कितने निर्मल बाबा का भांडाफोड़ करेगी मीडिया
1पिछले दिनों से देश के कई इलेक्टा्रनिक मीडिया में श्री निर्मल सिंह नरूला उर्फ ”निर्मल बाबा पर खुली बहस चल रही है। स्टॉर न्यूज द्वारा प्रारम्भ की गई इस बहस
प्रभात कुमार रॉय भारत में नक्सल समस्या की दुरुह जटिलताएं दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। बंदूकों और बमों के बल पर समाजवादी व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश करने वाले
सोफे पर बैठे-बैठे हम खबरों की दुनिया से निकलकर फिल्मी दुनिया में घूमने लगते हैं। रिमोट के बटन के आसरे चैनल बदलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। कंप्यूटर पर
1 मई / अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर विशेष आज २१वीं सदी में भी मजदूरों का शोषण बदस्तूर जारी है। शताब्दियों से संघर्षरत मजदूर वर्ग अपने सम्मान और हक से
पिछले दिनों से देश के कई इलेक्टा्रनिक मीडिया में श्री निर्मल सिंह नरूला उर्फ ”निर्मल बाबा पर खुली बहस चल रही है। स्टॉर न्यूज द्वारा प्रारम्भ की गई इस बहस
मित्रों, किसी भी सभ्य और लोकतान्त्रिक राष्ट्र की आधारशिला यह है कि वह अपने नागरिकों में लिंग, धर्म, जाति, आर्थिक स्थिति आदि के आधार पर बिना किसी भेदभाव के सबके
शीर्षक देखकर चौंक गये क्या? चौंकना तो नहीं चाहिए क्योंकि आजकल इससे अधिक खुलापन हमारे साहित्य में, हमारी फिल्मों में हमारे रोजमर्रा के जीवन में देखने को मिल रहा है।
हमें ‘नागरिक शास्त्र’ में पढ़ाया गया है- “प्रत्यक्ष प्रजातंत्र” सिर्फ ‘बहुत छोटे’ देशों में ही संभव है- भारत-जैसे विशाल देश में तो इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती! …और
पुनः विश्व गुरु बनने का सपना संजोने वाली अधिकांश भारतीय संततियों का ध्येय जब अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए राष्ट्र हितों के मानक मूल्यों से समझौता करने तक की तरफ अग्रसर होने लगे
‘अब व्हाइट जीतेगा’ चेस खेलने वाली एक गोरी महिला दावे के साथ कहती है। ब्लैक आउट व्हाइट इन- बड़े गर्व के साथ कहा जाता है। सिर्फ यही नहीं आप अच्छा गाती
“वो लोग जबरदस्ती गाडी में बैठ गए। उसके बाद सब सामान माँगने लगे और फिर आंटी(Aunty) को बगल की गली में जाने कहा फिर मार दिया” यह बयान है चार
गुलाम कुन्दनम 24मार्च को सासाराम में दृष्टिगत चुनौतीपूर्ण (visually challenged ) बच्चों के लिए रेडियो मिर्ची और बिहार शिक्षा परियोजना के संयुक्त कार्यक्रम में “तारे जमीं पर” फिल्म दिखाई गयी.
किसी भी देश की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने नायकों को किस तरह से याद करता है। भारत ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में देश के
श्री श्री रविशंकर जी के इस बयान (सरकारी स्कूलों से पढ़े बच्चों में संस्कार नहीं होते और इसकी वजह से छात्र हिंसा व नक्सलवाद की तरफ जा रहे हैं। इसीलिए सरकार को