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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; जीवन बीमा</title>
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		<title>कोई जाति नहीं होती गरीबी की</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Dec 2011 15:08:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>ब्रज किशोर सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवन बीमा]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[कोई जाति नहीं होती गरीबी की]]></category>
		<category><![CDATA[भारत में जाति]]></category>

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		<description><![CDATA[मित्रों,भारत में जाति का क्या स्थान है इससे आप भी भली-भांति परिचित होंगे.हमारे कुछ पढ़े-लिखे मित्र भी जाति नाम परमेश्वर में विश्वास रखते हैं.हमारे एक पत्रकार मित्र जो यादव जाति से आते हैं किसी से परिचित होने पर सबसे पहले ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/12/reservation.jpeg"><img class="alignleft size-full wp-image-25272" title="reservation" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/12/reservation.jpeg" alt="भारत में जाति"width="100" height="125" /></a>मित्रों,भारत  में जाति का क्या स्थान है इससे आप भी भली-भांति परिचित होंगे.हमारे कुछ  पढ़े-लिखे मित्र भी जाति नाम परमेश्वर में विश्वास रखते हैं.हमारे एक  पत्रकार मित्र जो यादव जाति से आते हैं किसी से परिचित होने पर सबसे पहले  उसकी जाति पूछते हैं.एक बार उन्होंने पटना से मुजफ्फरपुर तक पदयात्रा की  योजना बनाई.तब मुझसे पूछा कि हाजीपुर से मुजफ्फरपुर के बीच सड़क किनारे  यादवों के कितने गाँव हैं और तब मैं उनकी जातिभक्ति से हतप्रभ रह गया.यही  वे लोग होते हैं जो सड़क पर पड़े घायल की तब तक मदद नहीं करते जब तक उन्हें  इस बात की तसल्ली न हो जाए कि दम तोड़ रहा व्यक्ति उनकी ही जाति से है.ऐसे  लोग ढूँढने पर बड़ी जातियों में भी बड़ी आसानी से मिल जाएँगे.<br />
मित्रों,जहाँ तक मेरा मानना है कि व्यक्ति की जाति सिर्फ  तभी देखनी चाहिए जब बेटे-बेटी की शादी करनी हो वरना २४  घंटे,सोते-जागते,उठते-बैठते जाति के बारे में सोंचना अमानवीय तो है ही  मूर्खतापूर्ण भी है.ये तो हो गई आम जनता की बात लेकिन हम उनका क्या करें जो  विभिन्न जातियों और धर्मों के बीच तनाव की ही खाते हैं.आपने एकदम ठीक समझा  है मैं बात कर रहा हूँ उन नेताओं की जो गरीब और गरीब तथा वंचित और वंचित  और इस तरह इन्सान और इन्सान के बीच में फर्क करते हैं.<br />
दोस्तों,गरीबी,जहालत और बेबसी ये ऐसे शह हैं जो कभी जाति-जाति  और धर्म-धर्म के बीच भेदभाव नहीं करते.ये तो उतनी ही संजीदगी के साथ सवर्ण  हिन्दुओं पर भी नमूदार हो जाते हैं जितनी संजीदगी के साथ अन्य जाति और  धर्मवालों पर.फिर अगर हम गरीबों के बीच जाति और धर्म के नाम पर सुविधाएँ और  आरक्षण देने में भादभाव करते हैं तो हमसे बड़ा काईयाँ और कोई हो ही नहीं  सकता.<br />
मित्रों,अभी कुछ ही दिनों पहले देश के अग्रणी दलित उद्यमियों ने  एक मेले का आयोजन किया शायद मुम्बई में.वहां उन्होंने बताया कि वे लोग अपनी  फर्मों और कारखानों में ५०% सीटें दलितों के लिए आरक्षित रखते हैं और  बाँकी ५०% अन्य सारी बड़ी-छोटी जातियों के लिए;आखिर गरीबी तो उनमें भी है  न.क्या हमारी सरकार और हमारे राजनेताओं को भी इन दलित उद्यमियों से शिक्षा  लेने की आवश्यकता नहीं है?ये दलित उद्यमी कोई रामविलास पासवान के परिवार से  नहीं हैं और न हो चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए हैं.इन्होंने  गरीबी में जन्म लिया और गरीबी में ही पले-बढ़े.फिर अपनी बुद्धि और बाहुबल  से गरीबी से लड़कर उसे पराजित किया और आज सफलता के शिखर पर जा पहुंचे  हैं.लेकिन ये लोग नहीं भूले हैं गरीबी के दर्द को जो अपने आपमें सबसे बड़ी  बीमारी है.अगर हम इनकी तुलना गरीबी से उठकर आए राजनेताओं से करें तो सिवाय  निराशा के कुछ भी हाथ नहीं आएगा.लालू-रामविलास-मुलायम-मायावती जैसे बहुत-से  राजनेता हैं जो वास्तव में गुदड़ी के लाल हैं लेकिन सफलता पाते ही,अमीर  बनते ही ये अपने गरीबी धर्म को भूल गए और जाति-धर्म की राजनीति में खोकर रह  गए.<br />
मित्रों,गरीब सिर्फ गरीब होता है;उसकी कोई जाति नहीं  होती.अभाव उसका भाई होता है,दुःख उसका पिता और जहालत उसकी माँ.बेबसी और भूख  ही उसके भाई-बन्धु होते हैं.मैंने अपने गाँव में कई ऐसे राजपूत-ब्राह्मण  देखे हैं जिनके पास पहनने के लिए ढंग का कपड़ा तक नहीं है.जाकर उनकी मजबूरी  से पूछिए कि उसकी क्या जाति है?जाकर उनके परिजनों के फटे पांवों और खाली  पेटों से पूछिए कि उसका मजहब क्या है?यक़ीनन वो राजपूत-ब्राह्मण-यादव-दलित  या मुसलमान नहीं बताएँगे बल्कि अपनी जाति और धर्म दोनों का नाम सिर्फ और  सिर्फ गरीबी बताएँगे.मैंने अगर दलितों के घर में गरीबी के कारण भैस बेचने  पर लोगों को मातम मनाते देखा है तो मैंने बड़ी जातिवालों के घर में भी बेटी  की शादी में इकलौता बैल बेचने के बाद दो-दो दिनों तक चूल्हे को ठंडा रहते  हुए भी देखा है.क्या इन दोनों परिवारों की मजबूरी की,उनके आंसुओं की कोई  जाति है?क्या इन दोनों घरों में पसरे मातमी सन्नाटे का कोई मजहब है?खुद  मेरे चचेरे चाचा को लम्बे समय तक अपनी माँ के पेटीकोट को लुंगी बनाकर पहनना  पड़ा और पढ़ाई भी बीच में ही छोडनी पड़ी.क्या मेरे उन चाचा की दीनता और  हीनता को किसी खास जाति या धर्म की दीनता या हीनता का नाम देना अनुचित नहीं  होगा?मेरे उन्हीं चाचा की पत्नी और बच्चों के कपड़ों पर लगे पैबन्दों की  क्या कोई जाति हो सकती या कोई मजहब हो सकता है?पहले भले ही विभिन्न जातियों  में गरीबी का अनुपात काफी अलग रहा हो अब लम्बे समय से चले आ रहे जाति-धर्म  आधारित आरक्षण के बाद स्थिति बहुत ज्यादा अलग नहीं रह गयी है.इस बात का  गवाह सिर्फ एक मैं ही नहीं हूँ बल्कि सरकारी अमलों द्वारा निर्मित गरीबी  रेखा से नीचे जीवन जीनेवालों की सूची  भी चीख-चीखकर यही कह रही है कि  गरीबों की और गरीबी की कोई जाति नहीं होती,कोई धर्म नहीं होता.<br />
दोस्तों,अंत में मैं सत्ता पक्ष और विपक्ष के सभी नेताओं से  विनम्र निवेदन करता हूँ कि वे कृपया इंसानियत को जातियों और धर्मों में  विभाजित न करें.जब गरीबी ने कभी इंसानों और इंसानों के बीच अंतर नहीं किया  तो वे कौन होते हैं ऐसा करनेवाले?गरीबी अपने-आपमें ही बहुत बड़ा ईश्वरीय  मजाक होती है इसलिए कृपया वे इस क्रूर मजाक का और भी मजाक नहीं  बनाएँ.आरक्षण देना हो या कोई और सुविधा देनी हो दीजिए,शौक से दीजिए परन्तु  सुविधा दीजिए सिर्फ गरीबी देखकर,गरीबों की पहचान करके;न कि उसकी जाति और  धर्म देखकर क्योंकि इस तरह तो बहुत-से ऐसे लोग सुख की उस रौशनी और अवसर से  वंचित रह जाएँगे जिन पर उनका भी वास्तविक हक़ है और फिर पीढ़ी-दर-पीढ़ी  गरीबी उनके लिए घर में जबरदस्ती घुस आए मेहमान की तरह अड्डा जमा लेगी.</h3>
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		<title>गरीबी की लक्ष्मण रेखा.</title>
