Archive for category: विचार -विमर्श

जो भूखों मरते हैं, वो नाचते कैसे हैं ?

जो भूखों मरते हैं, वो नाचते कैसे हैं ?

0 जनोक्ति डेस्क / 2011/10/03 8:40 pm

अनिल यादव सिटिज़न न्यूज़ सर्विस आजादी के तिरसठ साल बाद भी देश के आदिवासी और अति दलित जातियां मुख्य धारा से बाहर हैं। उनके विकास के लिए बनी योजनाओं ने उन्हें दिया

समाज में चारित्र्यगत् शिक्षा का अभाव

समाज में चारित्र्यगत् शिक्षा का अभाव

0 ब्रजेश कुमार / 2011/09/28 3:28 pm

ब्रजेश कुमार शर्मा समाज में तरह-तरह के हृदय-विदारक घटनाएँ घट रही हैं, किसी डाँक्टर द्वारा न पसंद आने पर अपनी पत्नी को मार डालना, इंजीनियर, आईएस द्वारा मामूली-सी बात पर

नारी-सशक्तिकरण

नारी-सशक्तिकरण

0 ब्रजेश कुमार / 2011/09/28 2:47 pm

ब्रजेश कुमार शर्मा जिस दिन वास्तव में नारी सशक्त हो जाएगी उस दिन से पुरूष सशक्तिकरण अभियान का दौर भी आरम्भ हो जाएगा।क्योंकि मैंने बहुत-से ऐसे विवाहित पुरूषों की दुर्दशाओं

भारतीय पुलिस यानि सरकारी दामाद

भारतीय पुलिस यानि सरकारी दामाद

4 ब्रज किशोर सिंह / 2011/09/27 9:27 pm

मित्रों,इन दिनों भारतीय पुलिस की अनैतिकता के अद्भूत कारनामे रह-रहकर लगातार अलग-अलग प्रदेशों से सामने आ रहे हैं.कल-परसों की रात दिल्ली पुलिस का एक जवान लूटपाट और क़त्ल करता हुआ पकड़ा

आधुनिकता बनाम परिवार

आधुनिकता बनाम परिवार

0 गंगानंद झा / 2011/09/26 5:19 pm

परिवार की हमारी पारम्परिक अवधारणा और संरचना को आधुनिकता के ज्वार के कारण काफी तनाव का सामना करना पड रहा है । मनुष्य एक ही साथ व्यक्ति तथा समूह के अवयव

नारी सशक्तिकरण: संविधान में नहीं सोच में बदलाव जरुरी

0 प्रियम राजवंशी / 2011/09/25 1:28 pm

नारी सशक्तिकरण “यत्र नार्यातु पूज्यन्ते , तत्र देवो रमन्ते“ “जहाँ नारी की पूजा होती है वहा देवता निवास करते हैं“ महिलाओं  को शुरू से ही एक सम्मानीय और पूज्यनीय स्थान

वृद्धाश्रम, श्राद्ध की संस्कृति को मरणामंत्रण

वृद्धाश्रम, श्राद्ध की संस्कृति को मरणामंत्रण

0 कुन्दन पाण्डेय / 2011/09/24 9:57 pm

वृद्धाश्रम, श्राद्ध की संस्कृति को मरणामंत्रण श्राद्ध का अर्थ होता है, श्रद्धा से जो कुछ दिया जाय। किन्तु आज-कल श्राद्ध का अर्थ है पितरों के उद्देश्य से पिण्डदानादि की क्रिया।

घर का विकास

घर का विकास

3 गंगानंद झा / 2011/09/17 10:48 pm

आदमी ने आवास को मकान बनाया, फिर मकान को घर बनाया । घर बनने के साथ घर की खबरदारी करने वाली सत्ता गृहिणी के रुप में उभड़ी । पुरुष-सत्ता और

क्या स्वतंत्र भारत में ऐसा भी होता है….?

क्या स्वतंत्र भारत में ऐसा भी होता है….?

3 राजीव गुप्ता / 2011/09/08 7:58 am

मेरे पति को ईसाईयों ने जान से ख़त्म कर दिया क्योंकि वो ईसाई नहीं बने ! गोद में दुधमुहे बच्चे को लेकर सिसकते हुए अर्चना भार्गव जी जो कि छतीसगढ़

हाई प्रोफाइल होती शिक्षा में गुम होते शिक्षक

हाई प्रोफाइल होती शिक्षा में गुम होते शिक्षक

0 पूजा सिंह आदर्श / 2011/09/06 2:31 am

. जिस तेजी से परिवर्तन की बयार चल रही है….उसमे सब कुछ उतनी ही तेजी से बदल भी रहा है…हमारी जीवन शैली,हमारा आचरण,हमारे आदर्श,हमारे विचार,कर्त्तव्य, …सभी कुछ.हमारे उद्दयेश बदल गए