकी तरह के अन्य लोगों के प्रयास से यह आशा जगी है कि पावन सुरसरी आज नहीं तो कल अवश्य प्रदूषण मुक्त होगी।गंगा एक्शन प्लान के तहत 1990 तक गंगा को पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त हो जाना था लेकिन वह हुआ नहीं। अभी सरकार से कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि वह योजनाएं बनाने में माहिर होती है उसका कार्यान्वयन जरूरी नहीं कि हमेशा हो और वह भी सुचारू रूप से। ऐसे में देशवासियों को वे जहां हैं वहीं से गंगा को बचाने का प्रयास करना है। अगर कहीं भी ऐसी कोई औद्योगिक इकाई स्थापित होती है जिसका प्रदूषित कचड़ा गंगा में जायेगा तो स्थानीय जनता को अधिकारियों से अनुरोध कर पहले उस कचड़े के शुद्धीकरण का संयंत्र लगवाने की शर्त रखवानी चाहिए। वह बन जाये तभी कारखाने को बनाने की अनुमित दी जानी चाहिए। अगर इस नियम का कड़ाई से पालन हो (जो अभी तक शायद उस तरह नहीं हुआ जैसा होना चाहिए) तो कचड़ा स्वच्छ जल के रूप में गंगा में मिलेगा और इस तरह से उसके प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी। हर नागरिक को गंगासेवक बनना है और गंगा को और नुकसान न पहुंचे इसके लिए चौकस रहना है। ऐसा न हुआ तो गंगा का अस्तित्व मिट जायेगा फिर न पूजा के लिए इसका शुद्ध जल उपलब्ध होगा न इसके तट किसी पावन पर्व में स्नान लायक रह जायेंगे। शायद वह दिन कोई सच्चा हिंदुस्तानी नहीं देखना चाहेगा। क्योंकि गंगा न रही तो फिर सुहागन किससे निहोरा करेगी-गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो सैंया से करदे  मिलनवा। सुहागन की मनकामना पूरी होती रहे, वह अपने सैंयां की सलामती के लिए गंगा मैया में चुनरी चढ़ाती रहे, पुण्य सलिला मां गंगा भारत भूमि पर अपने स्वच्छ अमृतमय जल के साथ अनवरत काल तक अबाध प्रवाहमान रहे यही हम सबकी कामना और प्रार्थना है। देशवासियो जागो, गंगा को बचाओ, गंगा की रक्षा आत्म रक्षा है। गंगा नहीं बची तो भारत का अस्तित्व भी संकट में आ जायेगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><em>गंगा है देश का मान, देश की जान है गंगा। भारत के भारत होने की पहचान है गंगा।</em></p>
<p style="text-align: justify;"><em>जय जय गंगे, जय जय मां गंगे</em><em></em></p>
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		<title>गौवंश,हार्मोन और हम</title>
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		<pubDate>Wed, 14 Jul 2010 04:46:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ राजेश कपूर</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-4514" title="cow (1)" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/cow-1-300x220.jpg" alt="" width="300" height="220" />गौपालकों को भारत की वर्तमान परिस्थियों में अनेकों कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। इन समस्याओं का एक आयाम गौवंश चिकित्सा है। एलोपैथी चिकित्सा के अत्यधिक प्रचार का शिकार बनकर हम अपनी प्रमाणिक पारम्परिक चिकित्सा को भुला बैठे हैं। परिणामस्वरूप चिकित्सा व्यय बहुत बढ़ गया और दवांओं के दुष्परिणाम भी भोगने पड़ रहें हैं। दवाओं से विषाक्त बने मृत पशुओं का मांस खाकर गिद्धों  की वंश समाप्ति का खतरा पैदा हो गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">जरा विचार करें कि इन दवाओं के प्रभाव वाला दूध्, गोबर, गौमूत्रा कितना हानिकारक होगा। इन दवाओं के दुष्प्रभावों से भी अनेकों नए रोग लगते हैं, जीवनी शक्ति घटती चली जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;">दूध् बढ़ाने के लिये दिए जाने वालो ‘बोविन ग्रोथ हार्मोन’ या ‘आक्सीटोसिन’ आदि के इंजैक्शनो से अनेक प्रकार के कैंसर होने के प्रमाण मिले हैं । इन इंजैक्शनों से दूध् में आई जी एफ-1 ;इन्सुलीन ग्रोथ फैक्टर-1 नामक अत्यधिक शक्तिशाली वृद्धि  हार्मोन की मात्रा सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाती है और मुनष्यों में , स्तन, कोलन, प्रोस्टेंट, फेफड़ो, आतों, पैक्रिया के कैंसर पनपने लगते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इलीनोयस विश्वविद्यालय के ‘डा. सैम्यूल एपस्टीन’ तथा ‘नैशनल इंस्टीटयुट’ आॅफ हैल्थ;अमेरीकाद्ध जैसी अनेक संस्थाओं और विद्वानों ने इस पर खोज की है।</p>
