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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; पर्यटन</title>
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	<description>राज-समाज और जन की आवाज</description>
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		<title>ब़ृहदेश्‍वर मंदिर चोल स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है</title>
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		<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 08:49:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[पर्यटन]]></category>
		<category><![CDATA[अंधेर नगरी]]></category>
		<category><![CDATA[चोल स्थापत्य कला]]></category>
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		<category><![CDATA[विदेशी यात्रियों का इतिहास]]></category>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">ब़ृहदेश्&zwj;वर मंदिर चोल वास्&zwj;तुकला का शानदार उदाहरण है, जिनका निर्माण महाराजा राजा राज (985-1012.ए.डी.) द्वारा कराया गया था। इस मंदिर के चारों ओर सुंदर अक्षरों में नक्&zwj;काशी द्वारा लिखे गए शिला लेखों की एक लंबी श्रृंखला शासक के व्&zwj;यक्तित्&zwj;व की अपार महानता को दर्शाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/Brihadeshwara.jpg"><img alt="Brihadeshwara" class="aligncenter size-medium wp-image-1105" height="300" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/Brihadeshwara-198x300.jpg" title="Brihadeshwara" width="198" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">बृहदेश्&zwj;वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक भवन है और यहां इन्&zwj;होंने भगवान का नाम अपने बाद राज राजेश्&zwj;वरम उडयार रखा है। यह मंदिर ग्रेनाइट से निर्मित है और अधिकांशत: पत्&zwj;थर के बड़े खण्&zwj;ड इसमें इस्&zwj;तेमाल किए गए हैं, ये शिलाखण्&zwj;ड आस पास उपलब्&zwj;ध नहीं है इसलिए इन्&zwj;हें किसी दूर के स्&zwj;थान से लाया गया था। यह मंदिर एक फैले हुए अंदरुनी प्रकार में बनाया गया है जो 240.90 मीटर लम्&zwj;बा ( पूर्व &#8211; पश्चिम) और 122 मीटर चौड़ा (उत्तर &#8211; दक्षिण) है और इसमें पूर्व दिशा में गोपुर के साथ अन्&zwj;य तीन साधारण तोरण प्रवेश द्वार प्रत्&zwj;येक पार्श्&zwj;व पर और तीसरा पिछले सिरे पर है। प्रकार के चारों ओर परिवारालय के साथ दो मंजिला मालिका है।<a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/brihadeshwara-temple.jpg"><img alt="brihadeshwara-temple" class="aligncenter size-medium wp-image-1106" height="300" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/brihadeshwara-temple-210x300.jpg" title="brihadeshwara-temple" width="210" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">एक विशाल गुम्&zwj;बद के आकार का शिखर अष्&zwj;टभुजा वाला है और यह ग्रेनाइट के एक शिला खण्&zwj;ड पर रखा हुआ है तथा इसका घेरा 7.8 मीटर और वज़न 80 टन है। उप पित और अदिष्&zwj;ठानम अक्षीय रूप से रखी गई सभी इकाइयों के लिए सामान्&zwj;य है जैसे कि अर्धमाह और मुख मंडपम तथा ये मुख्&zwj;य गर्भ गृह से जुड़े हैं किन्&zwj;तु यहां पहुंचने के रास्&zwj;ता उत्तर &#8211; दक्षिण दिशा से अर्ध मंडपम से होकर निकालता है, जिसमें विशाल सोपान हैं। ढलाई वाला प्लिंथ विस्&zwj;तृत रूप से निर्माता शासक के शिलालेखों से भरपूर है जो उनकी अनेक उपलब्धियों का वर्णन करता है, पवित्र कार्यों और मंदिर से जुड़ी संगठनात्&zwj;मक घटनों का वर्णन करता है। गर्भ गृह के अंदर बृहत लिंग 8.7 मीटर ऊंचा है। दीवारों पर विशाल आकार में इनका चित्रात्&zwj;मक प्रस्&zwj;तुतिकरण है और अंदर के मार्ग में दुर्गा, लक्ष्&zwj;मी, सरस्&zwj;वती और भिक्षाटन, वीरभद्र कालांतक, नटेश, अर्धनारीश्&zwj;वर और अलिंगाना रूप में शिव को दर्शाया गया है। अंदर की ओर दीवार के निचले हिस्&zwj;से में भित्ति चित्र चोल तथा उनके बाद की अवधि के उत्&zwj;कृष्&zwj;ट उदाहरण है।