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	<title>JANOKTI : जनोक्ति :  राज-समाज और जन की आवाज &#187; खेल-कूद</title>
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	<description>राज-समाज और जन की आवाज</description>
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		<title>विदा हो गया महानतम गेंदबाज</title>
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		<pubDate>Sat, 31 Jul 2010 11:34:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जनोक्ति डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>

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		<description><![CDATA[लेखक: सुनील बघेल हाल ही में क्रिकेट इतिहास के सबसे महानतम गेंदबाज श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन ने शिखर पर रहते हुए टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया,ऐसे मौके पर फिरकी... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/31/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%a4%e0%a4%ae-%e0%a4%97%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%ac%e0%a4%be/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><strong><span style="color: #0000ff;"><img class="alignright size-medium wp-image-5509" title="murlidharan" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/murlidharan1-300x199.jpg" alt="" width="300" height="199" />लेखक: सुनील बघेल</span></strong></p>
<p style="text-align: justify;">हाल ही में क्रिकेट इतिहास के सबसे महानतम गेंदबाज श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन ने शिखर पर रहते हुए टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया,ऐसे मौके पर फिरकी के इस जादूगर के करियर से जुड़े उस घटनाक्रम को याद करना जरूरी है, जब मुरली को हजारों दर्शकों के सामने बीच मैदान में थ्रो गेंदबाज घोषित कर दिया गया था. आॅस्टेªलिया के खिलाफ ही 28 अगस्त 1992 को अपने टेस्ट करियर का आगाज करने वाले मुरली शायद ही इस मुकाम तक पहुंच पाते, अगर इन विवादों ने उनकी अग्निपरीक्षा न ली होती. 26 दिसंबर 1995 के बाॅक्ंिसग डे टेस्ट से पहले मुरली एक साधारण आॅफ स्पिन गेंदबाज थे. उनकी गेंदों में टर्न तो मौजूद था, लेकिन रहस्यमयी गेंदे, बल्लेबाजों के दिमाग को पढ़ लेने की योग्यता नहीं थी. इससे भी बढ़कर, इन विवादों से पहले मुरली में खुद को विश्व क्रिकेट के महानतम गेंदबाज के तौर पर स्थापित करने का जज्बा भी नहीं आ पाया था. आॅस्टेªलिया के खिलाफ इस मैच से पहले मुरली अपने करियर के 22 टेस्ट मैचों में 32 से ज्यादा की औसत से मात्र 80 विकेट ले पाए थे.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन 26 दिसंबर 1995 में मेलबोर्न टेस्ट में जो कुछ घटित हुआ, उसने मुरली की सोच पर गहरा प्रभाव छोड़ा. आॅस्टेªलिया क्रिकेट में हर साल 26 दिसंबर यानी बाॅक्ंिसग डे के मौके पर टेस्ट मैच खेले जाने की परंपरा उस टेस्ट श्रंृखला के दौरान भी निभाई जा रही थी, जब 26 दिसंबर 1995 को मेजबान टीम श्रीलंका के साथ टेस्ट मैच खेलने उतरी थी. मेलबोर्न में खेले गए इसी टेस्ट के दूसरे दिन यानी 27 दिसंबर को श्रीलंका के फिरकी गेंदबाज मुथैया मुरलीधरन की गेंदों को आॅस्टेेªलिया मूल के अंपायर डेरेल हेयर ने तीन ओवरों के भीतर ही सात बार ‘नोे बाॅल’ घोषित किया था. आमतौर पर गेंदबाज जब गेंदबाजी रेखा से बाहर जाकर गेंद डालता है, तब अंपायर उसे ‘नो बाॅल’ घोषित करता है, लेकिन इस मामले में खास बात यह थी कि डेरेल हेयर ने गेंदों को इसलिए ‘नो बाॅल’ करार दिया था, क्योंकि उनकी नजर में मुरलीधरन गलत एक्शन के साथ गेंदबाजी कर रहे थे. इसके 10 दिन बाद जब 5 जनवरी 1996 को श्रीलंका टीम आॅस्टेªलिया और वेस्टइंडीज के साथ खेली गई त्रिकोणीय श्रंृखला के सातवें मैच में वेस्टइंडीज के खिलाफ ब्रिस्बेन के मैदान पर उतरी, तो फिर से यही कहानी दोहराई गई. इस बार हेयर के बजाए अंपायर राॅस इमरसन ने मुरली के पहले ही ओवर की तीन गेंदों को ‘नो बाॅल’ घोषित कर दिया. हेयर की तरह ही अंपायर इमरसन ने भी अवैध एक्शन के साथ गेंदबाजी के लिए मुरली की गेंदों को ‘नो बाॅल’ करार दिया था.</p>
<p style="text-align: justify;">मात्रा 23 साल की उम्र में अवैध गेंदबाज घोषित कर दिए जाने के बाद मुरली के करियर का अंत निश्चित था. मुरली ने भी हार मान ली थी. आने वाले सालों में जो गेंदबाज क्रिकेट की दुनिया का हर बड़ा कीर्तिमान अपने नाम दर्ज कराने वाला था, उसने स्पिन को छोड़कर मध्यम तेज और लेग स्पिन गेंदबाजी का भी फैसला कर लिया था. लेकिन तभी, कप्तान अर्जुन राणातुंगा की अगुवाई में समूचा श्रीलंका मुरली के पक्ष में आ गया. आईसीसी से लंबी लड़ाई लड़ी गई, तकनीक के सहारे यह साबित किया गया कि मुरली के गेंदबाजी एक्शन में कोई खोट नहीं है.</p>
<p style="text-align: justify;">टीम, प्रशंसकों और श्रीलंका बोर्ड के इसी समर्थन को मुरली के करियर का निर्णायक मोड़ कहा जा सकता है. तब तक विश्व क्रिकेट में आॅफ स्पिन गेंदबाजी के मामले में पाकिस्तान के अब्दुल कादिर और भारत के बिशनसिंह बेदी ने ही नाम कमाया हुआ था. लेकिन फिर भी स्पिन गेंदबाजी की यह कला तब तक क्रिकेट में अपना ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाई थी. लेकिन आॅस्टेªलियाई अंपायरों के गतिरोध के बाद मुरली ने इस कला को नया जीवनदान देने का संकल्प ले लिया.</p>
<p style="text-align: justify;">नतीजा यह रहा कि बाद के सालों में मुरली ने गेंदबाजी के हर कीर्तिमान को अपने नाम दर्ज कराया. भारत के खिलाफ वर्तमान में खेलीे जा रहीे तीन टेस्ट मैचों की श्रंृखला के पहले मैच के बाद जब मुरली ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया, तो गेंदबाजी का हर कीर्तिमान उनके साथ जुड़ा हुआ था. 800 विकेटों के साथ वे टेस्ट क्रिकेट के सबसे कामयाब गेंदबाज हैं, उन्होंने सबसे ज्यादा 67 बार एक पारी में 5 विकेट झटके हैं, मैच में सबसे ज्यादा 22 बार दस विकेट लेने का कारनामा भी उनके नाम दर्ज है. टेस्ट की तरह ही एक दिवसीय क्रिकेट का हर कीर्तिमान भी उनके नाम ही दर्ज है. 337 एक दिवसीय मैचों में 512 विकेटों के साथ वे क्रिकेट के इस संस्करण के भी सबसे कामयाब गेंदबाज हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन मुरली की महानता सिर्फ विकेटों की संख्या तक ही सीमित नहीं है. किसी भी खेल में खिलाड़ी की महानता को इस पैमाने पर आंका जाता है कि उसने अपने देश, अपनी टीम को शिखर तक पहुंचाने में कितना योगदान दिया? इस मायने में यह बात बगैर किसी शक-शुबहे के कहीं जा सकती है कि विश्व क्रिकेट में मुरली से बड़ा मैच विजेता खिलाड़ी नहीं हुआ है. टेस्ट क्रिकेट में मुरली ने 67 बार एक पारी में 5 विकेट झटके हैं, जिनमें से 40 टेस्ट मैचों में श्रीलंका को जीत हासिल हुई है. 1983 में टेस्ट क्रिकेट खेलने की शुरुआत करने वाली श्रीलंका टीम मुरली के पहले भी गेंदबाजी के मामले में साधारण थी और शायद मुरली के बाद भी साधारण रहेगी. लेकिन जब तक मुरली श्रीलंका के लिए खेलने उतरते रहे, उन्होंने हर विपक्षी टीम के खिलाफ अपने देश का झंडा लहराया. 1996 के विश्वकप में अगर श्रीलंका विश्वविजेता बनकर उभरी और उसके बाद टेस्ट क्रिकेट की भी सबसे कामयाब टीमों में शुमार हुई, तो इसका श्रेय बहुत हद तक मुरली को ही जाता है. टेस्ट क्रिकेट में तब तक ‘नवजात टीम’ कही जाने वाली श्रीलंका को मुरली ने न सिर्फ अपने घरेलू मैदान पर मैच जिताए, बल्कि विदेशी सरजमीं पर भी ऐतिहासिक कामयाबियां हासिल कीं. इसी के बूते वे पिछले सत्रह सालोें से श्रीलंका ही नहीं, विश्व क्रिकेट के भी शीर्ष गेंदबाज बने हुए थे.</p>