<p style="text-align: justify;">ध्यान दें कि जिस हार्मोन के असर से मनुष्यों को कैंसर जैसे रोग होते हैं उनसे वे गाय-भैंस गम्भीर रोगो का शिकार क्यों नही बनेगे ? आपका गौवंश पहले 15-18 बार नए दूध् होता था, अब 2-4 बार सूता है। गौवंश के सूखने और न सूने का प्रमुख कारण दूध् बढ़ाने वाले हार्मोन हैं। आज लाखों गउएं सड़कों पर भटक रही हैं और उनका दूध् सूख गया है तो इसका बहुत बड़ा कारण ये दूध् बढाने वाले हारमोन हैं, इसे समझना होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की</title>
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		<pubDate>Tue, 13 Jul 2010 07:17:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>फ़िरदौस ख़ान</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रकृति]]></category>
		<category><![CDATA[स्वास्थ्य]]></category>
		<category><![CDATA[allopathic drugs]]></category>
		<category><![CDATA[allopathic medicine]]></category>

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		<description><![CDATA[भौतिकवादी संस्कृति ने जहां जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है, वहीं मनुष्य का स्वास्थ्य भी इससे न अछूता रहा हो तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है।... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/13/%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%bc-%e0%a4%ac%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-4540" title="medicine" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/medicine.jpg" alt="" width="320" height="320" />भौतिकवादी संस्कृति ने जहां जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है, वहीं मनुष्य का स्वास्थ्य भी इससे न अछूता रहा हो तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है। दौलत कमाने की चाह ने इंसान को बहुत ज़्यादा व्यस्त कर दिया है। समय के अभाव के कारण व्यक्ति अपनी सेहत की सही देखभाल नहीं कर पाता। बीमार होने की हालत में वह दवाओं का सेवन करके जल्द से जल्द ठीक होना चाहता है, लेकिन कुछ स्वस्थ व्यक्ति भी ख़ुद को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए नियमित रूप से दवाओं का सेवन करते हैं। इंसान का स्वस्थ रहना उसके खान-पान व उसके रहन-सहन पर निर्भर करता है, जबकि वे इसे दवाओं का लाभ समझता है।</p>
<p style="text-align: justify;">अनेक दवाएं ऐसी हैं जो लाभ की बजाय नुक़सान ज़्यादा पहुंचाती हैं। कुछ दवाएं रिएक्शन करने पर जानलेवा तक साबित हो जाती हैं, जबकि कुछ दवाएं मीठे ज़हर का काम करती हैं। कब्ज़ की दवा से पाचन तंत्र प्रभावित होता है। सर्दी, खांसी, ज़ुकाम, सरदर्द और नींद न आने के लिए ली जाने वाली एस्प्रीन सालि सिलेट नामक रसायन होता है, जो श्रवण केंद्रीय के ज्ञान तंतु पर विपरीत प्रभाव डालता है। कुनेन का अधिक सेवन कर लेने पर व्यक्ति बहरा हो सका है। ये दवाएं एक तरह से नशे का काम करती हैं। नियमित रूप से एक ही दवा का इस्तेमाल करते रहने से दवा का असर कम होता जाता है और व्यक्ति दवा की मात्रा में बढ़ोतरी करने लगता है। दवाओं में अल्कोहल का भी अधिक प्रयोग किया जाता है जो कि फेफड़ों को हानि पहुंचाती है।अधिकांश दवाएं शरीर के अनुकूल नहीं होतीं जिससे ये शरीर में घुलमिल कर खाद्य पदार्थों की भांति पच नहीं पाती हैं। नतीजतन, ये शरीर में एकत्रित होकर स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालती हैं। दवाओं में जड़ी-बूटियों के अलावा खनिज लोहा, चांदी, सोना, हीरा, पारा, गंधक, अभ्रक, मूंगा, मोती व संखिया आदि का इस्तेमाल किया जाता है।  इसके साथ ही कई दवाओं में अफ़ीम, अनेक जानवरों का रक्त व चर्बी आदि का भी इस्तेमाल किया जाता है। सल्फ़ा तथा एंटीबायोटिक दवाओं के लंबे समय तक सेवन से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। चिकित्सकों का कहना है कि मेक्साफार्म, प्लेक्वान, एमीक्लीन, क्लोरोक्लीन व नियोक्लीन आदि दवाएं बहुत ख़तरनाक हैं। इनके अधिक सेवन से जिगर व तिल्ली बढ़ जाती है, स्नायु दर्द होता है, आंखों की रोशनी कम हो सकती है, लकवा मार सकता है और कभी-कभी मौत भी हो सकती है। दर्द, जलन व बुख़ार के लिए दी जाने वाली ऑक्सीफ़ेन, बूटाजोन, एंटीजेसिक, एमीडीजोन, प्लेयर, बूटा प्राक्सीवोन, जेक्रिल, मायगेसिक, ऑसलजीन, हैडरिल, जोलांडिन व प्लेसीडीन आदि दवाएं भी ख़तरनाक हैं।  