बदल जाती हैं रिश्तों में प्राथमिकताएँ
2यह सच है कि हमें हर वक्त किसी न किसी की ज़रूरत होती है। फिर चाहे वह ज़िन्दगी में गम का तूफान हो या खुशियों का मेहमान। लेकिन सवाल यह
‘अब व्हाइट जीतेगा’ चेस खेलने वाली एक गोरी महिला दावे के साथ कहती है। ब्लैक आउट व्हाइट इन- बड़े गर्व के साथ कहा जाता है। सिर्फ यही नहीं आप अच्छा गाती
“वो लोग जबरदस्ती गाडी में बैठ गए। उसके बाद सब सामान माँगने लगे और फिर आंटी(Aunty) को बगल की गली में जाने कहा फिर मार दिया” यह बयान है चार
किसी भी देश की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने नायकों को किस तरह से याद करता है। भारत ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में देश के
यह सच है कि हमें हर वक्त किसी न किसी की ज़रूरत होती है। फिर चाहे वह ज़िन्दगी में गम का तूफान हो या खुशियों का मेहमान। लेकिन सवाल यह
गिरधर तेजवानी उत्तरप्रदेश विधानसभा में हाल ही मुख्यमंत्री सुश्री मायावती की पहल पर बहुजन समाज पार्टी की सरकार द्वारा पारित राज्य को चार भागों में बांटने का प्रस्ताव पारित किए जाने का
जबसे उत्तर प्रदेश सरकार ने बुन्देलखण्ड राज्य के प्रस्ताव की चर्चा की है तबसे बुन्देलखण्ड के लिए संघर्ष कर रहे लोगों के साथ-साथ आम आदमी को भी इस बात का
सुखराम बनाम ए. राजा : 4 अनुपात 96 बनाम 96 अनुपात 4 केवल वर्तमान में ही नहीं, बल्कि हमेशा से सही और सत्य बोलने वालों को सूली पर चढाया जाता
अभी हाल में ही मथुरा ऑनर किलिंग मामले में अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया,जिसमे आठ लोगों को फाँसी की सजा तथा सत्ताइस को उम्र कैद की सजा सुना दी।
भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि बहुमत के हिसाब से ही केंद्र या राज्य में अपनी सरकार बनाते है। सरकार का कार्य
बेटी शब्द सुनते ही अन्तःकरण में अनायास ही स्नेह, प्रेम, दुलार की लहर का कोमल सा अहसास नारी के ममत्व को पूर्णता प्रदान करताहै। बेटी अलग-अलग रूपों में जीवन को
अवधपुरी अति रुचिर बनाई ! देवन्ह सुमन बृष्टि झरी लाई !! प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा ! तुरत दिब्य सिंघासन माँगा !! (उत्तरकाण्ड, रामचरितमानस) बाय वन गेट टू फ्री….वॉव….देख-देख-उधर-देख….चल यार उधर ही चलते है….आज शॉपिंग
आजादी के तत्काल बाद संविधान में सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक रूप से सर्वाधिक कमजोर जिन दो वर्गों या समूहों को चिह्नत किया गया था, उनमें एक आदिवासी वर्ग है, जिसे
आज़ादी के इतने वर्षो बाद भी गरीबी और मजाक एक दूसरे का पर्याय बने हुए है अगर ऐसा मान लिया जाय तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी ! कम से कम