<p style="text-align: justify;">फिर, किसी खिलाड़ी की महानता का एक पैमाना यह भी होता है कि विपक्षी टीम के खिलाड़ियों पर उसके प्रभाव का आकलन किया जाए. इस मामले में भी मुरली अपने प्रतिद्वंद्वियों- शेन वार्न और अनिल कुंबले से श्रेष्ठ नजर आते हैं. आध्ुानिक क्रिकेट के दो महानतम बल्लेबाजों- सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ मानते हैं कि मुरली की गेंदों को खेलना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती रही. वहीं, आध्ुानिक क्रिकेट के सबसे विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग ने भी मुरली को आखिरी विदाई देते हुए खुलेतौर पर स्वीकार किया है कि वे मुरली की रहस्यमयी गेंदों को कभी भी समझ नहीं पाए. बाद के सालों में मुरली ने अपनी गेंदबाजी में कई नए आयाम जोड़े. क्रिकेट को ‘दूसरा’ गेंद देेने का श्रेय भले ही पाकिस्तान के सकलेन मुश्ताक को जाता है, लेकिन मुरली ने इस गेंद को दुनियाभर के बल्लेबाजों के लिए परेशानी का सबब बना दिया. इन्हीं घूमती हुई गेंदों के बूते मुरली ने अपने सत्रह साल के करियर में हर बल्लेबाजा को अपनी ध्ुान पर नचाया. इससे भी बढ़कर, अपनी रहस्यमयी गेंदों के बूते उन्होंने विश्व क्रिकेट में आॅफ स्पिन गेंदबाजी को भी सम्मानजनक स्थान दिलाया, जो उनसे पहले खत्म होती जा रही कला मान ली गई थी.</p>
<p style="text-align: justify;">तो, अब इस कला के सबसे बड़े जादूगर ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया है. हालांकि उनके प्रशंसकों के लिए यही बात राहतभरी है कि वे एकदिवसीय और ट्वेंटी-20 क्रिकेट में खेलते रहेंगे. फिलहाल तो महान उपलब्धियों के लिए मुरली को सलाम करने का वक्त है.</p>
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		<title>मुरली के संन्यास के पीछे का सच</title>
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		<pubDate>Sat, 24 Jul 2010 08:59:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>

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		<description><![CDATA[श्रीलंका के महानतम स्पीनर मुथैया मुरलीधरन ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया है. फिलहाल भारतीय टीम तीन टेस्ट मैचों की श्रंृखला खेलने श्रीलंका गई है, जहां गॉल मैदान में... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/24/%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%9b%e0%a5%87-%e0%a4%95/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-5119" title="murlidharan" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/murlidharan-300x199.jpg" alt="" width="300" height="199" />श्रीलंका के महानतम स्पीनर मुथैया मुरलीधरन ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया है. फिलहाल भारतीय टीम तीन टेस्ट मैचों की श्रंृखला खेलने श्रीलंका गई है, जहां गॉल मैदान में खेले गए श्रृंखला के पहले टेस्ट के बाद मुरली ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया. मुरली के अब टेस्ट मैचों में 800 विकेट हैं और वनडे में भी उनके नाम 515 से ज्यादा विकेट दर्ज हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">तो आखिर मुरली ने यह फैसला क्यों लिया ? याद कीजिए कुछ साल पहले की बात जब मुरली ने इस बात का ऐलान किया था कि वे तब तक खेलते रहेंगे, जब तक कि टेस्ट क्रिकेट में 1000 विकेट लेने  का कारनामा न कर दिखाएं. उन दिनों मुरली के लिए टेस्ट मैच खेलना सबसे बड़ी प्राथमिकता हुआ करती थी और इसके लिए उन्होंने वनडे मैचों मंे खेलना भी बंद कर दिया था ताकि शरीर को पांच दिन के मैच के लिए बचाकर रखा जा सके. लेकिन अब हालात बदल गए हैं और इसके साथ ही मुरली की प्राथमिकताएं भी बदल गई हैं. अब मुरली चेन्नई सुपर किंग्स के लिए आईपीएल में खेलते हैं, जो उन्हें एक साल में करोड़ों रुपए पगार के तौर पर देती है. सो, आईपीएल के इसी पैसे ने मुरली को यह फैसला लेने के लिए प्रेरित किया है. श्रीलंका बोर्ड अपने खिलाड़ियों को एक वनडे खेलने के लिए 12000 रुपए देता है और एक टेस्ट मैच खेलने के लिए दो लाख रुपए. वहीं आईपीएल के एक सत्र में खेलने के लिए वर्तमान में चेन्नई की टीम मुरली को तीन करोड़ रुपए से भी ज्यादा दे रही है. इसका मतलब यह हुआ कि मुरली अगर आईपीएल के सभी 14 मैच खेलें तो भी उन्हें एक मैच के लिए बीस लाख रुपए दिए जाते हैं. यानी कि बीस ओवर प्रति पारी के ट्वेंटी-20 मैच में मात्रा 4 ओवर फेंकने  के लिए बीस लाख रुपए. बस इसी पैसे ने मुरली को पे्ररित किया है कि वे अपने देश की टीम को अलविदा कह दें और आईपीएल को अपना बचा हुआ करियर समर्पित कर दें.</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे इस बात में कोई बुराई भी नहीं, क्योंकि यह व्यावसायिक दुनिया है और मुरली एक प्रोफेशनल खिलाड़ी. और फिर ऐसा भी नहीं है कि मुरली ने ही इस तरह का फैसला लिया हो. 2007 में ही जब आईपीएल का पहला संस्करण हुआ था तो कई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों की नियत डोल गई थी. आखिर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पूरी ताकत, ऊर्जा झोंकने के बाद भी उन्हें चंद लाख रुपए नसीब होते थे, वहीं आईपीएल उन्हें करोड़ों रुपए दे रहा है. ऐसे में वाजिब है कि खिलाड़ी अपने देश के बजाए आईपीएल को ही तरजीह  देंगे. शेन वार्न को ही देख लीजिए, जो आईपीएल में तो राजस्थान के लिए न सिर्फ खेलते हैं, बल्कि उसके कप्तान और कोच की भूमिका भी निभाते हैं. लेकिन अपने देश ऑस्ट्रेलिया की टीम से वो चार साल पहले हीे संन्यास ले चुके हैं. मैथ्यू हेडन, ग्लैन मैग्राथ, एडम गिलक्रिस्ट जैसे खिलाड़ियों ने भी बिलकुल यहीं किया. वे चाहते तो अपने देश की टीम के लिए तीन-चार साल और खेल सकते थे, लेकिन उन्होंने आईपीएल को अपने देश से ज्यादा तवज्जो दी.</p>
<p style="text-align: justify;">मुरली भी ठीक यही कर रहे हैं. उनको मालूम है कि उनका करियर अब ज्यादा नहीं बचा है. वे ज्यादा से ज्यादा दो-तीन साल और खेल सकते हैं. इसीलिए मुरली इस समय का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा लेना चाहते हैं. चूंकि राष्ट्रीय टीम के लिए खेलते हुए कहीं चोटिल हो गए तो आईपीएल भी हाथ से चला जाएगा. इसलिए उन्होंने टेस्ट मैचों से किनारा कर लिया है, लेकिन कह रहे हैं कि अभी आईपीएल में चेन्नई की ओर से खेलते रहेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">जाहिर है मुरली ने भी शेन वॉर्न, मैथ्यू हेडन और गिलक्रिस्ट की तरह ही सोचा. लेकिन काश, इन गोरे ऑस्ट्रलियाई खिलाड़ियों की ओर देखने की बजाए मुरली अपने पक्के दोस्त और अपनी टीम के सबसे बुजुर्ग खिलाड़ी सनत जयसूर्या से ही सबक ले लेते. जयसूर्या इन दिनों श्रीलंका की टीम से बाहर हैं. श्रीलंका बोर्ड ने उन्हें अपने अनुबंधित खिलाड़ियों की सूची से भी बाहर पफेंक दिया है. लेकिन जयसूर्या अभी भी अपने देश की टीम में आने के लिए प्रतिबध हैं. इकतालीस साल की उम्र में भी वे इंग्लैंड में काउंटी क्रिकेट खेल रहे हैं, जिससे कि अच्छा प्रदर्शन करके श्रीलंका टीम में वापस आ जाएं. काश, मुरली भी अपने इस साथी खिलाड़ी से प्रेरणा ले लेते&#8230;</p>
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		<title>क्रिकेट के देश में बैडमिंटन का जलवा</title>
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		<pubDate>Wed, 14 Jul 2010 12:36:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>
		<category><![CDATA[टेनिस]]></category>
		<category><![CDATA[बैडमिंटन]]></category>
		<category><![CDATA[साइना नेहवाल]]></category>

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		<description><![CDATA[टेनिस में भले ही आजाद भारत के साठ बरस के इतिहास में सिर्फ सानिया मिर्जा ने ही आंशिक कामयाबी हासिल की हों, लेकिन बैडमिंटन के खेल में समय-समय पर ऐसी... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/07/14/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a5%88%e0%a4%a1%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%82/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-4599" title="saina nehwal champion" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/07/saina-nehwal-champion.jpg" alt="" width="303" height="400" />टेनिस में भले ही आजाद भारत के साठ बरस के इतिहास में सिर्फ सानिया मिर्जा ने ही आंशिक कामयाबी हासिल की हों, लेकिन बैडमिंटन के खेल में समय-समय पर ऐसी प्रतिभाएं सामने आती रही हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाई है. हैदराबाद के लाल बहादुर स्टेडियम से निकलकर दुनिया की तीसरे नंबर की खिलाड़ी बनने तक का सफर तय करने वाली साइना नेहवाल के पहले भी अपर्णा पोपट और प्रकाश पादुकोण जैसे खिलाड़ियों ने बैडमिंटन के खेल में भारत का मान बढ़ाया है.</p>