ये ख़ून में कई क़िस्म के विकार उत्पन्न करती हैं। ये दवाएं सफ़ेद रक्त कणों को ख़त्म कर देती हैं। इनसे अल्सर हो जाता है तथा साथ ही जिगर व गुर्दे ख़राब हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">एक फ़ार्मास्टि के मुताबिक़ स्टीरॉयड तथा एनाबॉलिक्स जैसे डेकाडयराबोलिन, ट्राइएनर्जिक आदि दवाएं पौष्टिक आहार कहकर बेची जाती हैं, जबकि प्रयोगों ने यह साबित कर दिया है कि इनसे बच्चों की हड्डियों का विकास रुक जाता है। इनके सेवन लड़कियों में मर्दानापन आ जाता है।जलनशोथ आदि से बचने के लिए दी जाने वाली चाइमारोल तथा खांसी रोकने के लिए दी जाने वाली बेनाड्रिल, एविल, केडिस्टिन, साइनोरिल, कोरेक्स, डाइलोसिन व एस्कोल्ड आदि दवाएं स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालती हैं। इसी तरह एंसिफैड्रिल आदि का मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ता है। एक चिकित्सक के मुताबिक़ दवाओं के दुष्प्रभाव का सबसे बड़ा कारण बिना शारीरिक परीक्षण किए हुए दी जाने वाली दवाओं की निर्धारित मात्रा से अधिक ख़ुराक है। अनेक चिकित्सक अपनी दवाओं का जल्दी प्रभाव दिखाने के लिए प्राइमरी की बजाय थर्ड जेनेरेशन दे देते हैं, जो अक्सर कामयाब तो हो जाती हैं, लेकिन दूसरे असर छोड़ जाती हैं। दवाओं के साइड इफ़ेक्ट भी होते हैं, जिनसे अन्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के के अग्रवाल का कहना है कि स्वस्थ्य रहने के लिए ज़रूरी है कि लोग अपनी सेहत का विशेष ध्यान रखें जैसे अपना ब्लड कोलेस्ट्रॉल 160 एमजी प्रतिशत से कम रखें। कोलेस्ट्रॉल में एक प्रतिशत की भी कमी करने से हृदयाघात में 2 फ़ीसदी की कमी होती है। अनियंत्रित मधुमेह और रक्त चाप से हृदयाघात का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए इन पर काबू रखें। कम खाएं, ज्यादा चलें। नियमित व्यायाम करना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। वॉगिंग सबसे बढ़िया व्यायाम है जो तेज गति से भी अधिक तेज चलने को कहा जाता है। सोया के उत्पाद स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद होते हैं। खुराक में इन्हें ज़रूर लिया जाना चाहिए। जूस की जगह साबुत फल लेना बेहतर होता है। ब्राउन राइस पॉलिश्ड राइस से और सफ़ेद चीनी की जगह गुड़ लेना कहीं अच्छा माना जाता है। फाइबर से भरपूर खुराक लें। शराब पीकर कभी भी गाड़ी न चलाएं। गर्भवती महिलाएं तो शराब बिल्कुल न पिएं। इससे होने वाले बच्चे को नुकसान होता है। साल में एक बार अपने स्वास्थ्य की जांच करवाएं। ज़्यादा नमक से परहेज़ करें।</p>
<p style="text-align: justify;">लोगों को अपने स्वास्थ्य के संबंध में काफ़ी सचेत एवं जागरूक रहने की ज़रूरत है, वरना रोग का इलाज कराते-कराते वे किसी दूसरे रोग का शिकार हो जाएंगे। शरीर में स्वयं रोगों से मुक्ति पाने की क्षमता है। बीमारी प्रकृति के साधारण नियमों के उल्लंघन की सूचना मात्र है। प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखने से बीमारियों  से छुटकारा पाया जा सकता है। प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम करने तथा पौष्टिक भोजन लेने से मानसिक व शारीरिक संतुलन बना रहता है।</p>
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		<title>जलवायु परिवर्तन का कृषि पर प्रभाव</title>
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		<pubDate>Tue, 06 Jul 2010 13:23:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रकृति]]></category>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-4260" title="drought_girl" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/drought_girl.jpg" alt="" width="222" height="203" />पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश ने विभिन्न प्रकार के जलवायु परिवर्तन देखे हैं। जब पूर्वी उत्तर प्रदेश भयंकर बाढ़ की चपेट में था ठीक उसी समय बुंदेलखंड सूखे की मार झेल रहा था। इस जलवायु परिवर्तन के द्वारा न केवल भारी संख्या में लोग मौत का शिकार हो रहे हैं बल्कि इससे उनकी आजीविका पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। पूर्वी- उत्तर प्रदेश में जहाँ धान की सारी फसल बरबाद हो गयी वहीं बुंदेलखंड में स्थानीय फसलों पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है।</p>
