डर्टी ‘सिल्क’ है या सिस्टम?
0फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ की ‘सिल्क’ को लोग डर्टी मानते हैं। हालाँकि सिल्क बाजारी है या विचारी, इसमें से किसी निष्कर्ष पर पहुँचना आसान नहीं है। लेकिन गंभीर और बड़ा सवाल
भोजपुरी सिनेमा अपने पचासवे पायदान पर आ चुका है और हालात कुछ ऐसे हैं जैसे पुरे भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को मुंह छिपाने की जगह ना मिल रही हो | सब
जीवन की घटनाओं को पर्दें पर जीवित करने की जो पहल दादा साहब फलके ने की थी, उसके पीछे एक मकशद हुआ करता था। लेकिन जैसे वक्त बदलता गया, सिनेमा के
♦ मनोज भावुक भोजपुरी सिनेमा अब 50 साल का प्रौढ़ होने वाला है, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर भी इसमें प्रौढ़ावस्था वाली गंभीरता नहीं दिख रही है। जैसे-जैसे इसकी
फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ की ‘सिल्क’ को लोग डर्टी मानते हैं। हालाँकि सिल्क बाजारी है या विचारी, इसमें से किसी निष्कर्ष पर पहुँचना आसान नहीं है। लेकिन गंभीर और बड़ा सवाल
भोजपुरी सिनेमा अपने पचासवे पायदान पर आ चुका है और हालात कुछ ऐसे हैं जैसे पुरे भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को मुंह छिपाने की जगह ना मिल रही हो | सब
जीवन की घटनाओं को पर्दें पर जीवित करने की जो पहल दादा साहब फलके ने की थी, उसके पीछे एक मकशद हुआ करता था। लेकिन जैसे वक्त बदलता गया, सिनेमा के
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सिनमाई परदा बहुत कुछ कहता है…मसलन ये ना सिर्फ मंनोरंजन एक माध्यम है बल्कि अभिव्यक्ति का एक हस्ताक्षर भी है.. इस माध्यम से अभिव्यक्ति का एक सशक्त हस्ताक्षर है..हास्य। सिनमाई
हिंदी सिनेमा के इतिहास में अब तक आपने पढ़ा (पिछली पोस्ट पढ़ें ) सामाजिक-पारिवारिक समस्याओं पर बनीं फिल्में 1930-1940 तक के बड़े बैनर थे न्यू थिएटर्स, प्रभात, बांबे टॉकीज, मिनर्वा
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आज भारत विश्व में सर्वाधिक फिल्में निर्मित करनेवाला देश है लेकिन देश में सिनेमा की शुरुआत आसान नहीं रही। आज हमारा सिनेमा जिस मुकाम पर है, उसे वहां तक पहुंचने
सृष्टि शर्मा हम हमेशा दोष देते है कि आज की फिल्में वैसी नहीं बन रही जैसा कभी मदर-इन्डिया बना करती थी.३-इडीयट और पीपली-लाइव को अगर छोड़ दे तो शायद हमें