<p style="text-align: justify;">खासकर, 80 के दशक में प्रकाश पादुकोण की बैडमिंटन के खेल में उपलब्धियों ने समूचे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था. सायना नेहवाल की तरह ही पादुकोण ने भी 1980 में स्वीडन ओपन, डेनमार्क ओपन और आल-इग्लैंड टूर्नामेंट जीतकर इतिहास रचा था. हालांकि उस दौर में अधिकृत तौर पर व्यावसायिक टूर्नामेंट आयोजित नहीं किए जाते थे. हालांकि बैडमिंटन की विश्व स्पर्धा की शुरूआत 1977 में ही हो गई थी, लेकिन खिलाड़ियों को ‘व्यावसायिक खिलाड़ी’ का दर्जा हासिल नहीं था. तब बैडमिंटन के खिलाड़ियों को ‘लाइसेंसी खिलाड़ी’ कहा जाता था और उन्हें एशियन गेम्स जैसी कुछ स्पर्धाओं में तो भाग लेने की इजाजत भी हासिल नहीं थी. बावजूद इसके प्रकाश पादुकोण की उपलब्धियों को लेकर किसी को संदेह नहीं था. उस दौर में खिलाड़ियों के प्रदर्शन को आंकने के लिए विश्व रैकिंग की सुविधा मौजूद नहीं थी, बावजूद इसके पादुकोण उस दौर के निर्विवाद श्रेष्ठ खिलाड़ी थे.</p>
<p style="text-align: justify;">बाद के सालों में महिला खिलाड़ियों ने भी पादुकोण की कामयाबी के सफर को आगे बढ़ाने की पुरी कोशिश की. 80 के दशक में ही मधुमिता गोस्वामी ने अपने तेज और आक्रामक खेल से राष्ट्रीय स्तर पर धमाकेदार आगाज किया. हालांकि सुरक्षात्मक खेल के उस दौर में आक्रामक नजरिए के बावजूद गोस्वामी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी कामयाबियों को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर दोहराने में नाकाम रही. इसके बाद नब्बे के दशक में अर्पणा पोपट ने भी खूब सुर्खियां बटोरी. पूणे निवासी पोपट को प्रकाश पादुकोण ने अपनी देखरेख में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी के लिए तैयार किया था. 1998 में कुआलालम्पुर में आयोजित कॉमनवेल्थ खेलों में पोपट ने रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा की झलक भी दिखाई, लेकिन आने वाले सालों में वे भी अपनी प्रतिभा को सफलता में नहीं बदल पाई.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन सायना नेहवाल मानसिक और शारीरिक दृढ़ता दोनों में ही अपनी पूर्ववर्ती महिला खिलाड़ियों से ज्यादा मजबूत नजर आती है. पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन विमल कुमार का मानना है कि इन्हीं खूबियों के बूते सायना लंबे समय तक टूर्नामेंट जीतने में कामयाब रहेगी. विमल कुमार के मुताबिक-‘अपनी शारीरिक और मानसिक मजबूती के चलते सायना लंबे चलने वाले मुकाबलों में अपने विपक्षी पर भारी पड़ती है.’ प्रकाश पादुकोण की भी सायना के बारे में इसी तरह की राय है, जिनके मुताबिक-‘अगर वे अपने खेल मेें निरंतरता बनाए रखती है, तो फिर यह तय है कि वे भारतीय बैडमिंटन की सबसे कामयाब महिला खिलाड़ी साबित होगी.’ सायना के खेल से बेहद प्रभावित पादुकोण ने सालभर पहले ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि हैदराबाद की यह खिलाड़ी जल्द ही दुनिया की शीर्ष तीन खिलाड़ियों में शामिल हो जाएगी. अब नंबर तीन की खिलाड़ी बनकर सायना ने इस भविष्यवाणी को सही भी साबित कर दिया है.</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे भी, सायना का लक्ष्य एकदम स्पष्ट है-भारत की सर्वकालिक महान महिला एथलिट बनना. वे कहती भी हैं-‘मैं आने वाले सालों में भारत के लिए कईं टूर्नामेंट जीतकर शीर्ष पर पहुंचना चाहती हूं.’ ठीक चार दशक पहले 1980 में बैंकांक में आयोजित एशियन खेलों में कंवलजीत संधू ने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर भारत के लिए पदक जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया था. इसके बाद अस्सी के दशक में पीटी ऊषा ने भी अपनी कामयाबियों से देश का मान बढ़ाया था. इक्कीसवीं सदी में सानिया मिर्जा भले ही अपनी प्रतिभा को सफलता में तब्दील करने में नाकाम रही हो, लेकिन सायना नेहवाल से उनके प्रशंसकों को कामयाबी के दौर के लंबे समय तक रहने की उम्मीदें हैं. भले ही बैडमिंटन के खेल में क्रिकेट की तरह आंखें चूंधिया देने वाला पैसा नहीं बरसता, लेकिन सायना ने देश के गौरव को बढ़ाने को अपना लक्ष्य मान लिया है. प्रकाश पादुकोण की तरह ही सायना नेहवाल भी मौजूदा दौर में सर्वश्रेष्ठ भारतीय एथलिट नहीं है, लेकिन उनमें वे दो खूबियां मौजूद है, जो किसी भी खिलाड़ी के कामयाब होने के लिए बेहद जरूरी है-मेहनत और समर्पण. इन्हीं खूबियों के बूते बीस वर्षीया हैदराबादी सायना बैडमिंटन के क्षेत्र में भारतीय तिरंगा लहराने के अपने सफर का आगाज कर चुकी है.</p>
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		<title>सितारे जमीं पर&#8230;</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Jun 2010 06:22:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>
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		<category><![CDATA[विश्वकप]]></category>

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		<description><![CDATA[विश्वकप को सालभर से भी कम समय बचा है और भारतीय टीम के दर्जनभर प्रतिभावान गेंदबाज टीम में जगह पाने के लिए जूझ रहे हैं. यह 2008 में भारतीय टीम... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/06/11/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-3654" title="Munaf-Patel-Ishant-Sharma-India-Fast-Bowlers-201208" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/06/Munaf-Patel-Ishant-Sharma-India-Fast-Bowlers-201208-197x300.jpg" alt="" width="197" height="300" />विश्वकप को सालभर से भी कम समय बचा है और भारतीय टीम के दर्जनभर प्रतिभावान गेंदबाज टीम में जगह पाने के लिए जूझ रहे हैं. यह 2008 में भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे की बात है, जब प्रथम श्रेणी क्रिकेट में दिल्ली से खेलने वाले छह फुट चार इंच लंबे ईशांत शर्मा ने कंगारूओं को उनकी ही सरजमीं पर चारों खाने चित्त कर दिया था. खासकर पर्थ टेस्ट में ईशांत का जादू सर चढ़कर बोला था, जब उन्होंने विकेट के दोनों तरफ स्वींग लेती अपनी गेंदों से रिकी पोटिंग जैसे महानतम बल्लेबाज को भी चकित कर दिया था. उस पूरे दौरे में ईशांत ने 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रप्तार से गेंदबाजी की थी, जिससे प्रभावित होकर ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट के सर्वकालिक महानतम कप्तानों में शुमार होने वाले स्टीव वाॅ ने भी इस तेज गेंदबाज को भारतीय टीम का ‘भविष्य’ करार दिया था.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन अब हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं. ऐसे वक्त में, जबकि 2011 में एशिया में होने वाले विश्वकप को सालभर भी नहीं बचा है, ईशांत शर्मा भारतीय टीम में खेलने के आसपास भी नहीं है. ईशांत ही नहीं, आरपी सिंग, एस श्रीसंथ, मुनफ पटेल और इरफान पठान जैसे गेंदबाजों का भी यही हाल है. ये सभी कभी न कभी भारतीय क्रिकेट के सबसे चमकते सितारे थे. अपनी रप्तार और स्वींग खाती गेंदों से इन सभी ने विश्व क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों को भी पैवेलियन भेजा था. 2007 के दक्षिण अफ्रीका दौरे पर अपनी रफ़्तार से सबको चौकाने वाले श्रीसंथ इसके बाद से अब तक भारतीय टीम के लिए 17 टेस्ट और 49 एकदिनी मैच खेल चुके हैं. कभी कपिलदेव के समकक्ष करार दिए गए इरफान पठान भारत के लिए 29 टेस्ट और 107 एकदिवसीय मैच खेल चुके हैं. वहीं, अपनी स्वींग गेंदबाजी से भारतीय टीम को विदेशी मैदानों पर कई यादगार जीतें दिलाने वाले आरपी सिंह अभी तक 13 टेस्ट और 55 एकदिनी मैच खेल चुके हैं. इसी तरह भारत के लिए 12 टेस्ट और 43 एकदिवसीय मैच खेल चुके मुनफ पटेल को उनके करियर की शुरुआत में सटीक लाइन-लैंथ के चलते ग्लैन मैग्राथ की तरह का गेंदबाज माना गया था.