जंग ए आजादी में किसानों के सशस्त्र संघर्ष और आजादी के जश्न

लम्बी मुगलकालीन दासता के पश्चात् ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी की बेड़ियों को काटने के अनवरत संग्राम का सुखद परिणाम 15 अगस्त ,1947 को भारत वासियों के सम्मुख आया था । अखंड भारत के विभाजन के विष को आत्मसात करते हुए , दंगों की भयावह परिस्थितियों के मध्य भारत के नागरिकों ने ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति पाई और भारत एक लोकतान्त्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित हुआ । भारत एक ग्राम्य आधारित →आगे पढ़ें ..

बस्तर के प्रथम भूमकाल अर्थात हलबा विद्रोह (1774-1777) के मायने

Rajeev Ranjan Prasad  हलबा विद्रोह के मायने तलाशना इसलिये भी ज़रूरी है कि बस्तर का यह ज्ञात पहला जनजातीय विद्रोह संज्ञापित किया जाता है। इस विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक निहितार्थ समझने होंगे साथ ही इसके पटाक्षेप के पश्चात की परिस्थितियों का विश्लेषण किये बिना बात अधूरी रहेगी। इस विद्रोह में केवल एक ही जनजाति अर्थात हलबा ही अगुआ रहे थे। हलबा विद्रोह का सबसे बडा और व्यापक राजनीतिक →आगे पढ़ें ..

तारापुर के शहीदों की याद दिलाता है 15 फ़रवरी 1932 का वो बलिदानी दिन

मित्रों ! 15 फ़रवरी 1932 का वो बलिदानी दिन तारापुर ही नहीं समूचे भारतवर्ष के लिए गौरव का दिन है जब क्रांतिकारियों के धावक दल ने थाना पर " तिरंगा " फहराते हुए जान की बाजी लगा दी थी | राष्ट्रीय झंडा फहराने के क्रम में भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का सबसे बड़ा बलिदान "तारापुर " की धरती ने अपने 50 से अधिक सपूतों की शहादत दी थी | बिहार और देश के गौरव को बढ़ाने वाले तारापुर के शहीदों को न तो इतिहास में वो →आगे पढ़ें ..

संवेदनशील कहानीकार थे मुंशी प्रेमचंद

 ‘‘ऐ लोगों जब तुम्हें संसार में रहना है तो जिंदों की तरह रहो, मुर्दों की तरह जिंदा रहने से क्या फायदा !’’ - मुंशी प्रेमचंद  मुंशी प्रेमचंद भारत के उपन्यास सम्राट माने जाते हैं। जिनके युग का विस्तार सन् 1880 से 1936 तक है। यह कालखण्ड भारत के इतिहास में बहुत महत्त्व का है। इस युग में भारत में स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर था। वह एक सफल लेखक, देशभक्त नागरिक, कुशल वक्ता, जिम्मेदार संपादक और संवेदनशील →आगे पढ़ें ..

मध्य प्रदेश के दिलेर क्रांतिकारी महावीर कोठा

रौबदार, दिलेर, राष्ट्रभक्त और अद्भुत संगठन क्षमता वाले क्रांतिकारी महावीर कोठा सीहोर कन्टिजेंट में एक प्रभावी हवलदार थे। १८४८ से भोपाल की एक फौज को सीहोर में अंग्रेजी फौजों द्वारा फौजी प्रशिक्षण दिया जा रहा था। इस फौज को भोपाल कन्टिनजेंट कहते थे। ये फौज सिकन्दर बेगम भोपाल के पति नजर मोहम्मद खाँ (१७९१-१८१९) और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच हुए एक समझौते के अन्तर्गत गठित की गई थी। इसका →आगे पढ़ें ..

Last Stand at Lagyala Gompa

Last Stand at Lagyala Gompa L N Subramanian साल 1989 में एक जीप जो एक औरत को लेकर तवांग जा रही थी तब जैसे ही उसने दिरंग नामक जगह के पास ब्रिज पार किया वहां उस औरत को देखने के लिए लोगों की भीड़ जमा हो गई। जीप में बैठी उस औरत ने एक लड़की से पुछा कि क्या वो लग्याला गोप्पा नामक जगह जानती है । लड़की ने जवाब दिया- हां, हम वहां वसंत ऋतु में पूजा करने जाते हैं और वहां बनी शेर की कब्र पर पुष्प चढ़ाते हैं। उस औरत ने पुछा कि वो लोग →आगे पढ़ें ..

नई दृष्टि और नवीन विचारों के चितेरे डॉ० लोहिया

प्रणय विक्रम सिंह समाज मे व्याप्त प्रत्येक प्रकार की असमानता के विरुद्घ बुनियादी संघर्ष का बिगुल फूंकने वाले विचार का नाम है समाजवाद। समाजवाद वह अवधारणा है जो समाज में घर कर चुकी दमित व मानवता विरोधी मान्यताओं का पुरजोर विरोध कर समतामूलक समाज की स्थापना के लिए व्यवस्था व संस्कार के बुनियादी ढंाचे में आमूल-चूल परिवर्तन की वकालत करता है। डॉ० राम मनोहर लोहिया इसी रास्ते के वह फकीर →आगे पढ़ें ..