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		<pubDate>Thu, 22 Sep 2011 15:21:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>एल.आर. गाँधी</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवन बीमा]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[भारत से गरीब और गरीबी को मिटाने के भागीरथ परियास पिछले छह दशकों से जारी हैं &#8230; मगर गरीबी रेखा के साथ साथ ..गरीब हैं कि बढ़ते ही जा रहे हैं. अब हमारे मोहन प्यारे जी ने अपने अर्थ शास्त्रों ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/09/poverty-india.png"><img class="alignleft size-medium wp-image-19778" title="poverty-india" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2011/09/poverty-india-100x66.png" alt="गरीबी की लक्ष्मण रेखा"width="100" height="66" /></a>भारत से गरीब और गरीबी को मिटाने के भागीरथ परियास पिछले छह दशकों से जारी हैं &#8230; मगर गरीबी रेखा के साथ साथ ..गरीब हैं कि बढ़ते ही जा रहे हैं.</p>
<div>अब हमारे मोहन प्यारे जी ने अपने अर्थ शास्त्रों के विशाल अनुभव के बल पर अंतिम घोषणा कर दी है कि शहरों में ३२/- और ग्रामीण क्षत्रों में २६/- हर रोज़ खर्च करने वाले भारतीय नर-नारि अपने आप को गरीब कहना बंद कर दें ! सरकार के साथ और धोखा नहीं चलेगा &#8230; यूँ ही नकली गरीब बन कर सस्ते भाव राशन लूट कर सरकार को चूना लगाए जा रहे हैं. भला यह भी कोई बात हुई &#8230; एक गरीब को दो जून की रोटी के सिवा और चाहिए क्या ..६ रोटी , एक  कटोरी दाल/ सब्जी&#8230; महज़ दो वक्त &#8230; मनमोहन जी के मनटेक  सिंह जी ने बंगाली बाबू के साथ बैठ कर अपने पावर फुल आटा मंत्री से परामर्श कर एक भारतीय को जीने के लिए ज़रूरी दाल -रोटी का हिसाब लगा लिया है. वही ३२/- और २६/- &#8230; लो खींच दी &#8230; गरीब की गरीबी की &#8216;लक्ष्मण &#8216; रेखा &#8230; अब इस रेखा के नीचे वालों को मिलेगा &#8216;सोनिया&#8217; जी का अंग्रेजी में बोले तो &#8216; राईट टू फ़ूड&#8217; का उपहार.</div>
<div>यूं तो देश आज़ाद होते ही हमारे बापू के चहेते चाचा नेहरूजी ने देश से गरीबी, भुखमरी,असमानता,छूतछात ,भाई-भतीजाबाद और न जाने क्या क्या ख़तम करने की कसमें खाई  थीं. पूरे १७ वर्ष अपनी इन कसमों &#8211; वादों को पूरा करने में गुज़ार दिए. मगर वह वादा ही क्या जो वफ़ा हो जाए ? फिर उनकी पुत्री प्रियदर्शनी इंदिरा जी देश के  राज सिंघासन  पर आरूढ़ हुई&#8230; १९७० में इंदिरा जी ने तो वादा नहीं &#8216;अहद&#8217; ही कर लिया कि देश से गरीबी हटा कर ही दम लेंगीं &#8230; गरीबी रेखा का निर्धारण किया गया .. गरीबी हटाने के लिए गरीबी रेखा से नीचे जी रहे &#8216;जीव-जंतुओं &#8216; की पहचान भी तो ज़रूरी है भई. सो फैसला किया गया कि गाँव में एक &#8216;जीव&#8217; के जिन्दा रहने लिए २४०० और शहरी &#8216;जीव&#8217; को २१०० कैलोरी बहुत है. इसके लिए गाँव वासी को ६२/- और शहरी बाबु को ७१/- की दरकार है. जिसको हर रोज़ ६ रोटी, १ दाल/सब्जी दो वक्त नसीब हो जाए , वह गरीबी रेखा से नीचे भला कैसे गिना जा सकता है. फिर भी ३२ करोड़ भारतीय गरीबी रेखा के नीच न मालूम कहाँ से निकल आये .</div>
<div>अब राज परिवार द्वारा निर्धारित &#8216; दो जून की रोटी&#8217; के आधार पर हमारे राज भक्त कांग्रेसी हुक्मरान गरीबी रेखा खींचते चले आ रहे हैं. सन २००० में ग्रामीणों के लिए ३२८/- प्रति माह और शहरियों के लिए ४५४/- प्रतिमाह निर्धारित हुए और २००४ आते आते विकराल महंगाई को विचारते  हुए इसे क्रमशय: ४५४ और ५४० कर दिया गया .</div>
<div>मनमोहन जी ने आज इसे जब प्रति दिन २६/- -३२/- कर दिया तो हमारे मिडिया वाले मंहगाई का रोना रो रहे हैं &#8230; और अपना भूल गए जब हुक्मरानों के साथ संसद की कैंटीन में  १/- का चाए का कप, २/- में खाना, १/- में चपाती और वह भी &#8216;पवार&#8217; की भांति फूली हुई , डेढ़ रूपए में दाल की कटोरी ,५.५० /- में सूप का प्याला , ४/- में चिदम्बरम शाही डोसा ,८/- में अब्दुल्लाह शाही बिरियानी , २४.५० /- मनमोहन शाही पंजाबी मुर्गा और १३/- में राजा शाही फिश प्लेट &#8230;मज़े ले ले कर खाते हैं.</div>
<div>जब देश पर राज करने वाले हमारे सांसद जिनकी अपनी तनखाह मात्र ८००००/- प्रति माह है और बिना टैक्स के लाखों की अन्य सुविधाएं सो अलग , इतने सस्ते भोजन को पूरे प्यार और सत्कार से चुप चाप खा लेते हैं तो फिर इन गरीबी रेखा से नीचे वालों को २६/- और ३२/- रूपए में गुज़र बसर करने में क्या तकलीफ है. फिर हमारी महारानी उनके लिए एक और बिल लाने जा रहीं हैं &#8216;राईट टू फ़ूड &#8216; ताकि खाने पर सबका हक़ हो &#8211; हमारे सांसदों की भांति &#8230;  फिर भी यदि कोई गरीबी  रेखा से नीचे ही जीने का शौक पाले बैठा हो तो हमारे अमूल बेबी &#8230; &#8216;राजकुमार&#8217; क्या कर सकते हैं. बकौल ग़ालिब &#8230;.</div>
<div>वह  रे   ग़ालिब  तेरी फाका   मस्तियाँ</div>
<div>वो खाना सूखे टुकड़े भिगो कर शराब में</div>
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		<title>कहाँ गया वो बचपन, छिन गया वो बचपन</title>
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		<pubDate>Fri, 25 Mar 2011 15:48:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>श्याम एन रंगा</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवन बीमा]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[इक्कड़ बिक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरा सौ &#8230;&#8230;&#8230;पोसम्बा भाई पासेम्बा डाकिये ने क्या किया&#8230;&#8230;.. ये वो शब्द है जो आजकल गली मौहल्लों में सुनने को नहीं मिलते हैं। इन शब्दों के साथ बच्चों का बचपन निकलता था और बच्चे ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a rel="attachment wp-att-14571" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7-miscellaneous/%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%aa%e0%a4%a8-%e0%a4%9b%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a5%8b/attachment/bachpan/"><img class="alignleft size-medium wp-image-14571" title="bachpan" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/bachpan-300x219.jpg" alt="" width="300" height="219" /></a>इक्कड़ बिक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरा सौ &#8230;&#8230;&#8230;पोसम्बा भाई पासेम्बा डाकिये ने क्या किया&#8230;&#8230;..</p>
<p>ये वो शब्द है जो आजकल गली मौहल्लों में सुनने को नहीं मिलते हैं। इन शब्दों के साथ बच्चों का बचपन निकलता था और बच्चे इस तरह के सैकड़ों शब्दों के साथ अपना बचपन भरूपर जीते थे। आजकल ये शब्द सुनने को नहीं मिलते हैं। हमने विकास के साथ क्या पाया और क्या खोया कि अगर गणना करें तो बच्चों के हिस्से से हमने उनका बचपन छीन लिया है और उनके बचपन को हमने यांत्रिक बचपन बनाकर रख दिया है। याद करो वो दिन जब आप और हमारे जेसे बच्चे सुबह और शाम को अपने मौहल्ले में टोलिया  बनाकर घूमा करते थे और दुनिया भर की चिंता से मुक्त होकर खुले आसमान में कभी गिल्ली डंडा खेला करते थे तो कभी किसी बाग में लुका छिपी का खेल खेलकर अपने साथियों को ढूँढा  करते थे। बचपन की वो यादें आज भी हमारे जेहन में ऐसे ताजा है कि उनको याद कर हम आज भी खुद को तरोताजा महसूस करते हैं।</p>
<p>एक समय था जब बचपन खेल खेल में निकल जाता था और बचपन का मतलब ही खेल खिलौनों से लगाया जाता था। हर गली मौहलले में बच्चों की टोलियां अलग अलग खेल खेला करते थे। कोई लुका छिपी खेलता तो कोई पकड़ा पकड़ी, गिल्ली डंडा का खेल तो बच्चों का सबसे प्रिय खेल हुआ करता था। इसी के साथ लंगड़ी खेलना, लोहे और लकड़ी का खेल खेलना, पेल दूज का खेल, धाड़ धुक्कड़ का खेल, गुड़डे गुडि़डयों की शादी करना आदि आदि बहुत से ऐसे खेल थे जिनके माध्यम से बच्चे खेल खेल में बड़े हो जाते और समाज की सामाजिकता को सीखते थे।</p>
