लोकतंत्र के आगे बौद्धिक लोकतंत्र -30
2बौद्धिक मतभेद : कारण और निवारण बौद्धिक जनतंत्र स्थापना के लिए सर्व प्रथम यह अनिवार्य है कि बौद्धिक लोग एक मंच पर एकत्रित हों और देश को एक कुशल शासन
मित्रों अभी तीन दिन पहले मिडिया मे खबर आयी कि संदीप दीक्षित के ट्रेन के कूपे से दस लाख रूपये नगद मिले . कांग्रेस सांसद और शीला दीक्षित के पुत्र
विष्णु बैरागी ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’ वाली उक्ति इन दिनों बार-बार याद आने लगी है। होना तो यह चाहिए था कि जन भावनाओं का प्रकटीकरण, विधायी सदनों में, हमारे
डरे हुए हम लोग सभी है मनमानी कर रही सरकार। बढ़ा बढ़ा कर महंगाई को जीना कर दिया है दुश्वार ॥ ऐसा जीना क्या जीना जहाँ मर मर के हर
बौद्धिक मतभेद : कारण और निवारण बौद्धिक जनतंत्र स्थापना के लिए सर्व प्रथम यह अनिवार्य है कि बौद्धिक लोग एक मंच पर एकत्रित हों और देश को एक कुशल शासन
मध्य एशिया, भू-राजनैतिक दृष्टिकोण से हमेशा से ही विश्व का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है. सोवियत संघ के पतन के बाद इस क्षेत्र का महत्व और अधिक बढ़ गया
परिवर्तन की बात करना राजनेताओं और समाजसेवियों में प्रचलित एक फैशन है। चुनाव आयुक्त श्री कुरैशी भी देश भर के विद्वानों और राजनेताओं से परामर्श कर रहे हैं कि चुनाव
वैसे तो आमतौर पर सरदारों के बारे में दुनिया के लोग हास्य व चुटकुले बनाते व सुनाते रहते हैं, लेकिन इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि देश
“इंग्लेंड के लार्ड एंथनी लेस्टर ने सवा सौ करोड़ भारतीयों को अवसर प्रदान किया है कि वे देश के नकाबपोश कर्णधारों से सीधे सवाल करें कि भारतीय दण्ड संहिता में
:- राम पुरुषोत्तम कस्तुरे बचपन ग्रामीण परिवेश और काश्तकारो के बीच बीता ! पिताजी का व्यवसाय खेती था, इस कारण काश्तकारो से मेरा जीवंत संपर्क रहा ! यह संपर्क आज
अंग्रेजों ने क्या सोंचकर वकीलों को काला कपडा पहनाया था इसका महज अनुमान ही लगाया जा सकता है.शायद उन्होंने सोंचा हो कि जिस तरह इस रंग पर दूसरा कोई रंग
कवि कुलवंत सिंह प्राय: सभी देशों की सरकारों का एक रोना साझा है. और वो भी अति भयंकर रोना! देश की अर्थ व्यवस्था में कला धन. यह काला धन बहुत
पिछले दिनों हमने पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना दिए जाने और उन पर भीषण,अमानुषिक अत्याचार किए जाने सम्बन्धी कई लेख अख़बारों-पत्रिकाओं में पढ़े हैं.
बापू मैंने तेरी इस बात पर बचपन में ही आँख खोलकर विश्वास कर लिया था कि सत्य ही ईश्वर है और आज भी मानता हूँ.लेकिन तब मुझे यह पता नहीं