अंधेरे में यह प्रकाशः गांधी-लोहिया-जय प्रकाश

रघुनाथ गुप्ता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 8 अगस्त 1942 को मुंबई में अंगे्रजों भारत छोड़ो का आह्वान किया और रात में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिए गए, उसके बाद देशवासियों के लिए सम्पूर्ण आजादी हेतु करो या मरो का आह्वान जेल जाने के क्रम में कर दिया। उनके इस संदेश को जिन नौजवान नेतृत्व ने सफल बनाया उसमें डा.राममनोहर लोहिया एवं लोकनायक जय प्रकाश नारायण की ऐतिहासिक भूमिका रही है जो आजादी के इतिहास →आगे पढ़ें ..

बहुजन समाज में राजनीतिक चेतना जगाने वाले नायक थे कांशीराम

कांशीराम - भारत की राजनीति में एक अनूठा व्यक्तित्व | बालक कांशीराम का जन्म खवासपुर गाँव - जिला रोपड़ - पंजाब में एक रामदासिया हरिजन परिवार में हुआ था | गाँव में ही शिक्षा ग्रहण करने वाले बालक कांशीराम के दादा व चाचा फ़ौज में थे | कांशीराम ने विज्ञानं स्नातक की शिक्षा रोपड़ में ग्रहण की | बाल्य कल से लेकर शैक्षिक जीवन तक कांशीराम को सामाजिक भेदभाव व छुआ छूत का अनुभव नहीं था क्यूंकि आर्य समाज →आगे पढ़ें ..

सरल जीवन का सुंदर दर्शन

अनिल सौमित्र 81 वर्ष की अवस्था में भी सुदर्शन जी का अपना जीवन दर्शन बहुत बाल सुलभ था। अक्सर लोग उनके इस बाल सुलभ दर्शन को परख नहीं पाते थे और सवाल उठाते थे लेकिन स्वयंसेवक से सरसंघचालक तक की अपनी संघ यात्रा में उनकी सहजता, सरलता और भारतीय परंपराओं के प्रति अगाध श्रद्धा कभी कम नहीं हुई। हृदयरोग जैसी गंभीर बीमारी के बावजूद उन्हें देशज तरीकों और परहेजों से हृदयरोग को दूर रखा। लेकिन आज उसी →आगे पढ़ें ..

राष्ट्रवादी दर्शन के महाकाव्य थे ‘सुदर्शन ‘

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सर संघ चालक के.एस.सुदर्शन ने हमेशा के लिए इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया है। शनिवार की भोर ने देश से उसका सच्चा सपूत छीन लिया। वह हिंदुत्व, राष्ट्रीययता और राष्ट्रीय गौरव के प्रबल पैरोकार थे। कहा जाता है कि वह हार्ड लाइनर थे। यह कुछ हद तक ठीक भी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे राष्ट्रवादी संगठन की विचारधारा से ओतप्रोत निष्ठवान कार्यकर्ता के लिए →आगे पढ़ें ..
September 15, 2012

नवीन सोच के धनी : श्री कुप्.सी. सुदर्शन

श्रद्धांजलि लेख - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक श्री कुप्.सी. सुदर्शन मूलतः तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर बसे कुप्पहल्ली (मैसूर) ग्राम के निवासी थे। कन्नड़ परम्परा में सबसे पहले गांव, फिर पिता और फिर अपना नाम बोलते हैं। उनके पिता श्री सीतारामैया वन-विभाग की नौकरी के कारण अधिकांश समय मध्यप्रदेश में ही रहे और वहीं रायपुर (वर्तमान छत्तीसगढ़) में 18 जून, 1931 को श्री सुदर्शन →आगे पढ़ें ..

हिंदू धर्म,दर्शन और अध्यात्म के प्रचारक स्वामी विवेकानंद

गुरूदेव श्री रामकृष्ण परमहंस की अमर वाणी, ‘‘सभी धर्म सत्य हैं और वे ईश्वर प्राप्ति के विभिन्न उपाय मात्र हैं। ‘‘को आत्म सात् किये हुए स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो -अमेरिका में आयोजित होने वाले विराट धर्मसभा व महासम्मेलन में जाने का निश्चय मद्रास के शिष्यों के अनवरत् दबाव व इच्छा तथा एक रात को गुरूदेव श्री रामकृष्ण परमहंस को स्वप्न में देखा कि वे महासागर के अथाह जल में पैदल चलते चले →आगे पढ़ें ..