<p>याद करो वो अपने शहर में बारिस का आना और वो कागज की कश्तियाँ  बनाकर पानी में छोड़ना और उस कष्ती के पीछे पीछे जब तक जाना जब तक कि वह कष्ती दम न तोड़ दे । याद करो वो तेज आॅंधियों में कागज से बनी पतंगों को उड़ाना और आनन्द लेना। कितना खुषगवार होता था वह सब । कितना शानदार और यादगार रहा है हमारा बचपन । पर आज के बच्चों के नसीब में यह बचपन नहीं है, उनके पास कम्प्यूटर है, टीवी है, विडियोगेम है और आधुनिक साजो सामान के बने यंत्र है खिलौने है पर नहीं है तो कष्ती वो पतंग और वो अल्हड़पन और वो बचपना।</p>
<p>वर्तमान परिदृष्य पर गौर फरमाए तो हमें पता चलता है कि हमने विकास की इस दौड़ में बच्चों से बचपन छिन लिया है और उनके सिर पर स्कूल के बैग का इतना बोझ डाल दिया है कि आजकल के बच्चों की अल्हड़ता और नाजुकता इन बस्तों को बोझ में दब कर रह गई है। आज किसी  भी गली मोहल्ले में बच्चे आपको खेलते नजर नहीं आएंगे। आजकल का बच्चा टीवी के सामने सीरियल देखता है, कार्टून की फिल्म देखता है,  टीवी फिल्म देखता है और गेम्स पीरियड में थोपा हुआ गेम खेलकर अपनी दिनचर्या पूरी करता है।</p>
<p>क्या यह स्थितियां  बच्चों के लिए लाभदायक है। इस पर गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता  है। ?</p>
<p>पिछले दौर में गली मौहल्ले में खेलकर बच्चा सामाजिकता सीखता था आपस में मिलकर रहना  प्रेम, भाईचारा और समाज में रहने का तरीका सीखता था। वह खेल खेल में अपने पूरे मौहल्ले और पड़ौसी को जान जाता और वह बच्चा पूरे मौहल्ले का बच्चा माना जाता था। आज जो सामाजिक स्तर गिरा है और नैतिकता में जो कमी आई है और व्यक्ति ने स्व की कोटर में रहना सीखा है इसका मूल कारण एक यह भी है कि हमने बच्चों को उनके स्वाभाविक खेलों से दूर कर लिया। हमने उसको एकाकीपन से भरे खेल दिए जिन्हे खेलकर वह स्वयं एकाकी होता जा जाता है उसे पता नहीं कि पड़ोस में कौनसा उसकी हमउम्र का बच्चा रहता है और उसको उससे दोस्ती करनी है। उसे यह तो पता है कि आज किस कार्टून चैनल पर कौनसा सीरियल आएगा और आईपीएल खेलों का कलेण्डर क्या है लेकिन वह यह नहीं जानता कि उसका मौहल्ला कितना बड़ा है और उसमें कौन कौन रहते हैं। कम्प्यूटर पर बैठकर दुनिया भर की खबर रखने के चक्कर में वह अपने पड़ौस से अनजान रह जाता है। जिन खेलों के माध्यम से पूरे समाज में उसका प्रवेष होना था वह द्वार अब उसके पास नहंी रहा है और यही कारण है कि मौहल्ले का होने वाला यह बच्चा अब शर्मा जी, वर्माजी, सक्सेनाजी का बच्चा होकर रह गया है।</p>
<p>खेल जीवन में अनुषासन तो सीखाते ही है साथ ही साथ खेलों के माध्यम से बच्चे के व्यक्तित्व का भी विकास होता है। लेकिन बंद कमरे में विडियोगेम पर खेले जाने वाले खेलों के माध्यम से आजकल के बच्चे ने अपने बचपन को खो दिया है और वह बच्चा बड़ा होकर अपने ही समाज में अकेला महसूस करता है।</p>
<p>आप इमानदारी से अपने आस पास के घर परिवार के माहौल पर नजर डाले और अपने आप के बचपन से अपने आज के बच्चे के बचपन की तुलना करें तो शायद जो बात में कहना चाह रहा हूँ  वह अपने आप आपके समझ में आ जाएगी।जरूरत है आज के बच्चे को स्व की कोटर से निकाल कर सामाज के उस पटल पर रखने की जहाँ समग्र समाज उसे अपना परिवार लगे और वह अपने बचपन से ही वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के साथ बड़ा हो और एक जिम्मेदार नागरिक बने ।किसी कवि की कही ये पंक्तिया के साथ मैं अपनी बात को विराम देना चाहॅंगा: -ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो , भले छिन लो मुझसे मेरी जवानी,मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज की कष्ती वो बारिस का पानी&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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		<title>वर्तमान विकास का ढांचा मानव समाज के विनाश का कारण बन सकता है</title>
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		<pubDate>Sat, 19 Feb 2011 04:56:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवन बीमा]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[नन्दकिशोर शर्मा उदयपुर जंगल, जमीन, पेड़ एवं पर्यावरण को बचाने से ही भविष्य को बचाया जा सकता है। विश्व की कई समृृद्ध सभ्यतां एवं समाज महज इसीलिए नष्ट हो गए क्योंकि उन्होंने पर्यावरण की उपेक्षा की। बढ़ा रहा है वर्तमान ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a rel="attachment wp-att-13724" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7-miscellaneous/%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a2%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be/attachment/dsc_6932/"><img class="alignleft size-medium wp-image-13724" title="DSC_6932" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/DSC_6932-300x198.jpg" alt="" width="300" height="198" /></a>नन्दकिशोर शर्मा</p>
<p>उदयपुर</p>
<p>जंगल, जमीन, पेड़ एवं पर्यावरण को बचाने से ही भविष्य को बचाया जा सकता है। विश्व की कई समृृद्ध सभ्यतां एवं समाज महज इसीलिए नष्ट हो गए क्योंकि उन्होंने पर्यावरण की उपेक्षा की। बढ़ा रहा है वर्तमान विकास का ढांचा प्रदूषण को और यह  वर्तमान मानव समाज के विनाश  का कारण बन सकता है। जिम्मेदार नागरिकता से ही इस आसन्न संकट को दूर किया जा सकता है।</p>
<p>यह विचार पूर्व विदेश सचिव जगत एस मेहता ने गुरूवार को डाॅ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से आयोजित नागरिक  संवाद में व्यक्ति किए।</p>
<p>विख्यात लेखक जे. डायमण्ड की पुस्तक ‘‘कोम्पलेक्स’’ का विशद विश्लेषण करते हुए मेहता ने कहा कि ‘टूस्टर आइलैण्ड‘ जैसी समृद्ध व विकसित  सम्भयता का आज नामोनिशान नहीं बचा है। अमेरिका के मोन्टाना, सहित हैनी इत्यादि  कहे स्थान है वहां कुछ हिस्से समृद्ध है- कुछ एक दम खराब।</p>
<p>माया जैसी सम्भतांए खराब  हालात में है।  भारत के पडौस में नेपाल की हालात बदतर होती जा रही है, जबकि भूटान एक खुशहाल व समृद्ध देश है।</p>
<p>मेहता ने कहा कि इन सबके  पीछे मूल कारण जंगलों का विनाश तथा भारी प्रदूषण हैं पानी, मिट्टी सभी  प्रदूषित होते जा रहे है।  महात्मा गांधी के सिद्धान्तों पर चलकर  तथा एक सचेत आशावाद से हम सम्भ्यताओं का विनाश  रोक सकते है।</p>
<p>संवाद में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एम.एस. अगवानी ने कहा कि  व्यक्ति की बढ़ती लालच व स्वार्थ प्रवृति समस्त  संकटों का मूल ह) स्वतंत्रता सैनानी एम.पी. वया तथा विद्याभवन के अध्यक्ष रियाज  तहसीन ने कहा कि स्वेच्छिकता जैसे मूल्यों को व्यापक करने की आवश्यकता है। वरिष्ठ नागरिक मोहनसिंह कोठारी तथा किशोर सैन ने आध्यामित्क एवं मानव मूल्यों की ताकत  को रेखाकिंत किया।  संवाद में सुशील दशोरा, ए.बी. पाटक ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन नन्दकिशोर शर्मा ने किया। संवाद की अध्यक्षता  वियज सिंह मेहता ने की।</p>
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		<title>कैंसर के चंगुल में राघोपुर प्रखंड</title>
