Archive for category: विचार -विमर्श

मौत का सामान बेचते बच्चे

मौत का सामान बेचते बच्चे

1 गिरिजेश कुमार / 2012/02/19 8:33 pm

शरीर पर गंदे, मैले कुचैले कपड़े, ठंड और उचित देखभाल न होने से हाथ पैर और चेहरों के चमड़े फटे-फटे, उम्र बमुश्किल 12-13 साल, आँखे किसी खरीदार के इंतजार में।

संत वेलेंटाइन या साध्वी मीरा ?

संत वेलेंटाइन या साध्वी मीरा ?

1 आर.एल फ्रांसिस / 2012/02/14 7:46 am

मीडिया और बाजार वेलेंटाइन-डे के प्रचार-प्रसार में जुट गए है। आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि देश में वेलेंटाइन डे मार्किट 1200 करोड़ रुपए के आंकड़े को पार

गरीबी का आधुनिकीकरण

गरीबी का आधुनिकीकरण

2 Dadu / 2012/02/13 4:24 pm

ऐसा बताया जाता रहा है कि बढ़ते हुए परिवर्द्धन के साथ-साथ अभाव की स्थिति में कमी आती जाएगी तथा अन्त में विश्व के हर कोने से  गरीबी समाप्त हो जाएगी।

भूमंडलीकृत बाजार और समाज का नैतिक पतन

भूमंडलीकृत बाजार और समाज का नैतिक पतन

0 राजीव गुप्ता / 2012/02/12 6:28 pm

जयप्रकाश नारायण ने अपनी एक पुस्तक “समाजवाद से सर्वोदय की ओर” में लिखा है कि “विज्ञानं ने अखिल विश्व को सिकोड़कर एक पड़ोस बना दिया है !” इस बात की

वैलेनटाइन डे या प्यार को पैसे में तोलने का दिन

वैलेनटाइन डे या प्यार को पैसे में तोलने का दिन

0 राजेश त्रिपाठी / 2012/02/12 12:37 pm

आप अंग्रेजी, हिंदी या किसी क्षेत्रीय भाषा का अखबार उठाइए आपको उनमें वैलेनटाइन डे छाया मिलेगा। उनमें इससे संबंधित जितने फीचर नहीं होंगे, उनसे कहीं ज्यादा उन वस्तुओं के विज्ञापन

चुनाव सुधार हेतु कुछ सुझाव

चुनाव सुधार हेतु कुछ सुझाव

1 जनोक्ति डेस्क / 2012/02/12 10:00 am

देश के 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव के दौरान जो कुछ चल रहा है उसे देखते हुए एकबार पुनः ‘ चुनाव सुधार ‘ की बहस तेज हो गयी है |

‘ढ़ाई आखर प्रेम के’ (वेलेंटाइन डे विशेष)

‘ढ़ाई आखर प्रेम के’ (वेलेंटाइन डे विशेष)

1 Rajesh Kashyap / 2012/02/12 8:39 am

14 फरवरी / ‘वेलेंटाइन डे’ विशेष ढ़ाई आखर प्रेम के…. -राजेश कश्यप   ‘प्रेम’ ! दिल की कितनी अथाह गहरी भावनाओं को झंकृत करता है, यह शब्द। इस शब्द के

राजेन्द्र यादव जी के बारे में एक शब्द बहुत सटीक बैठता है “ढोंगी”

राजेन्द्र यादव जी के बारे में एक शब्द बहुत सटीक बैठता है “ढोंगी”

1 जनोक्ति डेस्क / 2012/02/10 8:32 pm

डॉ दीप्ति गुप्ता का आलोचनात्मक आलेख ‘ राजेन्द्र यादव जी, नारी-विमर्श को लेकर अपने विकृत दृष्टिकोण का परिष्कार कीजिए ‘ के ऊपर अपनी टिप्पणी में इलाहाबाद से जनोक्ति के पाठक

नक्सली अपने ही दर्शनशास्त्र के विरुद्ध खड़े हैं

नक्सली अपने ही दर्शनशास्त्र के विरुद्ध खड़े हैं

0 चाणक्य चिंतन / 2012/02/10 9:56 am

हर्ष वर्द्धन कुमार नक्सल कमांडर किशनजी के मारे जाने से बौखलाए नक्सलियों द्वारा झारखण्ड में पुलिस बालों पर लगातार हमला जारी है | झारखंड के गढ़वा जिले में नक्सली विस्फोट

नारी मौन साधक

नारी मौन साधक

1 देवी नागरानी / 2012/02/09 3:51 pm

जीवन एक संघर्ष, एक चुनौती है जिसे हर इंसान को स्वीकारना पड़ता है। संघर्ष में न सिर्फ़ उन्हें ऊर्जस्विता मिलती है, बल्कि जीवन के विविध रूप से उनका परिचय भी