<p style="text-align: justify;">कई सारे शोधों और वैज्ञानिकों का मानना है कि उत्तर-प्रदेश गंभीर जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जिसका काफी बुरा असर वहाँ के निवासियों पर पड़ सकता है। वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश की ६२.१२ प्रतिशत जनसँख्या कृषि कार्य से सम्बंधित गतिविधियों में संलिप्त है। उत्तर प्रदेश देश का तीसरा सबसे बड़ा अनाज उत्पादक प्रदेश है। तथा प्रत्येक वर्ष देश के पूरे उत्पादन में करीब २१ प्रतिशत योगदान देता है। उत्तर प्रदेश की जनसँख्या को जितने अनाज की आवश्यकता प्रत्येक वर्ष होती है उससे कहीं ज्यादा अनाज उत्पादन यह प्रदेश हर साल करता है, किंतु मौसम में परिवर्तन की वजह से पिछले कई वर्षों में अनाज उत्पादन में भी परिवर्तन दृष्टिगत हुआ है।</p>
<p style="text-align: justify;">तापमान में सामान्य वृद्धि की वजह से गेंहूँ की फसल का उत्पादन कम हो सकता है। जबकि धान कम तापमान में भी आसानी से उत्पन्न हो सकता है। यद्यपि सरकार तथा विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा वातावरण में हो रहे इस परिवर्तन को रोकने हेतु प्रयास किए गए हें, किंतु ये प्रयास किसानों को तुंरत राहत प्रदान करने वाले ज्यादा रहे हैं , न कि एक स्थाई लाभ देने वाले । इस सम्बन्ध में गोरखपुर एनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप के अध्यक्ष प्रोफेसर डाक्टर शीराज वजीह का कहना है, &#8216; वातावरण में हो रहे इस परिवर्तन की प्रतिकूलता को रोकने हेतु सरकार के साथ-साथ जन- समुदायों को भी स्वदेशी तकनीकी ज्ञान के माध्यम से वैज्ञानिक विधियों को अपनाना चाहिए ।&#8217;</p>
<p style="text-align: justify;">ये स्वदेशी ज्ञान स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध रहते हैं तथा इन्हें अपनाने में ज्यादा आर्थिक सहायता की भी जरूरत नहीं पड़ती। गोरखपुर एनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप द्वारा प्रकाशित एक शोध के मुताबिक उत्तर प्रदेश में करीब ९० प्रतिशत किसान लघु-और सीमान्त दर्जे के हैं जिनकी आजीविका का साधन केवल कृषि है। इन छोटे जोत के कृषकों द्वारा ही प्रदेश को कृषि में महत्वपूर्ण दर्जा प्राप्त है। यदि ये लघु-और सीमान्त कृषक, वातावरण में हो रहे परिवर्तन का इसी प्रकार शिकार होते रहे तो इससे प्रदेश की आजीविका के लिये एक बड़ी विपत्ति खड़ी हो सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">वातावरण में हो रहे इन परिवर्तनों के अनेक कारण हें । हम निजी स्वार्थों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं। नए आर्थिक ज़ोन के नाम पर कृषि योग्य भूमी का औद्योगीकरण किया जा रहा है। सरकार के नीतिगत फैसले कंपनियों के हित में ज्यादा होते हैं। इन सब बातों पर यदि हम गंभीरता पूर्वक नहीं सोचेंगे तो खाद्यान उत्पादन की समस्या गरीबों को और भी गरीबी की तरफ़ धकेलेगी। किसान आत्महत्याओं का दौर और भी बढेगा।</p>
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		<title>स्वदेशी, विदेशी गौवंश का अन्तर</title>
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		<pubDate>Mon, 05 Jul 2010 08:10:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ राजेश कपूर</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवन]]></category>
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		<description><![CDATA[विदेशी गौवंश ‘ए-1’ अनेक खोजो से साबित हुआ है कि अधिकांश विदेशी गौवंश विषाक्त है। आॅकलैण्ड की ‘ए-2, कार्पोरेशन तथा प्रसिद्ध खोजी विद्वान ‘डा. कोरिन लेक् मैकने’ की खोजों के... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/05/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b5%e0%a4%82%e0%a4%b6-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><img class="alignright size-medium wp-image-4207" title="A Jersey cow in a field of grass" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/cow-300x231.jpg" alt="" width="300" height="231" />विदेशी गौवंश ‘ए-1’</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अनेक खोजो से साबित हुआ है कि अधिकांश विदेशी गौवंश विषाक्त है। आॅकलैण्ड की ‘ए-2, कार्पोरेशन तथा प्रसिद्ध खोजी विद्वान ‘डा. कोरिन लेक् मैकने’ की खोजों के अनुसार ‘ए-1’ प्रकार की गौ के दूध में ‘बीटा कैसीन ए-1, पाया गया है जिससे हमारे शरीर में ‘आई जी एफ-१, इन्सुलिन ग्रोथ हार्मोन-१० तरह अधिक निर्माण होने लगता है। यह पहले ही बताया जा चुका है कि ‘आई जीएफ-1’ से कई प्रकार के कैंसर होने के प्रमाण मिल चुके हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>इसके ईलावा-</strong></p>
