लम्बी मुगलकालीन दासता के पश्चात् ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी की बेड़ियों को काटने के अनवरत संग्राम का सुखद परिणाम 15 अगस्त ,1947 को भारत वासियों के सम्मुख आया था । अखंड भारत के विभाजन के विष को आत्मसात करते हुए , दंगों की भयावह परिस्थितियों के मध्य भारत के नागरिकों ने ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति पाई और भारत एक लोकतान्त्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित हुआ ।
भारत एक ग्राम्य आधारित →आगे पढ़ें .. जंग ए आजादी में किसानों के सशस्त्र संघर्ष और आजादी के जश्न
लम्बी मुगलकालीन दासता के पश्चात् ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी की बेड़ियों को काटने के अनवरत संग्राम का सुखद परिणाम 15 अगस्त ,1947 को भारत वासियों के सम्मुख आया था । अखंड भारत के विभाजन के विष को आत्मसात करते हुए , दंगों की भयावह परिस्थितियों के मध्य भारत के नागरिकों ने ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति पाई और भारत एक लोकतान्त्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित हुआ ।
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रघुनाथ गुप्ता
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 8 अगस्त 1942 को मुंबई में अंगे्रजों भारत छोड़ो का आह्वान किया और रात में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिए गए, उसके बाद देशवासियों के लिए सम्पूर्ण आजादी हेतु करो या मरो का आह्वान जेल जाने के क्रम में कर दिया। उनके इस संदेश को जिन नौजवान नेतृत्व ने सफल बनाया उसमें डा.राममनोहर लोहिया एवं लोकनायक जय प्रकाश नारायण की ऐतिहासिक भूमिका रही है जो आजादी के इतिहास
अनिल सौमित्र
81 वर्ष की अवस्था में भी सुदर्शन जी का अपना जीवन दर्शन बहुत बाल सुलभ था। अक्सर लोग उनके इस बाल सुलभ दर्शन को परख नहीं पाते थे और सवाल उठाते थे लेकिन स्वयंसेवक से सरसंघचालक तक की अपनी संघ यात्रा में उनकी सहजता, सरलता और भारतीय परंपराओं के प्रति अगाध श्रद्धा कभी कम नहीं हुई। हृदयरोग जैसी गंभीर बीमारी के बावजूद उन्हें देशज तरीकों और परहेजों से हृदयरोग को दूर रखा। लेकिन आज उसी
श्रद्धांजलि लेख -
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक श्री कुप्.सी. सुदर्शन मूलतः तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर बसे कुप्पहल्ली (मैसूर) ग्राम के निवासी थे। कन्नड़ परम्परा में सबसे पहले गांव, फिर पिता और फिर अपना नाम बोलते हैं।
उनके पिता श्री सीतारामैया वन-विभाग की नौकरी के कारण अधिकांश समय मध्यप्रदेश में ही रहे और वहीं रायपुर (वर्तमान छत्तीसगढ़) में 18 जून, 1931 को श्री सुदर्शन
राजीव रंजन प्रसाद
अभी अभी यह दु:खद सूचना मिली है कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के साथी “क्रांतिकारी मोहन लहरी” नहीं रहे। श्री मोहन लहरी जी का जन्म 1908 को होशंगाबाद में हुआ था तथा 104 वर्ष की संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा के पश्चात कांकेर (बस्तर) के एक गेस्ट हाउस में 29 अगस्त 2012 की मध्य रात्रि को उन्होंने आखिरी सांस ली। श्री मोहन लहरी के साथ आज उस जीवित इतिहास का अंत हो गया जो भारतीय स्वतंत्रता के
राजीव रंजन प्रसाद
बस्तर को आन्दोलन सिखाने वालों की कोई कमी नहीं है तथा उसे बेज़ुबान बताने की साजिश दिल्ली के कई रंगमंचो से निरंतर जारी है। यह एक किस्म की राजनीति है जिसके परोक्ष में जंगल के भीतर चल रही आतंकवाद की दूकानों को खाद-पानी पहुँचाना ही है। बस्तर तो सर्वदा आन्दोलित रहा है बल्कि उसके मौलिक तथा वास्तविक आन्दोलन के स्वरूप का दम ही ‘लाल-आतंकवाद’ नें बेहद बुरी तरह घोंट दिया है।
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