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन हाल-फिलहाल ये सभी टीम से बाहर हैं. 2011 के बहुप्रतीक्षित विश्वकप से पहले दुनिया की अन्य टीमों की तरह ही भारतीय क्रिकेट के लिए भी यह तैयारियों का दौर है. लेकिन विश्वकप के लिए तैयार की जा रही टीम में इन सभी गेंदबाजों का नाम दूर-दूर तक भी नहीं है. इसके लिए सीधे तौर पर बीसीसीआई के मुख्य चयनकर्ता एस. श्रीकातं जिम्मेदार है. तमिलनाडू से ताल्लुक रखने वाले ये महाषय शायद भारतीय टीम में सिर्फ तमिलनाडू के खिलाड़ियों को ही देखना चाहते हैं. तभी, तो जिम्बाब्वे के लिए चुनी गई टीम में तमिलनाडू के बल्लेबाज मुरली विजय को तो आराम से जगह मिल गई, लेकिन इरफान पठान सहित भारत के ये सभी युवा गेंदबाज एक मौके के लिए भी तरस गए. हाल ही में भारतीय चयनकर्ताओं ने तीन अलग-अलग दौरों के लिए टीम का चयन किया- इंग्लैंड दौरे के लिए ए टीम का, जिम्बाब्वे दौरे के लिए सुरेश रैना की अगुवाई में युवा टीम का और श्रीलंका में खेले जाने वाले एशिया कप के लिए सबसे मजबूत टीम का. इन तीनों टीमों के लिए चयनकर्ताओं ने दर्जनभर तेज गेंदबाजों का चयन किया, लेकिन उनमें भी पठान, श्रीसंथ, मुनफ पटेल और ईशांत शर्मा का नाम नहीं था. चयनकर्ताओं के इस फैसले के चलते कई सवाल खड़े हो गए हैं. ऐसे में, जबकि दूसरे देश विश्वकप के लिए अपने सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों को तैयार कर रहे हैं, भारतीय चयनकर्ताओं ने इन अनुभवी गेंदबाजों को नजरअंदाज क्यों किया हुआ है ?</p>
<p style="text-align: justify;">हालांकि इसका जवाब इन खिलाड़ियों के हालिया प्रदर्शन में छुपा हुआ है. गौरतलब है कि करियर की शुरुआत में करिश्माई प्रदर्शन करने वाले इन सभी गेंदबाजों के हालिया प्रदर्शन में खासी गिरावट दर्ज की गई है. चोटों से जूझते करियर के बीच न सिर्फ इन गेंदबाजों की रप्तार में कमी आई है, बल्कि बल्लेबाजों के मन में खौफ पैदा करने वाली स्वींग भी कहीं खो गई है. इसी के चलते कभी भारतीय गेंदबाजी के अगुवा रहे ये गेंदबाज अपनी लय पूरी तरह खो चुके हैं, जिसका उदाहरण हाल ही में आईपीएल में भी देखने को मिला.</p>
<p style="text-align: justify;">फिर भी, विश्वकप से ठीक पहले 40 से ज्यादा एकदिवसीय मैच खेल चुके इन सभी गेंदबाजों को नजरअंदाज करना किसी भी मायने में सही नहीं है. पूर्व चयनकर्ता और विकेटकीपर किरण मोरे के मुताबिक- ‘कुछ महीने पहले तक ये सभी गेंदबाज भारतीय आक्रमण के अगुवा थे, लेकिन अब वे संभावित 60 खिलाड़ियों में भी नहीं है.’ खास बात यह है कि ये सभी गेंदबाज 27 साल से कम उम्र के हैं, साथ ही इनके पास भारतीय मैदानों पर अच्छे प्रदर्शन का अनुभव भी है.</p>
<p style="text-align: justify;">इसीलिए चयनकर्ताओं के फैसले को क्रिकेट गलियारों में एकमत से गलत ठहराया जा रहा है. भारत के पूर्व गेंदबाज मनोज प्रभाकर के मुताबिक- ‘ये ठीक है कि इनका हालिया प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. लेकिन विश्वकप के लिए नए गेंदबाज तैयार करने से बेहतर यह है कि इन्हें ही फार्म में आने का मौका दिया जाए.’</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे, हाल-फिलहाल तो चयनकर्ता इस तरह की दरियादिली दिखाने के मूड में नहीं है. इसीलिए कई वरिष्ठ खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी के बावजूद इन युवा तेज गेंदबाजों को जिम्बाव्बे दौरे पर नहीं भेजा गया. मोरे कहते हैं- ‘भारतीय टीम के पास फिलहाल जहीर खान और आशीष नेहरा ही बचे हैं. इनमें से भी नेहरा अक्सर चोटिल होते रहते हैं. ऐसे में भारतीय टीम की विश्वकप को लेकर तैयारियां अधूरी ही प्रतीत होती हैं.’ बात सही भी है. और इसमें भी संदेह नहीं कि चयनकर्ताओं की गलत नीतियों के चलते विश्वकप से ठीक पहले खराब पफार्म से जूझ रहे इन युवा गेंदबाजों को भी अपनी लय हासिल करने का मौका नहीं मिल पा रहा है.</p>
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		<title>सफाई दी धोनी ने</title>
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		<pubDate>Sun, 30 May 2010 17:13:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sumit yadav</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>
		<category><![CDATA[20-20]]></category>
		<category><![CDATA[Cricket]]></category>
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		<category><![CDATA[धोनी]]></category>

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		<description><![CDATA[धोनी की कप्तानी वाली टीम इंडिया टी-20 वर्ल्ड कप क्या नहीं उठा पाई हमारे मित्र मोंटी क्रिकेटिया ने पूरे मोहल्ले को सर पर उठा लिया। अपने घर से पिछले धरने-प्रदर्शन... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/05/30/%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%a7%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a5%87/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft size-medium wp-image-3511" title="dhoni_03" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/05/dhoni_03-300x262.jpg" alt="" width="300" height="262" />धोनी की कप्तानी वाली टीम इंडिया टी-20 वर्ल्ड कप क्या नहीं उठा पाई हमारे मित्र मोंटी क्रिकेटिया ने पूरे मोहल्ले को सर पर उठा लिया। अपने घर से पिछले धरने-प्रदर्शन का अधजला पुतला उठाकर और उस पर धोनी का पोस्टर चिपकाकर निकल आए चौक पर धोनी का पुतला जलाने।</p>
<p style="text-align: justify;">मैं दूर खड़ा उसको देख रहा था। जैसे ही वो पुतले में आग लगाने लगा मैंने रोकते हुए कहा, अरे बंधु क्या हुआ? इतने तमतमाए हुए क्यों हो और धोनी के पुतले को लिए हुए कहां फिर रहे हो?</p>
<p style="text-align: justify;">उसने पुतले को एक किनारे पटकते हुए कहा- धोनी अब कप्तान रहने लायक नहीं है, दो बार टीम इंडिया टी-20 विश्व कप से बाहर हो गई है। इसलिए मैं चौक पर धोनी का पुतला जलाकर अपना गुस्सा निकालूंगा।</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने टोकते हुए कहा- तुम भी खूब हो। कल तक जिस धोनी के छक्कों पर तुम तालियां पीट रहे थे, आज उसी के तुम छक्के छुड़ा रहे हो। ऐसा कर दिया धोनी ने कि तुम उसके पीछे पड़ गए हो?</p>
<p style="text-align: justify;">मोंटी बोला- मुझे धोनी से नहीं धोनी के सफाई से परेशानी है?</p>
<p style="text-align: justify;">मैं चौंकते हुए बोला- अब भला धोनी की सफाई से तुम्हें क्यों परेशानी होने लगी। बड़े-बुजुर्गों ने भी कहा है साफ-सफाई से रहना चाहिए।तो इसमें परेशानी कैसी?</p>
<p style="text-align: justify;">मोंटी समझाते हुए बोला- अरे नहीं, मैं उस सफाई की बात नहीं कर रहा बल्कि उस सफाई की बात कर रहा हूं जो धोनी हारने के बाद बार-बार सबको दे रहे हैं। चुपचाप अपनी हार क्यों नहीं मान लेता।</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने उसे समझाया, देखो धोनी अब एक ब्रांड बन चुका है। कितनी कंपनियों का वह ब्रांड एंबेसडर है। उसने चॉकलेट, पेन, पेंसिकल से लेकर गाड़ी, मोबाइल और कपड़े तक बेचे हैं। हो सकता है उसे किसी डिटर्जेंट कंपनी ने अपना ब्रांड एंबेसडर बना लिया हो और धोनी सफाई देने के बहाने उसी डिटर्जेंट का प्रचार कर रहे हों कि फलां डिटर्जेंट लगाओ और हार के दाग मिटाओ।</p>
