Archive for category: समाज

बदल जाती हैं रिश्तों में प्राथमिकताएँ

2 गिरिजेश कुमार / 2011/11/29 6:20 pm

यह सच है कि हमें हर वक्त किसी न किसी की ज़रूरत होती है। फिर चाहे वह ज़िन्दगी में गम का तूफान हो या खुशियों का मेहमान। लेकिन सवाल यह

कोरी राजनीति हैं छोटे राज्यों का मुद्दा

कोरी राजनीति हैं छोटे राज्यों का मुद्दा

1 जनोक्ति डेस्क / 2011/11/27 8:42 pm

गिरधर तेजवानी उत्तरप्रदेश विधानसभा में हाल ही मुख्यमंत्री सुश्री मायावती की पहल पर बहुजन समाज पार्टी की सरकार द्वारा पारित राज्य को चार भागों में बांटने का प्रस्ताव पारित किए जाने का

कृषि पदार्थों में आज भी समृद्ध है बुन्देलखण्ड

0 कुमारेन्द्र / 2011/11/27 12:21 am

जबसे उत्तर प्रदेश सरकार ने बुन्देलखण्ड राज्य के प्रस्ताव की चर्चा की है तबसे बुन्देलखण्ड के लिए संघर्ष कर रहे लोगों के साथ-साथ आम आदमी को भी इस बात का

गोपनीयता की ओट

0 डा ० पुरुषोत्तम मीणा / 2011/11/21 2:31 pm

सुखराम बनाम ए. राजा : 4 अनुपात 96 बनाम 96 अनुपात 4 केवल वर्तमान में ही नहीं, बल्कि हमेशा से सही और सत्य बोलने वालों को सूली पर चढाया जाता

ऑनर किलिंग:इंसानियत पर धब्बा

ऑनर किलिंग:इंसानियत पर धब्बा

0 पूजा सिंह आदर्श / 2011/11/21 2:25 pm

अभी हाल में ही मथुरा ऑनर किलिंग मामले में अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया,जिसमे आठ लोगों को फाँसी की सजा तथा सत्ताइस को उम्र कैद की सजा सुना दी।

क्या यही लोकतंत्र है ?

क्या यही लोकतंत्र है ?

0 अजय केशरी / 2011/11/19 9:11 pm

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि बहुमत के हिसाब से ही केंद्र या राज्य में अपनी सरकार बनाते है। सरकार का कार्य

बेटी है तो संसार है

बेटी है तो संसार है

1 डॉ. शशि तिवारी / 2011/11/08 9:45 pm

बेटी शब्द सुनते ही अन्तःकरण में अनायास ही स्नेह, प्रेम, दुलार की लहर का कोमल सा अहसास नारी के ममत्व को पूर्णता प्रदान करताहै। बेटी अलग-अलग रूपों में जीवन को

संस्कार और बाज़ार

0 राजीव गुप्ता / 2011/10/29 6:57 pm

अवधपुरी अति रुचिर बनाई !  देवन्ह सुमन बृष्टि झरी लाई !! प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा !  तुरत दिब्य सिंघासन माँगा !! (उत्तरकाण्ड, रामचरितमानस) बाय वन गेट टू फ्री….वॉव….देख-देख-उधर-देख….चल यार उधर ही चलते है….आज शॉपिंग

आदिवासी विकास के 11 अवरोधक

आदिवासी विकास के 11 अवरोधक

0 डा ० पुरुषोत्तम मीणा / 2011/10/23 11:46 am

आजादी के तत्काल बाद संविधान में सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक रूप से सर्वाधिक कमजोर जिन दो वर्गों या समूहों को चिह्नत किया गया था, उनमें एक आदिवासी वर्ग है, जिसे

गरीबी और मजाक

गरीबी और मजाक

0 राजीव गुप्ता / 2011/10/11 10:07 am

आज़ादी के इतने वर्षो बाद भी गरीबी और मजाक एक दूसरे का पर्याय बने हुए है अगर ऐसा मान लिया जाय तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी ! कम से कम