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		<pubDate>Sun, 12 Dec 2010 06:11:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>ब्रज किशोर सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवन बीमा]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[कैंसर के चंगुल में राघोपुर प्रखंड]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<div><a rel="attachment wp-att-11337" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7-miscellaneous/%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%98%e0%a5%8b%e0%a4%aa%e0%a5%81/attachment/cancer/"><img class="alignleft size-full wp-image-11337" title="cancer" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/cancer.jpg" alt="" width="200" height="126" /></a>मैं पिछले एक सप्ताह से  अपने सबसे छोटे ४५ वर्षीय चाचा के श्राद्ध के सिलसिले में अपने गाँव में  था.पटना के पार्श्व में स्थित राघोपुर प्रखंड के जुड़ावनपुर बरारी गाँव  में.एक ऐसे प्रखंड और गाँव में जहाँ कैंसर (हिंदी में केंकड़ा) धीरे-धीरे  महामारी का रूप लेता जा रहा है.यहाँ के चापाकल अमृत के बदले नीला जहर  आर्सेनिक उगल रहे हैं.मेरे चाचा सहित कुछ की इसके चलते अकालमृत्यु हो चुकी  है तो कुछ की जिंदगी में अब चंद दिन ही शेष बच गए हैं.दुर्भाग्यवश इस  बीमारी से ग्रस्त और मृत व्यक्तियों में ज्यादा संख्या किशोरों,युवाओं और  अधेड़ो की है.उदाहरण के लिए मेरे पड़ोसी पंचायत चकसिंगार के मुखिया  जवाहरलाल राय का १८ वर्षीय भतीजा कारू के कैंसर का ईलाज इस समय महावीर  कैंसर अस्पताल,पटना में चल रहा है.यह किशोर इन दिनों कीमोथेरेपी के दर्दनाक  दौर से गुजर रहा है.मेरे चाचा की तरह ही उसके पेट में भी भयंकर दर्द हो  रहा था.जांच के बाद पता चला कि उस नौनिहाल को कैंसर हो गया है.अभी तो उसने  जिंदगी जीना शुरू भी नहीं किया था कि अचानक जिंदगी की शाम हो गई.डॉक्टर अभी  भी इसको लेकर निश्चिन्त नहीं हैं कि वह कुछ और सालों के लिए भी ठीक हो  पाएगा कि नहीं.इसी प्रकार मेरे गाँव में ही कई अन्य लोग अचानक पेट दर्द और  बुखार होने के बाद मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं.यहाँ मैं यह भी बताता  चलूं कि लगभग मेरे पूरे गाँव में लोगों के सिरों और पैरों पर वैसे चकत्ते  उभर रहे हैं जिनका सीधा सम्बन्ध आर्सेनिक युक्त जल से हो सकता  है.बांग्लादेश में भी देखा गया है कि बाद में यही चकत्ते विकसित होकर कैंसर  में बदल जाते हैं.मेरे मृत चाचा के शरीर पर भी पिछले कई सालों में ऐसे ही  चकत्ते उभर आए थे.कुछ ही महीने पहले जब जढुआ,हाजीपुर में जहाँ मैं इस समय  निवास करता हूँ में पेय जल की जाँच की गई थी तो उसमें आर्सेनिक की मात्रा  निर्धारित सुरक्षित मात्रा से ५० गुना ज्यादा पाई गई थी.यहाँ बर्तनों में  धीरे-धीरे हल्की उजली परत जम जाती है.लेकिन मैंने अपने गाँव में पाया कि  पानी इतना ज्यादा प्रदूषित है कि मात्रा महीने-२ महीने में ही बाल्टियों  में मोटी नीली-पीली परत जम जाती है.इस बात से भी यह अनुमान सहजता से लगाया  जा सकता है कि वहां के पानी में कितना ज्यादा आर्सेनिक है.गाँव के कुछ  लोगों ने बताया कि आर्सेनिक रहित पेयजल के लिए कई विशेष प्रकार के चापाकल  भी सरकार की तरफ से गडवाए गए हैं लेकिन आश्चर्य की बात है कि इनका पानी और  भी ज्यादा गन्दा और प्रदूषित है.विशेष चापाकल लगाने के बाद अब तक कोई  डॉक्टर या अधिकारी पानी की जाँच करने नहीं आया है और न ही सरकार की तरफ से  कैंसर रोगियों की जाँच के लिए चिकित्सा-शिविर ही लगाया गया है.केंद्र सरकार  ने तो संसद में भी स्वीकार किया है कि समस्त गांगेय क्षेत्र के पानी में  कहीं कम तो कहीं ज्यादा मात्रा में आर्सेनिक आ रहा है.फ़िर भी न तो केंद्र  और न ही राज्य सरकार की तरफ से ही इस नीले जहर से दियारे में रहनेवाले  लाखों लोगों को बचाने का कोई प्रयास किया जा रहा है.पिछले दो सालों से  बरसात नहीं होने से इस अति पिछड़े ईलाके की अर्थव्यवस्था तो पहले से ही चौपट  हो चुकी है.फ़िर ऎसी स्थिति में कैंसर जैसी महँगी बीमारी का ईलाज लोग कहाँ  से करवाएं?इसलिए खुद मेरे चाचा ने ईलाज नहीं करवाना और बिना किसी को बताए  मौत को गले लगाना ज्यादा श्रेयस्कर समझा.अगर केंद्र और राज्य सरकार अब भी  नहीं जागती है और आर्सेनिक-रहित पानी का ईंतजाम नहीं हो पाता है तो वह समय  भी जल्दी ही आ जाएगा जब राघोपुर में लाशों को जलाए बिना ही गंगा में फेंकना  पड़ेगा क्योंकि इस दियारे में वैसे ही लकड़ी की किल्लत रहती है.</div>
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		<title>कष्ट की विषय-वस्तु है जीवन बीमा</title>
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		<pubDate>Tue, 09 Nov 2010 16:15:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>ब्रज किशोर सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवन बीमा]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[बीमा कष्ट की विषय-वस्तु है]]></category>

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		<description><![CDATA[जीवन का कोई ठिकाना नहीं.कब क्या हो जाए कोई नहीं जानता.इसी अनिश्चितता ने जन्म दिया बीमा के व्यवसाय को.निश्चित रूप से बीमा कम्पनियों ने लाखों-करोड़ों घरों को उजड़ने से बचाया है.बीमा अच्छी चीज है इस पर तो विवाद हो भी ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-10293" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7-miscellaneous/%e0%a4%95%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a4%af-%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8/attachment/lic-logo1/"><img class="alignleft size-full wp-image-10293" title="Lic logo1" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Lic-logo1.jpg" alt="" width="102" height="119" /></a>जीवन का कोई ठिकाना नहीं.कब क्या हो जाए कोई नहीं जानता.इसी अनिश्चितता ने  जन्म दिया बीमा के व्यवसाय को.निश्चित रूप से बीमा कम्पनियों ने  लाखों-करोड़ों घरों को उजड़ने से बचाया है.बीमा अच्छी चीज है इस पर तो विवाद  हो भी नहीं सकता;लेकिन बीमा-एजेंटों की खुदगर्जी के चलते बीमा गले का फाँस  भी बन सकती है.अचानक आपके घर कोई पूर्व परिचित व्यक्ति आ धमकता है.एक  बड़ा-सा बैग लेकर और इतनी मीठी बातें करना शुरू करता है कि आप उसे अपना  सबसे बड़ा शुभचिंतक मान बैठते हैं.आपके दिलों-दिमाग पर कब्ज़ा कर चुकने के  बाद वह धीरे से आपके सामने बीमा करवाने का प्रस्ताव रख देता है.पहली बार  में आप फँस गए तो ठीक नहीं तो वह आपसे विचार करने का आश्वासन लेकर चल देता  है और जब दोबारा आता है तो १-२ किलोग्राम अपने खेत में उपजी गोभी,आलू या  कोई अन्य खाद्य-सामग्री लेकर आता है.अब तो आपको फंसना ही है.आप कहते हैं कि  मेरा बीमा कर दो तो वह आपको बच्चों का बीमा कराने से होनेवाले लाभों को  गिनाने लगता है.आप भी मान लेते हैं कि इसी में आपका फायदा है लेकिन आपको यह  पता नहीं होता कि इसमें आपसे ज्यादा उसका फायदा होने वाला है.बच्चा ज्यादा  दिन तक जिएगा और एजेंट को ज्यादा दिनों तक बोनस/कमीशन प्राप्त होता  रहेगा.यानी कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना.कभी-कभी एजेंट धार्मिक  प्रवृत्ति का प्रदर्शन कर (बगुला भगत बनकर) भी आपको प्रभावित करने का  प्रयास कर सकता है.जब तक तीन प्रीमियम जमा नहीं हो जाता तब तक हो सकता है  वह पैसा जमा करने के लिए समय पर हाजिर हो जाए.तीन प्रीमियम तक उसे आपके  द्वारा जमा राशि पर सीधे कमीशन प्राप्त होता है.कई बार हो सकता है कि एजेंट  पहले प्रीमियम की राशि ही आपसे झटककर दुर्लभ हो जाए.अब आप आगे पैसा जमा  करें या न करें आपकी बला से,उसे तो प्रथम जमा से १० से ४०% तक का कमीशन  प्राप्त हो ही गया.एक बात और आप जब भी बीमा कराएँ सालाना ही कराएँ नहीं तो  आपको प्रत्येक ३ या ६ महीने पर खुद एलआईसी कार्यालय जाने का दुर्भाग्य  प्राप्त हो सकता है.