<p style="text-align: justify;">मोंटी खीझते हुए बोला- धोनी बहाना बना रहा है कि आईपीएल की नाइट पार्टियों के कारण वर्ल्ड कप में उनकी हार हुई है। किसने बोला था रात-रातभर नाचने-गाने? मुझे तो लगता है कि धोनी को अब सिर्फ आईपीएल में ही दिलचस्पी है वर्ल्ड कप जीतने में उसका अब मन रहीं रहा।</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने अपना तर्क रखते हुए कहा- देखो मैं तो धोनी को गलत नहीं मानता। अब धोनी ने एक बार वर्ल्ड कप जीत लिया, हो गया। अब तुम चाहते हो कि वह हर बार जीते। हो सकता है यह धोनी का उसूल हो कि एक बार जो चीज उठा ली उसे दोबारा नहीं उठाएंगे इसलिए पहला टी-20 वर्ल्ड कप जीतने के बाद बाकी दोनों वर्ल्ड कप से वे जल्दी ही बाहर हो गए। वैसे भी टी-20 वर्ल्ड कप तो दो साल में एक बार आता है पर आईपीएल तो हर साल होता है वो भी दो महीने के लिए। कहां वर्ल्ड कप के 3-4 मैच और कहां आईपीएल के 14-15 मैच वो भी एक के बाद एक। सांस लेने तक की फुर्सत नहीं, अब तुम ही बताओ वर्ल्ड कप में ज्यादा मेहनत लगती है कि आईपीएल में। इस साल तो आईपीएल में धोनी की चेन्नई टीम जीत गई। अगले साल फिर नीलामी होगी और धोनी की बोली और बढ़ेगी शायद आसमान छू जाए ऐसे में आईपीएल पर ध्यान देना यादा जरूरी है। वर्ल्ड कप में खेले तो बस मैच फीस मिलनी है लेकिन आईपीएल में तो हर चौके-छक्के और कैच पर पैसा ही पैसा। वर्ल्ड कप में कुछ मेहनत नहीं करना पड़ता वो तो कोई भी जीत जाएगा लेकिन आईपीएल में तो मेहनत ही मेहनत है। पहले ऊंचे दाम पर बोली लगने की मेहनत, फिर ग्यारह देशी-विदेशी खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बनाने की मेहनत, छक्के पे छक्के लगाने की मेहनत ताकि बालीवुड हिरोइनों की नजरों में हीरो बन जाएं और हां मैच जीत गए तो रात को पार्टी में नाचने-गाने की मेहनत। हाय राम इतनी मेहनत। और कहां वर्ल्ड कप जो दो साल में एक बार आता है, गिनती के 4-5 मैच और बस छोटी सी प्राइज मनी। न कोई ग्लैमर न पार्टी। तो ये कोई क्यूं ले वो न ले।</p>
<p style="text-align: justify;">मेरे इस जवाब ने मोंटी को निरुत्तर कर दिया, फिर भी वह कहीं से शब्दों को ढूंढकर लाया और बोला- चलो तुम्हारी बात मान लेता हूं। लेकिन जिस तरह टीम इंडिया का फार्म चल रहा है, मुझे नहीं लगता कि टीम जून में होने वाले एशिया कप को जीत पाएगी।</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने समझाते हुए कहा- अमा यार, तुम भी अजीब हो। इतनी सी बात नहीं समझते। तुम एशिया के बाहर निकलो, जरा ग्लोबल बनो। जून में होने वाले एशिया कप को छोड़ो और सितंबर में होने वाले चैंपियंस लीग को पकड़ो। एशिया कप में तो सिर्फ भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका खेलेंगे लेकिन चैंपियंस लीग में तो देश-विदेश की क्लब टीमें और आईपीएल की तीन टीमें भी खेलेंगी जिसमें धोनी की चेन्नई टीम भी शामिल है। एशिया कप मतलब वही 4-5 मैच वही छोटा सा प्राइज मनी और वही हल्की सी ट्राफी लेकिन चैंपियंस लीग मतलब ज्यादा पैसा, ज्यादा ग्लैमर और ज्यादा चीयरलीडर्स। मतलब बल्ले-बल्ले पार्टी-शार्टी।</p>
<p style="text-align: justify;">मोंटी बोला- तुम्हारा मतलब टीम इंडिया एशिया कप भी हारेगी और धोनी फिर सफाई देगा? लेकिन उस बार क्या बोलेगा?</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने बात साफ करते हुए कहा- धोनी ने तो एशिया कप में हारने के बाद देने वाली सफाई की लिस्ट भी बना ली है।</p>
<p style="text-align: justify;">इतना सुनते ही शांत मोंटी के अंदर फिर गुस्सा उबल उठा और वह बोला- अब मैं एक नहीं धोनी के दो पुतले जलाउंगा एक एडवांस में क्योंकि जून में एशिया कप में टीम जब हारेगी तब मैं बारिश के कारण पुतला जला नहीं पाउंगा।</p>
<p style="text-align: justify;">मैं मोंटी को उसके प्यारे पुतलों के साथ छोड़कर अपने रास्ते निकल लिया क्योंकि मैं कुछ देर और ठहरता तो मेरी बातें सुनकर उसे कई पुतले जलाने पड़ते।</p>
<p style="text-align: justify;">चलिए बाकी के पुतले मैं उससे सर्दियों में जलवाउंगा, आग तापने के काम तो आएंगे। आपको मेरा यह व्यंग्य कैसा लगा जरुर बताइएगा</p>
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		<title>राहु कटायो शीश ?</title>
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		<pubDate>Tue, 18 May 2010 15:08:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनिकेत प्रियदर्शी</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-3235" title="Twenty20-World-Cup-2010" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/05/Twenty20-World-Cup-2010-300x272.jpg" alt="" width="300" height="272" />लो जी हो गया बंटाधार&#8230;&#8230;&#8230;.. इसे कह्ते है, गये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास । जी ..हमारे क्रिकेटरों की ही बात हो रही है । कहां विश्व कप शुरू होने से पहले हम विश्व कप के सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे थे और कहां विश्व कप मे हमारी हवा सेमी फाईनल से पहले ही निकल गई । अब तो नौबत ये है की हमारे नौनिहालों को बीसीसीआई से प्रेम-पत्र भी आने शुरू हो गये है । हार जाना ज्यादा बुरा नही लगा क्योंकि खेल का एक हिस्सा हार ही होता है और इसे स्वीकारना भी सबों को आना चाहिए&#8230;। मगर जो बात सबसे बुरी लग रही है वो है कुछ खिलाडियों का दिनो दिन बदतमीज होते जाना ।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">पहले हम पाकिस्तानियों की अभद्रता पर हमेशा कहते थे की उनके बोर्ड का खिलाडियों पर कभी नियंत्रण नही रहता है । मगर वेस्ट इंडीज मे जो कारनामा हमारे क्रिकेटर पहलवानों ने किया वो वाकई हमारे सर को शर्म से झुका देने वाला है । 6 खिलाडियों को बीसीसीआई ने प्रेम पत्र भेजा है जिसमे उनके प्रदर्शन और उनके व्यवहारों पर जवाब मांगा गया है । कोई कुछ भी कह ले मगर जो प्रदर्शन लगातार दो विश्व कप मे भारतीय क्रिकेट टीम का रहा है वो कही न कही आई0 पी0 एल0 के दुष्प्रभाव का ही प्रभाव नजर आता है ।</p>
<p style="text-align: justify;">खैर, खेल के मैदान मे जो भद्द पिटवानी थी वो तो हो गई थी मगर वेस्ट इंडीज के पब मे जाकर जो कूदा-फांदी इन क्रिकेटर ने मचाया वो वाकई सोचने पर बडा अजीब सा लगता है । आज के हमारे नये क्रिकेटरों मे पार्टी का बडा शौक नजर आता है । मैच जीते या हारे इसकी परवाह शायद इतनी, इन्हे नही रहती है जितनी की मैच के बाद होने वाली पार्टियों की ललक इनमें देखी जा रही है । वैसे ये पार्टी का चलन भी आई0 पी0 एल0 की ही देन है । आई0 पी0 एल0 मे मैच के बाद क्या जबरदस्त पार्टी होती है ये आज किसी से छिपी नही है । यहां तो क्रिस गेल जैसे वेस्टइंडीयन भी कुर्ता फाड नृत्य करते नजर आ जाते है ।</p>
<p style="text-align: justify;">अब कहते है न कि आदत जब पड जाती है तब उसे छुडाने मे बडी मुश्किल का सामना करना पडता है । और एक बात ये भी है की मुट्ठीभर संकल्पवान लोग, जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं। तो हमारे मुट्ठीभर संकल्पवान क्रिकेटर पहुंच गये इतिहास की धारा बदलने पब मे और लगे अपने प्रशंसकों से ही दो-दो हाथ करने । अब इसमे अगर कुर्ता फट ही गया तो क्या ..अरे ये सब तो चलता ही रहता है । नेहरा भाई लाख कह ले मगर जो कुछ भी देखा या सुना गया है, वो प्रशंसनीय तो नही ही कहा जायेगा ।</p>
<p style="text-align: justify;">वे ही विजयी हो सकते हैं जिनमें विश्वास है कि वे विजयी होंगे । मगर हमारे भारतीय क्रिकेट टीम को देख कर क्या ऐसा लग रहा था कि इनमे विजयी होने का विश्वास है । एक बात और ये है कि आज कल खिलाडियों को अपनी चोट छिपाने की एक बुरी आदत भी हो गई है । जिसका भी खामियाजा आये दिन टीम इंडिया को भुगतना पड रहा है । जो हाल आज कल के मोटू-तोंदू खिलाडियों का है वो हमारे कोच ने अपनी रिपोर्ट मे दे दिया है । कोच ने तो यहां तक कह दिया की वो आज के कई खिलाडियों से ज्यादा फिट है । सही भी है &#8230; पर हां एक बात उडते उडते आयी है कोच महोदय&#8230; कि आपके कमरे मे भी रात के 2 बजे तक लडक़ियां घुसी रह्ती थी !</p>
<p style="text-align: justify;">मैं भी नही भूला और शर्तिया कह सकता हूं कि आप भी नही भूले होंगे वो हैदराबाद का मैच जब महान सचिन ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ एक जबरदस्त जुझारु पारी खेली थी मगर जीत के कुछ कदम दूर हम रह गये थे । तब सचिन ने 175 रन 141 गेंदों मे बनाए थे और भारत 3 रन से इस मैच को हार गया था । मैच का सर्वश्रेठ खिलाडी सचिन ही बने थे और जब उनसे उनके खेल से सम्बन्धित प्रश्न पूछा गया तब उनके चेहरे पर एक अनकहा सा मैच हारने का दर्द साफ तौर पर देखा गया था । उन्होने तब एक बात कही थी कि वो आज भी जानते है की भारत के तरफ से खेलना उनके लिए कितनी बडी बात है । बताते चले कि जहां एक तरफ सचिन उस मैच के हारने पर बहुत ज्यादा उदास थे वहीं उसी रात हमारे बाकी कई खिलाडी एक रंगीन पार्टी का मजा लेने मे व्यस्त थे ।</p>
