Archive for category: व्यंग

अटेंशन – एक व्यंग्य कथा !

0 जनोक्ति डेस्क / 2012/01/29 10:12 pm

Vijay Kumar Sappatti कुछ दिन पहले तक मेरी हालत बहुत खराब थी . मुझे कहीं से कोई भी अटेंशन नहीं मिल रही थी . हर कोई मुझे बस टेंशन देकर

टीम अन्ना का संगठन शास्त्र  (व्यंग्य)

टीम अन्ना का संगठन शास्त्र (व्यंग्य)

2 जयराम "विप्लव" / 2012/01/19 12:04 pm

अन्ना इन दिनों बीमार हैं। यद्यपि उनका उत्साह कम नहीं हुआ; पर क्या करें, शरीर साथ नहीं दे रहा। उनके साथियों को भी समझ नहीं आ रहा कि इस सरदी

व्यंग्य – आधार से निराधार तक

2 विजय कुमार / 2012/01/10 1:53 pm

हर व्यक्ति के जीवन में छात्र जीवन का बड़ा महत्व है। इस समय एक दौर ऐसा भी आता है, जब लोग प्रायः कविहृदय हो जाते हैं। डायरी में गुलाब का

व्यंग्य – सदाखुश बाबू

0 विजय कुमार / 2012/01/09 1:44 pm

शर्मा जी में यों तो कई विशेषताएं हैं; पर सबसे बड़ी विशेषता है कि वे स्वयं भी खुश रहते हैं और बाकी लोगों को भी खुश रखते हैं।  अतः लोग

व्यंग्य : गरीब दर्शन

1 विजय कुमार / 2011/12/09 6:13 pm

युवराज पिछले काफी समय से बोर हो रहे थे। महारानी जी बीमारी में व्यस्त थीं, तो राजकुमारी अपनी घर-गृहस्थी में मस्त। युवराज की बचकानी हरकतों से दुखी होकर बड़े सरदारों

मुन्नी की बदनामी में छिपा मनोविज्ञान

0 जनोक्ति डेस्क / 2011/10/27 8:43 am

लेखक : अश्विनी कुमार ‘मुन्नी बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए’ – पहली पंक्ति बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. हमारे कई बुद्धिजीवी मित्र इसे एक छिछोरे गीत की एक भोंडी पंक्ति कहकर

आतंकी हमले के बाद सरकारी वक्तव्य !( व्यंग )

0 विजय कुमार / 2011/09/28 6:18 pm

वक्तव्य की तैयारी भारत सरकार चाहती है कि देश में शांति रहे। देश में भले ही न रहे; पर दिल्ली में अवश्य रहे, चूंकि राजधानी होने के कारण यहां की

हिन्दी का वार्षिक श्राद्ध !

हिन्दी का वार्षिक श्राद्ध !

1 विजय कुमार / 2011/09/13 4:49 pm

सितम्बर हिन्दी के वार्षिक श्राद्ध का महीना है। हर संस्था और संस्थान इस महीने में हिन्दी दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा मनाते हैं और इसके लिए मिले बजट को खा पी

दूसरी आजादी के साइड इफेक्ट्स

दूसरी आजादी के साइड इफेक्ट्स

0 जनोक्ति डेस्क / 2011/09/02 11:56 am

ऋतू राज ( पूर्व आई पी एस अधिकारी ) संपर्क सूत्र मेरे एक पुराने मित्र हैं. हम दोनों कालेज और विश्वविद्यालय के दिनों से ही मित्र रहे हैं और यह

व्यंग्य: मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना

0 विजय कुमार / 2011/08/29 12:53 pm

अन्ना हजारे के आंदोलन से छात्र हो या अध्यापक, किसान हो या मजदूर, व्यापारी हो या उद्योगपति; सब प्रभावित हैं। यह बात दूसरी है कि कानून बनाने वाले अभी कान