आत्महंता मत बनिए
0यह एक विडंबना ही है कि ‘जीवेम शरदः शतम्’ यानी हम सौ साल जिएं, इसकी कामना करने वाले समाज में मृत्यु को अंगीकार करने की आत्महंता प्रवृत्ति बढ़ रही है।
बिना नागा दारू पिया, घर खर्चे का क्या होगा? बच्चों को नहीं दूध दही, उनके स्वास्थ्य का क्या होगा? बताओ तो, स्कूल की फीस? उनकी किताब का क्या होगा? तू
द्वंद विचारों के अनिर्णीत, दोराहों चौराहों पर शोर मचता जब घनघोर, दृढ़ संकल्पों की सडक ही, भटकन से हमें बचा कर, पकड़ाती मंजिल की डोर, ले जाती मंजिल की ओर. इस सडक की चाल कभी, सीधी सी कभी टेढ़ी सी, मुडती बलखाती कभी
कुछ बड़ा काम करने के लिए, कुछ हटके करने के लिए एक उद्देश्य होना चाहिए। अगर मकसद सामने हो और फिर उसे पाने के लिए कुछ किया जाये, तो बहुत
यह एक विडंबना ही है कि ‘जीवेम शरदः शतम्’ यानी हम सौ साल जिएं, इसकी कामना करने वाले समाज में मृत्यु को अंगीकार करने की आत्महंता प्रवृत्ति बढ़ रही है।
आर्थिक तौर पर विपन्न सवर्णों को मनवांछित उच्च शिक्षा अवश्य मिलनी चाहिए । और इसका एक संवैधानिक रास्ता भी निकला जा सकता है । संविधान के अनुच्छेद 15 (3) के
भारत में मुसलमान वर्ग अन्य समुदायों के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा पिछड़ा है. इसकी एक अहम वजह यह है कि वे अपनी पुरातनपंथी मानसिकता के दायरे से बाहर आने की कोशिश
मुंबई हमले में आज सीबीआई की विशेष अदालत ने कसाब को फाँसी की सजा सुनाई है जो भारत के लिए ख़ुशी की बात है लेकिन क्या इससे पाकिस्तान का मनोबल टूटेगा
सचमुच यह विडम्बना ही है कि विश्व भर में एक बड़ी आबादी निरक्षर है और उस निरक्षर आबादी का तीसरा हिस्सा भारत में निवास करता है . सिर्फ धन के
राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमन्त्री तक नक्सलवाद को देश की सबसे बडी या आतंकवाद के समकक्ष समस्या बता चुके हैं। अनेक लेखक भी वातानुकूलित कक्षों में बैठकर नक्सलवाद के ऊपर खूब
‘यौन शिक्षा’, यदि इसके आगे कुछ भी न कहा जाये तो भी लगता है कि किसी प्रकार का विस्फोट होने वाला है। हमारे समाज में ‘सेक्स’ अथवा ‘यौन’ को एक ऐसे विषय के रूप में सहज स्वीकार्यता प्राप्त है जो पर्दे के पीछे छिपाकर रखने वाला है; कहीं सागर की गहराई में दबाकर रखने वाला विषय है।
मनुष्य -जीवन में जिस प्रकार शैशव ,यौवन,प्रौढावस्थाऔर वार्धक्य आते हैं , राष्ट्रीयजीवन में भी ऐसी अवस्थाएं उसी क्रम में आती है । मनुष्य मरता है , एक शरीर को त्याग