कई बार ऐसा भी होता है कि जब तक आपसे और पॉलिसी  मिलने की सम्भावना रहती है एजेंट आता रहता है और जैसे ही आपकी आर्थिक  स्थिति ख़राब हुई गदहे की सिंग की तरह गायब हो जाता है.ये सिर्फ सुख के  साथी होते हैं.दुःख की घड़ियों में कन्धा देने के बजाये पीठ दिखा जाते  हैं.एक बार मेरा एक बीमा एजेंट कई बार समय देने के बाद ठीक ३१ मार्च को  यानी वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन हाजिर हुआ और भीड़ का हवाला देते हुए मुझे  साथ चलने को कहा.उसके बाद जो हुआ उसे मैं याद तो नहीं करना चाहता लेकिन  व्यापक जनहित में बताये देता हूँ.माशाल्लाह तब मैंने सचमुच का किशोर हुआ  करता था अब सिर्फ नाम का रह गया हूँ.मुझे अपनी ताकत पर स्वाभाविक तौर पर  अभिमान था.एक पंक्ति में चिपक गया.अब पंक्ति खिसकने का नाम ही नहीं ले रही  थी.मेरे अलावा पंक्ति में खड़े सारे लोग एजेंट थे और थोक में रसीद कटवा रहे  थे.दिन तो रोज ही ढलता था और आज भी ढलता है लेकिन उस दिन वक़्त गुजरने का  नाम ही नहीं ले रहा था.सूरज जब अपनी समस्त प्रकाशराशि  समेट कर जाने लगा तब  जाकर मेरी बारी आई.घुटनों में जोश की जगह दर्द भर गया था और पेट में चूहे  दंड पेलने लगे थे.किसी तरह जान बच सकी.कहाँ तो जीवन को जोखिम से बचाने के  लिए बीमा कराया और कहाँ यही बीमा जान जाने का कारण बनते-बनते रह गई.तो  श्रीमान अगर आपके घुटनों में दम हो तभी करवाईये बीमा.सरकार ने जनता की  सुविधा को ध्यान में रखते हुए जगह-जगह संग्रह केंद्र खोल दिए हैं.लेकिन  यहाँ भी खुद जमा करने जाने में कम परेशानी नहीं.हो सकता है आप जिस संग्रह  केंद्र पर जमा करने जाएँ वहां का लिंक फेल हो.बार-बार जाने पर भी कैडबरी के  विज्ञापन के पप्पू की तरह फेल ही मिले.इन परिस्थियों में आपको सब कामकाज  छोड़कर कई-कई बार संग्रह केंद्र के चक्कर काटने पड़ सकते हैं.तब आप अपने आपको  अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में फँसा हुआ महसूस करेंगे,ठीक मेरी तरह.हाथ तो  डाल दिया अब निकालें कैसे?चिंता करने से कोई लाभ नहीं आयु के साथ-साथ आपकी  बुद्धि भी क्षीण होगी और खुदा न करे मर-मरा गए तो आपको कुछ नहीं  मिलेगा,परिवार मालामाल जरूर हो जाएगा.जैसे हर समस्या का समाधान होता है उसी  तरह इसका भी समाधान है और वह है सरकार यानी केंद्र के हाथों में.केंद्र को  चाहिए कि वह संशोधन करके ऐसा प्रावधान कर दे कि जिससे पोस्ट ऑफिस  एजेंटों की तरह बीमा एजेंटों को भी तभी कमीशन या बोनस का लाभ मिले जब वो  खुद जमा कराने जाएँ अन्यथा यह राशि ग्राहक को ही दे दी जाए,आखिर वह बेवजह  घुटनों का दर्द जो सहता है.अभी तो भैया सीधे माल महाराज के मिर्जा खेले  होली वाली स्थिति है.और अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो उसे विज्ञापित कर यह  कहने का कोई अधिकार नहीं है कि बीमा आग्रह की विषय-वस्तु है.बल्कि इसके  बदले यह प्रसारित/प्रकाशित करना चाहिए कि बीमा कष्ट की विषय-वस्तु है.</p>
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		<title>किस्सा देहदान का</title>
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		<pubDate>Thu, 30 Sep 2010 05:11:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>R K KHURANA</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवन]]></category>
		<category><![CDATA[जीवन बीमा]]></category>
		<category><![CDATA[विविध]]></category>
		<category><![CDATA[heart transplant]]></category>
		<category><![CDATA[life]]></category>
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		<category><![CDATA[देहदान]]></category>

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		<description><![CDATA[जब टी वी और बीवी दोनो नाराज़ हों तों समय काटना मुश्किल हो जाता है ! हमारे यहां तो लाईट थी परंतु केबल वाले की कालोनी की बत्ती गुल होने के कारण हमारा 32” का टी वी हमें अपने नीले ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h2 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal; font-size: 13.2px;"><a rel="attachment wp-att-7923" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7-miscellaneous/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be/attachment/organ-donation7/"><img class="alignleft size-full wp-image-7923" title="Organ-Donation7" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/Organ-Donation7.jpg" alt="" width="257" height="256" /></a>जब टी वी और बीवी दोनो नाराज़ हों तों समय काटना मुश्किल हो जाता है ! हमारे यहां तो लाईट थी परंतु केबल वाले की कालोनी की बत्ती गुल होने के कारण हमारा 32” का टी वी हमें अपने नीले रंग के परदे में से 32 के 32 दांत निकाल कर हमारा मुंह चिढा रहा था ! बीवी को मुझसे हमेशा यह शिकायत रहती है कि मैं घर के काम में उसका हाथ नहीं बटाता ! झाडू-पोंछा से लेकर बर्तन तक सब उसी को करना पडता है !</span></h2>
<h2 style="text-align: justify;"><span style="font-weight: normal; font-size: 13.2px;">तभी दरवाजे की घंटी ने अपनी पुरानी आवाज में ट्रिनट्रिनाना शुरू कर दिया ! बाहर कोरियर वाला था ! सरकारी अस्पताल से एक लिफाफा आया था ! लिफाफे में मेरे द्वारा मरने के पश्चात शोध के लिए अपनी देह दान करने का फार्म था ! अस्पताल वालों ने मेरा फार्म यह कहकर लौटा दिया था कि उनके पास मृत-शरीर को रखने की जगह ही नहीं है !</span></h2>
<p style="text-align: justify;">लगभग एक वर्ष पहले एक भाई जी टाईप के नेता हमारी कालोनी में पधारे ! उन्होंने हमें बडी ज्ञान की बातें बताई ! साथ ही धार्मिक सोच से ऊपर उठ कर देहदान करने की प्रेरणा दी ! उन्होंने मरणोपरांत शरीर दान देने का महत्व समझाया और देह दान का संकल्प लिया ! शास्त्रों में कन्यादान को महादान बताया गया है ! आजकल रक्तदान की भी महानता है ! और अब देहदान&#8230;&#8230; ! तीन बेटियों की शादी करके कन्यादान का पुण्य कमा चुका हूं ! 5-6 बार रक्तदान भी कर चुका हूं ! परंतु देहदान का ख्याल कभी न आया ! सोचा विद्यार्थियों के शोध कार्य के लिए हम भी अपनी देह का दान करेंगे !</p>
<p style="text-align: justify;">अस्पताल में रिसेप्शन की कुर्सी खाली देखकर निराशा हुई ! तभी धवल वस्त्रों में एक ‘सिस्टर’ प्रकट हुई ! उसे रोककर मैंने अपने देहदान के शुभ विचार से अवगत कराया ! हमारी ओर बिना देखे एक कमरे की ओर इशारा करके वह दूसरी ओर चल दी !</p>
<p style="text-align: justify;">कमरे में एक सज्जन फाईलों के स्थान पर मेज़ पर समोसे, पेस्ट्री और चाय सजा कर उसका आनन्द लेते मिले ! मैंने उन्हें अपने आने का मकसद बताया ! उन्होंने मुंह में समोसा ठूंसते हुए बैठने का इशारा किया ! 15-20 मिनट तक उदरपूर्ति करने के पश्चात वो मुझसे मुखातिक हुए !</p>
<p style="text-align: justify;">“वो ऐसा है कि, अब बताईये आपकी समस्या क्या है ?”</p>
<p style="text-align: justify;">”मेरी कोई समस्या नहीं है ! मैं तो मरणोपरांत अपनी देह-दान करने आया हूं !” मैने उन्हें बताया !</p>
<p style="text-align: justify;">“अच्छा-अच्छा बाडी डोनेट करेंगें ?” उन्होंने अपने दांत में फसे समोसे के टुकडे को अपनी जीभ से पीछे ढकेल कर अंदर गटकते हुए कहा – “वो ऐसा है कि, उसके लिए आपको एक ‘विल फार्म’ भरना पडेगा !”</p>
<p style="text-align: justify;">”तो दे दीजिये फार्म मैं अभी भरकर दे देता हूं !” मैंने खुश होकर कहा !</p>