<p style="text-align: justify;">‘ हैल्थ जनरल’ न्यूजीलैण्ड के अनुसार ‘ए-1’ दूध से हृदय रोग मानसिक रोग, मधुमेह, गठिया, आॅटिज्म (शरीर के अंगो पर नियंत्रण न रहना) आदि रोग होते हैं। सन् 2003 में ‘ए-2’ ‘कार्पोरेशन’ द्वारा किए सर्वेक्षण से पता चला है कि इन गऊओं के दूध् से स्वीडन, यूके, आस्ट्रेलिया, न्यूजिलेंड में हृदय रोग, मधुमेह रोगों में वृद्धि हुई है। फ्रांस तथा जापान में ‘ए-2’ दूध् से इन रोगों में कमी दर्ज की गई है। प्रशन है कि हानिकारक ‘ए-1’ तथा लाभदायक ए-2 दूध् किन गऊओं में है ?</p>
<p style="text-align: justify;">पश्चिमी वैज्ञानिकों के अनुसार ७०% हालिस्टीन, रेड डैनिश और फ्रिजियन गऊएं हानिकारक ‘ए-1’ प्रोटीन वाली है। जर्सी की अनेक जातियां भी इसी प्रकार की है। पर यह स्पष्ट रूप से कोई नहीं बतला रहा कि लाभदायक ‘ए-2’ प्रोटीन वाली गऊएं कौन सी है, कहां है स्वयं जरा ढूंढ़ें। विचार करें!!</p>
<p style="text-align: justify;">ब्राजील में लगभग 40 लाख भारतीय गौवंश तैयार किया गया हैं और पूरे यूरोप में उसका निर्यात हो रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">इनमें अधिकांश गऊएं भारतीय गीर नस्ल और शेष रैड सिंधी तथा सहिवाल हैं। क्या अब बताने की जरूरत है पड़ेगा कि उपयोगी ‘ए-2’ प्रोटीन वाली गऊएं भारतीय है ?</p>
<p style="text-align: justify;">क्या पशुपालन विभाग का दुरूपयोग करके, करोड़ रु. अनुदान देकर, पशु कल्याण के नाम पर भारतीय गौवंश को नष्ट  करने की गुप्त योजना पश्चिमी ताकतें चला रही हैं. भोले भारतीयों को उनका आभास तक नहीं है। दूध् बढ़ाने और वंश सुधार के नाम पर भारतीय गौवंश का बीज नाश ‘कृत्रिम गर्भाधन’  करके कत्लखानों से कई गुणा अधिक भारतीय गौवंश का विनाश आपकी सहमति, सहयोग से, आपके अपने द्वारा हो रह है। गौवंश विनाश यानी भारत का विनाश। धन व्यय करके कृत्रिम गर्भाधन से अपने अमूल्य ‘ए-2’ गौवंश को हम स्वयं नष्ट कर रहें हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">विषाक्त विदेशी गौवंश से बने संकर भारतीय गौवंश से प्राप्त किया घी, दूध्, दही ही नही, गोबर, गौमुत्रा, स्पर्श और निश्वास भी विषाक्त होगा न? दुग्ध् पदार्थो से हमारा स्वास्थ्य बरबाद नही हो रहा क्या? इनके गोबर, गौमूत्रा से बनी खाद और पंचगव्य औषधिया भी परम हानिकारक प्रभाव वाली होगी। हमारी खेती नष्ट होने, पंचगव्य औषधियों के असफल होने, घी, दूध्, दहीं खाने-पीने पर भी स्वास्थय में सुधार होने की बजाए बिगाड़ का बड़ा कारण यह संकर गौवंश हो सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>समाधान सरल है:</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-4208" title="Indian Cow" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/Cow-gomatha_vishnu-296x300.gif" alt="" width="296" height="300" />वर्तमान संकर नसल का गौवंश ‘ए-1’ तथा ‘ए-2’ के संयुक्त गुणों वाला है। इनमें ५०% से ६०% दोनो गुण हों तो स्वदेशी गर्भधन की व्यवस्था से अगली पीढ़ी में ‘ए-1’ २५% दूसरी बार १२%  तथा तीसरी बार ६% रह जाएगा। बिगाड़ने वालों ने सन् 1700 से आज तक 300 साल धैर्य से काम किया, हम 10-12 साल प्रयास क्यों नही कर सकते? करने में काफी सरल है।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वदेशी विदेशी का अन्तर- विदेशी गौवंश तथा भारतीय गौवंश में कुछ मौलिक अंतर हमने जो जाने हैं वे निम्न है। पर यह सूचि अन्तिम नही, विद्वान और अनुभवी महानुभव इसमें संशोधन-संर्वधन करने की कृपा करें।</p>
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		<title>जल ही जीवन है &#8230;&#8230;&#8230;</title>
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		<pubDate>Sun, 04 Jul 2010 11:58:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रकृति]]></category>
		<category><![CDATA[स्वास्थ्य]]></category>