</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/brihadeshwara-temple1.jpg"><img alt="brihadeshwara-temple" class="aligncenter size-full wp-image-1108" height="168" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/brihadeshwara-temple1.jpg" title="brihadeshwara-temple" width="275" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">उत्&zwj;कृष्&zwj;ट कलाओं को मंदिरों की सेवा में प्रोत्&zwj;साहन दिया जाता था, शिल्&zwj;पकला और चित्रकला को गर्भ गृह के आस पास के रास्&zwj;ते में और यहां तक की महान चोल ग्रंथ और तमिल पत्र में दिए गए शिला लेख इस बात को दर्शाते हैं कि राजाराज के शासनकाल में इन महान कलाओं ने कैसे प्रगति की।</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/tempthanj1.jpg"><img alt="tempthanj1" class="aligncenter size-full wp-image-1109" height="218" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/tempthanj1.jpg" title="tempthanj1" width="160" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">सरफौजी, स्&zwj;थानीय मराठा शासक ने गणपति मठ का दोबारा निर्माण कराया। तंजौर चित्रकला के जाने माने समूह नायकन को चोल भित्ति चित्रों में प्रदर्शित किया गया है।</p>
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		<title>पाताल भुवनेश्वर- रहस्यों को खुद में समेटे एक शिल्प</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 11:58:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>उमेश  पंत</dc:creator>
				<category><![CDATA[पर्यटन]]></category>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<h3 class="post-title entry-title" style="text-align: justify;"><a href="http://naisoch.blogspot.com/2008/11/blog-post_6273.html"><br />
</a></h3>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/12312.jpg"><img width="180" height="138" class="aligncenter size-full wp-image-906" title="जनोक्ति/उतराखन्ड" alt="जनोक्ति/उतराखन्ड" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/10/12312.jpg" /></a></p>
<div style="text-align: justify;">उत्तराखण्ड की पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट की पाताल भुवनेश्वर गुफा किसी आश्चर्य से कम नही है। यहां पत्थरों से बना एक. एक शिल्प तमाम रहस्यों को खुद में समेटे हुए है। मुख्य द्वार से संकरी फिसलन भरी 80 सीढियां उतरने के बाद एक ऐसी दुनिया नुमाया होती है जहां युगों युगों का इतिहास एक साथ प्रकट हो जाता है। गुफा में बने पम्थरों के ढांचे देष के आध्यात्मिक वैभव की पराकाष्ठा के विषय में सोचने को मजबूर कर देते हैं।<br />
पौराणिक महत्व&nbsp; पुरातात्विक साक्षों की मानें तो इस गुफा को त्रेता युग में राजा ऋतुपर्ण ने सबसे पहले देखा। द्वापर युग में पाण्डवों ने यहां चौपड़ खेला और कलयुग में जगदगुरु शकराचार्य का 822 ई के आसपास इस गुफा से साक्षात्कार हुआ तो उन्होंने यहां तांबे का एक शिवलिंग स्थापित किया। इसके बाद चन्द राजाओं ने इस गुफा के विशय मे जाना।और आज देष विदेष से षैलानी यहां आते हैं। और गुफा के स्थपत्य को देख दांतो तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाते हैं।<br />