<p style="text-align: justify;">“वो ऐसा है कि, हमारे जो बडे बाबू हैं वो आज पी वी आर में अपनी पत्नी के साथ नई पिक्चर देखने गए हैं ! आप कल आईये !” उन्होंने रूखा सा जवाब दिया !</p>
<p style="text-align: justify;">“फार्म तो आप भी दे सकते हैं ! दे दीजिए मैं भर कर दे देता हूं !” मैंने आग्रह किया !</p>
<p style="text-align: justify;">“वो ऐसा है कि, फार्म बडे बाबू की अलमारी में हैं ! चाबी उनके पास ही है 1 आप कल आईये !” इतना कहकर वो सज्जन “अटैचड” वाशरूम में घुस गए !</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरे दिन भी बडे बाबू की कुर्सी खाली देखकर बहुत कोफ्त हुई ! कमरे में वही सज्जन मौजूद थे ! मैंने उन्हें नमस्कार करके फार्म मांगा !</p>
<p style="text-align: justify;">“वो ऐसा है कि, बडे बाबू दो-तीन दिन तक बिज़ी रहेंगें !” उन्होंने अपना पुराना तकिया कलाम दोहराते हुए बताया !</p>
<p style="text-align: justify;">”क्यों ?” मैंने किंचित क्रोध से पूछा !</p>
<p style="text-align: justify;">“वो ऐसा है कि, हमारे बडे साहब के डागी जी का कल हैप्पी बर्थ-डे है ! बडे बाबू बर्थ-डे पार्टी की व्यवस्था करने में व्यस्त हैं ! आप दो-तीन दिन बाद आईये !” उन्होंने दो टूक फरमान जारी कर दिया !</p>
<p style="text-align: justify;">”कमाल है ? हम यहां सेवा भाव से अपनी देह का दान करने आए हैं और आप लोग सरकारी नौकरी छोडकर साहबों की चापलूसी करने में लगे हैं ! कुत्ते का जन्म दिन&#8230;. ???” क्रोध से मेरा चेहरा लाल हो गया !</p>
<p style="text-align: justify;">“वो ऐसा है कि, हम लोग तो साहबों के रहमो करम पर ही जीते हैं !” उस सज्जन ने मुझे समझाया ! “हम लोगों की कांफिडेन्शिल रिपोर्ट तो बडे साहब ही बनाते हैं न ! अगर हम उनका कहना नहीं मानेंगें तो हमारे बच्चे तो भूखे ही मर जायेंगें !”</p>
<p style="text-align: justify;"><a rel="attachment wp-att-7925" href="http://www.janokti.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7-miscellaneous/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be/attachment/organ-tissue-donors-2/"><img class="alignright size-medium wp-image-7925" title="organ-tissue-donors" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/organ-tissue-donors1-300x300.gif" alt="" width="300" height="300" /></a>चोथे दिन बडे बाबू को कुर्सी पर बैठा देखकर जान में जान आई ! वो मोबाईल पर व्यस्त थे ! किसी से पैसे के लेन-देन की बात चल रही थी! बातों से लग रहा था कि सरकार की तरफ से मुफ्त दवाईयों की नई खेप आने वाली थी ! उसे ही बाज़ार में बेचने की डील चल रही थी ! लगभग आधे घंटे बाद साहब मेरी तरफ मुडे-“सर बताईये, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं !” उनके शब्दों में चाशनी घुली हुई थी !</p>
<p style="text-align: justify;">“मुझे देहदान के लिए फार्म चाहिए !” मैंने कहा !</p>
<p style="text-align: justify;">दो मिनट तक सोचने की मुद्रा में बैठे रहे ! फिर अलमारी में से एक फाईल निकाल कर कागज़ों का एक पुलिन्दा मुझे थमा कर बोले – “सर ज़रा इन सभी फार्मों की 10-10 फोटोकापियां करवा लाईये !”</p>
<p style="text-align: justify;">”देहदान के लिए इतने फार्म भरने पडेंगें क्या ?” मैं कागज़ों के ढेर को देखकर घबरा गया !</p>
<p style="text-align: justify;">”सर, आप इतनी बडी देह का दान करना चाहते हैं पर आपका दिल बहुत छोटा है !” बडे बाबू ने मुझे घूरते हुए कहा ! “आप इनकी फोटोकापी करवा कर लाईये फिर मैं आपको देहदान का सरल तरीका भी बताऊंगा !”</p>
<p style="text-align: justify;">जब मैं फोटोकापी करवा कर लाया तो उन फार्मों में से बडे बाबू ने एक फार्म निकाल कर मुझे पकडा दिया ! मुझे बहुत गुस्सा आया ! मैंने कहा –“आपने इस एक फार्म के लिए मुझसे इतने फार्मों की फोटोकापियां करवा ली ! मेरे 150 रूपये खर्च हो गए !”</p>
<p style="text-align: justify;">“सर क्या है न कि अस्पताल में फार्मों की, स्टेशनरी की और दवाईयों की हमेशा कमी बनी रहती है ! इसलिए हमें आप जैसे दानी महापुरूषों की सेवा लेनी पडती है ! सर, आप तो देह-दान करने जा रहे हैं फिर थोडे से पैसों का क्या लालच ? यह पैसे साथ थोडे ही जायेंगें !” बडे बाबू ने बनावटी हंसी हंसकर कहा !</p>
<p style="text-align: justify;">”क्यों ! सरकार आप लोगों को हर चीज़ देती है ! वो कहां जातीं है ?” मैंने रोष प्रकट किया !</p>
<p style="text-align: justify;">“सर क्या है न कि सरकार की तरफ से जो सामग्री हमें मिलती है उसके हिस्से तो पहले ही निश्चित हो जाते हैं ! हम आफिस की रूटीन के खिलाफ कोई भी काम नहीं कर सकते ! चपरासी से लेकर नेता तक ओहदे के हिसाब से सबका हिस्सा बंधा हुआ है !” बडे बाबू ने बडी ढीढता से उत्तर दिया ! “सर अभी मुझे बडे साहब की बीवी को क्लब छोडने जाना है ! आप घर जाईये और इतमिनान से बैठ कर पूरा फार्म भरकर ले आईये !”  इतना कहकर बडे बाबू तेजी से बाहर निकल गए !</p>
<p style="text-align: justify;">मैं फार्म भरकर खुश हुआ कि चलो आज यह काम भी निपट गया ! लेकिन फार्म देखकर बडे बाबू भडक उठे –“यह क्या सर, आपने पूरा फार्म तो भरा ही नहीं ! इस फार्म में यहां दो लोगों की गवाही की जरूरत है ! फिर उन दोनो गवाहों की और आपकी तरफ से एक हल्फिया ब्यान देना होगा जिसमें यह लिखा हो कि आप अपनी खुशी से देहदान कर रहे है किसी दबाव में नहीं और वो ब्यान मजिस्ट्रेट से अटैस्ट करवाना होगा ! तब यह फार्म जमा होगा !”</p>
<p style="text-align: justify;">“परंतु इसकी क्या आवश्यकता है ? मैं खुद आकर अपने हाथों से अपनी मर्जी से फार्म भर कर दे रहा हूं ! फिर इसमें शंका कैसी ?” मैंने प्रतिवाद किया !</p>
<p style="text-align: justify;">“सर, हम तो कानून के बन्धे हुए हैं ! इसके बिना फार्म जमा नहीं होगा !” बडे बाबू ने दो टूक निर्णय सुना दिया !</p>
<p style="text-align: justify;">अगले दिन कचहरी गए ! 15 रूपये वाला स्टाम्प पेपर 20 रूपये में मिला ! हल्फिया ब्यान टाईप करने वाले ने भी हमें खूब निचोडा ! मैजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर करवाने के लिए किसी वकील की गवाही भी जरूरी थी ! उसकी भी फीस अदा की ! रब रब करते शाम को पांच बजे जाकर काम पूर्ण हुआ !</p>
<p style="text-align: justify;">सारी औपचारिकतायें पूरी करके हम बडे बाबू के सामने खडे थे ! उन्होंने दोबारा फार्म का सूक्ष्म निरीक्षण किया ! आश्वस्त होकर एक पर्ची पर पावती देकर बोले – “सर, आपका फार्म जमा कर लिया है ! अब आप एक हफ्ते बाद आकर अपना डोनर कार्ड ले जाईयेगा ! वो डोनर कार्ड हमेशा आपको अपनी जेब में रखना होगा ! जिससे मृत्यु के पश्चात आपके रिश्तेदार डोनर कार्ड के साथ आपकी बाडी यहां सौंप सकें !”</p>
<p style="text-align: justify;">डोनर कार्ड लेकर हम खुश थे कि चलो मरने के बाद भी हमारा शरीर कई विद्यार्थियों का भला करेगा ! मैं मन ही मन उस दिन की कल्पना करने लगा जब मैं मरूंगा तो सभी साथी-सम्बन्धी राम नाम सत्य कहते हुए हमारी अर्थी अस्पताल के बरामदे में रखेंगें तो सभी डाक्टर दौडे दौडे आयेंगे और मेरे शरीर को बडी हिफाजत से रिसर्च रूम में चीर फाड कर नए विद्यार्थियों को बतायेंगें कि देखो यह दिल है, यह गुर्दा है आदि आदि !  कितनी जाने बचाने के लिए वे शोध कार्य करेंगें ! हमारी देह भी किसी के काम आयेगी यह सोच कर हम अन्दर ही अन्दर अपने आप पर गर्व मह्सूस कर रहे थे !</p>
<p style="text-align: justify;">अवसोस, आज वो इच्छा पत्र (विल फार्म) अस्पताल वालों ने हमें कोरियर के द्वारा वापिस भेज दिया था !</p>
