गाना गाया
0जीवन के इस तरफ उस तरफ का अन्धकार उस तरफ जाने क्या ? आगे बढ़ा मैं रेंगता हुआ दौड़ जीता | इस जीत में शामिल थे मेरे चाहने वाले और
दिगम्बर नासवा इतिहास के क्रूर पन्नों पे समय तो दर्ज़ करेगा हर गुज़रता लम्हा मुँह में उगे मुहांसों से लेकर दिल की गहराइयों में छिपी क्रांति को खोल के रख
अमर क्रांति की चिनगारी से लगी प्राणों में आग सदियों से सोयी जो ज्वाला आज गयी है जाग | सर ऊंचा हिमालय जैसा गर्दन पर गंगा पसीना चरण धोतें हैं
देश की खातिर जीना शान देश की खातिर मरना शान जिससे कम हो शान वतन की ऐसा कुछ भी न कर नादान॥ भारत माँ है जननी मेरी मैं उसकी लायक
जीवन के इस तरफ उस तरफ का अन्धकार उस तरफ जाने क्या ? आगे बढ़ा मैं रेंगता हुआ दौड़ जीता | इस जीत में शामिल थे मेरे चाहने वाले और
चाहता हूँ एक पुरानी डायरी कविता लिखने के लिए एक कोरा काग़ज़ चित्र बनाने के लिए एक शांत कोना पृथ्वी का गुनगुनाने के लिए | चाहता हूँ नीली – कत्थई
छोटे छोटे स्टेशन देहाती इधर से राधागाँव उधर से तुपकाडीह बीच में गलियाँ जहां छोड़ आया मैं खुदको दोस्तों संग साइकिल पर घंटों का रास्ता मिनटों में तय करते हुए
मैं ‘मैं’ हूँ ! ‘आप’ कौन हैं ये आपसे बेहतर कौन जानता है ? वो तो ख़ैर वो ही है… जब मैं और आप नहीं थे वो था | जब
आज मैं ख़ुश हूँ | रोज़ की तरह आज भी ख़ुश हूँ | एक बेटी अपने पिता की छाती पर लात रख छत पर टांक दी गयी | मैं ख़ुश
घर में बैठे जब मुझे घर की याद आई खुन्नस में मैंने ब्लेड निकाला नस काटने की हिम्मत नहीं थी दाढ़ी बना डाला | मेरी सूरत देखती है कि बदला
भारत का संविधान जानते हो कई लोगों को पहचानते हो समझते हो देश की तकलीफें आते हो आकर चले जाते हो | इस नितम्बाकार अजायबघर में क्यों बैठे हो ?
मुख से फेनिल गाढ़ा खून उगलते अन्दर से झुलसाती आग नाक के संकरे सुरंगों में कैद घिनौनी बू, जली चर्बी की झाग महसूस करो तुम्हारे चेहरे की खाल गल रही
‘विरक्ति’ और ‘अशांति’ दो बहनें हैं | दो चंचल बहनें जो पता नहीं कितनों से ‘ब्याही’ हैं कितनो से ‘बंधी’ हैं | स्वांगमय-गरिमामय रूप उनका | मैं एक से ब्याहा
शाम के वक़्त आसमान गहरा नीला कुछ काला और क्षितिज गुलाबी लाल ! बच्चों की तरह बाहें फैलाकर गोल गोल घूमो तीन सौ साठ डिग्री हर तरफ देखो क्षितिज गुलाबी