<p style="text-align: justify;">असफलता यह बताती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं किया गया , लेकिन अगर आप इससे कोई सीख न ले तो फिर आप देश के प्रतिनिधि कैसे माने जाये ? आज इस बात मे तो कोई दो राय नही है कि हमारे क्रिकेटरों के पास पैसा बहुत आ गया है , मगर वो ये भी जान ले कि ये क्रिकेट ही है जिसने उन्हे इतना पैसा दिया है । अगर क्रिकेट नही तो फिर बाकी कुछ भी नही । इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी भी व्यक्ति को केवल उसकी उपलब्धियों के लिए सम्मानित नहीं किया जाता। समाज तो उसी का सम्मान करता है,जिससे उसे कुछ प्राप्त होता है। आप देश और समाज से अपने को अलग नही कर सकते है बन्धु । और अगर आपको सम्मान प्राप्त करना है तो कही ना कही अपने आचरण को सुधारने का प्रयास तो जरूर ही करना पडेगा। एक बात तो कबीर जी भी कह गये है की “मान सहित विष खाय के , शम्भु भये जगदीश । बिना मान अमृत पिये , राहु कटायो शीश? ।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अत: समय रहते अपने आचरण मे सुधार कर सके तो बढिया है, नही तो आपके मालिक तो है ही ! और वैसे भी हमारे देश मे क्रिकेटरों की कोई कमी थोडे ही न है । और आप ये भी जान ले कि परिवर्तन विज्ञानसम्मत है । परिवर्तन को अस्वीकार नहीं किया जा सकता जबकि प्रगति, राय और विवाद का विषय है । अगर परिवर्तन हो गया तो फिर आपलोगों की प्रगति भी राय और विवाद का विषय ही बन कर रह जाएगी । और कोच महोदय आपको तो ये मानना होगा की शिक्षा और प्रशिक्षण का एकमात्र उद्देश्य समस्या-समाधान होना चाहिये । तो लग जाए समस्या के समाधान मे और इसके लिए जितने तोंदो को कम करना पडे करिये, लेकिन देर रात तक आप भी जागा न करें क्या पता कल आपका तोंद निकल आया तो ? और प्रिय खिलाडी जन आप अपने को ज्ञानी बनाए क्यूंकि जो ज्ञानी होता है वही अपनी कमियों को समझकर उनका सुधार कर सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p><strong> </strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>आईपीएल ने किया क्रिकेटरों का बंटाधार</title>
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		<pubDate>Tue, 18 May 2010 13:47:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनिकेत प्रियदर्शी</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-3230" title="Indian-Cricket-Team" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/05/Indian-Cricket-Team-300x230.jpg" alt="" width="300" height="230" />लो जी हो गया बंटाधार&#8230;&#8230;&#8230;.. इसे कह्ते है, गये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास । जी ..हमारे क्रिकेटरों की ही बात हो रही है । कहां विश्व कप शुरू होने से पहले हम विश्व कप के सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे थे और कहां विश्व कप मे हमारी हवा सेमी फाईनल से पहले ही निकल गई । अब तो नौबत ये है की हमारे नौनिहालों को बीसीसीआई से प्रेम-पत्र भी आने शुरू हो गये है । हार जाना ज्यादा बुरा नही लगा क्यूंकी खेल का एक हिस्सा हार ही होता है और इसे स्वीकारना भी सबों को आना चाहिए&#8230;। मगर जो बात सबसे बुरी लग रही है वो है कुछ खिलाडियों का दिनो दिन बदतमीज होते जाना ।</p>
<p style="text-align: justify;">पहले हम पाकिस्तानियों की अभद्रता पर हमेशा कहते थे की उनके बोर्ड का खिलाडियों पर कभी नियंत्रण नही रहता है । मगर वेस्ट इंडीज मे जो कारनामा हमारे क्रिकेटर पहलवानों ने किया वो वाकई हमारे सर को शर्म से झुका देने वाला है । 6 खिलाडियों को बीसीसीआई ने प्रेम पत्र भेजा है जिसमे उनके प्रदर्शन और उनके व्यवहारों पर जवाब मांगा गया है । कोई कुछ भी कह ले मगर जो प्रदर्शन लगातार दो विश्व कप मे भारतीय क्रिकेट टीम का रहा है वो कही न कही आई0 पी0 एल0 के दुष्प्रभाव का ही प्रभाव नजर आता है ।</p>
<p style="text-align: justify;">खैर, खेल के मैदान मे जो भद्द पिटवानी थी वो तो हो गई थी मगर वेस्ट इंडीज के पब मे जाकर जो कूदा-फांदी इन क्रिकेटर ने मचाया वो वाकई सोचने पर बडा अजीब सा लगता है । आज के हमारे नये क्रिकेटरों मे पार्टी का बडा शौक नजर आता है। मैच जीते या हारे इसकी परवाह शायद इतनी, इन्हे नही रहती है जितनी की मैच के बाद होने वाली पार्टियों की ललक इनमें देखी जा रही है । वैसे ये पार्टी का चलन भी आई0 पी0 एल0 की ही देन है। आई0 पी0 एल0 मे मैच के बाद क्या जबरदस्त पार्टी होती है ये आज किसी से छिपी नही है । यहां तो क्रिस गेल जैसे वेस्टइंडीयन भी कुर्ता फाड नृत्य करते नजर आ जाते है ।</p>
<p style="text-align: justify;">अब कहते है न कि आदत जब पड जाती है तब उसे छुडाने मे बडी मुश्किल का सामना करना पडता है । और एक बात ये भी है की मुट्ठीभर संकल्पवान लोग, जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं। तो हमारे मुट्ठीभर संकल्पवान क्रिकेटर पहुंच गये इतिहास की धारा बदलने पब मे और लगे अपने प्रशंसकों से ही दो-दो हाथ करने । अब इसमे अगर कुर्ता फट ही गया तो क्या ..अरे ये सब तो चलता ही रहता है । नेहरा भाई लाख कह ले मगर जो कुछ भी देखा या सुना गया है, वो प्रशंसनीय तो नही ही कहा जायेगा ।</p>
<p style="text-align: justify;">वे ही विजयी हो सकते हैं जिनमें विश्वास है कि वे विजयी होंगे । मगर हमारे भारतीय क्रिकेट टीम को देख कर क्या ऐसा लग रहा था कि इनमे विजयी होने का विश्वास है । एक बात और ये है कि आज कल खिलाडियों को अपनी चोट छिपाने की एक बुरी आदत भी हो गई है । जिसका भी खामियाजा आये दिन टीम इंडिया को भुगतना पड रहा है । जो हाल आज कल के मोटू-तोंदू खिलाडियों का है वो हमारे कोच ने अपनी रिपोर्ट मे दे दिया है । कोच ने तो यहां तक कह दिया की वो आज के कई खिलाडियों से ज्यादा फिट है । सही भी है &#8230; पर हां एक बात उडते उडते आयी है कोच महोदय&#8230; कि आपके कमरे मे भी रात के 2 बजे तक लडक़ियां घुसी रह्ती थी !</p>
<p style="text-align: justify;">मैं भी नही भूला और शर्तिया कह सकता हूं कि आप भी नही भूले होंगे वो हैदराबाद का मैच जब महान सचिन ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ एक जबरदस्त जुझारु पारी खेली थी मगर जीत के कुछ कदम दूर हम रह गये थे । तब सचिन ने 175 रन 141 गेंदों मे बनाए थे और भारत 3 रन से इस मैच को हार गया था । मैच का सर्वश्रेठ खिलाडी सचिन ही बने थे और जब उनसे उनके खेल से सम्बन्धित प्रश्न पूछा गया तब उनके चेहरे पर एक अनकहा सा मैच हारने का दर्द साफ तौर पर देखा गया था । उन्होने तब एक बात कही थी कि वो आज भी जानते है की भारत के तरफ से खेलना उनके लिए कितनी बडी बात है । बताते चले कि जहां एक तरफ सचिन उस मैच के हारने पर बहुत ज्यादा उदास थे वहीं उसी रात हमारे बाकी कई खिलाडी एक रंगीन पार्टी का मजा लेने मे व्यस्त थे ।</p>
<p style="text-align: justify;">असफलता यह बताती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं किया गया , लेकिन अगर आप इससे कोई सीख न ले तो फिर आप देश के प्रतिनिधि कैसे माने जाये ? आज इस बात मे तो कोई दो राय नही है कि हमारे क्रिकेटरों के पास पैसा बहुत आ गया है , मगर वो ये भी जान ले कि ये क्रिकेट ही है जिसने उन्हे इतना पैसा दिया है । अगर क्रिकेट नही तो फिर बाकी कुछ भी नही । इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी भी व्यक्ति को केवल उसकी उपलब्धियों के लिए सम्मानित नहीं किया जाता। समाज तो उसी का सम्मान करता है,जिससे उसे कुछ प्राप्त होता है। आप देश और समाज से अपने को अलग नही कर सकते है बन्धु । और अगर आपको सम्मान प्राप्त करना है तो कही ना कही अपने आचरण को सुधारने का प्रयास तो जरूर ही करना पडेगा। एक बात तो कबीर जी भी कह गये है की “मान सहित विष खाय के , शम्भु भये जगदीश । बिना मान अमृत पिये , राहु कटायो शीश? ।</p>