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथी “क्रांतिकारी मोहन लहरी” नहीं रहे

राजीव रंजन प्रसाद अभी अभी यह दु:खद सूचना मिली है कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथी “क्रांतिकारी मोहन लहरी” नहीं रहे। श्री मोहन लहरी जी का जन्म 1908 को होशंगाबाद में हुआ था तथा 104 वर्ष की संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा के पश्चात कांकेर (बस्तर) के एक गेस्ट हाउस में 29 अगस्त 2012 की मध्य रात्रि को उन्होंने आखिरी सांस ली। श्री मोहन लहरी के साथ आज उस जीवित इतिहास का अंत हो गया जो भारतीय स्वतंत्रता के →आगे पढ़ें ..

पूर्वोत्तर की जनजातियां जुडी हैं रामायण-महाभारत काल से

|| ओमप्रकाश तिवारी || पूर्वोत्तर की जिन जनजातियों को शेष भारत में चीनी कहकर चिढ़ाया जाता है, वे असल में खांटी भारतीय जनजातियां हैं। ये अपने आप को न सिर्फ रामायण-महाभारत के पात्रों का वंशज मानती हैं, बल्कि अपने पूर्वजों की परंपराओं को जीवित भी रखे हुए हैं। सबसे पहले सूर्यदेव को प्रणाम करने वाले अरुणाचल प्रदेश की 54 जनजातियों में से एक मिजो मिश्मी जनजाति खुद को भगवान कृष्ण की पटरानी रुक्मिणी →आगे पढ़ें ..

समुद्रगुप्त की दक्षिणापथ विजय यात्रा और प्राचीन बस्तर

राजीव रंजन प्रसाद दक्षिण भारत को प्रमुखता के साथ इतिहास की पुस्तकों में जगह नहीं मिली है। वस्तुत: जब उत्तर भारत में साम्राज्यों के उत्थान पतन के दौर रहे तब भी सम्पूर्ण दक्षिणापथ के पास अपना गौरवशाली इतिहास व राजनीति रही है। प्राचीन बस्तर जिसे मौर्य काल में स्वतंत्र आटविक जनपद क्षेत्र कहा गया इसे समकालीन कतिपय ग्रंथों में महावन भी उल्लेखित किया गया है। साम्राज्यवादी शासक समुद्रगुप्त →आगे पढ़ें ..

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी शहादत

15 फरवरी 1932 की दोपहर सैकड़ों आजादी के दीवाने मुंगेर जिला के तारापुर थाने पर तिरंगा लहराने निकल पड़े | उन अमर सेनानियों ने हाथों में राष्ट्रीय झंडा और होठों पर वंदे मातरम ,भारत माता की जय नारों की गूंज लिए हँसते-हँसते गोलियाँ खाई थी | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े गोलीकांड में देशभक्त पहले से लाठी-गोली खाने को तैयार हो कर घर से निकले थे | 50 से अधिक सपूतों की शहादत के बाद स्थानीय थाना →आगे पढ़ें ..

बस्तर में भी सुलग उठी थी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला

राजीव रंजन प्रसाद बस्तर को आन्दोलन सिखाने वालों की कोई कमी नहीं है तथा उसे बेज़ुबान बताने की साजिश दिल्ली के कई रंगमंचो से निरंतर जारी है। यह एक किस्म की राजनीति है जिसके परोक्ष में जंगल के भीतर चल रही आतंकवाद की दूकानों को खाद-पानी पहुँचाना ही है। बस्तर तो सर्वदा आन्दोलित रहा है बल्कि उसके मौलिक तथा वास्तविक आन्दोलन के स्वरूप का दम ही ‘लाल-आतंकवाद’ नें बेहद बुरी तरह घोंट दिया है। →आगे पढ़ें ..

शहीद उधम सिंह उर्फ राम मुहम्मद सिंह आजाद

आज ..31 जुलाई महान." शहीद उधम सिंह का शहादत दिवस " इस बलिदानी को शतशत नमन .... " राम मुहम्मद सिंह आजाद "...यही नाम बताया था ब्रटिश पुलिस को अपने ' कार्य सिद्दी ' के बाद उधम सिंह ने ..ओ डायर मारा जा चुका था. घटना 13 मार्च 1940 की है .." देशप्रेम का यह पैगम्बर "..संकल्पित था 13 अप्रेल 1919 को ब्रटिश दुर्दांत हुकूमत द्वारा ' जलियांवाला बाग़ ' में मारे गए अपने देशवासियों के क्रूर अपमानजनक मौत का बदला लेने के लिए ..लगभग →आगे पढ़ें ..

कारगिल विजय दिवस

पाकिस्तान 1947 ई. में भारत से तो अलग हो गया था लेकिन उसकी गिद्ध-दृष्टि कश्मीर पर टिकी हुई थी क्योंकि अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य के चलते कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता हैं और इसी को हासिल करने के लिए उसने भारत पर तीन बार आक्रमण भी किया परन्तु हर-बार उसे मुँह की ही खानी पङी ( करारी शिकस्त झेलनी पङी )। जब लाहौर बस से शांति व अमन का पैगाम लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी फरवरी →आगे पढ़ें ..