नारी मौन साधक
1जीवन एक संघर्ष, एक चुनौती है जिसे हर इंसान को स्वीकारना पड़ता है। संघर्ष में न सिर्फ़ उन्हें ऊर्जस्विता मिलती है, बल्कि जीवन के विविध रूप से उनका परिचय भी
: डॉ दीप्ति गुप्ता राजेन्द्र जी, ‘हंस’ के अक्टूबर अंक 2010 में ‘तुम्हीं ने तो दिए हैं ये हथियार’ शीर्षक के तहत आपका सम्पादकीय पढ़ा. मुझे बेहद आश्चर्य हुआ कि
_आज समाज कितना ही आधुनिक क्यों न हो गया हो | पर महिलाओं को लेकर उनकी सोच में जरा भी बदलाव देखने को नहीं मिला हैं | एक लड़का यदि
शैलेश गुप्ता एक कथा है बहुत पुरानी बरसो पहले गुरु कुल के दो शिष्यों राघव और अनीष को गुरु देव ने किसी आवश्यक कार्य से दुसरे देश भेजा. गुरु कुल में
जीवन एक संघर्ष, एक चुनौती है जिसे हर इंसान को स्वीकारना पड़ता है। संघर्ष में न सिर्फ़ उन्हें ऊर्जस्विता मिलती है, बल्कि जीवन के विविध रूप से उनका परिचय भी
: डॉ दीप्ति गुप्ता राजेन्द्र जी, ‘हंस’ के अक्टूबर अंक 2010 में ‘तुम्हीं ने तो दिए हैं ये हथियार’ शीर्षक के तहत आपका सम्पादकीय पढ़ा. मुझे बेहद आश्चर्य हुआ कि
_आज समाज कितना ही आधुनिक क्यों न हो गया हो | पर महिलाओं को लेकर उनकी सोच में जरा भी बदलाव देखने को नहीं मिला हैं | एक लड़का यदि
शैलेश गुप्ता एक कथा है बहुत पुरानी बरसो पहले गुरु कुल के दो शिष्यों राघव और अनीष को गुरु देव ने किसी आवश्यक कार्य से दुसरे देश भेजा. गुरु कुल में
पुरुष वर्चस्ववादी सामाजिक अवधारणा में स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार कोई नई बात नहीं है लेकिन बदलते परिवेश में सीमित सोच और घटिया मानसिकता पूरी व्यवस्था के लिए घातक है। सवाल
बेटी शब्द सुनते ही अन्तःकरण में अनायास ही स्नेह, प्रेम, दुलार की लहर का कोमल सा अहसास नारी के ममत्व को पूर्णता प्रदान करताहै। बेटी अलग-अलग रूपों में जीवन को
ब्रजेश कुमार शर्मा जिस दिन वास्तव में नारी सशक्त हो जाएगी उस दिन से पुरूष सशक्तिकरण अभियान का दौर भी आरम्भ हो जाएगा।क्योंकि मैंने बहुत-से ऐसे विवाहित पुरूषों की दुर्दशाओं
नारी सशक्तिकरण “यत्र नार्यातु पूज्यन्ते , तत्र देवो रमन्ते“ “जहाँ नारी की पूजा होती है वहा देवता निवास करते हैं“ महिलाओं को शुरू से ही एक सम्मानीय और पूज्यनीय स्थान
आदमी ने आवास को मकान बनाया, फिर मकान को घर बनाया । घर बनने के साथ घर की खबरदारी करने वाली सत्ता गृहिणी के रुप में उभड़ी । पुरुष-सत्ता और
महिला आयोग, महिला हेल्प लाईन, नारी सशक्तीकरण योजना, नारीवाद इस तरह के शब्द आज भी यह बताने के लिये काफी हैं कि तमाम परिवर्तनों के बावजूद भी हम स्त्रियां पुरुषसत्तात्मक