Archive for category: विचार -विमर्श

दबी कुचली नीतियाँ और आधुनिक कचरे का निपटारा

दबी कुचली नीतियाँ और आधुनिक कचरे का निपटारा

0 अमित कुमार मीत / 2012/05/03 1:02 am

सोफे पर बैठे-बैठे हम खबरों की दुनिया से निकलकर फिल्मी दुनिया में घूमने लगते हैं। रिमोट के बटन के आसरे चैनल बदलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। कंप्यूटर पर

मजदूर: मंजिल अभी है कोसों दूर !

मजदूर: मंजिल अभी है कोसों दूर !

0 राजेश कश्यप / 2012/04/30 2:59 pm

1 मई / अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर विशेष   आज २१वीं सदी में भी मजदूरों का शोषण बदस्तूर जारी है। शताब्दियों से संघर्षरत मजदूर वर्ग अपने सम्मान और हक से

धर्म और अध्यात्म पर आघात करते बाबाओं की जमात

1 डॉ. शशि तिवारी / 2012/04/29 11:12 pm

भारत प्रारंभ से ही साधु-संत फकीर, ऋषि मुनियों की भूमि रहा है! आध्यात्म-ज्ञान के क्षेत्र में भारत का पूरे विश्व में एक अलग ही स्थान है, फिर बात चाहे भगवान

देश में गहराता विश्वास का संकट

0 राजीव खंडेलवाल / 2012/04/28 11:54 pm

सम्पूर्ण विश्व विभिन्न समस्याओ से जूझ रहा है व भारत उन राष्ट्रो से भिन्न नहीं है। लेकिन देश वर्तमान मे जिन विभिन्न-विशिष्ट समस्याओ का सामना कर रहा है वे विभिन्न

आखिर निर्मल बाबा पैदा कहाँ से होते हैं ?

आखिर निर्मल बाबा पैदा कहाँ से होते हैं ?

1 अवधेश कुमार / 2012/04/26 10:30 pm

अवधेश कुमार निर्मल नाम के बाबा पिछले कुछ दिनों से देश भर में बहस का मुद्दा बन हुए हैं। ऐसा बाबा पहली बार हमारे सामने हंै जो बाजाब्ता बैंक खातों

आस्था से अंधविश्वास तक ”बाबाओं” की भूमिका !

0 राजीव खंडेलवाल / 2012/04/25 10:45 am

पिछले दिनों से देश के कई इलेक्टा्रनिक मीडिया में श्री निर्मल सिंग नरूला उर्फ ”निर्मल बाबाÓÓ पर खुली बहस चल रही है। स्टॉर न्यूज द्वारा प्रारम्भ की गई इस बहस

जंगल की आवाज कौन सुनेगा ?

जंगल की आवाज कौन सुनेगा ?

0 अभिषेक रंजन / 2012/04/25 10:33 am

बड़ी तकलीफ होती है जब अपने पाँवों के नीचे की जमीन सुलगती है। लेकिन उनका क्या जिन्हें सुलगते आग के दर्द को दिन-रात झेलना पड़ता है। उनकी व्यथा कौन समझ

समरथ को नही दोष ?

समरथ को नही दोष ?

डॉ. शशि तिवारी / 2012/04/23 5:21 pm

जल, जंगल और ज़मीन आदि अनादि काल से ही मानव को आर्किर्षत करते आए हैं और करे भी क्यों न आखिर इनसे मानव का जीवन जो जुड़ा है, इतना ही

कश्मीर पर वार्ता का औचित्य

कश्मीर पर वार्ता का औचित्य

0 कुन्दन पाण्डेय / 2012/04/21 7:33 pm

अमेरिकी समाचार पत्र वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए इंटरव्यू में भारत के विदेश सचिव रंजन मथाई ने कहा कि भारत पाक के साथ शांति वार्ता के तहत कश्मीर मुद्दे पर

विषमतापूर्ण समाज में विविधतापूर्ण शिक्षा का सवाल

विषमतापूर्ण समाज में विविधतापूर्ण शिक्षा का सवाल

0 जनोक्ति डेस्क / 2012/04/18 4:36 pm

दीपक, भारतीय समाज में धर्म, जाति, लिंग पर आधारित घोर विषमताए है जो भारतीय समाज के विकास के साथ साथ यहाँ के सामाजिक वातावरण मे अत्यंत गहराई से स्थापित होते