<p style="text-align: justify;">हम फार्म लेकर अस्पताल पहुंचे और बडे बाबू से फार्म कोरियर से वापिस भेजने का कारण पूछा</p>
<p style="text-align: justify;">तो वो बोले &#8211; “सर बात ऐसी है कि हमारे बडे साहब के साले साहब की कोरियर की एजेंसी है ! सो अस्पताल के जितने भी डाक्यूमेंट हैं वो उनकी कोरियर से ही भेजे जाते हैं ! फार्म क्यों वापिस भेजा है इसका जवाब तो सर आपको बडे साहब ही देंगें ! आप उनसे मिल लीजिए !”</p>
<p style="text-align: justify;">हमने बडे साहब के सामने पेश होकर उनसे फार्म वापिस करने का कारण पूछा तो वे बिफर पडे  – “देखिए, बात ऐसी है कि हमारे पास केवल 40 शव रखने का प्रबन्ध है और हमारे पास 600 से अधिक फार्म जमा हो चुके हैं ! इसलिए हमने यह फार्म वापिस लौटाने शुरू कर दिए हैं !”</p>
<p style="text-align: justify;">“लेकिन जिन्होंने विल फार्म जमा करवाए हैं वो तो अभी जिन्दा हैं !” मैंने तर्क दिया ! “क्या आप ऐसा सोचते हैं कि 600 लोग जिन्होंने फार्म जमा करवाए हैं वो सारे अभी एक ही दिन में मर जांयेगे ?”</p>
<p style="text-align: justify;">”देखिए बात ऐसी है कि ग्राहक की तरह मौत का भी कोई भरोसा नहीं ! आप लोग तो आराम से अर्थी पर लेटकर अपने मुंह में डोनर कार्ड दबा कर यहां आ टपकेंगें ! हमारे लिए तो मुसीबत हो जायगी न ! हम आपके आत्मा विहीन शरीर को कहां कहां ढोते फिरेंगें ! इसलिए हम सबके फार्म वापिस लौटा रहे हैं !” बडे साहब ने अपने तेवर दिखाए !</p>
<p style="text-align: justify;">बडे साहब की बात सुनकर हमारा दिल टूट गया ! मरने का सारा जोश खत्म हो गया ! हमारा सारा उत्साह धरा का धरा रह गया ! हमारी मरने के इच्छा ही मर गई ! सोच रहे हैं कि अब मर कर क्या करेंगें ?</p>
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		<title>बच्चों की शिक्षा/ विवाह के लिए बीमा पॉलिसी LIC</title>
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		<pubDate>Wed, 18 Nov 2009 03:44:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[जीवन बीमा]]></category>
		<category><![CDATA[LIC]]></category>
		<category><![CDATA[jeevan bima]]></category>
		<category><![CDATA[jeevan sathi]]></category>
		<category><![CDATA[jeevan warsha]]></category>
		<category><![CDATA[एल.आई.सी. की पालिसियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[जीवन - आस्था.जीवन वर्षा]]></category>
		<category><![CDATA[बीमा पॉलिसी]]></category>
		<category><![CDATA[बीमा सुरक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय जीवन बीमा निगम]]></category>
		<category><![CDATA[शिक्षा और स्वास्थ्य की बीमा]]></category>

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		<description><![CDATA[&#160; शिक्षा आज के सर्वाधिक मँहगी आवश्यकताओं में से एक है। परिवार में सन्तान के आते ही उसकी उच्च शिक्षा अथवा (कन्या जन्म के मामले में उसके) विवाह की चिन्ता सताने लगती है। ऐसे में, भारतीय जीवन बीमा निगम की ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 class="post-title entry-title" style="text-align: justify;">&nbsp;</h3>
<h3 class="post-title entry-title" style="text-align: justify;"><a href="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/homeowners-insurance-91.jpg"><img alt="homeowners-insurance-9" class="aligncenter size-medium wp-image-1121" height="300" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2009/11/homeowners-insurance-91-269x300.jpg" title="homeowners-insurance-9" width="269" /></a></h3>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	शिक्षा आज के सर्वाधिक मँहगी आवश्यकताओं में से एक है। परिवार में सन्तान के आते ही उसकी उच्च शिक्षा अथवा (कन्या जन्म के मामले में उसके) विवाह की चिन्ता सताने लगती है। ऐसे में, भारतीय जीवन बीमा निगम की &lsquo;शिक्षा/विवाह बन्दोबस्ती पॉलिसी&rsquo; (तालिका 90) पिता/माता को इस चिन्ता से मुक्त करने में सहायक होती है। भारतीय जीवन बीमा निगम की यह पॉलिसी उन लोगों के लिये &lsquo;आदर्श पॉलिसी&rsquo; है जो अपनी सन्तान की शिक्षा अथवा विवाह के लिये एक सुनिश्चित समय पर सुनिश्चित आर्थिक व्यवस्था करना चाहते हैं।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	पॉलिसी अवधि के दौरान पॉलिसीधारक के जीवन पर बीमा धन के बराबर रिस्क कवरेज उपलब्ध रहता है और दुर्घटना-मृत्यु की स्थिति में यह कवरेज बीमा धन से दुगुना होता है । पॉलिसी अवधि पूरी होने पर पॉलिसीधारक को मूल बीमा धन की राशि तथा पॉलिसी अवधि की बोनस राशि (तथा अन्तिम-अतिरिक्त बोनस राशि, यदि कोई देय हो तो) का भुगतान किया जाता है ।</p>
<p>	पॉलिसी अवधि के दौरान यदि दुर्भाग्यवश पॉलिसीधारक की मृत्यु हो जाए तो -</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	<span style="color: rgb(255, 0, 0);">1. सामान्य मृत्यु की दशा</span> में नामित व्यक्ति को तत्काल तो कोई भुगतान नहीं मिलेगा किन्तु पॉलिसी की अवधि पूरी होने के दिनांक को उपरोक्त वर्णित समस्त धन राशि (अर्थात् मूल बीमा धन की रकम तथा सम्पूर्ण पॉलिसी अवधि की बोनस राशि तथा अन्तिम-अतिरिक्त बोनस राशि (यदि कोई देय हो तो) का भुगतान नामित व्यक्ति को मिलेगा ।</p>
<p>	<span style="color: rgb(255, 0, 0);">2. दुर्घटना मृत्यु की दशा में</span> मूल बीमा धन के बराबर राशि का भुगतान नामित व्यक्ति को तत्काल किया जाएगा तथा पॉलिसी अवधि पूरी होने पर उपरोक्त वर्णित समस्त रकम नामित व्यक्ति को पुनः भुगतान की जाएगी ।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	अर्थात्, पॉलिसी अवधि पूरी होने से पहले, पॉलिसीधारक की अकस्मात मृत्यु के बाद उसकी सन्तान की शिक्षा/विवाह के लिये पॉलिसीधारक द्वारा निर्धारित की गई अवधि पर एक सुनिश्चित रकम उपलब्ध कराने की सुनिश्चित व्यवस्था यह पॉलिसी उपलब्ध कराती है ।</p>
<p>	<span style="color: rgb(255, 0, 0);">उदाहरण </span>- 27 वर्षीय &lsquo;श्रीमान् क&rsquo; आज एक बिटिया के बाप बने हैं। उनका अनुमान है कि उसके 23वें वर्ष में वे उसका विवाह कर देंगे। इस हेतु वे 23 वर्ष की अवधि के लिए 5 लाख रुपये बीमाधन की यह पॉलिसी लेते हैं। इसकी वार्षिक प्रीमीयम होगी रुपये 20,088/- अर्थात् वे 23 वर्षों तक, 20,088/- रुपये प्रति वर्ष चुकाएँगे। पॉलिसी अवधि पूरी होने पर उन्हें परिपक्वता राशि रुपये 13,37,000 (अनुमानित) का भुगतान मिलेगा। इस राशि में मूल बीमाधन की रकम रुपये 5 लाख, 23 वर्षों के बोनस की अनुमानित रकम रुपये 5,52,000 तथा अन्तिम-अतिरिक्त बोनस की अनुमानित रकम रुपये 2,85,000 शामिल है। (बोनस की गणना, भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा वर्ष 2007-08 के लिए घोषित बोनस दरों के आधार पर की गई है।) </span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	&lsquo;श्रीमान् क&rsquo; को, किश्तों की रकम पर आय कर अधिनियम की धारा 80 सी के अन्तर्गत आय कर छूट मिलेगी तथा परिपक्वता पर मिलने वाली सम्पूर्ण राशि, आय कर अधिनियिम की धारा 10 (10) (डी) के अन्तर्गत आय कर से मुक्त होगी।