<p style="text-align: justify;">अत: समय रहते अपने आचरण मे सुधार कर सके तो बढिया है, नही तो आपके मालिक तो है ही ! और वैसे भी हमारे देश मे क्रिकेटरों की कोई कमी थोडे ही न है । और आप ये भी जान ले कि परिवर्तन विज्ञानसम्मत है । परिवर्तन को अस्वीकार नहीं किया जा सकता जबकि प्रगति, राय और विवाद का विषय है । अगर परिवर्तन हो गया तो फिर आपलोगों की प्रगति भी राय और विवाद का विषय ही बन कर रह जाएगी । और कोच महोदय आपको तो ये मानना होगा की शिक्षा और प्रशिक्षण का एकमात्र उद्देश्य समस्या-समाधान होना चाहिये । तो लग जाए समस्या के समाधान मे और इसके लिए जितने तोंदो को कम करना पडे करिये, लेकिन देर रात तक आप भी जागा न करें क्या पता कल आपका तोंद निकल आया तो ? और प्रिय खिलाडी जन आप अपने को ज्ञानी बनाए क्यूंकि जो ज्ञानी होता है वही अपनी कमियों को समझकर उनका सुधार कर सकता है।</p>
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		<title>आईपीएल-बीसीसीआई , ना तुम जीते ना हम हारे</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Apr 2010 08:25:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>के .पी. त्रिपाठी</dc:creator>
				<category><![CDATA[खेल-कूद]]></category>
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		<category><![CDATA[भारतीय राजनीति]]></category>
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		<description><![CDATA[बडे बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले। कुछ ऐसा ही इंडियन प्रीमियर लीग के कमिश्नर ललित मोदी के साथ हुआ। उनको इस पद से रूखसत कर दिया गया। उनके... <a class="meta-more" href="http://www.janokti.com/2010/04/27/%e0%a4%86%e0%a4%88%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%8f%e0%a4%b2-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%86%e0%a4%88-%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae-%e0%a4%9c%e0%a5%80/">Read more <span class="meta-nav">&#187;</span></a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;"><img class="alignright size-full wp-image-2650" title="आईपीएल" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/आईपीएल2.jpg" alt="" width="300" height="234" />बडे बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले। कुछ ऐसा ही इंडियन प्रीमियर लीग के कमिश्नर ललित मोदी के साथ हुआ। उनको इस पद से रूखसत कर दिया गया। उनके स्थान पर अलेम्बिक फार्मा कंपनी के मालिक चिरायु अमीन को अंतरिक कमिश्नर नियुक्त किया गया है। आईपीएल पर जब विवाद के बादल मंडराने लगे उसी समय से यह माना जा रहा था कि देर-सवेर ललित मोदी का जाना तय है। हम भारतीयों की सच्चाई यह है कि हम जिस किसी की आलोचना करते या गुणगान करते हैं तो सभी उसके पीछे बुरी तरह पीछे पड जाते हैं; यह भी नहीं सोचते-समझते कि इसकी अच्छाई और बुराई क्या होगी। एक माह पहले आईपीएल फटाफट क्रिकेट का गौरव हुआ करता था और ललित मोदी उसके भगवान। विवाद ने समय का ऐसा चक्र धुमाया कि पल भर में आईपीएल और उसके संरक्षक मोदी दागदार हो गए। मोदी के खिलाफ अभी कुछ सबित नहीं हुआ बस मीडिया में विवाद उठा और चलते कर दिए गए मोदी। छापों का दौर जारी है। तहकीकात जारी है फिर बीसीसीआई को इतनी कौन सी जल्दी आन पडी कि उसे अपने नोटों के बरसात करने वाली इस मशीन को चलता करना पड़ा। क्रिकेट का दागमुक्त और क्रिकेट बोर्ड को भष्ट्राचार मुक्त करने की मांगे हो रही हैं। यह किसी को नहीं पता कि इसका असली गुनाहगार कौन है। क्या अपराधी राजनेता और उद्योगपतियों का गठजोड़ हैं या पूंजीवाद जिसने आईपीएल की शुरूआत को इस शर्मनाक मुकाम तक पहुंचा दिया है। या फिर असली गुनाहगार ललित मोदी जिन्होंने गवर्निंग कांउसिल में अपने करीबियों और विश्रव्स्त बोर्ड अधिकारियों से मदद मिली। छुट्टी मोदी की ही नहीं बल्कि श्रीनिवासन की भी होनी चाहिए। उन्हें भी बीसीसीआई से निकाला जाना चाहिए।</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">ललित मोदी की बर्खास्तगी से क्या दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा! शायद नहीं? मोदी की बर्खास्तगी के बाद बीसीसीआई के अधिकारियों औ केंद्र सरकार के उन मंत्रियों और सांसदों को भी जांच के दायरे में लाना चाहिए जो देा साल से मोदी की आड़ में अपने स्विस एकाउंट में काला धन जमा कर रहे थे। विवादों के चक्रव्यूह में जब शशि थरूर और ललित मोदी घिरे तो थरूर ने अपना इस्तीफा सौंप अपने आप को बेदाग साबित करने की कोशिश की। चूंकि ललित मोदी के पास आईपीएल से जुडे़ सभी भ्रष्ट्र लोगों का कच्चा चिट्ठा था इस कारण सभी मिलकर मोदी को ही कसूरवार ठहराने लगे और अंततः आईपीएल विवाद का नजला मोदी पर गिर ही गया; अब मोदी की बर्खास्त कर विवाद का बवंडर थामने की कोशिश की जा रही है। संसद में विपक्ष चीख-चीखकर जेपीसी द्वारा घोटाले के जांच की मांग कर रहा है।लेकिन सरकार कमेटी ना बनाने पर अड़ी हुई है। कमेटी बनती है तो उसकी जांच में बहुत से सफेदपोश नंगे हो जाएंगे। सत्तारूढ़ कांग्रेस जानती है कि इसमें सर्वाधिक किरकिरी उसकी होनी है। क्योकि आईपीएल में जिन लोगों का रूप्या लगा हुआ है उनमें सर्वाधिक कांग्रेसी नेता और पार्टी से जुडे़ उद्योगपति हैं।</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">ललित मोदी अंत तक कहते रहे कि उनको सफाई का एक मौका दिया जाए। लेकिन उनकी एक ना सुनी गई। आईपीएल में जो गड़बड़झाला हुआ क्या उसके लिए मोदी ही जिम्मेदार हैं दूसरा और कोई नहीं ? अगर आईपीएल से मोदी की छुट्टी की गई है तो बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) के अध्यक्ष शशांक मनोहर भी उतने ही दोषी हैं। शशांक ने अध्यक्ष होने के नाते टीम नीलामी से जुड़े दस्तावेजों पर उनके भी हस्तक्षर हैं। यह दस्तावेज अचानक कहां गायब कर दिए गए। शशांक मनोहर जिस समय दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर रहे थे क्या उस समय उन्हें कुछ दिखा नहीं या फिर वे धृतराष्ट्र बन गए और मोदी को दुर्योधन मानते हुए उन्होंने ने उनकी हाँ में हाँ मिलाई। शशांक भी अर्थिक अनियमितताओं  के उनते ही आरोपी हैं जितने कि मोदी को ठहराया जा रहा है। विवादों में आने के बाद से ही मोदी शशांक के लिए तानाशाह हो गए। क्या इससे पहले आईपीएल एक और आईपीएल दो में बीसीसीआई को मोदी की तानाशाही दिखाई नहीं दी। इंडियन प्रीमियर लीग और उससे जुड़े विवादों का रिश्ता कोई नया नहीं है। लीग अपनी पहली पारी में ही अनेंक लोगों की घोर आलोचना का शिकार हुआ था। मोदी के अलावा लीग के अन्य अधिकारियों को भी विवाद का शिकार होना पड़ा था। यह भारतीय परंपरा रही है कि जिसके नाम पर विवाद उठता है उसे बलि का बकरा बनाकर विवाद और घोटालों को गर्त में डालने की कोशिश की जाती रही है। मोदी की बर्खास्तगी, इसका कोई इलाज नहीं है। जांच इससे आगे भी होनी चाहिए और विपक्ष की मांग पर सरकार को जेपीसी गठित कर जांच करवानी चाहिए।</div>
