Archive for category: कविता

गाना गाया

गाना गाया

0 Sourav Roy / 2011/03/09 6:38 pm

जीवन के इस तरफ उस तरफ का अन्धकार उस तरफ जाने क्या ? आगे बढ़ा मैं रेंगता हुआ दौड़ जीता | इस जीत में शामिल थे मेरे चाहने वाले और

चप्पल से लिपटी चाहतें

0 Sourav Roy / 2011/03/08 10:58 pm

चाहता हूँ एक पुरानी डायरी कविता लिखने के लिए एक कोरा काग़ज़ चित्र बनाने के लिए एक शांत कोना पृथ्वी का गुनगुनाने के लिए | चाहता हूँ नीली – कत्थई

बोकारो

0 Sourav Roy / 2011/03/08 10:54 pm

छोटे छोटे स्टेशन देहाती इधर से राधागाँव उधर से तुपकाडीह बीच में गलियाँ जहां छोड़ आया मैं खुदको दोस्तों संग साइकिल पर घंटों का रास्ता मिनटों में तय करते हुए

मैं आप वो

0 Sourav Roy / 2011/03/08 10:53 pm

मैं ‘मैं’ हूँ ! ‘आप’ कौन हैं ये आपसे बेहतर कौन जानता है ? वो तो ख़ैर वो ही है… जब मैं और आप नहीं थे वो था | जब

ख़ुशी

0 Sourav Roy / 2011/03/08 10:51 pm

आज मैं ख़ुश हूँ | रोज़ की तरह आज भी ख़ुश हूँ | एक बेटी अपने पिता की छाती पर लात रख छत पर टांक दी गयी | मैं ख़ुश

दाढ़ी बना डाला

0 Sourav Roy / 2011/03/08 10:50 pm

घर में बैठे जब मुझे घर की याद आई खुन्नस में मैंने ब्लेड निकाला नस काटने की हिम्मत नहीं थी दाढ़ी बना डाला | मेरी सूरत देखती है कि बदला

करवटों के जोकर

0 Sourav Roy / 2011/03/08 10:49 pm

भारत का संविधान जानते हो कई लोगों को पहचानते हो समझते हो देश की तकलीफें आते हो आकर चले जाते हो | इस नितम्बाकार अजायबघर में क्यों बैठे हो ?

चिता

0 Sourav Roy / 2011/03/08 10:48 pm

मुख से फेनिल गाढ़ा खून उगलते अन्दर से झुलसाती आग नाक के संकरे सुरंगों में कैद घिनौनी बू, जली चर्बी की झाग महसूस करो तुम्हारे चेहरे की खाल गल रही

दो बहनें

0 Sourav Roy / 2011/03/08 10:47 pm

‘विरक्ति’ और ‘अशांति’ दो बहनें हैं | दो चंचल बहनें जो पता नहीं कितनों से ‘ब्याही’ हैं कितनो से ‘बंधी’ हैं | स्वांगमय-गरिमामय रूप उनका | मैं एक से ब्याहा

एकदम पाग़ल

0 Sourav Roy / 2011/03/08 10:46 pm

शाम के वक़्त आसमान गहरा नीला कुछ काला और क्षितिज गुलाबी लाल ! बच्चों की तरह बाहें फैलाकर गोल गोल घूमो तीन सौ साठ डिग्री हर तरफ देखो क्षितिज गुलाबी