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	इस 23 वर्षों की अवधि के दौरान &lsquo;श्रीमान् क&rsquo; के जीवन पर सामान्य मृत्यु की दशा में 5 लाख रुपयों का तथा दुर्घटना मृत्यु की दशा में 10 लाख रुपयों का रिस्क कवरेज उपलब्ध रहेगा। अर्थात् 23 वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले यदि, परिवार के दुर्भाग्य से &lsquo;श्रीमान् क&rsquo; की मृत्यु हो गई तो -</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	(1) <span style="color: rgb(255, 0, 0);">सामान्य मृत्यु </span>होने पर, &lsquo;श्रीमान् क&rsquo; के नामित व्यक्ति को तत्काल कोई भुगतान नहीं मिलेगा। चूँकि बीमित व्यक्ति (अर्थात् &lsquo;श्रीमान् क&rsquo;) की मृत्यु हो चुकी है सो प्रीमीयम जमा कराने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। किन्तु शेष अवधि के लिए पॉलिसी पूरी तरह प्रभावी मानी जाएगी (अर्थात्, उसे बोनस की पात्रता मिलती रहेगी) और निर्धारित परिपक्वता दिनांक को, &lsquo;श्रीमान् क&rsquo; के नामित व्यक्ति को उपरोल्लेखित राशि (अनुमानित 13 लाख 37 हजार रुपये) का भुगतान किया जाएगा।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	(2) यदि &lsquo;श्रीमान् क&rsquo; की <span style="color: rgb(255, 0, 0);">मृत्यु </span>किसी <span style="color: rgb(255, 0, 0);">दुर्घटना के कारण</span> हुई है तो मूल बीमा धन (रुपये 5 लाख) के बराबर की रकम का भुगतान, &lsquo;श्रीमान् क&rsquo; के नामित व्यक्ति को तुरन्त कर दिया जाएगा और पॉलिसी की निर्धारित परिपक्वता दिनांक को, &lsquo;श्रीमान् क&rsquo; के नामित व्यक्ति को उपरोल्लेखित राशि (अनुमानित 13 लाख 37 हजार रुपये) का भुगतान फिर से किया जाएगा।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	<span style="color: rgb(255, 0, 0);">विशेषता &#8211; </span></span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	इस पॉलिसी का भुगतान या तो (परिपक्वता पर) स्वयम् पॉलिसीधारक को मिलेगा या फिर (पॉलिसीधारक की मृत्यु हो जाने की दशा में) उसके नामित व्यक्ति को मिलेगा। </span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	सामान्य मृत्यु के बाद तत्काल भुगतान न मिलने से, बीमा से मिलने वाली रकम के अनुचति उपयोग (यथा मृत्यु-भोज जैसी उत्तर क्रियाओं में) होने की आशंका नहीं रह पाती है।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	भुगतान सन्तान को न मिलने से भी, उसके अनुचित उपयोग की आशंक स्वतः नष्ट हो जाती है।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	सन्तान के विवाह के लिए अवधि का अनुमान ही लगाया जा सकता है। यदि बीमा पुत्री का हो और पॉलिसी परिपक्वता से पहले ही उसका विवाह हो जाए तो, विवाहोपरान्त, पॉलिसी की परिपक्वता रकम पर पुत्री का ससुराल पक्ष अधिकार जता सकता है। किन्तु इस पॉलिसी में बीमा चूँकि पिता अथवा माता का होता है, सन्तान का नहीं, इसलिए, इस पॉलिसी की परिपक्वता राशि पर, पुत्री के ससुराल पक्ष द्वारा अधिकार जताने की आशंकाएँ भी स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	<span style="color: rgb(255, 0, 0);">उच्च शिक्षा में सहायक -</span><br />
	बच्चों की उच्च शिक्षा हेतु सुनिश्चित आर्थिक व्यवस्थाएँ इस पॉलिसी के माध्यम से की जा सकती हैं।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	आयु के 17वें वर्ष में बच्चा, उच्च शिक्षा के दरवाजे पर खड़ा होता है। आज के चलन के अनुसार उसे अगले 6 वर्ष तो पढ़ना ही है &#8211; बी।ई. (अथवा ऐसे ही किसी स्नातक पाठ्यक्रम के लिए) 4 वर्ष और एम. बी. ए. के लिए 2 वर्ष। ऐसे मामलों में व्यक्ति को एक-एक लाख रुपये बीमा धन की 6 पॉलिसियाँ लेनी चाहिए (क्षमता तथा आवश्यकतानुसार अधिक बीमा धन की पॉलिसियाँ भी ली जा सकती हैं) जिनकी अवधि क्रमशः 17 वर्ष, 18 वर्ष, 19 वर्ष, 20 वर्ष, 21 वर्ष और 22 वर्ष होंगी। </span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	17 वर्ष पूरे होने पर लगभग 1 लाख 71 हजार रुपये, 18 वर्ष पूरे होने पर लगभग 1 लाख 73 हजार रुपये, 19 वर्ष पूरे होने पर लगभग 1 लाख 78 हजार रुपये 20 वर्ष पूरे होने पर लगभग 1 लाख 78 हजार 500 रुपये, 21 वर्ष पूरे होने पर लगभग 1 लाख 83 हजार रुपये और 22 वर्ष पूरे होने पर लगभग 1 लाख 85 हजार 500 रुपये मिलेंगे। (अधिक बीमा धन की पॉलिसियाँ लेने पर यह रकम उसी अनुपात में अधिक मिलेगी।) अर्थात् बच्चे की शिक्षा के लिए न केवल प्रति वर्ष रकम उपलब्ध रहेगी अपितु प्रति वर्ष यह बढ़ती ही जाएगी। </span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	जैसा कि पहले बताया जा चुका है, पॉलिसीधारक रहे या न रहे, रकम की यह उपलब्धता सुनिश्चित है।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	उपरोक्तानुसार पॉलिसियाँ लेने पर पॉलिसीधारक को पहले 17 वर्षों तक 6 पॉलिसियों की प्रीमीयम चुकानी पड़ेगी। उसके बाद प्रति वर्ष, जैसे-जैसे एक-एक पॉलिसी पूरी होती जाएगी, प्रीमीयम की रकम कम होती जाएगी। अर्थात् 17 वर्षों के बाद मिलने वाली रकम में जहाँ प्रति वर्ष वृद्धि होगी वहीं प्रीमीयम भुगतान का वजन प्रति वर्ष कम होता जाएगा। </span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	इसी के समानान्तर, 17वें वर्ष से, जैसे-जैसे पॉलिसी पूरी होती जाएगी, पॉलिसीधारक का रिस्क कवरेज भी प्रति वर्ष कम होता जाएगा।</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 130%;"><br />
	<span style="color: rgb(255, 0, 0);">पॉलिसी से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण बातें -</span></span></strong></p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="color: rgb(255, 0, 0);"><br />
	</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(1) 18 वर्ष से 60 वर्ष तक की आयु के व्यक्ति यह पॉलिसी ले सकते हैं।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
	(2) पॉलिसी की न्यूनतम अवधि 5 वर्ष तथा अधिकतम अवधि 25 वर्ष है। किन्तु परिपक्वता के समय पॉलिसीधारक की अधिकतम आयु 70 वर्ष तक होनी चाहिए। अर्थात् 60 वर्ष के व्यक्ति को यह पॉलिसी अधिकतम 10 वर्ष की अवधि के लिए मिल सकेगी।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
	(3) न्यूनतम बीमा धन रुपये 50,000। उसके बाद रुपये 5000 के गुणांक में। अधिकतम बीमाधन का निर्धारण व्यक्ति की आयु तथा आय के आधार पर होगा।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
	(4) दुर्घटना हित लाभ -&lsquo;निगम&rsquo; की समस्त पॉलिसियों सहित, अधिकतम 50 लाख रुपये।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
	(5) किश्त भुगतान विधि &#8211; वार्षिक, अर्द्ध वार्षिक, तिमाही, मासिक तथा वेतन बचत योजना।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
	(6) पॉलिसी पर &lsquo;पॉलिसी ऋण&rsquo; लिया जा सकता है।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
	(7) पॉलिसी समनुदेशित की जा सकती है।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
	जिन परिवारों में बच्चे अभी एक वर्ष के नहीं हुए हैं उन्हें यह पॉलिसी लेने पर अवश्य ही विचार करना चाहिए।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><br />
	</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="color: rgb(255, 215, 0);"><span>&quot;विष्णु बैरागी &quot; <a href="http://akoham.blogspot.com/search/label/%E0%A4%8F%E0%A4%B2.%E0%A4%86%E0%A4%88.%E0%A4%B8%E0%A5%80.%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81">{</a></span></span><a href="http://akoham.blogspot.com/"> एकोऽहम् }<br />
	</a></strong></p>
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