2
जनोक्ति डेस्क / 2009/08/01 5:09 pm
प्राचीन काल की बात है किसी नगरी में नेता जी नामक एक प्राणी रहा करते थे |उनके कार्यकाल में ,नगर में सर्वत्र शान्ति थी | नागरिक गण अपना-अपना कार्य बड़ी लगन व निष्ठा से कर रहे थे .किसी कार्य के लिए ‘सोर्स-पैरवी ‘ लगवाना एक निकृष्ट कार्य समझा जाता था। लोग अपनी योग्यता व दक्षता के बल से आगे बढ़ते थे।परस्पर प्रेम व भाई चारा व सौहार्द्र था।नेता जी प्राय: अपने निर्वाचन क्षेत्र में ही भ्रमणरत रहा करते थे।प्रगति की बात किया करते थे समस्यायें सुनते थे।
0
जनोक्ति डेस्क / 2009/07/25 11:11 am
सखेद सधन्यवाद… इधर विगत कुछ दिनो से जब मेरी रचनाएं ’सखेद सधन्यवाद’ वापस आने लगी तो मुझे हिंदी की ’दशा’ व ’दिशा’ दोनों की चिन्ता होने लगी।अब यह देश नहीं
0
जनोक्ति डेस्क / 2009/07/19 7:07 pm
प्यास से व्याकुल कौए ने घडा देखा .घडे में पानी था तो ज़रूर परन्तु पेंदे में , मुंह से बहुत नीचे था .प्यास बुझाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा
0
जनोक्ति डेस्क / 2009/07/16 12:02 pm
मैं अपनी महिमा गीत ख़ुद गाकर अपने मुंह मियां मिट्ठू नही बनना चाहता । मैं एक कुर्सी हूँ । मैं एक आम घरों से लेकर आम सभा और लोकसभा तक
0
जनोक्ति डेस्क / 2009/07/16 8:06 am
मुशर्रफ, मनमोहन, ऐश्वर्या राय और सोनिया एक ट्रेन में यात्रा कर रहे हैं। ट्रेन एक सुरंग से निकलती है ट्रेन में अंधेरा हो जाता है। अचानक वहां एक चुंबन ध्वनि
0
जनोक्ति डेस्क / 2009/07/11 7:42 pm
एक व्यंग : एक इन्टरव्यू मेरा भी…. जब से प्रसारण क्रान्ति आई ,टी०वी० चैनलों की बाढ़ आ गई। जिसको देखो वही एक चैनेल खोल रहा है।कोई न्यूज चैनेल,कोई व्यूज चैनेल।समाचार
0
जनोक्ति डेस्क / 2009/07/11 11:11 am
सुदामा की पत्नी ने अपनी व्यथा कही …. ‘ हे प्राण नाथ ! या घर ते कबहूँ न बाहर गयो,यह पुरातन फ्रीज़ और श्वेत-श्याम टी०वी० अजहूँ ना बदली जा सकी.पड़ोस
3
जनोक्ति डेस्क / 2009/07/08 12:42 pm
एक व्यंग : कुत्ता बड़े साहब का …..वह बड़े साहब हैं.बड़ी -सी कोठी,बड़ी-सी गाडी, बड़ा-सा मकान ,बड़ा -सा गेट और गेट पर लटका बड़ा-सा पट्टा-’बी अवेयर आफ डाग” कुत्ते से
2
जनोक्ति डेस्क / 2009/06/21 9:47 pm
विवाहित कवियों को जो एक सुविधा सर्वदा उपलब्ध रहती है और अविवाहित कवियों को नहीं – वह है एक अदद श्रोता और वह श्रोता होती है उनकी श्रीमती जी -अभागिन
0
नरेन्द्र निर्मल / 2009/06/03 9:19 pm
बचपन से ही शर्मीला किस्म का इंसान। लड़कियां तो दूर लड़कियों के शब्द से भी सिरहन सी होने लगती। दोस्त कई सारे हुए मगर सभी समान लिंग वाले। इसका कदापि