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		<description><![CDATA[जल ही जीवन है। परन्तु सबके लिये। इसमें अमीर गरीब का भेदभाव बर्दाशत नहीं किया जा सकता। शहरी उपभोगतावादी संस्कृति में यह आम बात है कि कहीं &#8216;वाटर पार्क&#8217; में मस्ती चल... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/04/%e0%a4%9c%e0%a4%b2-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%88/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-4184" title="DCF 1.0" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/water-300x300.jpg" alt="" width="300" height="300" />जल ही जीवन है। परन्तु सबके लिये। इसमें अमीर गरीब का भेदभाव बर्दाशत नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align: justify;">शहरी उपभोगतावादी संस्कृति में यह आम बात है कि कहीं &#8216;वाटर पार्क&#8217; में मस्ती चल रही है लोगों कारों को भी पानी की मोटी धार से धो रहे हैं। और कहीं लोग नगरमहापालिका के टैंकरों पर पानी के डिब्बे लिये लाइन लगाकार खड़े हैं। यह व्यक्ति के गरिमापूर्ण रूप से जीवन जीने के अधिकार पर कुठाराघात है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा भारत भूमि के सभी निवासियों को प्राप्त है।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8216;रिवर्स ऑस्मोसिस&#8217; जैसी जल को साफ करने वाली तकनीक के कारण यदि दूषित पानी को बहने दिया जाए, जो अधिकतर घरों और कार्यालयों में होता है, तो यह जल की निर्ममतापूर्ण बर्बादी ही कही जाएगी. दस्तावेजों का कहना है कि आर.ओ. तकनीक से शुद्ध साफ़ पानी तो निकलता ही है पर जो पानी व्यर्थ कचरे की तरह निकल रहा है, उसकी गुणात्मकता नलके के पानी जितनी ही है, और उसको दैनिक जीवन में जल-पूर्ती के लिए इस्तेमाल करना चाहिए. क्या यह व्यावहारिक है और क्या ऐसा अधिकतर घरों और कार्यालयों में जहां आर.ओ. तकनीक से पानी साफ़ किया जा रहा है, वहाँ पर हो पा रहा है? मेरे निजी अनुभव के अनुसार, इस तकनीक से 1 लीटर पानी साफ करने में लगभग 4 लीटर पानी बर्बाद होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">अब इस उपकरण को बेचने वाली कंपनियाँ कहेंगी कि यह पानी तो इस उत्पाद को उपयोग करने वाले बहा रहे है। क्या आज की व्यस्त शहरी जिन्दगी में व्यक्ति के लिये यह संभव है कि वो एक लीटर पानी के लिये 4 लीटर पानी बाल्टी में भरे और उसका सदुपयोग करे। ऐसा करना वास्तविक जिन्दगी में तो असंभव सा ही है असलियत में होता यह है कि (आर. ओ) रिवर्स औसमोसिस उत्पाद का पानी निष्कासन करने वाला पाइप रसोईघर के सिंक में डाल दिया जाता है और पानी बहता रहता है। यहआर. ओ उत्पाद विभिन्न कम्पनियों के कार्यालय में भी लग रहा है जहां तो इस बहते हुए पानी का सददुपोग करना और भी मुश्किल है। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि क्या सामाजिक अपराधी बनकर अति शुद्ध जल पीने को तैयार है? और अगर नहींतो क्या ऐसा कोई भी जल शुद्धीकरण का उत्पाद न लें जो पर्यावरण मित्र न हो। हमलखनऊ के प्रशासन, लखनऊ के महापौर (मेयर) तथा हेमामालिनी जी को भी इस प्रकार का ज्ञापन देगें।</p>
<p style="text-align: justify;">हमारी माँगे है:-<br />
1. वे उपकरण भी जिन्हें गुणवत्ता मानक आई.एस. ओ.९001 प्राप्त है,पर्यावरण वचनबद्धता संबंधी 14001 प्रमाणन, जल उपयोग से संबन्धित सभी उपकरणों को प्राप्त करना अनिवार्य हो।<br />
२. यू . पी. ग्राउंड वाटर कांसेर्वेशेन्न प्रोटेक्शन एंड डेवेलोपमेंट(मैनेजमेंट कण्ट्रोल एंडरेगुलेशन ) बिल २०१० में सबमर्सिबिल पप्स जैसे घरेलू उपकरणों को निगरानी में रखा गया है, जल शुद्धिकरण से संबंन्धित सभी उपकरणों को निगरानी में रखा जाए।<br />
३.ऐसे उत्पादों के ब्रोशर्स,पैंप्लेटस पर उनकी अच्छाइयों के साथ-साथ यह भी लिखा हो कि वह निम्नलिखित कारणों से पर्यावरण मित्र नहीं है। अर्थात उत्पाद की पूरी जानकारी उपभोगता को लिखित रूप में दी जाए।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सिटिज़न न्यूज़ सर्विस-वसु सेन मिश्रा</strong></p>
<div style="text-align: justify;"><span style="font-family: 'Trebuchet MS', Verdana, Arial, sans-serif; font-size: x-small; color: #000033;"><br />
</span></div>