मान्यताएं चाहे कुछ भी हो पर एकबारगी गुफा में बनी आकृतियों को देख लेने के बाद उनसे जुड़ी मान्यताओं पर भरोसा किये बिना नहीं रहा जाता। गुफा की शुरुआत में शेषनाग के फनों की तरह उभरी संरचना पत्थरों पर नज़र आती है। मान्यता है कि धरती इसी पर टिकी है। आगे बढने  पर एक छोटा सा हवन कुंड दिखाई देता है। कहा जाता है कि राजा परीक्षित को मिले श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके पुत्र जन्मेजय ने इसी कुण्ड में सभी नागों को जला डाला परंतु तक्षक नाम का एक नाग बच निकला जिसने बदला लेते हुए परीक्षित को मौत के घाट उतार दिया। हवन कुण्ड के ऊपर इसी तक्षक नाग की आकृति बनी है। आगे चलते हुए महसूस होता है कि हम किसी की हडिडयों पर चल रहे हों। सामने की दीवार पर काल भैरव की जीभ की आकृति दिखाई देती है। कुछ आगे मुड़ी गरदन वाला गरुड़ एक कुण्ड के ऊपर बैठा दिखई देता है। माना जाता है कि शिवजी ने ने इस कुण्ड को अपने नागों के पानी पीने के लिये बनाया था। इसकी देखरेख गरुड़ के हाथ में थी। लेकिन जब गरुड़ ने ही इस कुण्ड से पानी पीने की कोशिश की तो&nbsp; शिवजी  ने गुस्से में उसकी गरदल मोड़ दी। कुछ आगे ऊंची दीवार पर जटानुमा सफेद संरचना है। यहीं पर एक जलकुण्ड है मान्यता है कि पाण्डवों के प्रवास के दौरान विश्वकर्मा ने उनके लिये यह कुण्ड बनवाया था। कुछ आगे दो खुले दरवाजों के अन्दर संकरा रास्ता जाता है। कहा जाता है कि ये द्वार धर्म द्वार और मोक्ष द्वार है । आगे ही है आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा&nbsp; स्थापित तांबे का शिवलिंग। माना यह भी जाता है गुफा के आंखिरी छोर पर पाण्डवों ने शिवजी के साथ चौपड़ खेला था। लौटते हुए एक स्थान पर चारों युगों के प्रतीक चार पत्थर हैं। इनमें से एक धीरे धीरे ऊपर उठ रहा है। माना जाता है कि यह कलयुग है और जब यह दीवार से टकरा जायेगा तो प्रलय हो जायेगा। गुफा की शुरुआत पर वापस लौटने पर एक मनोकामना कुण्ड है। मान्यता है कि इसके बीच बने छेद से धातु की कोई चीज पार करने पर मलोकामना पूरी होती है। आष्चर्य ही है कि जमीन के इतने अन्दर होने के बावजूद यहां घुटन नहीं होती शान्ति मिलती है। देवदार के घने जंगलों के बीच बसी रहस्य और रोमान्च से सराबोर पाताल भुवनेश्वर की गुफा की सैलानियों के बीच आज एक अलग पहचान है। कुछ श्रृद्धा से, कुछ रोमान्च के अनुभव के लिये, और कुछ शीतलता और शान्ति की तलाश में यहां आते हैं। गुफा के पास हरे भरे वातावरण में सुन्दर होटल भी पर्यटकों के लिये बने हैं। खास बात यह है कि गंगोलीहाट में अकेली यही नहीं बल्कि दस से अधिक गुफाएं हैं जहो इतिहास की कई परतें, मान्यताओं के कई मूक दस्तावेज खुदबखुद खुल जाते हैं। आंखिर यूं ही गंगोलीहाट को गुफाओं की नगरी नहीं कहा जाता।</div>
<div style="text-align: justify;">
<strong>अन्य आकर्षण :- </strong>हिमालय की श्रृंखलाओं को यहां नजदीक से देखा जा सकता है। प्रसिद्ध कालिका मन्दिर और हजारों फीट की ऊंचाई पर बसा मुक्तेश्वर । सर्दियों में बर्फ का लुत्फ भी यहां उठाया जा सकता है।<br />
<strong><br />
कहां रुकें :- </strong>पार्वती रिसोर्ट और होटल सैलाषा में रहने खाने पीने की उच्च स्तरीय व्यवस्था है।</div>
<div style="text-align: justify;">
<strong>कैसे पहुंचें:-</strong> दिल्ली से गंगोलीहाट तक सीधी बस सेवा। गंगोलीहाट से टैक्सी लेकर एक घन्टे में यहां पहुंचा जा सकता है।</div>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
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