Archive for category: शिक्षा

आत्महंता मत बनिए

आत्महंता मत बनिए

0 फ़िरदौस ख़ान / 2010/05/23 2:22 pm

यह एक विडंबना ही है कि ‘जीवेम शरदः शतम्’ यानी हम सौ साल जिएं, इसकी कामना करने वाले समाज में मृत्यु को अंगीकार करने की आत्महंता प्रवृत्ति बढ़ रही है।

गरीब सवर्ण छात्रों को मिले संरक्षण

गरीब सवर्ण छात्रों को मिले संरक्षण

0 डा ० पुरुषोत्तम मीणा / 2010/05/22 8:48 pm

आर्थिक तौर पर विपन्न सवर्णों को मनवांछित उच्च शिक्षा अवश्य मिलनी चाहिए । और इसका एक संवैधानिक रास्ता भी निकला जा सकता है । संविधान के अनुच्छेद 15 (3) के

फ़तवों की बिसात पर मुसलमान

फ़तवों की बिसात पर मुसलमान

1 फ़िरदौस ख़ान / 2010/05/13 3:53 pm

भारत में मुसलमान वर्ग अन्य समुदायों के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा पिछड़ा है. इसकी एक अहम वजह यह है कि वे अपनी पुरातनपंथी मानसिकता के दायरे से बाहर आने की कोशिश

ग्रेजुएट आतंकियों का कारखाना

ग्रेजुएट आतंकियों का कारखाना

0 जयराम "विप्लव" / 2010/05/06 3:52 pm

मुंबई हमले में आज सीबीआई की विशेष अदालत ने कसाब को फाँसी की सजा सुनाई है जो भारत के लिए ख़ुशी की बात है लेकिन क्या इससे पाकिस्तान का मनोबल टूटेगा

शिक्षा क्षेत्र में समाज का सहयोग जरुरी

शिक्षा क्षेत्र में समाज का सहयोग जरुरी

1 दीपाली पाण्डेय / 2010/05/02 11:03 am

सचमुच यह विडम्बना ही है कि विश्व भर में एक बड़ी आबादी निरक्षर है और उस निरक्षर आबादी का तीसरा हिस्सा भारत में निवास करता है . सिर्फ धन के

नक्सलवाद की असली तस्वीर

नक्सलवाद की असली तस्वीर

0 डा ० पुरुषोत्तम मीणा / 2010/03/20 9:10 am

राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमन्त्री तक नक्सलवाद को देश की सबसे बडी या आतंकवाद के समकक्ष समस्या बता चुके हैं। अनेक लेखक भी वातानुकूलित कक्षों में बैठकर नक्सलवाद के ऊपर खूब

यौन शिक्षा – चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया

2 कुमारेन्द्र / 2009/08/17 1:53 am

‘यौन शिक्षा’, यदि इसके आगे कुछ भी न कहा जाये तो भी लगता है कि किसी प्रकार का विस्फोट होने वाला है। हमारे समाज में ‘सेक्स’ अथवा ‘यौन’ को एक ऐसे विषय के रूप में सहज स्वीकार्यता प्राप्त है जो पर्दे के पीछे छिपाकर रखने वाला है; कहीं सागर की गहराई में दबाकर रखने वाला विषय है।

भारत एक मिशन है,एक गौरवपूर्ण भविष्य है : “नेता जी “

0 जनोक्ति डेस्क / 2009/06/06 8:53 pm

मनुष्य -जीवन में जिस प्रकार शैशव ,यौवन,प्रौढावस्थाऔर वार्धक्य आते हैं , राष्ट्रीयजीवन में भी ऐसी अवस्थाएं उसी क्रम में आती है । मनुष्य मरता है , एक शरीर को त्याग