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		<title>लकड़ी और लोहे का विकल्प पौलीवूड स्लीपर</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Jun 2010 07:09:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>नरेन्द्र निर्मल</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रकृति]]></category>
		<category><![CDATA[साक्षात्कार]]></category>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-3602" title="plastic_bridge" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/plastic_bridge.jpg" alt="" width="279" height="208" />देश भर में गर्मी विकराल रूप लेता जा रहा है। इस वर्ष भी बारिश के सही से न होने पर पूरे देश में पानी के लिए हहाकार सा है। कई जगहों पर तो पानी की वजह से सरकार और प्यासे लोगों के बीच घमासान भी मचा हुआ है। वहीं जनसंख्या भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। और देश भर में शहरीकरण के कारण पारंपरिक श्रोतों का बेजा इस्तेमाल भी तेजी से होने लगा है। बढ़ती जनसंख्या ने देश में विभिन्न प्रकार की समस्याओं को जन्म दिया है जैसे अशिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, पलायन, जलयावु परिवर्तन, जंगलों का कटाव, प्रदुषण, ग्लोबल वार्मिंग आदि।</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार अशिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी आदि पर तो लगातार अंकुश लगाने का दांवा करती है हांलाकि यह संभव नहीं हो पा रहा है। लेकिन प्रदुषण, मृदा अपर्दन, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण असंतुलन आदि जैसी समस्याओं पर ना सही रूप से ध्यान केन्द्रित है और ना ही जनता इसके निदान के लिए आगे आना चाहती है। दरअसल शहरों में लोग इस कदर सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जुझ रहे है कि अन्य दायित्वों से भागते नजर आ रहे है। उदाहरण के तौर पर अगर सरकार लाख कहती है कि प्लास्टिक थैलियों का इस्तेमाल न करें यह पर्यावरण के लिए खतरा है। बावजूद सुविधाभोगी हो चुकी जनता इसे हर वक्त नकार देती है। परिणाम होता है कि ये थैलिया न सिर्फ प्रदुषण फैलाने में मदद करती है बल्कि इसके खाने से हर साल लाखों जानवर मारे जाते है।</p>
<p style="text-align: justify;">आज भी देश में प्लास्टिक थैलियों के रिसाईकल की सही व्यवस्था मौजूद नहीं हैं। यहीं कारण है ये थैलियां यत्र-तत्र बिखरी होती है और अक्सर नालियों को जाम कर देती है। हिमालय का ग्लेसियर आज पिघल रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह आने वाले पर्यटको द्वारा प्लास्टिक सामग्रीयों को छोड़ा जाना एक बड़ा कारण माना गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">वहीं हम पेड़ों की बात करे तो यह न सिर्फ बारिश कराने में मददगार साबित होती है। बल्कि वायुमंडल में फैले जानलेवा जहरीली गैसों को अवशोषित कर हमारे लिए प्राण वायु बनाने का काम करती है। बावजूद बढ़ती जनसंख्या के कारण जंगलों और पेड़ों को धड्ल्ले से कांटा जा रहा है। और उसकी जगह मानव निर्मित कोंक्रिट के जंगल खड़े किए जा रहे है। अगर जंगल और वृक्ष लोगों के लिए इतना महत्वपूर्ण है तो भला इसे अत्यधिक मात्रा में क्यों कांटा जा रहा है? ऐसे सवाल अक्सर लोगों के मन में उठते होंगे। इस सवाल का जवाब अगर ढूंढा जाए तो हम पाएंगे एक जोड़े इंसान पैदा होते ही जैसे-जैसे वह बढ़ता जाता है उसे किस-किस चीजों की आवश्यकता पड़ती है।</p>
<p style="text-align: justify;">सबसे पहला उसे सर के उपर छत चाहिए होता है जिसके लिए हैसियत अनुसार घर, फ्लैट, बंगला आदि का निर्माण किया जाता है। स्वास्थ संबंधी देखभाल के लिए क्लीनिक और अस्पतालों की जरूरत होती है। पढ़ाई के लिए स्कूल, काॅलेज, लाईब्रेरी, विश्ववि़द्यालय आदि की जरूरत पड़ती है। फिर जीविकोपार्जन के लिए दुकान, औद्योगिक इकाईया, कार्यालय इत्यादि की जरूरत होती है। भोजन के लिए खेत-खलिहान, गोदाम की आवश्यकता। व्यापार के लिए दुकान, माल, बाजार आदि की जरूरत। मनोरंजन के लिए होटल, मॉल, पार्क, थियेटर आदि की चाहत। देश व समाज की सुरक्षा के लिए सैन्य बलों एवं आयुद्ध सामग्रियों को रखने का स्थान। चलने के लिए सड़क, एक्सप्रेस वे, हवाई अड्डे, रेलवे, मेट्रो, पुल-पुलिया आदि। और मरने के बाद दो जग जमी। इन तमाम चीजों के लिए जगह की आवश्यकता होती है। जिसके लिए हम न चाह