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		<title>आईपीएल के कर्ताधर्ताओं को लगता है कि बच निकलेंगे।</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Apr 2010 06:39:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सुमित श्रीवास्तव</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-2630" title="ipl , LALIT MODI" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/ipl-LALIT-MODI-300x234.jpg" alt="" width="300" height="234" />आईपीएल के कर्ताधर्ताओं को अब भी लगता है कि वे बच निकलेंगे। शायद वे एकाध को बलि का बकरा बनाकर काम चला लें। लेकिन आईपीएल की विश्वसनीयता को जो नुकसान पहुंचा है, उसका हिसाब कौन देगा? दुनिया के सबसे बड़े सर्कस का फॉमरूला बहुत सरल था: सभी को खुश रखो और मजे करो। मुनाफे को ही नैतिकता और मनोरंजन को ही सबसे बड़ी कला मानने वाले इस दौर में इस बेहतरीन फॉमरूले को पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए। शो</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">के मालिकों ने भारतीयों की अहंकार ग्रंथि को भुनाया और महंगी टिकटों के मार्फत खूब माल कमाया। वे हंसते-खिलखिलाते बैंक की राह नापते रहे या</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">मॉरिशस और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स की ओर रुख करते रहे, जहां पैसे का रंग स्थायी रूप से काला ही है। मालिकों को एक ही डर था और वह यह कि कहीं सरकार कबाब में हड्डी न बन जाए। ऐहतियात के तौर पर उन्होंने राजनेताओं से अपनी कमाई में साझा भी किया।</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">नतीजतन जब पहले पहल कर अधिकारियों ने ललित मोदी पर सवाल उठाए तो उनकी कार्रवाई की हवा निकाल दी गई। इसके बाद मोदी पूर्णत: निश्चिंत हो गए। उनका यह भ्रम ही उनके पतन का कारण बना। आईपीएल को कुछ दीगर लाभ भी दिए जा रहे थे। शायद इस पर भरोसा न हो, लेकिन सच्चाई यही है कि यह सर्कस मनोरंजन कर से मुक्त था। यदि यह छूट न दी गई होती तो अभी तक केवल महाराष्ट्र में ही ५-६ करोड़ की कमाई हो चुकी होती।</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">शो की पटकथा बेहद शानदार रची गई थी और सभी भूमिकाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता भी जुटाए गए थे, लेकिन अफसोस यही कि इसके बावजूद बात नहीं बनी। चंद मंत्रियों को अपने पक्ष में राजी करवाया जा सकता है, लेकिन बिगड़े विपक्ष को कैसे मनाया जाए?</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">यह मान लेना मूर्खतापूर्ण ही था कि विपक्ष और मीडिया को अग्रिम पंक्ति के टिकट थमाकर चुप कराया जा सकता है। जब शुरुआती साझेदारों और <span style="font-family: arial; line-height: 25px; font-size: 14px;">नवधनाड्य <span style="font-family: Georgia, 'Times New Roman', 'Bitstream Charter', Times, serif; line-height: 19px; font-size: 13px;">घुसपैठियों के बीच झड़प हुई तो विपक्ष को यह पूछने में कोई गुरेज नहीं हुआ: ‘दाल में क्या काला है और कितने थरूर हैं?’</span></span></div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">अभी तक पूरा अंदाजा नहीं लग सका है कि मामले में कितनी और परतें हैं। कुछ फ्रेंचाइजी मालिकों द्वारा निजी तौर पर लगाए गए दांव भी अब तक राज ही बने हुए हैं। अगर मालिक दांव खेलते हैं तो यह भी जाहिर है कि कुछ मैच फिक्स हों। एक अच्छी टीम के हारने पर उसके जीतने की तुलना में अधिक काला धन कमाया जा सकता है।</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">सभी जानते हैं कि खिलाड़ियों को रिश्वत देकर खरीदा जाना नामुमकिन नहीं है। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने अभी तक छापे के आदेश देने में कोई कोताही नहीं बरती है और बताया जाता है कि शुरुआती जांच में ही गड़बड़ियों के महत्वपूर्ण सुराग हाथ लगे हैं। हालांकि सरकार ने अभी तक घोटाले की जांच के लिए कोई संयुक्त संसदीय समिति गठित नहीं की, लेकिन वह ज्यादा देर इसे टाल नहीं पाएगी।</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">आईपीएल के कर्ताधर्ताओं को अब भी लगता है कि वे बिना ज्यादा नुकसान के बच निकलेंगे। शायद वे एकाध को बलि का बकरा बनाकर काम चला लें। वे ‘आवश्यक बुराइयों’ का बहाना बना सकते हैं या आगे से सब कुछ साफ-सुथरा रखने का वादा भी कर सकते हैं। बहरहाल, आईपीएल को होने वाली आर्थिक क्षति का आकलन तो किया जा सकता है लेकिन उसकी विश्वसनीयता को जो नुकसान पहुंचा है|</div>
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		<title>मोदी का जाना तो तय है&#8230;</title>
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		<pubDate>Thu, 22 Apr 2010 11:55:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पुष्पेन्द्र आल्बे</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;"><img class="alignright size-medium wp-image-2565" title="lalit modi ipl" src="http://www.janokti.com/wp-content/uploads/2010/04/lalit-modi-ipl-300x229.jpg" alt="" width="300" height="229" />आईपीएल समाप्ति पर है और इसी के साथ ललित मोदी का स्वर्णिम काल भी खत्म होता नजर आ रहा है. तीन साल पहले, 2008 में, विश्व क्रिकेट को आईपीएल की अनूठी सौगात देकर इतिहास के पन्नों में सुनहरों अक्षरों में अपना नाम दर्ज कराने वाले मोदी को अब एक खलनायक की तरह रूखसत करने का प्रयास किया जा रहा है. उनके खिलाफ बीसीसीआई है, क्रिकेट के मैदान में जलवे बिखेर चुके कईं भूतपूर्व खिलाड़ी हैं. यहां तक कि भारतीय राजनीति में भी इन दिनों ललित मोदी को बर्खास्त किए जाने की मांग ही सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है. राजनेता हो या राजनीतिक पार्टियां, बीसीसीआई के आला अधिकारी हो या पिफर भूतपूर्व खिलाड़ी, हर कोई इन दिनों मोदी को एक खलनायक के तौर पर प्रस्तुत करने की मुहिम में जुटा हुआ है. सबकी राय एक जैसी ही हैः मोदी एक भ्रष्टाचारी है, जिन्होंने क्रिकेट और आईपीएल में भ्रष्टाचार किया है. सो, उन्हें आईपीएल के चैयरमेन की कुर्सी पर बैठे रहने का कोई हक नहीं है.</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">तो क्या हकीकत में ऐसा है? क्या मोदी ने वाकई में भारतीय क्रिकेट का इस कदर नुकसान कर दिया है कि उन्हें बर्खास्त करना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ? जवाब होगा, नहीं. मोदी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है, जिससे भारतीय क्रिकेट बदनाम हो. और फिर अगर उन्होंने ऐसा कुछ किया भी है, तो पहले उसकी जांच होनी चाहिए. पहले उनके द्वारा किए गए अपराधों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, उसके बाद उन्हें पद से बर्खास्त करना चाहिए.</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">हाल फिलहाल तो मोदी का कसूर सिर्फ इतना प्रतीत होता है कि उन्होंने बरसों से सुस्त पड़ी बीसीसीआई को पुनर्जीवित करने का काम किया है. मोदी का कसूर सिर्फ इतना प्रतीत होता है कि उन्होंने आईपीएल जैसी पैसे बनाने वाली मशीन तैयार करके भारतीय क्रिकेट की तस्वीर बदलने की कोशिश की है. भारतीय खेलप्रेमियों को वह समय याद करना चाहिए, जब बीसीसीआई के पास अपने चयनकर्ताओं को तनख्वाह देने के लिए भी पैसे नहीं हुआ करते थे. यह ज्यादा पुरानी बात नहीं, बल्कि पांच या छह साल पहले की बात है, जब देश की राष्ट्रीय टीम चुनने वाले चयनकर्ता भी अवैतनीक कर्मचारी की तरह काम करते थे. वहीं बीसीसीआई आज दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बन गया है, तो इसमें मोदी द्वारा रची गई आईपीएल की अहम भूमिका है. आज अगर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भारत में खेलने के लिए अपनी राष्ट्रीय टीमों को छोड़ रहे हैं, तो यह आईपीएल की वजह से ही है. आज अगर धेानी, सहवाग और युवराज जैसे खिलाड़ियों को आईपीएल में डेढ़ महीनें खेलने के एवज में पांच करोड़ रूपए मिल रहे हैं, तो यह भी मोदीे की आईपीएल की वजह से ही है.</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">लेकिन बीसीसीआई को यह रास नहीं आ रहा है. बीसीसीआई में बरसों से प्रभुत्व जमाएं बैठे उन उदासीन और निकम्मे पदाधिकारियों को यह रास नहीं आ रहा है कि मोदी नामक कोई शख्स उन्हें ‘सिस्टम’ सुधारने पर उतारू है. आजादी के बाद से भारत की सबसे बड़ी व्यथा यही है कि यहां पर सिस्टम को सुधारने की कोषिष करने वालों को कभी स्वीकार नहीं किया गया. फिर चाहे वह जयप्रकाश नारायण हो, रजनीश ओशो हो या फिर अब ललित मोदी. जयप्रकाश ने राजनीति का सिस्टम सुधारने की कोशिश की, किनारे लगा दिए गए. ओशों ने यौन व्यवहार के सिस्टम को सुधारने की कोशिश की, जहर देकर मार दिए गए. अब मोदी देश के सबसे पसंदीदा खेल के सिस्टम को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, सो जाहिर है उन्हें भी किनारे लगा दिया जाएगा.</div>
<div id="_mcePaste" style="text-align: justify;">भारत की संस्कृति की यही सबसे बड़ी खासियत हैं. हम न स्वयं सिस्टम को बदलने की कोशिश करते हैं, न ही किसी को यह सिस्टम बदलने देते हैं. सो, मोदी की रवानगी तो तय है&#8230;</div>
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