कर भी जंगलों और पेड़ों को कांटते जा रहे है। और ये जितने भी संसाधन है वहां किसी न किसी रूप में लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में पर्यावरण में बदलाव आना तो लाजमी ही है। इसलिए हम विनाश की आरे तेजी से बढ़ रहे है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि हमारी आबादी अन्य देशों के मुकाबले काफी तेजी से बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">आज लोगों को वृक्ष, जंगल, जमीन और पानी बचाने की सख्त जरूरत है। जो गांव वाले तो थोड़ा बहुत यह कर भी रहे है लेकिन शहरी नवधनाढ्य इसके प्रति काफी उदासीन है। जो उनके व्यवहारों से देखा और समझा जा सकता है। उन्हें फल, सब्जिया खाना और साफ हवां का आनंद लेना तो पसंद है लेकिन 500 से हजारों गज के प्लोटों में दो-चार फलदार वृक्ष लगाना मंजूर नहीं। क्योंकि इससे किराया के साथ जमीन की कीमत का नुकसान जो होता है। आज लोग पेड़ लगाना तो दूर पेड़ बचाने में भी अपनी भागीदारी नहीं निभा पाते।</p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-3603" title="polywood-nautical-outdoor-dining-set" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/polywood-nautical-outdoor-dining-set-300x254.png" alt="" width="300" height="254" />इन्हीं सब बाते को ध्यान में रखते हुए आज दिल्ली में एक ऐसी प्राईवेट संस्था है जो न सिर्फ पेड़ो को बचाने के लिए एक नई तकनीक अमेरिका से आयात की है बल्कि इसके माध्यम से प्लास्टिको को भी रिसाईकल कर इससे फैलने वाले प्रदुषण से भी निजात दिला सकती है। जालान प्लाईवूड प्राईवेट लि. के निदेशक सुबल जालान ने अपने इस उत्पाद के बारे में विशेष चर्चा में बताया कि यह प्लास्टिक से बनी पोलीवूड स्लीपर लकड़ी और लोहे के विकल्प के तौर इस्तेमाल किया जा सकता है। यह इतना मजबूत है कि इसका इस्तेमाल बड़े-बड़े निर्माण कार्य में लोहे और लकडियों का स्थान ले सकता हैं। छोटे-छोटे सामग्रियों में कुर्सि, टेबल, सोफा, मेज, दरवाजे, खिड़कियाँ, कप, प्लेट, बर्तन, खिलौने, जूते, आदि बन सकते है वही बड़े-बड़े निर्माण कार्य जैसे पूल-पूलिया, मेराईन पाईप, पैदल पार पथ, पटरियों के नीचे बीछने वाले स्लीपर, के साथ-साथ पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों में बांधों का निर्माण किया जा सकता है जहां पर आज भी लकड़ियों का इस्तेमाल होता चला आ रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">जहां तक रही इसकी कीमत की बात तो यह लगभग लकड़ी से 2-3 गुना मंहगा होता है लेकिन लोहे से काफी सस्ता। वहीं इसके टिकाउ की बात करे तो लकड़ी के मुकाबले यह काफी मजबूत और लम्बे समय तक चलने वाला होता है। इसपर न तो पानी का असर होता है ना ही मौसम परिवर्तन का। इसमें लोहे की तरह जंग भी नहीं लगता जिससे बार-बार पेंट करने की जरूरत भी नहीं पड़ती। उन्होंने कहा कि इस उत्पाद का प्रशिक्षण यू.एस आर्मी कोर्प्स इंजीनियर द्वारा किया गया है। इसकी क्षमता 150 मिलीयन टन वजन तक हो सकती है। अमेरिका में इसका इस्तेमाल रेलवे ट्रैक के स्लीपर, अंडर ग्राउण्ड नेटवर्क, पैदल पार पथ, पुल-पुलिया और बिजली के खम्बे के साथ-साथ यूएस आर्मी द्वारा पहाड़ी इलाकों में बांध बनाने के काम में किया जा रहा हैं। सबसे बड़ी खासियत होती है कि इसे न तो आसानी से जलाया जा सकता है ना ही बम से उड़ाया जा पाएगा। 400 डिगरी तापमान तक सहने की क्षमता होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">जालान पोलीवूड ने जिस बहुराष्ट्रीय कम्पनी से यह तकनीक स्थानांतरण की है उसके कार्यालय अमेरिका और लंदन में मौजूद है। जालान पोलीवूड विगत कुछ वर्षो में अपना एक प्रोजेक्ट भारत में लगाने जा रही हैं ताकि इस तकनीक के माध्यम से प्लास्टिक को रिसाईकल कर इस उत्पाद को बनाया जाएगा। इस बहुआयामी प्रोजेक्ट से जहां लोगों को रोजगार मिलेगा वहीं प्लास्टिक के प्रदुषण और वृक्ष, जंगल और पानी जैसे बहुउपयोगी तत्वों से विरान होते इस धरती को भी बचाया जा सकेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">पर्यावरण दिवस को ध्यान में रखते हुए इस बहुउपयोगी प्रोजेक्ट की सफलता के लिए इसकी चर्चा ब्लॉग जगत में वांछनीय है। क्योंकि एक स्वस्थ समाज के निर्माण में ब्लॉग जगत सदैव सराहनीय कदम उठाता रहा है।</p>
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